आवृतबीजी पादपों की आकारिकी एवं शारीरिकी
पादप आकारिकी:-
– पौधों के विभिन्न भागों (जड़, तना, पत्ती, फल, फूल आदि) की बाह्य संरचना का अध्ययन पादप आकारिकी में करते हैं।
– विल्हेम हॉफमिंस्टर:- पादप आकारिकी के जनक।
– पादपों के विभिन्न भागों में वातावरण के साथ अधिकतम अनुकूलन दर्शाने हेतु कई रूपांतरण पाए जाते हैं, इनका अध्ययन भी आकारिकी में ही करते हैं।
I. जड़ (Roots):-
– पादप का वह भाग जो बीजांकुरण के समय भ्रूण अक्ष के मूलांकुर के विवर्धन से विकसित होता है। जड़ या मूल कहलाता है।
– जड़ें भूमिगत होती हैं।
– ये रंगहीन/भूरे रंग की होती हैं।
– जड़ों में पुष्प, पत्तियाँ, आदि अनुपस्थित होते हैं।
– जड़ों (Roots) में अवर्णी लवक/ल्यूकोप्लास्ट उपस्थित, जो कि भोजन संग्रहण का कार्य करता है।
– जड़े धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती, धनात्मक जलानुवर्ती व ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती होती है।
– जड़ का शीर्ष भाग मूल गोप (Root cap) के द्वारा सुरक्षा प्रदान करता है। इसे ‘कैलिप्ट्रा’ (कैलिप्ट्रोजन ऊतक) भी कहते हैं।
– परजीवी जड़ों (अमरबेल/कस्कुटा) तथा माइकोराइज़ल जड़ों (कवक एवं उच्चतर पौधों की जड़ों में सहजीवी संबंध) में मूल गोप अनुपस्थित।
– जलीय पौधों में मूल गोप के स्थान पर ‘रूट पॉकेट्स’ पाए जाते हैं, जिनमें हवा भरी होने से ये पौधों को उत्प्लावन (Buoyancy) प्रदान करते हैं।
– केवड़ा (Pandanus) में एक से अधिक मूल-गोप पाए जाते हैं।
– मूल गोप के बिल्कुल पीछे सक्रिय रूप से विभाजन करने वाली कोशिकाएँ पायी जाती हैं, जो कि विभज्योत्तकी क्षेत्र (Elangation zone) कहलाता है।
– विभज्योत्तकी क्षेत्र के पीछे दीर्घीकरण क्षेत्र (Elangation zone) उपस्थित, जहाँ कोशिकाओं के आकार में वृद्धि होती है।
– दीर्घीकरण क्षेत्र के पीछे स्थित कोशिकाओं में परिपक्वन एवं विभेदन (Maturation and differentiation) होता है तथा इसी क्षेत्र में एककोशिकीय मूल रोम भी पाए जाते हैं, जो कि जल एवं खनिज-लवणों के अवशोषण में सहायक है।
जड़ (Roots) | |
मूसला मूल(Tap Root) | अपस्थानिक मूल(Adventitious Roots) |
इनकी उत्पत्ति मूलांकुर से होती है।सामान्यतया द्विबीज पत्री पौधों में उपस्थित। जैसे – चना | इनकी उत्पत्ति मूलांकुर के अलावा अन्य संरचनाओं से होती है।सामान्यतया एक बीज पत्री पौधों में उपस्थित। |
– घासों में रेशेदार मूल तंत्र (Fibrous Root System) पाया जाता है।
– जड़ के मुख्य कार्य होते हैं-
(a) मृदा में पौधे को स्थिरता प्रदान करना।
(b) खनिज लवणों एवं जल का अवशोषण करना।
– लेकिन कभी-कभी मूसला मूल (Tap Roots) एवं अपस्थानिक मूल (Adventitious Roots) विशेष कार्य करने के लिए रूपांतरित हो जाती है। इनके रूपांतरण (Modifications) इस प्रकार है-
जड़ों के रूपांतरण:-
I. मूसला मूल के रूपांतरण:-
भोजन संग्राहक:-
1. Conical/शंक्वाकार – गाजर
2. Napiform/कुंभीरूपी – शलजम, चुकंदर
3. Fusiform/तर्कुरूपी – मूली
4. Tuberous/कुंदिल – गुलअब्बास
II. अपस्थानिक मूल रूपांतरण:-
1. ग्रंथिल मूलें (Nodulose Roots):- जड़ों के शीर्ष फूलकर मोती जैसी आकृति बनाते हैं; उदाहरण – आम्बा हल्की व अरारोट।
2. मालाकार (Moniliform or Beaded):- ये मूलें एकान्तर क्रम में फूली व पिचकी हुई मोती हैं तथा मणियों (Beads) से बनी माला के समान आकृति बनाती है; उदाहरण– करेला, डायोस्कोरिया (रतालू)
3. वलयाकार (Annulated):- अपस्थानिक मूलों पर छल्लों या वलयों जैसी चक्रिय संरचनाएँ निर्मित होती हैं जो एक दूसरे पर रखी हुई प्रतीत होती है; उदाहरण– सिफेलिस इपीकैकुआन्हा (Cephalis ipecacuanha)
4. कंदिल मूले (Tuberous roots):- कुछ शयान (Prostrate) पादपों के स्तम्भ की पर्वसंधियों से अनिश्चित आकृति की खाने योग्य फूली हुई संरचनाओं के रूप में मूलें निर्मित होती हैं, इन्हें कंदिल मूले कहते हैं; उदाहरण – शकरकंद
5. पूलिकित मूले (Fasciculated roots):- अपस्थानिक जड़ें गुच्छों में निकल कर फूलती है। इन्हें कंदिल मूलों का समूह भी कह सकते हैं; उदाहरण – शतावर व डहेलिया।
जैविक कार्यों के रूपांतरण:-
