अकशेरूकीय
मधुमक्खी (Honey Bee)
वर्गीकरण (Classification) à संघ-ऑर्थोपोडा à वर्ग-इंसेक्टा à गण-हाइमेनोप्टेरा à कुल-एपिडी à जाति-एपिस
– मधुमक्खियों की चार प्रजातियाँ मिलती हैं–
(i) एपिस मैलीफेरा (ii) एपिस डोरसेटा
(iii) एपिस इंडिका (iv) ऐपिसफ्लोरी
– तीन प्रजातियाँ भारत में बहुतायत से पाई जाती हैं।
आवास तथा स्वभाव
– मधुमक्खियाँ, कॉलोनी बनाकर रहती हैं। बड़े-बड़े समूह बनाकर सामाजिक रूप से रहना इनका स्वभाव है।
– मधुमक्खियों की कॉलोनी में तीन प्रकार के वर्ग पाए जाते हैं। अपने कार्यों की दृष्टि से ये वर्ग श्रमिक मक्खी (Worker), रानी मक्खी (Queen) एवं नर मक्खी (Drone) कहलाते हैं।
– कीट जगत में मधुमक्खी की गणना अत्यन्त विकसित वर्ग में की जाती है। उसका शरीर स्पष्ट रूप से सिर, धड़ और उदर में बंटा होता है तथा उनके दो युग्म पक्ष एवं तीन युग्म संधित टाँगें होती हैं।
मधुमक्खी के प्रकार
रानी मधु मक्खी (Queen Honey Bee)
– रानी मधु मक्खी आकार में सबसे लम्बी होती है। इसका संकरा उदर इसकी विशेष पहचान है। इसके पैर, पक्ष, मुखांग एवं डंक सभी छोटे होते हैं। यह मोम व शहद का निर्माण करने में असमर्थ होती है। सारे छत्ते में केवल रानी ही जनन-क्षम मादा होती है। एक छत्ते में एक ही सक्रिय रानी होती है।
– रानी का काम निरंतर अंडे देना होता है। वह कई वर्षों तक जीवित रहती है। रानी की उत्पत्ति भी निषेचित अंडे से ही होती है।
– रानी के रूप में विकसित होने वाले लार्वी को विशेष रस दिया जाता है जिसे ‘रॉयल जैली’ (Royal Jelly) कहते हैं।
श्रमिक वर्ग (Worker)
– आकार की दृष्टि से कॉलोनी में श्रमिक मक्खी (Worker Bee) सबसे छोटी होती है किन्तु कार्य की दृष्टि से वह सबसे अधिक महत्त्व रखती है। श्रमिक मक्खी भीतर और बाहर के सभी काम करती है। वह छत्ता बनाती है।
– कॉलोनी की रक्षा करती है तथा बाहर से फूलों का रस और परागकण एकत्र करके लाती है तथा शहद तैयार करके कोष्ठों में भरती रहती है। श्रमिकों के मुखांग लेहन और रेसन (लेपिंग और रेसपिंग) किस्म के होते हैं जो फूलों से रस चूसने तथा पराग एकत्र करने का कार्य करते हैं। क्रॉप में लार्वी ग्रन्थियों से प्राप्त होने वाला एक एन्जाइम से मिलकर फूलों का रस शहद में परिवर्तित हो जाता है।
– शहद डेक्स्ट्रीज और लेब्यूलोज शक्कर का मिश्रण होता है। श्रमिक मक्खी के उदर के अधर भाग में मोम ग्रन्थियाँ (Wax glands) पाई जाती हैं। मोम बारीक छिद्रों द्वारा शल्कों के रूप में बाहर निकलता है।
– श्रमिक के पश्च भाग में एक डंक होता है। श्रमिक मक्खियाँ बन्ध्य मादाएँ होती हैं जिनकी उत्पत्ति निषेचित अंडों से होती है।
नर मधु मक्खी (Drone Honey Bee)
– एक सामान्य छत्ते में नर मक्खियों की संख्या 100-200 होती है। नर मक्खी का आकार मध्यम श्रेणी का होता है। यह अधिक मजबूत और चौड़े नजर आते हैं।
– नर मक्खियों का जन्म अनिषेचित अंडों से होता है। अनिषेक जनन के द्वारा ये उत्पन्न होती हैं।
– जीवन चक्र (Life Cycle) –

वृन्दन –
– बसन्त के उत्तरार्द्ध अथवा ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ में मक्खियों का एक दल नई कॉलोनी बनाता है। इस समय खाद्य सामग्री की बहुलता के कारण छत्ते में मक्खियों की संख्या बहुत अधिक हो जाती है।
निषेचन में –
– अंडज उत्पत्ति के करीब एक हफ्ते बाद रानी मक्खी अपने छत्ते से बाहर निकलकर हवा में उड़ती है। काफी प्रयत्नों के बाद एक नर मक्खी को रानी मक्खी के साथ संभोग करने में सफलता प्राप्त होतो है। मैथून हवा में ही होता है। अतः इसे मैथून उड़ान कहते हैं। रानी मक्खी नर से शुक्राणु प्राप्त करती है। शुक्राणु रानी की शुकग्राहिका में संगृहीत हो जाते हैं जो जीवन भर अंडों को निषेचित करते रहते हैं।
– मैथून के कुछ समय पश्चात् नर की मृत्यु हो जाती है। उधर असफल नर मक्खियों को श्रमिक मक्खियाँ वापस छत्ते में आने नहीं देती हैं। मैथुन के तीन-चार दिन बाद से रानी अंडे देने लगती हैं। वह दो प्रकार के अंडे देती है।
– निषेचित अण्डों से मादा-रानी एवं श्रमिक तथा अनिषेचित अंडों से नर मक्खियों की उत्पत्ति होती है। छत्ते में रानी, श्रमिक एवं नर के लिए अलग-अलग कोष्ठ होते हैं। अंडे लम्बवत् तथा हल्के गुलाबी रंग के होते हैं जो छत्ते के तल से चिपके रहते हैं।
