जन्तुओं में परिसंचरण
रक्त (Blood)
रक्त का अध्ययन à Haematology
रक्त निर्माण की क्रिया à Haemopoiesis (लाल अरिथमज्जा में)
– रक्त एक लाल रंग का तरल योजी ऊतक है।
– शरीर भार का 7-8% भार बनाता है। (Male : 5-6 lit, Female 4-5 lit)
– रक्त की pH = 7.4 (हल्का क्षारीय)
– रक्त एक आभासी योजी ऊतक है, क्योंकि
(i) रक्त की कोशिकाओं में विभाजन नहीं होता
(ii) रक्त की Matrix तंतु रहित होती है।
(iii) रक्त की Matrix का संश्लेषण और स्त्रवण रक्त से बाहर Liver और लसिकांगों द्वारा होता है।
रक्त का संगठन (Composition of Blood)
(a) Liquid Part – Matrix (55%) जिसे Plasma कहते हैं।
(b) Solid Part – Blood Corpuscles (45%) à R.B.Cs, W.B.Cs, Plateletes
– Packed Cell Volume (PCV) – सम्पूर्ण रक्त में विभिन्न रक्त कणिकाओं का कुल आयतन (R.B.C.+W.B.C.+Platelets)
– सम्पूर्ण कणिकाओं का 99% केवल R.B.C होती है और शेष 1% में W.B.C और Platelet होते हैं।
Plasma (मेट्रीक्स) –
– रक्त की Matrix (Plasma) हल्के पीले रंग की होती है।
– Plasma का हल्का पीला रंग Urobillinogen (Bilirubin) के कारण होता है।

प्लाज्मा का संगठन (Composition of Plasma) –
– 90-92% Water
– 8-10% – Solid Part (अकार्बनिक व कार्बनिक यौगिक होते है।)
अकार्बनिक भाग (Inorganic part) (0.9%) इसमें –
(a) आयन (Ions) – Na+, K+, Ca+2
𝐶𝑙−,𝐻𝐶𝑂3−,𝑆𝑂4−2,𝑃𝑂4−3
(Cl‑ > Na+)
(b) नमक (Salts) – NaCl, KCl, NaHCO3, KHCO3
NaCl सर्वाधिक
– NaCl को शरीर का सामान्य लवण भी कहते हैं।
(c) गैस (Gases) – O2, CO2, N2
– Plasma के प्रति 100 ml जल में 0.29 ml O2, 0.5 ml, N2, 5 ml CO2 घुलित अवस्था में होती है।
– Organic Parts (7-9 %)
(i) प्रोटीन (Proteins) – (6-7% max)
प्रमुख प्लाज्मा प्रोटीन –
(a) Albumin – (4%) सर्वाधिक
– संश्लेषण यकृत में
– सबसे छोटा Plasma Protein
– यह blood का कोलाइडी परासरणी दाब (BCOP) बनाए रखता है। (28-32 mm/Hg)
(b) Globulin – (2-2.5%)
– अतः रक्त में Albumin a Globulin का अनुपात 2 : 1 होता है।
– इसका संश्लेषण और स्त्रवण यकृत व लसिकांगों द्वारा होता है।
– ये शरीर में रसायनों का परिवहन करने के साथ जीवाणु वाइरस और उनके द्वारा स्त्रावित विष पदार्थों को नष्ट करते हैं।
– रक्त में तीन प्रकार के Globulins होते हैं–
(i) 𝛼-Globulin – संश्लेषण यकृत में होता है।
उदाहरण – Ceruloplasmin यह (Cu) का परिवहन करता है।
(ii) 𝛽-Globulin – संश्लेषण यकृत में होता है।
उदाहरण – Transferin यह (Fe) का परिवहन करता है।
(iii) 𝛾 -Globulin – संश्लेषण लसिका अंगों में होता है।
– ये रोगाणुओं को और उनके द्वारा स्त्रावित विष पदार्थों को नष्ट करते हैं, अतः ये Antibody का कार्य करते हैं, इन्हें Immunoglobulin भी कहते हैं, जो पाँच प्रकार की होती है।
(c) Prothrombin = (0.3%)
(d) Fibrinogen = (0.3%)
– संश्लेषण व स्त्रवण यकृत द्वारा होता है।
– ये सबसे बड़े Plasma Protein है।
– ये रक्त का थक्का बनाने में सहायक होते हैं।
पचित पोषक (Digested Nutrients)
– Glucose
– Amino acid
– Fatty acid
– Glycerole
– Cholesterole
– Vitamins
– Blood में Glucose level = 80-100 mg/100 ml
– Blood Cholesterole level 150-260 mg/100 ml