1. अधिपादपीय जड़ें (Epiphytics Roots):- इनमें वायवीय तने से अधिपादपीय जड़ें वायु में लटकी रहती है तथा इन जड़ों में आर्द्रताग्राही ऊतक ‘वेलामेन’ पाया जाता है, जिससे ये पौधे वायु से नमी अवशोषित करते हैं; उदाहरण – वेण्डा।
2. परजीवी मूल/चूषक मूल/Haustorial Roots:- इनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता नहीं पायी जाती है। अत: पोषण के लिए ये किसी अन्य पौधे/पेड़ के तने पर लिपट जाते हैं तथा इनकी मूल (Roots) के रूपांतरण जैसे – चूषकांग (Haustoria) उस पादप से पोषक पदार्थों का अवशोषण करते हैं; उदाहरण – अमरबेल/कस्कुटा
3. मायकोराइज़ल मूल/Saprophytic Roots:-
– उच्चतर पादपों व कवकों के मध्य सहजीवी संबंध (Symbiotic Relationship) पाया जाता है। ऐसी जड़ें मृतोपजीवी मूल/माइकोराइज़ल मूल कहलाती है।
– कवकों के जड़ों को सुरक्षा एवं जल-खनिज लवणों अवशोषण हेतु अधिक सतह उपलब्ध कराई जाती है, वहीं जड़ें कवक (Fungi) को आवास (Habitat) एवं भोजन (food) उपलब्ध कराती है। उदाहरण – पाइनस, बर्च़ आदि की जड़ें।
4. स्वांगीकारी मूल (Assimilatory Roots):- सिंघाड़ा/ट्रापा, टीनियोस्पोरा व टीनियोफिल्लम जैसे पौधों में अपस्थानिक मूल के वायवीय रूपांतरण प्रकाश-संश्लेषण करते हैं। इनमें हरित लवक/क्लोरोप्लास्ट तथा आर्द्रताग्राही संरचना पायी जाती है।
5. जनन मूल (Reproductive Root):- डहेलिया, शकरकंद की भोजन संग्राहक मूल की सतह पर कई पतली-पतली जनन मूल (Reproductive Roots) उपस्थित, जो कि कायिक जनन (Vegetative propogation) के द्वारा नए पौधे उत्पन्न करती है।
6. श्वसन मूल (Respiratory Root):- दलदली या क्षारीय भूमि में ऑक्सीजन की कमी या अभाव होता हैं वहाँ इस प्रकार की जडे पाई जाती हैं तथा मैग्रोंव वनस्पति में भी इस प्रकार की मूल पाई जाती है।
यांत्रिक रूपांतरण (Mechanical Modification):-
1. जटा मूल (Stilt Roots/Brace Roots):- गन्ना, राइज़ोफोरा, ज्वार आदि में पौधे के तने/वायवीय सहारा प्रदान करने के लिए अवस्तंभ मूल पाई जाती है।
2. अवस्तंभ मूल (Pillar Roots/Prop Roots/Columnar Roots):- बरगद में – तने एवं इसकी शाखाओं से वायवीय जड़ें उत्पन्न होती है जो कि तने को सहारा प्रदान करती है।
3. पुस्टा जड़ें (Buttress Roots):- साल्मेलिया के वृक्ष के तने के आधारी भाग से पतले फलकों के रूप में पुस्टा जड़ें पाई जाती हैं। उदाहरण- सेमल
4. प्लावी जड़ें (Floating Roots):- जस्सिया में प्लावी जड़ें इसे जल में तैरते रहने में सहायक होती हैं।
5. आरोही जड़ें (Climbing Roots):- पान/बीटल में तने के नोड एवं इंटरनोड वाले भाग से आरोही मूल उत्पन्न होती हैं, जो कि पौधे ऊपर की गति करने व सहारा प्रदान करने में सहायक।
6. पर्णमूल:- उदाहरण -पत्थरचट्टा
II. तना (Stem):-
– तने का विकास प्रांकुर (Plumule) वाले भाग से
होता है।
– सामान्यतया तना वायवीय, धनात्मक प्रकाशानुवर्ती, ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती होता है।
– नए तने सामान्यतया हरे, जिनमें प्रकाश संश्लेषण होता है।
– तने से उत्पन्न शाखाओं पर फल, फूल, कलिकाएँ (Buds) पाई जाती है।
– तने पर कई शाखाओं (Branches), पत्तियों (Leaves) तथा कलिकाओं की उत्पत्ति पर्वसंधि (Node) वाले भाग से होती है।
– दो पर्वसंधियों के बीच का स्थान पर्व (Internodes) कहलाता है।
तने की आकृति (Shape of Stem):-
– बेलनाकार (Cylindrical) तने, उदाहरण – अधिकतर पौधे।
– त्रिकोणीय (Triangular) तने, उदाहरण – साइप्रस
– चतुष्कोणीय (Quadrangular) तने, उदाहरण – तुलसी
– चपटे (Flat) तने, उदाहरण – नागफनी
– संधित (Jointed) तने, उदाहरण – गन्ना, बाँस
तने के स्वरूप (Forms of stem):-
– स्वरूपानुसार तने ऊर्ध्व तथा दुर्बल हो सकते हैं–
I. ऊर्ध्व तने (Erectstems):- इस प्रकार के तने भूमि पर सीधे खड़े रहते हैं। तना दृढ़ एवं कठोर होता है। ये दो प्रकार के होते हैं-
– शाकीय (Herbaceous) तने:- इनमें तना हरा, कोमल एवं अकाष्ठीय होता है; उदाहरण एकवर्षी पादप जैसे गेहूँ, द्विवर्षी पादप जैसे – चुकन्दर
– काष्ठीय (Woody):- इसका तना लम्बा, मजबूत, काष्ठयुक्त होता है। काष्ठीय पादप दो प्रकार के होते हैं–