विकास (Development)
– तीन दिन पश्चात् अंडों से लार्वी निकल आते हैं जो ‘ग्रब्ज’ कहलाते हैं। लारवी की देखभाल एवं खिलाई-पिलाई श्रमिक ही करते हैं। पहले दो दिन ग्रब्ज को ‘रॉयल जैली’ दी जाती है।
– रॉयल जैली शहद और श्रमिकों के आन्तरिक रस मिश्रित परागकणों के मिश्रण से तैयार होती है। दो दिन पश्चात् जिन ग्रब्ज को बराबर रॉयल जैलो ही दी जाती है, रानी में विकसित होती हैं।
– केवल शहद पाने वाले ग्रब्ज श्रमिक अथवा नर मक्खियों में विकसित होते हैं। छत्ते में षट्कोणिक परिकोष्ठों की दो तहें होती हैं। परिकोष्ठ मधुमोम से बनाये जाते हैं जो सिफेलिक ग्रन्थियों के स्त्राव से मिलकर प्लास्टिक पदार्थ में बदल जाता है।
– शहद और पराग का संग्रह करने वाली तथा श्रमिक, रानी एवं नर मक्खियों के परिकोष्ठों के आकार भिन्न-भिन्न होते हैं। छत्ते के बाहर और सिरे की ओर संग्रह परिकोष्ठ होते हैं जबकि निवास परिकोष्ठ भीतरी और केन्द्रीय भाग में होते हैं।
मधुमक्खी का कृषि में महत्व:-
– मधुमक्खी से हमें शहद प्राप्त होता है। शहद खाद्य दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पदार्थ है। शुद्ध ताजा शहद में विशेष चीनी, कुछ खनिज तथा एन्जाइम्स होते हैं। इसलिए शहद स्वास्थ्य के लिए अच्छा पदार्थ माना जाता है।
– शहद के अतिरिक्त मधुमोम भी महत्त्वपूर्ण वस्तु है जिसका औषधि के रूप में उपयोग होता रहा है।
– इनका सबसे बड़ा योगदान ‘परागण’ में होता है। जब यह एक फूल से दूसरे फूल और एक पेड़-पौधे से दूसरे पेड़-पौधे पर जाती हैं तब उनके शरीर पर लगे परागकणों से परागण होने में मदद मिलती है। परागण से ही हमें फल व बीज प्राप्त होते हैं।
कीट नियन्त्रण:-
– कीट नियन्त्रण के अन्तर्गत व्यापक रूप से उन सभी बातों का समावेश होता है जो कीटों की संख्या में वृद्धि को रोक सके। कीटों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से रोक सके तथा उनकी बढ़ी हुई समष्टि को समाप्त कर उनकी संख्या को नियन्त्रित कर सकें।
– कीट नियन्त्रण को प्रमुख रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है-
(i) प्राकृतिक नियन्त्रण (Natural control)
(ii) कृत्रिम नियन्त्रण (Artificial control)
(iii) भौतिक नियन्त्रण (Physical control)
(iv) यांत्रिक नियन्त्रण (Mechanical control)
(v) कर्षण नियन्त्रण (Cultural control)
(vi) रासायनिक नियन्त्रण (Chemical control)
(vii) जैविक नियन्त्रण (Biological control)
(i) प्राकृतिक नियन्त्रण (Natural control):-
– प्राय: प्रकृति में कुछ ऐसे भौतिक व जैविक कारक होते हैं जो स्वयं कीटों की संख्या को कम कर देते हैं। प्राकृतिक कारक निम्नलिखित प्रकार से है-
(a) मौसम संबंधित कारक:-
– तापमान, आर्द्रता, वर्षा, सर्दी, वायु, प्रकाश, वायुमण्डलीय दबाव, गर्मी आदि कारकों का सामूहिक रूप से प्रभाव कीटों पर पड़ता है।
(b) भौतिक संरचना संबंधित कारक:-
– विभिन्न प्राकृतिक संरचनाएँ जैसे समुद्र, झील, मरुस्थल, नदियाँ, पर्वत, जंगल, मृदा संरचना आदि कीटों के फैलाव में प्रभावी अवरोधक का कार्य करते हैं।
(c) प्राकृतिक शत्रुओं द्वारा नियन्त्रण:-
– प्रकृति में प्राय: कशेरुकी व अकशेरुकी प्राणी कीटों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं। जैसे- परभक्षी कीट, परजीवी सूत्रकृमि, मेंढक, छिपकली, पक्षी, मछलियाँ आदि।
(d) प्राकृतिक रोगों द्वारा नियन्त्रण:-
– सूक्ष्मजीव जैसे प्रोटोजोआ, विषाणु, जीवाणु, कवक आदि द्वारा उत्पन्न रोग कीटों की मृत्यु का प्रमुख कारण होती है।
2. कृत्रिम नियन्त्रण (Artificial control):-
– कृत्रिम नियन्त्रण में उन सभी विधियों को सम्मिलित किया जाता है जो मनुष्य द्वारा संचालित की जाती है। विभिन्न फसलों में कृषिगत प्रबन्धन विधियों की सफलता के लिए इसकी पूर्ण जानकारी आवश्यक है।
1. फसल व नाशककीट के जीवन चक्र के सम्बन्ध में पूर्ण व सही जानकारी होनी चाहिए।
2. हानिकारक कीटों के नियन्त्रण के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली विभिन्न प्रभावी विधियों का निर्धारण करना।
3. कृषि पारिस्थितिकी तन्त्र