अपशिष्ट पदार्थ (Waste Products)
– यूरिया (Urea)
– यूरिक एसिड (Uric acid)
– क्रिएटीन (Creatine)
– क्रिएटिनीन (Creatinine)
– Blood Urea level = 17-30 mg/100ml
– यदि रक्त में यूरिया का स्तर 40mg/100ml से अधिक हो जाए तो इसे Uremia अवस्था कहते हैं, जिसमें R.B.C. की आकृति विकृत हो जाती है। इन्हें (बर) Burr Cell कहते हैं।
– जिन्हें Spleen में नष्ट कर दिया जाता है, अतः Uremia एक प्रकार का एनीमिया होता है।
प्रतिस्कन्दक (Anticoagulant)
– हिपेरिन
– यह एक Mucopolysaccharide है जो वाहिनियों में रक्त स्कन्दन को रोकता है।
सुरक्षात्मक पदार्थ (Defense Compounds)
(a) Lysozyme – यह एक Protein enzyme है जो जीवाणुओं की कोशिका भित्ति को घोलकर उन्हें नष्ट करता है।
(b) Properdins – ये बड़े Protein अणु होते हैं, जो जीवाणु/वाइरस द्वारा स्त्रावित विष पदार्थों को नष्ट करते हैं, अतः Antitoxins कहलाते हैं।
हॉर्मोन (Hormones) –
– अन्तः स्त्रावी ग्रंथियों द्वारा स्त्रावित हॉर्मोन्स का परिवहन भी Plasma द्वारा किया जाता है।
रक्त कणिकाएँ
लाल रक्त कणिकाएँ (R.B.C)- (Erythrocyte)
– Erythrocyte स्तनधारियों में उभयावतल (Biconcave) वृत्ताकार (Circular) व केन्द्रक रहित होती है।
– R.B.C में उत्पत्ति के समय केन्द्रक उपस्थित होता है, लेकिन ये परिपक्वन के दौरान विलुप्त हो जाता है अतः परिपक्व R.B.C केन्द्रक रहित होती है।
– R.B.C में केन्द्रक की अनुपस्थिति और उभयावतल स्वरूप के कारण तलीय क्षेत्रफल बढ़ जाता है, जिससे R.B.C में अधिक मात्रा में Haemoglobin भरा जा सकता है।
अपवाद – ऊँट और लामा ऐसे स्तनधारी हैं, जिनकी R.B.C उभयोत्तल (Biconvex), अण्डाकार (Oval shaped) R.B.C में E.R भी (अनुपस्थित) होती है।
– अन्त:प्रद्रव्यी जालिका E.R. की अनुपस्थिति में R.B.C का अन्त कंकाल संरचनात्मक प्रोटीन, वसा व कॉलेस्ट्रॉल का बना होता है जो R.B.C में जाल के रूप में भरा होता है, इसे Stromatin कहते हैं। यह स्पंजी होता है।
– R.B.C की Plasma झिल्ली अत्यधिक लचीली होती है। इसे Donnan’s memberane कहते हैं। यह कुछ विशेष आयन्स जैसे Cl–, HCO3– के लिए अत्यधिक पारगम्य और Na+, K+ के लिए अपारगम्य होती है, इसे डोनन्स घटना कहते हैं।
– Spongy अन्त कंकाल और लचीली प्लाज्मा झिल्ली के कारण ही R.B.C अपने से (7.5) कम व्यास की (5
) रक्त केशिकाओं से भी आसानी से गुजर जाती है।
– R.B.C में Mitochondria व गॉल्जीकाय भी अनुपस्थित होते हैं।
– Mitochondria की अनुपस्थिति में R.B.C में केवल अवायवीय श्वसन होता है। अतः R.B.C में केवल glycolysis प्रक्रिया के Enzymes पाए जाते हैं जबकि क्रेब्स चक्र के enzyme अनुपस्थित होते हैं।
– R.B.C में महत्त्वपूर्ण Enzyme कार्बोनिक एनहाइड्रेज उपस्थित होता है। यह Enzyme CO2 के परिवहन के दौरान कार्बोनिक एसिड के निर्माण और बाद में उसके वियोजन की दर को 5000 गुना बढ़ा देता है। (तीव्र उत्प्रेरक जिसमें Zink होता है)
– रक्त समूह की Antigen, R.B.C की सतह पर पाई जाती है।
– Rh Antigen भी उपस्थित होने पर R.B.C की सतह पर ही पाई जाती है।
– एकल R.B.C का रंग हल्का पीला होता है, लेकिन R.B.C के समूह का रंग लाल होता है।
– R.B.C में लाल रंग का श्वसन वर्णक हीमोग्लोबिन पाया जाता है।