– क्षुप या झाड़ी (Shrubs):- इन पादपों में वृक्षों से भिन्न मुख्य एक स्तम्भ के स्थान पर भूमि के ऊपर कई काष्ठीय शाखाएँ एक साथ निकलती हैं; उदाहरण – गुलाब।
– वृक्ष (Trees):- इन पादपों में मुख्य तना मोटा व काष्ठीय होता है। शाखाएँ तने पर ऊपर की ओर लगती हैं। वृक्ष के तने की प्रकृति के आधार पर ये कई स्वरूपों में मिलते हैं।
– पुच्छी (Caudex):- तने शाखा रहित तथा पत्तियों शीर्ष पर मुकुट रूप में व्यवस्थित होती है; उदाहरण – खजूर (Palm)।
– बहिर्वेधी (Excurrent):- इनके तने में असीमित वृद्धि तथा शाखाएँ नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः छोटी होती जाती हैं जिससे वृक्ष की आकृति शंक्वाकार हो जाती है; उदाहरण – चीड़ (Pinus)
– लीनाक्ष (Deliquescent):- शीर्षस्थ भाग की अपेक्षा पार्श्व भाग की कलिकाएँ अधिक सक्रिय होती हैं जिससे शाखाएँ विभिन्न दिशाओं में वृद्धि करती हैं; उदाहरण – बरगद
II. दुर्बल तने (Weakstems):- इस प्रकार के तने भूमि पर सीधे खड़े नहीं रह पाते तथा इनका तना दुर्बल, लम्बा, व प्रायः पतला होता है। ये तीन प्रकार के होते हैं–
– विसर्पी (Creepers):- इनकी पर्वसंधियों से अपस्थानिक जड़ें, पणे व शाखाएँ निकलती हैं। बीच के पर्व टूट जाते हैं व स्वतंत्र पादपों का निर्माण करते हैं। ये पादप सभी दिशाओं में फैलकर एक बड़े भू–भाग को आवरित करता है; उदाहरण – दूब (Cynodon dactylon)
– तलसर्पी (Trailors):- ये जमीन पर क्षैतिज वृद्धि करते हैं। इनकी पर्वसंधियों से अपस्थानिक जड़ें नहीं निकलती है इसलिए स्वतंत्र पादपों का निर्माण भी नहीं करते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं–
– आरोही (Climbers):- ये तने आधार प्राप्त करके कुछ विशिष्ट संरचनाओं की सहायता से लिपटकर ऊपर चढ़ते हैं, जिससे इनकी पर्णें पूर्ण रूप से प्रकाश प्राप्त कर सकें। ये आरोही तने निम्नलिखित प्रकार के होते हैं–
(i) प्रतान आरोही (Tendril climber):-
– ये विशेष सर्पिलाकार, संवेदनशील व तीव्र वृद्धि करने वाली संरचनाएँ होती हैं। इनको आधार मिलते ही उससे लिपटकर पादप को आरोहण में मदद करती हैं। प्रतान प्रायः पर्ण या पर्ण के किसी भाग जैसे पर्ण शीर्ष (ग्लोरिओसा), पर्णवृन्त (क्लिमेटिस), पर्णक (मटर), कक्षस्थ कलिका (पैसिफ्लोरा), शीर्षस्थ कलिका (अंगूर) व अपस्थानिक मूल (पान) के रूपान्तरण से बनते हैं।
(ii) स्तम्भ आरोही (Stem climber):-
– इन पादप में कई स्तम्भ परस्पर लिपटकर आरोहण करते हैं। ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं–
– पल्लरियाँ (Twiners) – उदाहरण –आइपोमिया की कई जातियाँ।
– कंठलताएँ (Lianas) – उदाहरण – गिलोय
(iii) वाहन कंटक आरोही (Prickle and thorn climbers):-
– तीक्ष्ण वर्ध एवं कंटक प्रायः सीधे व नुकीली संरचना होती है जो पर्ण या प्ररोह के किसी भाग से आरोहण के लिए रूपान्तरित होते है। उदाहरण – नागफनी (Opuntia), गुलाब, बिगनोनिया क्रमशः इनके शूल उदाहरण हैं।
तने के रूपांतरण (Modifications of Stem):-
– सामान्यतया तना वायवीय, हरा, शाखित, पत्तियों से युक्त होता है, लेकिन तने के 3 मुख्य रूपांतरण देखे जाते हैं-
तने के रूपांतरण | ||
भूमिगत तना | अर्द्धवायवीय तना | वायवीय तना |
– कंद/ Tuber Ex :- आलू- शल्ककंद/ bulbEx :- लहसुन प्याज- घनकंद/ cornEx:- अरबी केसर जमीकंद-प्रकंद/ RhizoneEx:- अदरक, हल्दी, केला | – उपरिभूस्तारी/RunnerEx:- दूब घास/सायनेडॉन, ऑक्ज़ेलिस- भूस्तारी/StolonEx:- स्ट्रॉबेरी, मेन्था, जैस्मीन- भूस्तारिका/offsetEx:- जलकुंभी, पिस्टिया, अगेवा- अंत: भूस्तारि/SuckerEx:- गुलदाऊदी, पुदीना | – स्तंभ प्रतान (Stem Tendril)Ex:- अंगूर, लौकी, तुरई- स्तंभ कंटक(Stem Thorn)Ex:- नीबू, बेर- पर्णाभ पर्व (Cladode)Ex:- नागफनी- पत्रप्रकलिका(Bulbil) Ex:- अन्नानास |
III. पत्ती:-
– पत्तियाँ पौधे के वायवीय भागों; जैसे- तने की शाखाओं, अक्षीय कलिकाओं आदि से विकसित होती हैं।
– ये पत्तियाँ सामान्यतया हरे रंग की (क्लोरोफिल वर्णक की उपस्थिति से) होती है तथा पत्तियों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया से भोज्य पदार्थों का निर्माण किया जाता है।