4. हानिकारक कीट के जीवनचक्र में दुर्बल अवस्था को पहचानने के सन्दर्भ में ऋतुजैविकी का अध्ययन।
भौतिक नियन्त्रण (Physical control):-
– इस विधि के अन्तर्गत तापक्रम, नमी ध्वनि ऊर्जा तथा विकिरण का उपयोग कर प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से कीटों को नष्ट किया जाता है।
– तापमान:- अधिकांश कीट 10-35°C तापमान पर सामान्य रूप से जीवित एवं सक्रिय रहते हैं। उच्च ताप (60-66°C) पर कीटों को अल्प समय तक रखने पर कीट मर जाते हैं। इसका उपयोग प्राय: भण्डारण अनाज, फसलों, फलों व कपड़ों के विरुद्ध किया जाता है।
– प्रकाश:- प्रकाश का उपयोग रात्रिचर कीटों जैसे सफेद लट, कातरा, तंबाकू की लट आदि को आकर्षित करके मारने में किया जाता है।
– नमी (Moisture):- नमीयुक्त वातावरण में कीटों की वृद्धि अधिक होती है। इसलिए अनाज को भंडारित करने से पूर्व उसे भली भांति सूखाकर नमी का प्रतिशत 8-10 रखा जाता है।
– विकिरण ऊर्जा (Radiation energy):- गामा व एक्स Rays का प्रयोग भण्डारित अनाज के कीटों के विरुद्ध किया जा रहा है।
– यांत्रिक नियन्त्रण (Mechanical control):- कीट नियन्त्रण की इस विधि में हस्तनिर्मित उपकरणों तथा मशीनों का प्रयोग किया जाता है। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित विधियों का उपयोग किया जाता है।
(a) हाथों द्वारा कीटों को पकड़ना (Hand picking):- यह अतिप्राचीनतम विधि है। यह विधि उन कीटों के विरुद्ध कारगर है जो आकार में बड़े हो या उनके अण्डे समूह में रहते हो। जैसे- कातरा, गोभी की तितली, नीबू की तितली, चने की लट इत्यादि।
(b) हस्तजाल द्वारा (Hand nets):- इस विधि में उड़ने वाले कीटों जैसे टिड्डा, पायरीला, पतंगें आदि को हस्तजाल द्वारा पकड़कर नष्ट किया जाता है।
(c) बाड़ लगाकर:- खेत के चारों तरफ बाड़ लगाकर रेंगने वाले कीटो को नियंत्रित किया जाता है।
(d) खाई खोदना (Trenching):- टिड्डे, सैन्य कीट आदि कीटों को उनके मार्ग में खाई खोदकर नष्ट किया जा सकता है।
(e) तनों पर पट्टी बाँधना (Tree banding):- आम के वृक्ष को मिली बग के प्रकोप से बचाने के लिए 20-30 सेमी. चौड़ी ग्रीस की पट्टी एक मीटर की ऊँचाई पर लगा देने से जमीन से निकले कीट के निम्फ पेड़ पर चढ़ नहीं पाते हैं।
(f) पाश या ट्रेप का उपयोग:- कीटों को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न प्रकार के ट्रेप्स या पाशों का उपयोग किया जाता है।
(i) प्रकाश पाश (Light Trap):-
– रात्रिचर कीट व ऐसे कीट जो प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं, उसके लिए प्रकाश पाश (लाईट ट्रेप) का उपयोग किया जाता है।
– लाइट ट्रेप में मर्करी वेपर बल्ब, अल्ट्रावॉयलेट ट्यूब आदि का उपयोग प्रकाश स्रोत के रूप में किया जाता है।
– साधारणतया पाश को रात्रि को जलाकर चौड़े बर्तन में रख दिया जाता है जिसके ऊपर मिट्टी के तेल सहित पानी (5:95) को भरकर रखते हैं। कीट प्रकाश की ओर आते हैं व उससे टकराकर पानी में गिरकर मर जाते हैं।
(ii) चिपचिपा पाश:-
– उड़ने वाले छोटे कीटों जैसे माहू, हरा तेला इत्यादि को नष्ट करने के लिए चिपचिपे पाश का प्रयोग किया जाता है।
– इसमें लकड़ी के कार्ड बोर्ड, टिन के पतरों आदि के ऊपर चिपचिपा पदार्थ के साथ कीटनाशी मिलाकर लगा देते हैं।
– इनको खेतों की मेड के आसपास लगा देते हैं और ये कीट इन पर चिपक कर समाप्त हो जाते हैं।
(iii) फेरामोन ट्रेप:-
– फेरामोन वह रासायनिक पदार्थ है जो विपरीत लिंग के कीटों को समागम के लिए अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन कीटों में से एक विशेष प्रकार की सुगन्ध निकलती है जिससे नाशकीट उनकी ओर आकर्षित होते हैं और जाल में फँस जाते हैं।
कर्षण नियन्त्रण:-
– कर्षण नियंत्रण, कीट नियंत्रण की बहुत सरल, सस्ती व कीटों के प्राकृतिक शत्रुओं के प्रति सुरक्षित विधि है।
– इसके अन्तर्गत फसल के अधिक उत्पादन व खेती की आयु को बढ़ाने के लिए विभिन्न तकनीकों का उपयोग करते हैं।
– कृषिगत क्रियाओं में कीटों के प्रजनन शक्ति को रोकते हैं या फसलों के अन्दर कीटा विरोधी गुण उत्पन्न करते हैं जिससे कीट उनसे दूर रहे। कृषिगत क्रियाओं में कई भागों में विभाजित किया गया है-