– R.B.C के संगठन में 60% जल और 40% ठोस भाग होता है।
– केवल हीमोग्लोबिन R.B.C के सम्पूर्ण भार का 36% और ठोस भाग का 90% भाग बनाता है।
– हीमोग्लोबिन की संरचना के दो घटक
Haem à 5%
Globin à 95%
1. Haem
– यह आयनन पोरफाइरिन का बना होता है।
– इसमें Iron, Fe+2 अवस्था में होता है।
– पेशियों में Myoglobin होता है।
– जिसमें Iron, Fe+3 अवस्था में होता है।
– Haemoglobin के O3 से क्रिया करने पर इसका ऑक्सीकरण हो जाता है तथा ऑक्सीकृत Haemoglobin, Methmoglobin कहलाता है, जो ऑक्सीजन परिवहन के लिए बेकार होता है।
– Haemoglobin, Oxygen से संयोग कर अस्थायी यौगिक Oxyhaemoglobin बनाता है, इसे ऑक्सीजनीकरण कहते हैं।
– Porphyrin का निर्माण एसिटिक अम्ल व ग्लाइसीन एमीनो एसिड से होता है।
– एक ग्राम हीमोग्लोबिन 1.34 ml O2 का परिवहन करता है।
– 100 ml रक्त में 15 gm Haemoglobin होता है।
– 100 ml रक्त लगभग 20ml O2 का परिवहन करता है।
2. Globin (Protein Part) –
– Globin protein का प्रत्येक अणु चार Polypeplide शृंखलाओं के संयोजन से बनता है तथा ये शृंखलाएँ चार प्रकार की होती हैं–
– Hb. F की ऑक्सीजन बंधुता वयस्क हीमोग्लोबिन से अधिक होती है।
Size of R.B.C
– Human = 7.5 𝜇
– Rabbit = 6.9 𝜇
– Frog = 35 𝜇
– कशेरुकियों की सबसे बड़ी R.B.C, Amphibia वर्ग में होती है – Amphiuma (size 75-80𝜇)
– कशेरुकियों की सबसे छोटी R.B.C स्तनधारी वर्ग में – Musk Deer (size 2.5𝜇)
– स्तनधारी की सबसे बड़ी R.B.C Elephant में होती है। (9-11)
– R.B.C के आकार में सामान्य से परिवर्तन Anisocytosis कहलाता है।
– Vit B12 की कमी से R.B.C का Size सामान्य से बड़ा होता है, जिन्हें Macrocyte कहते हैं। इन्हें Spleen में नष्ट कर दिया जाता है, ये वास्तव में अपरिपक्व R.B.C होती है लेकिन इनमें हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य होती है।
– Iron (Fe) की कमी से Microcyte बनती है, जिनमें हिमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम होती है, इन्हें भी Spleen में नष्ट कर दिया जाता है।
– Shape of R.B.C
– R.B.C की आकृति Biconcave होती है।
– आकृति में सामान्य से परिवर्तन पोइकीलो साइटोसिस (Poikelo cytosis) कहलाता है।
– यूरेमिया अवस्था में R.B.C की आकृति विकृत हो जाती है, जिन्हें Burr cells कहते हैं।
– सिकल सेल एनीमिया में R.B.C हंसियाकार हो जाती है।
– R.B.C को Hypotonic (अल्पपरासरी) विलयन में रखने पर ये फूल कर फट जाती है।
– R.B.C को Hypertonic विलयन में रखने पर सिकुड़ जाती है।
– 0.9% NaCl का घोल (.8 से 1%) R.B.C के लिए समपरासरी होता है।
– 80 – 100 mg% ग्लूकोज का घोल भी समपरासरी होता है।
– जीवन काल Life span of R.B.C
Human – 120 days
New Born – 100 days
Rabbit – 80 days
Frog – 100 days
– स्तनधारियों में औसत जीवन काल 120-127 दिन
– R.B.C Count (प्रति घन मिमी. रक्त में R.B.C की संख्या)
– ±1 Million
– Human – Male 5.5 Million (55 लाख)
– Female – 4.5 Million
– New born baby – 6.5 – 6.8,
– Rabbit – 7 Million
– Frog – 0.4 Million
– R.B.C की संख्या में सामान्य से वृद्धि (Poly cythemia) कहलाती है।
जो पहाड़ों की ऊँचाई पर उत्पन्न होता है, जहाँ वायु या O2 विरल होती है।