– तने पर पत्तियाँ असमान रूप से वितरित रहती है।
– एक पत्ती में 3 मुख्य संरचनाएँ दिखाई देती हैं-
(i) हाइपोपोडियम (पर्णाधार)
(ii) मीज़ोपोडियम (पर्णवृत्त)
(iii) एपिपोडियम (पर्णफलक/lamina)
– पत्ती के कक्ष के दोनों ओर अनुपर्ण (Stipule) पाए जाते हैं, जो कि तरुण पत्तियों (Young leaves) की सुरक्षा करते हैं।
– अनुपर्ण के पास पत्ती का प्रारंभिक सिरा, जो तने से जुड़ा रहता है, कुछ फूला हुआ होता है। ये भाग हाइपोपोडियम/पर्णाधार कहलाता है।
– पर्णाधार से जुड़ी संरचना मीजोपोडियम/पर्ण वृन्त/Petiole कहलाती है। ये पर्णवृन्त लंबी, बेलनाकार संरचना जो पर्णफलक से जुड़ती है।
– पर्णफलक/Lamina/एपिपोडियम पर्ण का चपटा, चौड़ा भाग है।
– पर्ण/पत्तियों के मुख्य कार्य:- प्रकाश संश्लेषण, श्वसन में सहायक (रंध्र पाए जाते हैं।)
– अन्य कार्य:- भोजन संग्रहण, कीटों का शिकार, गति, सुरक्षा आदि।
पर्ण के प्रकार (Types of leaves):-
– बीजपत्रीय पर्ण (Cotyledonary leaves):- ये बीजांकुरण के समय नवीन पौधे पर प्रथम पर्ण के रूप में निकलती हैं, जो बीजपत्रों से बनती है। ये हरी व खाद्य संग्रह करती हैं।
– शल्क पर्ण (Scale leaves or cataphylls):- ये सामान्यतः भूमिगत तनों पर मिलने वाली छोटी, पतली व भूरे रंग की होती है। प्रकाश संश्लेषण नहीं करती हैं, वरन सुरक्षा का कार्य करती है।
– पुष्प पर्ण (Floral leaves):- पुष्प के विभिन्न भाग पत्तियों के रूपान्तरण हैं अतः इन्हें पुष्प पर्ण (Floral leaves) कहते हैं।
– बीजाणु पर्ण (Sporophylls):- वे पर्ण जिन पर बीजाणु उत्पन्न होते हैं बीजाणुपर्ण कहलाते हैं।
पर्ण की स्थिति (Position of leaf):-
– मूलजाभासी (Radical) – उदाहरण – गाजर, मूली
– शाखिक (Ramal) – उदाहरण – अधिकांश वृक्ष।
– स्तम्भिक (Cauline) – उदाहरण – अधिकांश शाकीय पादप।
पर्ण विन्यास (Phyllotaxy):-
– तने पर पर्णों की व्यवस्था पर्ण विन्यास कहलाती हैं। ये निम्नलिखित प्रकार का होता है–
– एकान्तर (Alternate) विन्यास:- एक पर्वसंधि पर पर्ण दायीं ओर है तथा अगली व पिछली पर्वसंधि पर बायीं ओर तो इसे एकान्तर पर्ण विन्यास कहते हैं; उदाहरण – गेहूँ तथा धान
– सर्पिल (Spiral) विन्यास:- पर्वसंधियों पर एक ही पर्ण लगी होती तथा इनके आधारों को एक रेखा से मिलाने पर सर्पिल आकार बनता है; उदाहरण – गुडहल, पपीता।
– सम्मुख पर्ण विन्यास (Opposite):- इसमें एक पर्वसंधि पर दो पर्णें सदैव एक-दूसरे के सम्मुख स्थित होती हैं। यह पुनः दो प्रकार का होता है–
(i) सम्मुख क्रासित (Opposite decussate) –उदाहरण – आक (Calotropis), तुलसी (Ocimum)।
(ii) सम्मुख अध्यारोपित (Opposite superposed) – उदाहरण – अमरूद, माधवीलता (Hiptage)।
– चक्रिक (Whorled) पर्वसंधि:- जब पर्वसंधि पर दो से अधिक पत्तियाँ चक्करदार अवस्था में व्यवस्थित हों; उदाहरण – कनेर (Nerium) एलामेण्डा (Allamanda)।
पर्णफलक की आकृति (Shape of leaflamina):-
– पर्णफलक की आकृति के आधार पर पर्ण को निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा गया है–
– भालाकार (Lanceolate) – उदाहरण – बाँस।
– गोलाकार (Orbicular) – जैसे – कमल में।
– रेखीय (Linear) – उदाहरण – घास की पर्ण।
– तिर्यक (Oblique) – उदाहरण – नीम।
– हृदयाकार (Cordate) – उदाहरण – पान।
– वृक्काकार (Reniform) – जैसे – ब्राह्मी।
– सूच्याकार (Acicular) – उदाहरण – चीड़ (Pinus)।
– आयताकार (Oblong) – जब फलक की आकृति आधार से शीर्ष तक समान चौड़ी हो; जैसे – केला।
पर्णवृन्त के रूपान्तरण (Modification of petiole):-
– सपक्ष (Winged) पर्णवृन्त:- पर्णवृन्त जब चपटा व पर्ण के समान होता है; उदाहरण – नीबू, संतरा।
– प्रतानीय (Tendrillar) पर्णवृन्त:- जब पर्णवृन्त धागे सदृश्य होता है; उदाहरण – घट पादप (Pitcherplant)।
– स्पंजी (Spongy) पर्णवृन्त:- जब पर्णवृन्त प्लावी, वायुकोष उपस्थित हो; उदाहरण – जलकुम्भी।
शिराविन्यास (Venation):-
– पर्ण में शिराओं और शिरिकाओं का विन्यास शिराविन्यास (Venation) कहलाता हैं। यह दो प्रकार का होता है–
1. जालिकावत शिराविन्यास
2. समानान्तर शिराविन्यास
1. जालिकावत शिराविन्यास (Reticulate venation):-