(a) फसल चक्र (Crop rotation) अपनाना:-
– फसल चक्र वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत किसी निश्चित क्षेत्र में एक नियत अवधि में फसलों को इस क्रम में उगाया जाता है कि मृदा की उर्वरा शक्ति का कम से कम ह्रास हो जिससे फसल में लगने वाले कीट व रोग दूसरी कुल की फसल में ना लगे।
(b) जुताई एवं निराई-गुड़ाई:-
– जुताई एवं निराई-गुड़ाई करने का समय ऐसे निर्धारित करना चाहिए जिससे नाशक कीटों के प्राकृतिक शत्रुओं को कोई हानि ना पहुँचे।
– भूमि में उपस्थित नाशक कीटों की विभिन्न अवस्थाएँ भूमि की संरचना, नमी, तापमान आदि के कारण बाहरी वातावरण में आ जाती है जिससे उनके प्राकृतिक शत्रु उन्हें मारकर अपने भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं।
(c) बीज बोना, फसल लगाना व काटना:-
– फसल के पकते ही उसकी कटाई कर दी जानी चाहिए।
– बीज बोने की प्रक्रिया कीटों की प्रकोप अवस्था को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए।
– फसलों की बुवाई तथा कटाई के समय व प्रक्रियाओं में परिवर्तन करने से कीटों को नियंत्रित किया जा सकता हे।
(d) प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग:-
– विभिन्न प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करके कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है।
(e) खरपतवारों व अवशेषों को नष्ट करना:-
– फसलों की कटाई के पश्चात् उनके अवशेषों व परपोषी पौधों या खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए जिससे नाशक कीटों को वृद्धि करने का अवसर नहीं मिलता है।
(f) सन्तुलित उर्वरक एवं सिंचाई प्रबन्धन:-
– विभिन्न प्रकार की फसलों (गेहूँ, धान, सब्जियाँ, फलदार वृक्ष, कपास) में आवश्यक उर्वरक व पोषक तत्त्वों की संतुलित मात्रा में प्रयोग में लेनी चाहिए जिससे नाशी कीटों की संख्या में वृद्धि ना हो।
– समय-समय पर तथा आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करते रहना चाहिए जिससे कीट व रोगों का प्रभाव कम होता है।
(g) मिश्रित फसलों की खेती:-
– मिश्रित फसलों की खेती के अन्तर्गत एक समान फसलों के बीच दूरी हो जाती है जिससे उनके बीच में स्थित अन्य दूसरी फसलों के पौधे एक-दूसरे के नाशी कीटों के लिए अवरोध उत्पन्न करते हैं।
(h) ट्रेप क्रॉपिंग:-
– मुख्य फसल की कीटों से सुरक्षा हेतु गौण फसलों को उगाया जाता है जिससे कीटों का प्रकोप उन अन्य फसलों पर हो तथा मुख्य फसल को कीटों के आक्रमण से बचाया जा सके।
रासायनिक नियंत्रण (Chemical control):-
– रासायनिक पदार्थों द्वारा कीटों व उनकी समष्टियों को नष्ट करना, उनकी वृद्धि को रोकना या भगाना, रासायनिक नियन्त्रण कहलाता है।
– वे संश्लेषित रसायन जिनका उपयोग हानिकारक कीटों व अन्य जीवों को नष्ट करने हेतु किया जाता है, पीड़कनाशी (Pesticides) कहलाते हैं।
मुख्य प्रकार के पीड़कनाशी
क्र.स. | पीड़कनाशी के प्रकार | प्रभावित जीव-जन्तु |
1. | कीटनाशी | कीट |
2. | कवकनाशी | कवक |
3. | शाकनाशी | शाक (पौधे) |
4. | बरुथीनाशी | बरुथी |
5. | सूत्रकृमिनाशी | सूत्रकृमि |
6. | कृन्तकनाशी | चूहे |
7. | मोलस्कनाशी | स्लग और घोंघे |
8. | जीवाणुनाशी | जीवाणु |
9. | खरपतवारनाशी | खरपतवार |
10. | मत्स्यनाशी | मछली |
1. कीटनाशी:-
कीटनाशी रसायन:-
– कीटों के नियंत्रण के लिए प्रयुक्त रसायन कीटनाशी (Insectisides) कहलाते हैं।
– भारत में सघन कृषि के विस्तार के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पीड़कनाशियों के प्रयोग में तीव्र वृद्धि हुई है। प्राय: कीटनाशियों का प्रयोग बहुत ही प्राचीन है। सल्फर का उपयोग कीटनाशी के रूप में ईसा से 100 वर्ष पहले किया गया था।
कीटनाशी सूत्रीकरण (Insecticides formulation):-
– सभी कीटनाशियों के सफल प्रयोग व वाणिज्यिक उत्पाद का उत्पादन करने के लिए उपयुक्त सूत्रीकरण आवश्यक होता है।
– कीटनाशी सामान्यत: दो बुनियादी सूत्रीकरण के रूप में पाए जाते हैं- गैस व तरल।
तरल (द्रव्य) सूत्रीकरण (Liquid formulation):-
1. विलयन (Solution):-