R.B.C की संख्या में कमी एनीमिया कहलाती है।
– Types of Anemia –
(i) विटा B12 की कमी से – (Macrocytic, Normochromic Anaemia)
(ii) Fe की कमी से (Micro cytic, Hypochromic Aanemia)
(ii) अत्यधिक रक्त स्त्राव के कारण (Accident) – (Normocytic, Normochromic Anaemia) पूर्ण शरीर में R.B.C की संख्या घट जाती है, लेकिन इस एनीमिया में R.B.C count अपरिवर्तित रहता है।
Formation of R.B.C
– R.B.C निर्माण की क्रिया à Erythropoiesis
– R.B.C बनाने वाले अंग à Erythropoietic Organ
– R.B.C निर्माण की क्रिया का प्रेरण वृक्क द्वारा स्त्रावित इरिथ्रोपोइटिन पीत्तक कोश (Erythropoietin Hormone) करता है।
– सर्वप्रथम R.B.C का निर्माण पीत्तक कोश (Yolk sac) द्वारा होता है।
– भ्रूणीय परिवर्धन के दौरान R.B.C का निर्माण Placenta, यकृत (Liver), प्लीहा (Spleen) व थाइमस ग्रंथि (Thymus gland) द्वारा होता है।
– वयस्क अवस्था में R.B.C का निर्माण लाल अस्थि मज्जा में होता है, जो स्पंजी अस्थियों की गुहा (ट्रेबेक्यूली) में भरा होता है।
– मेंढक में वृक्क प्रमुख हीमोपोएटिक अंग होता है।
– 1% R.B.C प्रतिदिन नष्ट होती है, लेकिन इतनी ही संख्या में नई R.B.C रक्त में प्रवेश कर जाती है।
– मृत R.B.C को Spleen में नष्ट किया जाता है, इसलिए Spleen को R.B.C का कब्रिस्तान कहते हैं।
– अतिरिक्त R.B.C का संग्रहण भी Spleen में होता है। इसलिए इसे शरीर का Blood Bank कहते हैं।
– R.B.C का Ghost इसकी Plasma झिल्ली का बना होता है, ये वास्तव में रिक्त R.B.C होती है, इसमें स्ट्रोमेटिन स्पंजी अन्तः कंकाल होता है जो इनकी आकृति को सामान्य बनाए रखता है।
– धीरे प्रवाह की अवस्था में RBC अपरा में पृष्ठीय तनाव के कारण चिपक जाती है जिसे रोलेक्स कहते हैं।
– RBC के छोटे विखण्डित टुकड़ों को हीमोकोनिया कहते हैं।
श्वेत रक्त कणिकाएँ (White Blood Corpuscles)
– इसे (W.B.C) को Leucocyteभी कहते हैं, क्योंकि ये रंगहीन होती है।
– TLC – Total leucocyte count à 8000–11000/mm3
– DLC – Differential Leucocyte count à विभिन्न W.B.C की अलग-अलग प्रतिशत मात्रा
– Acidophils – 4% of TLC
– Basophils – 0.5-1% of TLC
– Neutrophils – 65-70% of TLC
– Monocyte – 4-8% of TLC
– Lymphocyte – 25-30% of TLC
– Leucocytosis – TLC का बढ़ जाना, यह जीवाणु, Virus आदि के संक्रमण पर होता है।
– Leucocytopenia – T.L.C का घट जाना, यह AIDS व टाइफॉइड जैसे रोगों में होता है।
– Leukemia – T.L.C का अनियंत्रित रूप से बढ़ जाना, जिससे ये स्वयं की रक्त कणिकाओं को नष्ट करने लगती है, इसे Blood कैंसर भी कहते हैं।
– कोशिका द्रव्य और केन्द्रक के आधार पर W.B.C. दो प्रकार की होती है–
1. कणिकामय श्वेताणु (Granulocyte) –
– इनके कोशिका द्रव्य में विशेष अभिरंजक से अभिरंजित होने वाली कणिकाएँ पाई जाती हैं।
– इनका केन्द्रक पालियों में विभक्त होता है तथा पालियाँ एक-दूसरे से जीवद्रव्यी सूत्रों द्वारा जुड़ी रहती है।
– पालि युक्त केन्द्रक के कारण इन्हें Polymorphonuclear W.B.C कहते हैं।
– इनकी उत्पत्ति अस्थि मज्जा में होती है।
– ये तीन प्रकार की होती है–
(i) Acidophils
(ii) Basophils
(iii) Neutrophils
2. कणिकाविहीन श्वेताणु (Agranulocyte) –