– जब प्रत्येक शिरा कई बार विभाजित होती है तथा शिराओं का एक जाल (Reticulam) बना लेती है, इसे ही जालिकावत शिरा विन्यास कहते हैं। यह द्विबीजपत्री पादपों के पर्णों में पाया जाता है। यह दो प्रकार का होता है-
(i) एकशिरीय जालिकावत (Unicostate reticulate)– उदाहरण – गुडहल।
(ii) बहुशिरीय जालिकावत (Multicostate reticulate)– उदाहरण – बेर
2. समानान्तर शिराविन्यास (Parallel Venation):-
– इस प्रकार के पर्णफलक में शिराएँ व शिरिकाएँ एक दूसरे के समानान्तर स्थित होती हैं। उदाहरण: एक बीजपत्री पादप
– यह दो प्रकार का होता है–
(i) एकशिरीय समानान्तर (Unicostate parallel) – उदाहरण- केला।
(ii) बहुशिरीय समानान्तर (Multicostate parallel) – उदाहरण – नारियल।
Note:-
– केलोफिलम (Calophyllum) द्विबीजपत्री पौधा है परन्तु इसमें समानान्तर शिराविन्यास पाया जाता है। स्माइलैक्स एकबीजपत्री है परन्तु इसमें जालिकावत शिराविन्यास पाया जाता है।
पर्ण के प्रकार (Types of Leaves):-
– पर्ण फलक की संरचना के आधार पर पर्ण दो प्रकार की होती हैं–
1. सरल पर्ण
2. संयुक्त पर्ण
1. सरल पर्ण (Simple leaf):- जब पर्णफलक पूरी हो व कटाव हों। यदि कटाव न हों तो मध्यशिरा व पर्णवृन्त तक नहीं होता। उदाहरण–पीपल, आम
2. संयुक्त पर्ण (Compound Leaf):-
– इनमें पर्णफलक में कटाव मध्यशिरा या पर्णवृन्त तक पहुँच जाते हैं तथा जिससे पर्णफलक कई खण्डों में बँट जाता है तो यह संयुक्त पर्ण कहलाती हैं। प्रत्येक खण्ड पर्णक (Leaflet) कहलाता है।
– ये दो प्रकार की होती है-
(i) पिच्छाकार संयुक्त पर्ण (Pinnately compound leaf):-
– एकशिरीय जालिकावत शिराविन्यास वाले पर्ण में कटान मध्यशिरा तक पहुँच जाने से इस प्रकार के पर्ण विकसित होते हैं इनकी मध्यशिरा को अब पिच्छाक्ष (Rachis) कहते हैं। पिच्छाकार संयुक्त पर्ण निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
– एक पिच्छकी संयुक्त पर्ण (Unipinnate compound leaf) – उदाहरण – इमली, नीम।
– जब पर्णकों की संख्या सम हो-2, 4, 6, 8) जैसे केसिया आदि अथवा विषमपिच्छकी (Imparipinnate जब पर्णकों की संख्या विषम हो 3, 5, 7, 9) जैसे नीम, गुलाब आदि।
– द्विपिच्छकी संयुक्त पर्ण (Bipinnate compound leaf) – उदाहरण – बबूल
– त्रिपिच्छकी संयुक्त पर्ण (Tripinnate compound leaf) – उदाहरण – सेंजना (Moringa)
– बहुपिच्छकी संयुक्त पर्ण (Multipinnate compound or Decompound leaf) –उदाहरण – गाजर, धनिया, सौंफ।
(ii) संयुक्त हस्ताकार पर्ण (Palmate compound leaf):-
– हस्ताकार पर्ण के पर्णफलक में कटाव तटों से आधार या पर्णवृन्त की ओर होता है तथा पर्ण की आकृति हथेली (Palm) जैसी हो जाती है। पर्णकों की संख्या के आधार पर संयुक्त हस्ताकार पर्ण निम्नलिखित प्रकार के होते हैं–
– एक पर्णी (Unifoliate) – उदाहरण – नीबू, संतरा।
– द्विपर्णी (Bifoliate) – उदाहरण – हिंगोटा
– त्रिपर्णी (Trifoliate) – उदाहरण – खट्टी बूटी, बेल, मेथी।
पर्ण के रूपान्तरण (Modifications of leaves):-
– पर्णों के कुछ विशिष्ट रूपान्तरण निम्नलिखित प्रकार हैं–
– पर्ण प्रतान (Leaf tendril):- पर्ण का कोई भाग जैसे अनुपर्ण या पर्ण फलक पतली धागे सदृश्य संरचना में रूपान्तरित होकर पौधे को आरोहण में सहायता करती हैं। उदाहरण जंगली मटर (Lathyrus aphaca) में सम्पूर्ण पर्ण प्रतान में रूपान्तरित हो जाती है।
– पर्णक प्रतान (Leaflet tendril):- संयुक्त पर्ण के शीर्ष का पर्णक प्रतान में रूपान्तरित हो जाता है। उदाहरण – मटर
– रक्षात्मक शल्क पर्ण (Protective scale leaf):- ये पर्णें पतली शुष्क झिल्ली के समान होकर कक्षस्थ कलिका की सुरक्षा करती है। उदाहरण – शतावर, रसकस
– कीटाहारी पर्ण (insectivorous):- इनकी पर्णें विशेष रूप से कीटों को फंसाकर मारने व उनका पाचन करने का कार्य करती हैं। इनके निम्नलिखित प्रकार है–
– ब्लेडर या थैली (Bladder):- यूट्रिकुलेरिया (Bladderwort) की पर्णे कटी-फटी व खण्डों में विभक्त होती हैं एवं कुछ छोटे- छोटे खण्ड या पालियाँ थैली सदृश्य संरचनाओं में रूपान्तरित हो जाती हैं।