– संश्लेषित कार्बनिक कीटनाशी को कार्बनिक विलायकों में जैसे तेल, ईथर अथवा पैराफिन तेल में मिलाया जाता है क्योंकि यह जल में घुलनशील नहीं है जैसे फिनिट।
2. पायसीकरण सान्द्र (EC):-
– प्राकृतिक यौगिक को उपयुक्त जैव विलायक में घोला जाता है क्योंकि यह जल में घुलनशील नहीं है।
3. सान्द्र कीटनाशी द्रव (Concentrate liquid insecticides):-
– इसमें जल की मात्रा को कम रखा जाता है। जैसे- मेलाथियान का 95 प्रतिशत सान्द्र कीटनाशी द्रव।
4. ऐरोसॉल:-
– कीटनाशी का इस प्रकार सूत्रीकरण किया जाता है ताकि इसे अतिमहीन बूँदों के धुएँ (फॉग) के रूप में छोड़ा जा सके।
5. धूमक (Fumigant):-
– प्राकृतिक यौगिक जो गैस के रूप में सक्रिय रहता है। इसका उपयोग किसी दाबित सिलेण्डर से गैस के रूप में, वाष्पशील तरल के रूप में अथवा पानी के सम्पर्क में आने पर गैस निर्मुक्त करने वाले ठोस माध्यम के रूप में किया जाता है।
ठोस या शुष्क सूत्रीकरण (Solid formulation):-
1. धूलि (Dust):-
– मूल यौगिक को एक समुचित वाहक में मिश्रित किया जाता है। इसमें कीटनाशी की सान्द्रता 0.1 से 25 प्रतिशत तक हो सकती है।
2. कणिका (Granules):-
– इस सूत्रीकरण या संरूपण में कीटनाशी निहित किसी अक्रिय वाहक जैसे परिष्कृत मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है। जिससे उसकी कणिकाएँ निर्मित की जा सके। इन दानों में 2 से 10% तक कीटनाशी की मात्रा होती है।
3. घुलनशील पाउडर:-
– सभी कार्बनिक कीटनाशी जो जल में अविलेय है, उनके साथ एक आर्द्रक को मिलाया जाता है जो इनके कणों को पानी में घोले रखता है।
– सामान्यत: इसमें 25-50% कीटनाशी की मात्रा उपस्थित होती है।

1. कीटों के शरीर में प्रवेश करने के आधार पर (Based on mode of entry):-
(i) संस्पर्श विष (Contact Poison):-
– ये कीटनाशी कीटों को तब मारते हैं जब वह विषाक्त वस्तु के स्पर्श में आते हैं।
(ii) जठर विष (Stomach poism):-
– ऐसे कीटनाशी जिनका प्रयोग कीटों के भोज्य पदार्थों पर किया जाता है। जिसका सीधा प्रभाव उनके आमाशय पर पड़ता है।
(iii) धूमक (fumigant):-
– ऐसे रसायन जो गैस के रूप में कीटों के श्वास-रंध्र में प्रवेश कर जाते हैं।
2. क्रियाविधि के आधार पर (Based on mode of Action):-
(i) भौतिक विष (Physical posion):-
– ऐसे कीटनाशक श्वासरोधी तथा अवघर्षक होते है जो कीटों को दम घोट कर मार डालते हैं।
(ii) जीवद्रव्यी विष (Protoplasmic poison):-
– ऐसे कीटनाशी कोशिकाओं के प्रोटोप्लास्ट में उपस्थित प्रोटीन्स पर प्रभाव डालते हैं जिससे कोशिकाएँ नष्ट हो जाती है एवं साथ ही कीट भी मर जाते हैं।
(iii) श्वसन विष (Respiratory poison):-
– ऐसे कीटनाशी श्वसन तन्त्र को प्रभावित करते हैं।
(iv) तंत्रिका विष (Nerve poison):-
– ये कीटनाशी शरीर में प्रवेश कर तंत्रिका तन्त्र को प्रभावित करते हैं।
3. रसायनों के स्वभाव के आधार पर (Based on chemical Nature):-
– इन्हें दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
1. अकार्बनिक कीटनाशी (Inorganic insecticides):-
(I) आर्सेनिक यौगिक (Arsenical compounds):-
– आर्सेनिक के यौगिक अति विषैले आन्तरिक विष वाले होते हैं जो कीटों और स्तनधारियों के लिए हानिकारक है।
– उदाहरणस्वरूप- लेड आर्सेनेट, कैल्सियन आर्सेनेट एवं सोडियम आर्सेनेट इत्यादि।
2. कार्बनिक कीटनाशी (Organic insecticides):-
(I) जन्तु कीटनाशी एवं उनके व्युत्पन्न:- इसका प्रमुख व्युत्पन्न नेरिसटॉक्सिन है जो लम्ब्रिकोनेरीस हेट्रोपोडा व लम्ब्रिकोनेरीस ब्रेवीसिरा नामक ऐनेलिड से प्राप्त होता हे।
(II) वानस्पतिक कीटनाशी:-
– वानस्पतिक कीटनाशी पादप व्युत्पन्न है।
– ये पौधों के लिए पूर्ण सुरक्षित तथा स्तनधारियों के लिए कम विषाक्त होते हैं।
– नीम, इरेथ्रम, रोटेनॉन तथा निकोटिन कीट विष के रूप में प्रयुक्त महत्त्वपूर्ण सम्मिश्रण है।
(i) नीम (Neem):-
– कीटनाशी के प्रमुख पादप स्रोत नीम (Azadirachita indica) है। इसका महत्त्वपूर्ण सक्रिय घटक एजाडिरेक्टिन होता है।
– कीटनाशक क्रिया दर्शाता है; जैसे- मरु टिड्डी, सैन्य कीट, चने का फली वेधक इत्यादि।
(ii) पाइरेथ्रम (Pyrethrum):-
– यह क्रायसेन्थेमम सिनेरेरिया फोलियम तथा क्रायसेन्थेमम कॉक्सीनियम नामक पादप के फूलों से बनता है।