– कणिकाविहिन व स्वच्छ कोशिका द्रव्य
– इनमें एक केन्द्रक होता है जो पालियों में विभक्त नहीं होता। इसलिए इन्हें Mononuclear W.B.C कहते हैं।
– इनकी उत्पत्ति अस्थि मज्जा में होती है, ये दो प्रकार की होती है।
(i) मोनोसाइट (Monocyte)
(ii) लिम्फोसाइट (Lymphocyte)
(i) एसिडोफिल्स (Acidophils/ Eosinophils)
– 4% of TLC
– अमीबीय आकृति (Amoeboid in shape)
– Size 10-14 𝜇
– जीवनकाल (Life span) – 14 hours
– इनके कोशिका द्रव्य में अम्लीय अभिरंजक इओसीन (Eosin) से अभिरंजित होने वाली कणिकाएँ पाई जाती हैं। इनका केन्द्रक दो पालियों में विभक्त होता है।
– ये शरीर की Allergy और परजीवी संक्रमण से सुरक्षा करती है।
– Allergy के समय हिस्टामिन स्त्रावित करती है।
– परजीवी संक्रमण के दौरान ये पहले परजीवी की सतह पर आसंजित हो जाती है और फिर लाइसोसोम्स के समान एन्जाइम्स स्त्रावित कर परजीवी को देहभित्ति को घोलकर उसे नष्ट करती है।
– इनकी संख्या में वृद्धि Eosinophilia कहलाती है, जो निम्नलिखित रोगों में होता है–
(a) Hay Fever – परागकणों के श्वास नली में पहुँचने पर उत्पन्न एलर्जी
(b) टीनिएसिस (Teniasis)
(c) एसकेरिएसिस (Ascariasis)
(ii) बेसोफिल्स (Basophils)
– 0.5-1% of TLC (min. in number)
– Amoeboid in shape size 8-10 𝜇
– Life span 10 Hours
– इनके कोशिका द्रव्य में क्षारीय अभिरंजक मिथाइलीन ब्लू से अभिरंजित होने वाली कणिकाएँ पाई जाती हैं। इनका केन्द्रक ‘S’ shaped होता है, जो दो या तीन पालियों में बँटा होता है। इनका प्रमुख कार्य हिपेरिन, हिस्टामिन तथा सिरटोनिन का स्त्रावण और परिवहन करना है लेकिन इन पदार्थों का संश्लेषण liver में होता है।
(iii) न्यूट्रोफिल्स/हेटरोफिल्स (Neutrophils/ Heterophils)
– 65-70% of TLC (max)
– Amoeboid in shape
– Size 10-124 𝜇
– Life span 12 Hours
– इनके कोशिका द्रव्य में कणिकाएँ पाई जाती हैं, जो किसी भी अभिरंजक द्वारा अभिरंजित हो जाती है, इसलिए इन्हें Heterophils भी कहते हैं।
– इनका केन्द्रक घोड़े के नाल की आकृति का होता है, जो तीन से पाँच पालियों या अधिक में विभक्त होता है (सर्वाधिक पालियाँ)
– Neutrophil के Lobes की गणना Arneth count कहलाती है।
– ये रक्त की सक्रिय गतिशील W.B.C होती है, जो रक्त केशिकाओं की पतली दीवार से पिचककर संयोजी ऊतक में आ जाती है। ये घटना Dipedasis (केशिका पारण) कहलाती है।
– ये स्वभाव से भक्षाणु (Phagocytic) होती है जो भक्षण द्वारा जीवाणु, वाइरस आदि को नष्ट करती है।
– अपने छोटे आकार और भक्षाणु स्वभाव के कारण इन्हें रक्त की Micro Policeman कहते हैं।
– ये लिंग ज्ञात करने में भी सहायक हैं Barr bodies की सहायता से ये Female की उपस्थिति दर्शाती है। जो ‘x’ गुणसूत्र के रूपान्तरण से बनती है।
(iv) मोनोसाइट (Monocyte)
– 4-8% of TLC
– Amoeboid in shape
– Size 12-20𝜇 (सबसे बड़ी W.B.C, सबसे बड़ी रक्त कणिका)
जीवनकाल (Life Span)
– रक्त में इनका जीवन काल 24 घंटे से कम होता है, लेकिन रक्त से बाहर संयोजी ऊतक में जीवनकाल हफ्ते या महीने में हो सकता है।
– प्रत्येक में सेम के बीज या वृक्क की आकृति का केन्द्रक होता है।
– इनमें भी Dipedasis की क्षमता पाई जाती है।