– घट पर्णी पादप (Pitcher plant):- मटका सदृश्य संरचना पर्णफलक का रूपान्तरण है। पर्ण शीर्ष घट के ढक्कन की तरह कार्य करता है। एक बार कीट घट में प्रवेश कर जाए तो ढक्कन बंद हो जाता है तथा घट के अन्दर कीट का पाचन होने के बाद ढक्कन वापस खुल जाता है। उदाहरण– निपेन्थीस (Nepanthes), सारासीनिया (Sarracenia)।
– अवशोषी पर्णें (Absorbing leaves):- कुछ जलीय पादपों की कटी-फटी जल निमग्न पर्णे जल अवशोषण का कार्य करती हैं। इन पादपों में जडें नहीं होती हैं। उदाहरण – हाइड्रिला
– पर्ण शूल (Leaf spines):- वाष्पोत्सर्जन को घटाने व पादप सुरक्षा के लिए पर्ण शूलों में बदल जाते हैं। उदाहरण – नागफनी (Opuntia)
पादप भागों की आन्तरिकी:-
1. द्विबीजपत्री मूल की आन्तरिक संरचना (Internal structure of dicotyledon root):- एक द्विबीजपत्री मूल की आन्तरिक संरचना में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं–

T.S. of Dicot Root
(a) मूलीय त्वचा (Epiblema) or (Rhizodermis or Piliferous layer):-
– यह सबसे बाहरी परत है जिसमें नलिकाकार जीवित घटक होते हैं। क्यूटिकल तथा रंध्र अनुपस्थित होते हैं। मूल के परिपक्वन क्षेत्र में इसकी कुछ कोशिकाएँ दीर्घित होकर एक कोशिकीय मूल रोम निर्मित करती हैं ये रोम मिट्टी से जल के अवशोषण को सम्पादित करते हैं।
(b) वल्कुट (Cortex):-
– यह पतली भित्ति युक्त मृदूतकीय कोशिकाओं का बना होता है। इसकी कोशिकाएँ अन्तर कोशिकीय स्थान युक्त या बहुभुजी होती हैं।
(c) अन्तस्त्वचा (Endodermis):-
– यह कॉर्टेक्स का सबसे भीतर एकल स्तर व बिना अन्तर कोशिकीय स्थान है जो परिरम्भ तथा कॉर्टेक्स के बीच स्थित होता है। अन्तस्त्वचा की अरीय तथा स्पर्शरेखीय भित्तियों पर कैस्पेरियन पट्टियाँ होती हैं (केस्परी द्वारा खोजी गई)। इन पट्टियों में सुबेरिन होता है। केस्पेरियन पट्टियाँ अन्तस्त्वचा की उन कोशिकाओं में अनुपस्थित होती है जो प्रोटोजाइलम के सम्मुख स्थित होती हैं इन्हें मार्ग या पथ कोशिकाएँ (passage cells or transfusior cells) कहते हैं। जो कि कॉर्टेक्स से परिरम्भ में जल के परिवहन में सहायक होती हैं।
(d) परिरम्भ (Pericycle):-
– यह एकस्तरीय होती है। यह मृदुतक (prosenchyma- प्रोसेनकाइमा) की बनी होती है। पार्श्व मूलें परिरम्भ से अन्तर्जात रूप से उत्पन्न होती हैं।
(e) संवहन पूल (Vascular Bundles):-
– संवहन पूल अरीय तथा बाह्यआदिदारूक होते हैं। जाइलम पूलों की संख्या 2 से 6 (द्विआदिदारूक से षटादिदारूक) अपवाद-फाइकस बेन्गालेन्सिस (बरगद वृक्ष) में बहुआदिदारूक (Polyarch) होती हैं। जाइलम तथा फ्लोएम के बीच स्थित मृदुतक को संयोजी ऊतक (Conjunctive tissue) कहते हैं जो बाद में द्वितीयक वृद्धि के दौरान संवहन एधा बनाने में भाग लेते हैं।
(f) मज्जा (Pith):-
– द्विबीजपत्री मूल में मज्जा कम विकसित या अनुपस्थित होता है।
– एकबीजपत्री मूल की आन्तरिक संरचना (Internal structure of monocotyledon root):-

T.S. of Monocot Root
– यह निम्न बिन्दुओं को छोड़कर संरचना में द्विबीजपत्री मूल के समान होती है।
– जाइलम बहुआदिदारूक (Polyarch) होता है। (6 से अधिक) लेकिन अपवाद स्वरूप प्याज में जाइलम पूल 2 से 6 होते हैं।
– मज्जा एकबीजपत्री मूल में सुविकसित होती है।
– संयोजी मृदुतक एधा नहीं बनाती है।
– द्विबीजपत्री तने की आन्तरिक संरचना (Internal structure of dicot stem):-
– द्विबीजपत्री तने की आन्तरिक संरचना निम्नलिखित प्रकार की है–

T.S. of Dicot Stem
अधिचर्म (Epidermis):-
– एपीडर्मिस तने की सबसे बाहरी परत है। यह एक स्तरीय होती है। एपीडर्मिस की बाहरी सतह एक स्तर द्वारा घिरी होती है। जिसे क्यूटिकल (उपचर्म) कहते हैं। जो कि क्यूटिन की बनी होती है बहुकोशिकीय रोम तथा रंध्र एपीडर्मिस पर पाए जाते हैं।
कॉर्टेक्स (Cortex):-
– द्विबीजपत्री तने में कॉर्टेक्स तीन भागों में विभक्त होता है–
(i) अधश्चर्म (Hypodermis)
(ii) सामान्य कॉर्टेक्स (General cortex)
(iii) अन्तस्त्वचा (Endodermis)
(i) अधश्चर्म (Hypodermis):-
– यह एपीडर्मिस के ठीक नीचे स्थित होती है। स्थूलकोणोतक की बनी तथा इसकी कोशिकाओं के विभिन्न क्षेत्रों में सेल्यूलोज के अतिरिक्त स्थूलन होते हैं।