– विलायक से सक्रिय सामग्री को निष्कर्षित किया जाता है और स्प्रे तथा डस्ट के संरूपण में बनाया जाता है।
(iii) रोटेनॉन:-
– यह डेरिज (Derris) प्रजातियों की जड़ों और लोकोकार्पस की जड़ों से निष्कर्षित किया जाता है।
(iv) निकोटिन:-
– निकोटिन तम्बाकू (Nicotiana tobaccum) की पत्तियों द्वारा निष्कर्षित किया जाता है।
(III) तेल तथा उनके पायस:-
– पेट्रोलियम व कोलतार, तेल का प्रयोग कीटनाशी के रूप में फसलों पर सीमित रूप से किया जाता है।
– यह शल्क कीट, सफेद मक्खी, बरुथी के विरुद्ध प्रभावी है।
(IV) कार्बनिक थायोसायनेट (organic thiocyanate):-
– ऐसे कीटनाशी पंख वाले कीटों को नष्ट करने वाले तथा संस्पर्श विष होते हैं।
– इसके अन्तर्गत थानाइट, लीथेन 60 एवं लीथेन 384 प्रमुख है।
(V) सल्फर के यौगिक (Sulphur compounds):-
– ऐसे बरुथीनाशी यौगिक कीटों के अण्डों व लार्वा अवस्था को नुकसान पहुँचाते हैं।
– टेट्रासोल, मोर्टान, फिनाइल सल्फोन, एरामाइट ओवेक्स, P-क्लोरोफिनाइल आदि मुख्य है।
(VI) डाइनाइट्रोफिनॉल (Dinitrophenol):-
– ये कीटों व उनके अण्डों, डिम्भकों तथा वयस्कों के विरुद्ध प्रभावी होता है।
(VII) क्लोरोनित हाइड्रोकार्बन (Chlorinated hydrocarbons):-
– इन्हें आधुनिक कीटनाशी भी कहा जाता है।
– DDT व BHC कीट नियंत्रण के लिए प्रमुख कीटनाशी है।
– ये कीटनाशी प्रभावी जठर व संस्पर्श विष है।
– DDT व BHC के अतिरिक्त टोक्साफोन, डाइएल्ड्रिन, एण्डोसल्फॉन इत्यादि मुख्य है।
(VIII) ऑर्गेनोफॉस्फोरसयुक्त कीटनाशी:-
– ये फॉस्फोरस युक्त कीटनाशी अति विषैले प्रकृति के होते हैं जिनका प्रयोग सफेद मक्खी, शल्क कीट, मिली बग तथा एफिड के विरुद्ध किया जाता है।
– ये कीटनाशी एसिटाइल कोलिन्स्ट्रेज एन्जाइम के निरोधी होते हैं।
(IX) कार्बोमेट कीटनाशी (Carbamates insecticides):-
– कीटों के लिए संस्पर्श, जठर एवं सर्वांगी विष के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
– स्तनधारियों के लिए सुरक्षित
– कार्बेरिल व कार्बोफ्यूरॉन प्रमुख व्युत्पन्न।
(X) धूमक (Fumigants):-
– कीटों के श्वसन तंत्र को प्रभावित कर उन्हें नष्ट कर देते हैं।
– इसके अन्तर्गत हाइड्रोजन सायनाइड, मेथिल ब्रोमाइड, नेफ्थेलिन, एथिलीन डाईब्रोमाइड, DDT, EDCT एवं एल्युमिनियम फॉस्फाइड प्रमुख है।
– कीटों के अलावा सूत्रकमियों व कृन्तकों के नियन्त्रण हेतु भी इनका प्रयोग किया जाता है।
(XI) संश्लेषित पाइरिथ्राइड (Synthetic pyrethroids):-
– ऐसे कीटनाशकों का प्रयोग भण्डारित अनाज के नाशीकीट, घरेलू नाशीकीट, परजीवी तथा मवेशियों के नियंत्रण हेतु प्रभावी रूप से किया जाता है।
– ये कीटनाशी अधिक सक्रिय, प्रभावी, स्थायी होते हैं।
– तना वेधक व बॉलवर्म के नियंत्रण के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।
– लैम्डा साइहेलोथ्रिन, साईपरमिथ्रिन, डेल्टामेथ्रिन आदि प्रमुख संश्लेषित पाइरिथ्राइड यौगिक है।
(XII) विविध (Miscellaneous):-
(a) क्लोरोनिकोटिनिल कीटनाशी
(b) फिनाइलपायरोजोल कीटनाशी
(c) स्पाइनोसेड
(d) एबामेक्टिन
4. बरुथीनाशी (Muticides):-
– वे रासायनिक पदार्थ जिनका प्रयोग बरुथियों (धुन) को नष्ट करने के लिए किया जाता है, बरुथीनाशी (miticides) कहलाते हैं।
– सर्वप्रथम सन् 1920 से गन्धक का प्रयोग बरुथीनाथक के रूप में हुआ था।
– बरुथियाँ पादप के विभिन्न भाग जैसे पत्तियों, कलियों व पुष्पों में कई प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं।
– डाइकोफॉल (Dicofol), क्लोरोबेंजिलेट (Chlorobenzilate) कार्बोफिनोथियोन (Carbophenothion) प्रमुख बरुथीनासक है।
5. कृन्तकनाशी (Rodenticides):-
– ऐसे रासायनिक पदार्थ जिनका प्रयोग रोडेन्ट जीवों जैसे चूहे, गिलहरी को मारने में किया जाता है, कृन्तकनाशी कहलाते हैं।

जैविक नियन्त्रण (Biological control):-
– नाशीकीटों की संख्या एवं उनके द्वारा होने वाली हानि के स्तर को कम करने हेतु परजीव्याभ, परभक्षी, रोगाणु जैसे जीवों का उपयोग जैविक नियंत्रण कहलाता है।
– सर्वप्रथम सन् 1762 में लाल टिड्डी के नियंत्रण हेतु भारतीय मैना को मॉरीरास भेजा गया।
परभक्षी कीट (Predators):-