– ये भी स्वभाव से भक्षाणु होती है, जो भक्षण द्वारा जीवाणु, वायरस आदि को नष्ट करती है।
– बड़े आकार और भक्षाणु स्वभाव के कारण इन्हें Macropoliceman कहते हैं।
– इन्हें रक्त की सफाई कोशिकाएँ भी कहते हैं, क्योंकि ये मृत रक्त कणिकाओं और उनके टुकड़ों की सफाई करती है।
(v) लिम्फोसाइट (Lymphocyte) –
– 25-30% of TLC
– Amoeboid in shape
– Size 6-16𝜇 (Smallest W.B.C)
– जीवनकाल (Life Span) रक्त में इनका जीवनकाल पाँच से सात दिन या 20 दिन से कम होता है।
– प्रत्येक में एक बड़ा केन्द्रक और कोशिका द्रव्य परिधीय परत के रूप में होता है।
– ये दो प्रकार की होती है–
1. T-Lymphocyte
2. B-Lymphocyte
1. T-Lymphocyte –
– उत्पत्ति अस्थि मज्जा में, लेकिन परिपक्वन Thymus gland में होता है।
– कार्य के आधार पर तीन प्रकार की होती है–
(i) T-killer/T-cytotoxic –
– ये जीवाणु, Virus आदि पर प्रत्यक्ष आक्रमण कर उन्हें नष्ट करती है।
– भक्षण द्वारा या एन्जाइमी क्रियाओं द्वारा
(ii) T-helper –
– ये B-lymphocyte को विशिष्ट Antibody निर्माण और स्त्रवण के लिए प्रेरित करती है।
(iii) T- suppressor –
– ये T-killer को संदमित करती है और उनसे स्वयं के प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाती है।
2. B-Lymphocyte –
– इनकी उत्पत्ति और परिपक्वन अस्थि मज्जा में होता है।
– इनका कार्य Antibody का निर्माण, स्त्रवण तथा परिवहन करना है।
बिम्बाणु (Platelets)
– ये केवल स्तनधारियों में पाई जाती है।
– अन्य कशेरुकियों में इनके स्थान पर spindle cells पाई जाती है, जो कार्य में इन्हीं के समान होती है।
– इन्हें थ्रोम्बोसाइट (Thrombocyte) भी कहते हैं।
– ये उत्पत्ति में ही केन्द्रक रहित होती है। ये वास्तव में जीवद्रव्य के टुकड़े होते हैं। जो अस्थि मज्जा की Megakaryocyte cells से मुकुलन द्वारा बनी आकृतियों के पृथक् होने से बनती है।
– आकृति में उभयोत्तल (Biconvex), Disc like या अण्डाकार (Oval shaped) होती है।
Note – जबकि spindle corpuscles आकृति में spindle shaped और इनमें मध्य में गोलाकार केन्द्रक स्थित होता है।
– इसके कोशिकाद्रव्य में Basophelic granules पाए जाते हैं।
– इनके कोशिका द्रव्य का अधिकांश भाग एक संकुचनशील प्रोटीन Thrombosthenin का बना होता है।
– Size à 2-3𝜇 (सबसे छोटी रक्त कणिका)
– Life Span à 2 से 4 या 5 दिन
– Thrombocyte count à 1.5 से 4.5 लाख/ mm3
– संख्या में सामान्य से कमी à Thrombocytopenia
– क्रांतिक संख्या (Critical count of thrombocyte) à 40,000/mm3 रक्त
– यदि इनकी संख्या क्रांतिक संख्या से भी कम हो जाए तो त्वचा पर धब्बे (Red spots) दिखाई देते हैं, इसे purpura कहते हैं।
Functions of Thrombocyte –
– ये रक्त वाहिनियों की क्षतिग्रस्त Endothelium की मरम्मत करती है, Platelet plug बना देती है क्योंकि इनमें किसी चिपचिपी सतह पर आसंजित होने की (चिपकने की) प्रवृत्ति पाई जाती है।
– ये वाहिनी संकोचक सिरटोनिन स्त्रावित करती है।
– ये स्कन्दक कारक III (थ्रोम्बोप्लास्टिन) स्त्रावित करती है।
रक्त का थक्का (Blood Clotting)
– चोट लगने पर घाव से रक्त बहने लगता है, लेकिन कुछ समय बाद रक्त का बहना स्वतः ही रुक जाता है। इसे रक्त का थक्का बनना कहते हैं।
Bleeding time: 1-3 min