(a) स्पर्शरेखीय भित्तियों पर (पटलिकीय स्थूलकोणोतक उदाहरण – सूर्यमुखी)
(b) कोनों पर (कोणीय स्थूलकोणोतक; उदाहरण – अरण्डी )
(c) छोटे अन्तरकोशिकीय स्थानों के समीप (रिक्तिकीय स्थूलकोणोतक; उदाहरण– कुकुरबिटा)
इसके कार्य हैं–
(a) यह पादपों को यांत्रिक सहारा व लोच प्रदान करती है
(b) भोजन का संग्रहण
(c) क्लोरोप्लास्ट की सहायता से भोजन का निर्माण।
(ii) सामान्य कॉर्टेक्स (General Cortex):-
– यह मृदुतक का बना होता है। रेजिन कैनाल/श्लेष्म कैनाल इसमें पाई जाती है। ये उत्पत्ति में वियुक्तिजात होती हैं। कॉर्टेक्स का मुख्य कार्य भोजन का संचय करना है।
(iii) अन्तस्त्वचा (Endodermis):-
– यह एक स्तरीय है। इसकी कोशिकाएँ ढोलकाकार आकृति की होती हैं। अन्तस्त्वचीय कोशिकाओं में संचित भोज्य पदार्थ के रूप में स्पष्ट स्टार्च कण होते हैं। इस कारण इसे स्टॉर्च परत कहते हैं।
परिरम्भ (Pericycle):-
– यह अन्तस्त्वचा तथा संवहनपूलों के बीच होती है। स्तम्भ की परिरम्भ बहुस्तरीय तथा दृढ़ोतकीय परिरम्भ को ‘Hardbast’ भी कहते हैं। परिरम्भ विषमांगी (heterogenous) होती है तथा मृदुतक व स्थूलकोणोतक की एकान्तरित पट्टियों की बनी होती है। उदाहरण – सूर्यमुखी का तना। परिरम्भ का भाग जो संवहन पूल के सम्मुख स्थित होता है उसे ‘Bandle cap’ के नाम से जाना जाता है। पादपों जैसे कुकुरबिटा, एरिस्टोलोकिया में, यह दृढ़ोतकीय कोशिकाओं के एक सतत सिलेण्डर के रूप में पाई जाती है।
संवहनपूल (Vascular Bundle):-
– संवहन पूल संयुक्त, समपार्श्विक, खुले तथा एण्डार्क (अन्तः आदि दारूक) होते हैं। संवहन पूल वलय में स्थित तथा वेज आकृति के होते हैं। प्रत्येक संवहन पूल फ्लोएम, कैम्बियम (एधा) तथा जाइलम का बना। द्विबीजपत्री तने में यूस्टील पाई जाती है। कुकुरबिटा में संवहन पूल समद्विपार्श्विक होते हैं।
मज्जा किरणें (Medullary rays):-
– मज्जा से परिधि की ओर अरीय रूप से व्यवस्थित मृदूतकीय कोशिकाओं की पंक्तियाँ जो पहिये के स्पोक के समान दिखाई देती है, उन्हें मज्जा किरणें कहते हैं। ये भोजन व जल के अरीय संवहन के लिए मार्ग प्रदान करती है।
– मज्जा (Pith):- यह संवहन पूलों की वलय से लेकर केन्द्र तक पाई जाती है। इस क्षेत्र की कोशिकाएँ मृदुतक की बनी होती है कार्य-भोजन व जल का संचय।
एकबीजपत्री तने की आन्तरिक संरचना (Internal structure of monocotyledon stem):-
– अधिचर्म (Epidermis):- यह सबसे बाहरी एक कोशिका मोटी परत है जो मोटी क्यूटिकल द्वारा घिरी होती है। बहुकोशिकीय रोम अनुपस्थित तथा रंध्र भी कम होते हैं।

T.S. of Monocot Stem
– अधश्चर्म (Hypodermis):- यह दृढ़ोतक की बनी होती है। इसके 2-3 स्तर होते हैं। यह पादप को यांत्रिक सहारा प्रदान करती है।
– भरण ऊतक (Ground tissue):- अधश्चर्म से लेकर केन्द्र तक विस्तारित मृदूतकीय कोशिकाओं का बना समूह भरण ऊतक कहलाता है। भरण ऊतक अन्तस्त्वचा कॉर्टेक्स परिरम्भ आदि में विभेदित नहीं होता है।
– संवहन पूल (Vascular Bundle):- संवहन पूल भरण ऊतक में बिखरे हुए तथा अण्डाकार आकृति के होते हैं। संवहन पूल परिधि की ओर छोटे तथा केन्द्र की ओर बड़े होते हैं। संवहन पूल संयुक्त, समपार्श्विक, बंद तथा एण्डार्क होते हैं। प्रत्येक संवहन पूल दृढ़ोतकीय रेशों की एक परत द्वारा घिरा होता है जिसे पूलाच्छद (bundle sheath) कहते हैं। एकबीजपत्रियों में एटेक्टोस्टील पाई जाती है।
(a) जाइलम (Xylem):-
– जाइलम में, वाहिकाएँ (मेटा जाइलम तथा प्रोटोजाइलम) V या Y आकृति में विन्यासित होती हैं यहाँ प्रोटोजाइलम वाहिकाओं तथा मृदुतक के सिरे पर जलयुक्त वियुक्तिजात व लयजात गुहा होती है इसे मुख्यतः लजयात गुहा (Lysigenous cavity) कहते हैं। जो प्रोटोजाइलम के नीचे तत्त्वों तथा मृतक के घुलने से बनती है। शतावर (एस्परेगस) में जलगुहा तथा पूलाच्छद अनुपस्थित होता है।
(b) फ्लोएम (Phloem):-
– यह चालनी नलिका तत्त्व तथा सहकोशिकाओं का बना होता है। फ्लोएम मृदुतक अनुपस्थित होते हैं।
मज्जा (Pith):-
– एकबीजपत्री तने में मज्जा अविभेदित होती है। कभी-कभी कुछ घासों जैसे गेहूँ आदि में भरण ऊतक का केन्द्रीय भाग खोखला होता है तथा इसे मज्जा गुहा कहते हैं।