– परभक्षी कीट अपने परपोषी कीटों अथवा भक्ष्य (शिकार) से बड़े व शक्तिशाली होते हैं। ये अपने शिकार को तत्काल पकड़कर भक्षण करते हैं।
– मनुष्य के लिए ये बड़े परोपकारी कीट है।
– अधिकतर परभक्षी कीट कोलियाप्टेरा (काक्सीनेला सेप्टेमपंकटेटा, मिनोकाईलस सेक्समैकुलेटस), डिप्टेरा (सिरफिस जातियाँ), न्यूरोप्टेरा (काइसोपरला कार्निया), हेमिप्टेरा (एकेन्थेस्पिस रामा) तथा ओडोनेटा (एस्ना प्रजाति) गण के अन्तर्गत आते हैं।
परजीवी कीट (Parasitic insects):-
– परजीवी सामान्यतया अपने परपोषी से हमेशा छोटा होता है।
– फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों को परपोषी (Host) कहते हैं और इन परपोषी कीटों को मारने वाले कीटों को परजीव्याभ (Parasitoid) कहते हैं।
– परजीव्याभ अपनी अविकसित अवस्थाएँ परपोषी कीट के शरीर के ऊपर या अन्दर रहकर अपने जीवन चक्र की एक या अधिक अवस्थाएँ पूरी करते हैं।
– उदाहरणार्थ हाइमेनोप्टेरा व डिप्टेरा गण के कई कीट इस वर्ग में आते हैं।
समाकलित कीट प्रबन्धन (Integrated Pest Management):-
– समाकलित नाशक कीट प्रबन्ध का अर्थ है- प्रबन्धन की सभी संभावित विधियों का एक कार्यक्रम के अन्तर्गत् समन्वयन जो कि आर्थिक, सामाजिक एवं पारिस्थितिक दृष्टि से लाभदायक हो।
– सर्वप्रथम वर्ष 1956 में बार्टलेट ने “समाकलित नाशकीट नियंत्रण” (Integrated Pest Control) शब्द का प्रयोग किया।
– वर्ष 1970 में गीयर ने नाशक कीट प्रबन्ध शब्द का प्रयोग करते हुए समाकलित नाशककीट प्रबन्ध (Integrated Post Management) का प्रयोग किया।
– खाद्य एवं कृषि संगठन (1967) की विशेषज्ञ समिति के अनुसार हम समाकलित नाशक नियंत्रण को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं-
– नाशीकीट प्रजाति को समष्टि गतिकी तथा सह पारिस्थितिक तंत्र के वयनोतक, सभी संभावित विधियों का सुसंगत, समन्वय को इस प्रकार से उपयोग करना की नाशीकीट समष्टि का स्तर आर्थिक क्षति सीमा से नीचे रहे।
– दूसरा सिद्धान्त यह माना गया कि खेतों में हानिकारक कीटों की कुछ संख्या का होना पारिस्थितिक दृष्टि से हमारे लिए लाभदायक रहता है, क्योंकि यह खेतों में परभक्षी एवं परजीव्याभ कीटों के भोजन के रूप में उपलब्ध रहते हैं जो कि हमारे मित्र कीट है तथा इनकी अनुपस्थिति में पूरी खाद्य शृंखला में रुकावट आ जाती है।
छिड़काव व भुरकाव के यंत्र: नैपसैक स्प्रेयर, हेण्डरोटरी डस्टर (Equipments of Spraying and Dusting: Knapsack Sprayer, Hand Rotary Duster):-
– फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए कीटनाशकों का उचित उपयोग अत्यन्त आवश्यक होता है।
– कीटनाशियों के अनुप्रयोग हेतु दो तरीके महत्त्वपूर्ण है- भुरकाव एवं छिड़काव।
1. यन्त्र का चयन (Selection of Equipment):-
– यन्त्र असंरक्षारक धातु या प्लास्टिक का बना हुआ हो।
– यन्त्र की क्षमता, बनावट एवं कार्यविधि हमारी आवश्यकताओं के अनुरूप हो।
– यन्त्र के सुधार, मरम्मत, रखरखाव एवं अतिरिक्त पुर्जों की सुविधा का आसानी से उपलब्ध होना।
– किसानों की क्रय शक्ति के अनुरूप यन्त्र की कीमत हो।
– यन्त्र के प्रयोग में श्रम शक्ति का उपयोग कम से कम लगे एवं यह अधिक टिकाऊ हो।
2. यन्त्रों का वर्गीकरण (Classification of Equipments):-
(अ) प्रधूलक यन्त्र (Dusters):- ये दो प्रकार के होते हैं-
(i) हस्त चालित:- रोटेरी या चक्रिक, प्लंजर तथा धोकनीदार इत्यादि।
(ii) शक्ति चालित:- पॉवर डस्टर तथा मिस्ट ब्लोअर।
(ब) फुहारा या छिड़काव यन्त्र (Sprayers):- इनका वर्गीकरण हम निम्न अनुसार कर सकते हैं-
1. हाइड्रोलिक (द्रवचालित):- इसमें पम्प के द्वारा द्रव पदार्थ पर दबाव उत्पन्न करके प्रयोग में लिया जाता है।
(i) हाइड्रोलिक पम्प वाले:- नैपसेक, हैड स्प्रेअर, स्टीरर (बाल्टी)।
(ii) हैड कम्प्रेशन या वायु पम्प या न्यूमेटिक स्प्रेअर:- कम्प्रेशन नेपसेक स्प्रेअर, हैंड कम्प्रेशन स्प्रेअर आदि।
(iii) गैसीय शक्ति चालित:- हैंड एटोमाइजर (कणित्र)।
2. शक्ति चालित स्प्रेअर:- ये यन्त्र बड़े क्षेत्रों में प्रसारण के लिए उपयुक्त है तथा इन्हें शक्ति इकाई द्वारा चलाया जाता है। ये निम्न प्रकार के होते हैं-