Clotting time: 2-8min
– कभी-कभी रक्त वाहिनियों में भी रक्त का थक्का बन जाता है, जो दो प्रकार के होते हैं–
(i) थ्रोम्बस थक्का (Thrombus Clot) –
– ये स्थिर थक्के होते हैं। जो आकार में लगातार बड़े होते जाते हैं, और अन्त में रक्त वाहिनी को अवरुद्ध कर देते हैं।
– यदि यह थक्का हृदय की कोरोनरी वाहिनी में बने तो इसे कोरोनरी थ्रोम्बस कहते हैं, जिसका परिणाम Heart Attack होता है।
– यदि यह थक्का मस्तिष्क की रक्त वाहिनियों में बने तो इसे Cephalic Thrombus कहते हैं, जिसका परिणाम लकवा होता है।
(ii) एम्बोलस थक्का (Ambolus Clot) –
– ये गतिशील थक्के होते हैं, जो रक्त के साथ बहते हुए, अन्त में रक्त में ही घुल जाते हैं।
– Ambolus Clot गतिशील होने के कारण Thrombus की अपेक्षा अधिक हानिकारक होते हैं।
रक्त का थक्का बनने की क्रिया विधि (Enzyme Cascade Theory)–
– यह सिद्धान्त Mac Farlane व Co-workers द्वारा दिया गया।
– इसके अनुसार थक्का बनने की क्रिया विधि में तीन चरण होते हैं।
1. Thromboplastin का मुक्त होना –
– चोट परत ऊतक Exo-Thromboplastin और Platlets Endothromboplastin स्त्रावित करती है, दोनों Thromboplastin Ca+2 की उपस्थिति में Plasma प्रोटीन्स से संयोग कर Pro-Thrombinase/Thrombokinase enzyme बनाती है।
– यह enzyme रक्त में उपस्थिति प्रतिस्कन्दक हिपेरिन को निष्क्रिय करता है। इसलिए इसे Anti Heperin भी कहते हैं।
2. Pro- thrombin का Thrombin में परिवर्तन –
– Pro-thrombinase enzyme, Plasma में उपस्थित निष्क्रीय Pro-Thrombin को सक्रिय Thrombin में बदलता है, Ca+2 आयनों की उपस्थिति में।
3. Fibrinogen का fibrin में परिवर्तन –
– फाइब्रिनोजन Plasma में उपस्थित घुलनशील प्रोटीन होता है।
– Thrombin Protein फाइब्रिनोजन के एकलकों का बहुलकीकरण कर अघुलनशील रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन बनाता है।
– ये फाइब्रिन के रेशे घाव पर जाल का निर्माण कर देते हैं, जिसमें रक्त कणिकाओं के अटक जाने से रक्त का बहना रुक जाता है, इसे रक्त का थक्का बनना कहते हैं।
– थक्का बनने के बाद भी थक्के से रक्त का कुछ भाग एक हल्के पीले रंग के तरल के रूप में बाहर निकलता है, जिसे Serum कहते हैं, जिसमें Antibody होती है।
Blood – Corpuscles = Plasma
Plasma – Fibrinogen = Serum
स्कन्दन कारक (Clotting Factors) –
– रक्त स्कन्दन में 13 कारक सहायक होते हैं।
– इन कारकों को रोमन संख्या द्वारा दर्शाया जाता है।
– इन कारकों का संश्लेषण मुख्यतः यकृत में होता है।
– इन कारकों के संश्लेषण के लिए Vit K आवश्यक होता है।
I. Fibrinogen
II. Prothrombin
III. Thromboplastin
IV. Ca++ (ये स्कन्दन के प्रत्येक चरण में सह कारक Co-factor का काम करते हैं।)
V. Proaccelerin
VI. Accelerin (इस कारक को अब अमान्य कर दिया है।)
VII. Proconvertin
VIII. AHG (Anti Haemophilic globin) (यह कारक शाही रोग ‘हीमोफिलिया A’ में अनुपस्थित होता है।)
IX. Christmus Factor
X. Stuwart Factor
XI. PTA (Plasma Thromboplastin Anticident)
XII. Hagman Factor (यह कारक घर्षण से सक्रिय होता है।)
XIII. FSF – Fibrin Stalizing Factor (Laki lowand Factor)
Blood Groups –