पर्ण की आन्तरिकी (Anatomy of leaf):-
– आन्तरिकी के आधार पर पर्ण दो प्रकार की होती हैं पृष्ठाधारी पर्ण तथा समद्विपार्श्व पर्ण।
– पर्ण अधिकतर क्षैतिज रूप से विन्यासित होती हैं इसलिए उनकी ऊपरी तथा निचली सतह में स्पष्ट विभेदन होता है। ये पृष्ठाधारी पर्ण कहलाती हैं। उदाहरण – द्विबीजपत्री।
– एकबीजपत्रियों की पर्ण सामान्यतः उदग्र रूप से विन्यासित होती हैं इस कारण पर्णों की दोनों सतहों को समान मात्रा में प्रकाश मिलता है। ऐसी पर्णों को इस कारण समद्विपार्श्व पर्ण कहते हैं। उदाहरण– एकबीजपत्री पर्ण की सतह, जो कि स्तम्भ के अक्ष के समीप स्थित होती हैं उसे अभ्यक्ष/अधर ऊपरी सतह कहते हैं। दूसरी तरफ की सतह को अपाक्ष/पृष्ठ/निचली सतह कहते हैं।
– पृष्ठाधारी पर्ण की आन्तरिक संरचना (Internal structure of dorsiventral leaves):- आम की पर्ण की उदग्र अनुप्रस्थ काट में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं–
एपीडर्मिस (Epidermis):-
– प्रत्येक पर्ण में ऊपरी तथा निचली एपीडर्मिस होती है। इनमें से प्रत्येक सघन रूप से व्यवस्थित मृदूतकीय कोशिकाओं की एकल परत की बनी होती है। अपवाद-फाइकस इलास्टिका, पाइपर में बहुस्तरीय ऊपरी एपीडर्मिस पाई जाती है दोनों सतहों पर क्यूटिकल पाई जाती है परन्तु ऊपरी एपीडर्मिस पर क्यूटिकल अधिक मोटी होती है। पृष्ठाधारी पर्ण मुख्य रूप से अधोरंध्रीय होती हैं जिनमें रंध्र निचली सतह पर पाए जाते हैं। उभयरंध्रीय पृष्ठाधारी पर्णों में रंध्र ऊपरी एपीडर्मिस की तुलना में निचली एपीडर्मिस पर अधिक होते हैं। उदाहरण– आलू।
पर्णमध्योतक (Mesophyll):-
– पर्णमध्योतक दो क्षेत्रों में विभक्त होता है- खम्भ ऊतक तथा स्पंजी मृदुतक। खम्भ ऊतक ऊपरी एपीडर्मिस की ओर पाया जाता है इन कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट अधिक होते हैं। स्पंजी मृदुतक निचली एपीडर्मिस की ओर पाई जाती है। स्पंजी मृदुतक की कोशिकाओं के बाहर सुविकसित अन्तरकोशिकीय स्थान होते हैं।
संवहन पूल (Vascular bundles):-
– संवहन पूल संयुक्त, सम्पार्श्विक तथा बंद प्रकार के होते हैं। जाइलम एण्डार्क (अन्तः आदि दारूक) होता है। जाइलम अभ्यक्ष या ऊपरी सतह की ओर तथा फ्लोएम अपाक्ष सतह की ओर होता है प्रत्येक संवहन पूल मृदूतकीय कोशिकाओं की एक परत द्वारा घिरा होता है जिसे पूलाच्छद (Bundle sheath) कहते हैं।
– मध्यशिरा का संवहन पूल सबसे बड़ा होता है।
– मृदुतक पूलाच्छद के दोनों ओर एपीडर्मिस तक विस्तारित रहती हैं।
– समद्विपार्श्व पर्ण की आन्तरिक संरचना (Internal structure of Isobilateral leaf):-

T.S. of Isobilateral Leaf:-
एपीडर्मिस (Epidermis):-
– प्रत्येक पर्ण में ऊपरी तथा निचली एपीडर्मिस होती है इनमें से प्रत्येक सघन रूप से व्यवस्थित कोशिकाओं की एक परत की बनी होती है। दोनों एपीडर्मिस पर क्यूटिकल की मोटाई समान होती है। दोनों एपीडर्मिस पर रंध्र लगभग समान रूप से वितरित होते हैं। इस प्रकार समद्विपार्श्व पर्ण उभयरंध्रीय होती हैं।
पर्ण मध्योतक (Mesophyll):-
– पर्णमध्योतक खम्भ ऊतक तथा स्पंजी मृदुतक में विभक्त नहीं होता है यह पूर्णतया स्पंजी मृदुतक का बना होता है। समद्विपार्श्व पर्ण में प्रत्येक बड़े संवहन पूल के ऊपर तथा नीचे क्रमशः ऊपरी व निचली एपीडर्मिस तक दृढ़ोतक विस्तारित रहता है।
संवहन पूल (Vascular bundles):-
– पृष्ठाधारी तथा समद्विपार्श्व पर्ण दोनों में संवहन पूल समान प्रकार के होते हैं। संवहन पूल संयुक्त, सम्पार्श्विक तथा बंद प्रकार के होते है। संवहन पूल में जाइलम अभ्यक्ष सतह की ओर तथा फ्लोएम अपाक्ष सतह की ओर स्थित होता है। संवहन पूल पूलाच्छद द्वारा घिरे होते हैं।
– C-4 पादपों में पूलाच्छद हरितमृदूतकीय (chlorenchymatous) तथा शेष पादपों में पूलाच्छद मृदूतकीय या दृढ़ोतकीय (अधिकतर मृदूतकीय) होता है।
– शीर्षस्थ विभज्योतक अंगों में स्थायी आन्तरिक संरचनाओं का निर्माण करता है यह संरचना प्रथम वर्ष के कुछ ही सप्ताहों में पूर्ण हो जाती है इसे प्राथमिक वृद्धि (primary growth) कहते हैं।
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