(i) जल गैसीय (Hydropneumatic) फुहारा।
(ii) धूमिका (Mist) उत्पादक- मिस्ट ब्लोअर कम डस्टर।
(iii) द्रव चालित (Hydraulic)- उच्च दाब फुहारा।
3. हवाई छिड़काव यन्त्र:- इसके अन्तर्गत हवाई जहाज एवं हैलीकॉप्टर का उपयोग होता है।
(i) फुहारा (Sprayer):-
– किसी उपचार की जाने वाली सतह पर घोलों, मिश्रणों या प्रलम्बनों के रूप में पीड़कनाशियों का अनुप्रयोग करने के लिए छिड़काव सर्वाधिक व्यापक रूप से प्रयुक्त तरीका है। एक विशेष उपकरण फुहारे (स्प्रेअर) का प्रयोग (हस्त चालित अथवा ट्रैक्टर चालित तथा साथ ही हवाई) छिड़काव के लिए किया जाता है। छिड़काव पीड़कनाशी का अनुप्रयोग करने की एक सार्वभौमिक विधि है। अन्य विधियों की तुलना में इसके लाभ निम्न है-
1. विभिन्न फसल उत्पादन प्रणालियों के लिए सहज अनुकूलनीयता
2. सरल प्रचालन
3. सहज अंशाकन
4. प्रति यूनिट क्षेत्रफल में सक्रिय घटक की बहुत कम खपत
5. उपचार की जा रही सतहों की अच्छी व्याप्ति
6. निम्न निवेश लागत
नैपसैक स्प्रेअर (Knapsack Sprayer):-
– यह एक द्रवचलित तथा सतत् दबाव बनाकर चलाए रखने वाला फुहार यन्त्र है।
– मनुष्य अपनी पीठ पर रख कर चलाता है।
– इसमें तीन प्रमुख होते हैं-
– टंकी, पम्प और नोजल सहित छिड़काव नली।
– इस यन्त्र की टंकी का आकार चपटा या सेम बीज (Bean) के जैसा होता है।
– यह जस्तेदार लोहा, पीतल, स्टेनलेस स्टील या प्लास्टिक की बनी होती है।
– इसकी भराव क्षमता 10 से 30 लीटर तक हो सकती है।
– टंकी में ही वायु सम्पीड़न विधि या पम्प के बैरल में एक विलोड़क लगा रहता है।
– टंकी में पम्प लगा होता है जो विलयन को पम्प सिलिंडर पर लगे निकास से बाहर फेंकता है।
– हत्थे को हाथ से ऊपर-नीचे चलाने पर पम्प के पाद कपाट (Foot valve) पर लगे पिस्टन के दबाव से घोल ऊपर दाब कोष्ठ (Pressure Chamber) में पहुँचता है और फिर निस्सरण (Discharge) नली में होता हुआ नोजल से एक फुहार के रूप में बाहर निकलता है।
– सीमान्त एवं लघु कृषकों के लिए तथा कम ऊँचाई की फसलों, नर्सरी, सब्जियों एवं छोटे वृक्षों (2.5 मी. ऊँचाई) के लिए छिड़काव हेतु यह एक आदर्श यन्त्र है।
– इसका उपयोग रेगिस्तानी, दलदली तथा पहाड़ी क्षेत्र में अधिक किया जाता है।
(i) धूमित्र (Duster):-
– पौधों की सतह या कीटों पर धालन सूत्रीकरणों का अनुप्रयोग धूमित्र नामक विशेष यंत्र की सहायता से किया जाता है।
लाभ:-
1. यह पीड़कनाशी अनुप्रयोग का सरल एवं सस्ता तरीका है।
2. धूलित्रों के हल्के भार के कारण रफ्तार तथा गतिशीलता, विशेषत: उच्च होती है।
3. निम्न विद्युत आवश्यकता
4. निम्न पादप विषाक्तता
5. अच्छी व्याप्ति या वितरण
हैण्ड रोटेरी डस्टर (Hand Rotary Duster):-
– इन्हें क्रेंक डस्टर या पंखा वाला डस्टर भी कहते हैं।
– यह प्रधूलक (Duster) एक ढोल के समान होता है जिसकी टंकी (Hopper) के अन्दर तीन-चौथाई भाग को चूर्ण से भर देते हैं।
– हॉपर के एक सिरे पर पंखा लगा होता है हवा के साथ-साथ चूर्ण को बाहर फैंकता है और दूसरे सिरे पर पंखे को घुमाने के लिए एक हत्था लगा होता है। इसके तीन प्रमुख भाग होते हैं-
1. गियर बॉक्स (Gear box):-
– यह हत्थे की तरफ होता है।
– इसमें कुल चार गियर्स होते हैं।
– सबसे बड़ा गियर बीच में मथनी (Agitator) वाली शाफ्ट पर लगा होता है।
– इस प्रकार जब मुख्य गियर का एक चक्कर पूरा होता है तो पंखे वाले गियर के बहुत से चक्कर हो जाते हैं व इस तरह पंखा बहुत तेजी से घुमता है।
– मुख्य गियर को घुमाने के लिए बाहर की ओर एक टेढ़ी सलाख लगी होती है जिसे क्रेंक (Crank) कहते हैं तथा क्रेंक के सिर को पकड़कर घुमाने के लिए लकड़ी का एक हत्था (Handle) लगा होता है।
2. हॉपर (Hopper):-
– यह ढोल के समान होता है।
– जिसमें लगभग 4-6 किलो चूर्ण भरने की टंकी होती है।
– हॉपर के बीच में दाएँ-बाएँ एक सलाख लगी होती है।
– जिसे क्रेंक-शाफ्ट (Crank shaft) कहते हैं।
– इन टेढ़ी सलाखों को विलोडक (Agitators) या मथनी भी कहते हैं।
– क्रेंक शाफ्ट के नीचे की ओर एक पतली शाफ्ट लगी होती है।
– जिसे पंखा शाफ्ट (Fan shat) कहते हैं।
3. ब्लोअर (Blower):-
– ब्लोअर एक बन्द बॉक्स होता है जो आगे की ओर लगभग 3 सेमी. व्यास की टोंटी द्वारा खुलता है।