– रक्त समूह की Antigen, R.B.C की सतह पर पाई जाती है। इसे एग्लूटीनोजन Agglutinogen कहते हैं।
– रक्त समूह की Antigen के लिए Antibody Serum/Plasma में होती है।
– Antigen तथा Antibody विशेष प्रकार के Glyco-Proteins होते हैं।
– Antigen Antibody के निर्माण को प्रेरित करता है।
– रक्त समूह चार प्रकार के होते हैं। A, B, AB तथा O इनमें से A, B तथा O की खोज ‘लैंडस्टीनर’ ने की (Father of Blood Groups)
– रक्त समूह AB की खोज डी-कॉस्टेलो (De-costello) तथा टुली (Sturli) ने की।
Blood groups | Antigen | Antibody | Recieve Blood from | Donate Blood to |
A | A | b | A, O | A, AB |
B | B | a | B, O | B, AB |
AB | A, B | – | A,B, AB, O | AB |
O | – | a,b | O | A,B, AB,O |
सार्वत्रिक दाता – ‘O’ (एन्टीजन अनुपस्थित)
सार्वत्रिक ग्राही – AB ( एन्टीबॉडी अनुपस्थित)
– रक्त समूह बहु युग्म विकल्पी का उदाहरण होते हैं।
– जब किसी जीन के दो से अधिक विकल्प होते हैं, तो इसे बहु युग्म विकल्पी कहते हैं। रक्त समूह की जीन के तीन विकल्प होते हैं।
– जीन A तथा B प्रभावी होते हैं, जो अपना प्रभाव समयुग्मजी और विषम युग्मजी दोनों अवस्थाओं में प्रदर्शित करते हैं।
Rh FACTOR
– Rh कारक की खोज लैंडस्टीनर और वीनर ने Rhesus बंदर में की।
– Rh Antigen भी R.B.C की सतह पर पाया जाता है।
– Rh Antigen की जीन का कोई विकल्प नहीं होता। अतः यदि दोनों युग्मकों में से किसी एक में इस कारक की जीन उपस्थित है, तो संतान सदैव Rh+ होती है।
– Rh Antigen होने पर रक्त Rh+ और अनुपस्थित होने पर Rh– कहलाता है।
1. यदि Rh+ रक्त Rh– को स्थानांतरित किया जाए तो प्रथम रक्त स्थानान्तरण सफल रहता है लेकिन इस स्थानान्तरण के दौरान ही ग्राही के रक्त में Rh Antibody बनने लग जाती है, अतः अगले रक्त स्थानान्तरण में ग्राही की मृत्यु हो जाती है।
(कारण – ग्राही के शरीर में दाता के R.B.C की Clumping)
– इसे Agglutination of Blood कहते हैं।
– अतः AB+ सार्वत्रिक ग्राही तथा O– सार्वत्रिक दाता होता है।
2. यदि माता Rh– व पिता Rh+ है तो संतान Rh+ होती है। प्रथम शिशु तो सफलता पूर्वक जन्म ले लेता है, लेकिन प्रसव के दौरान ही माता के रक्त में Rh Antibody बन जाती है। अतः अगली गर्भावस्थाओं में शिशु की प्रारम्भिक अवस्था में ही R.B.C की Clumping (झुण्ड बनना) के कारण मृत्यु हो जाती है। जिसे Erythrablastosis foetalis कहते हैं।
– Rh Antibodies को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त औषधियाँ Rhogam, Rholin की गोलियाँ व Anti ‘D’ का इंजेक्शन दिया जाता है।
हृदय (Heart)
परिचय (Introduction) –
– जन्तु शरीर में एक विस्तृत पाइप लाइन का तन्त्र होता है। इसे परिसंचरण तन्त्र कहते हैं। शरीर एवं वातावरण के बीच तथा शरीर के विभिन्न ऊतकों के बीच पदार्थों का निरन्तर रासायनिक आदान प्रदान इसी तन्त्र के माध्यम से होता है इस प्रकार पाचन तन्त्र से पचे हुए पोषक पदार्थों श्वसनांगों से O2 तथा अन्त:स्त्रावी ग्रन्थियों से हॉर्मोन को शरीर कोशिकाओं में वितरित करने तथा कोशिकाओं से CO2 को श्वसनांगों में और NH3 यूरिया आदि उत्सर्जी पदार्थों को उत्सर्जन अंगों में पहुँचाने का काम परिसंचरण तन्त्र करता है। रक्त वाहिनियों की Endothelium व Endocardium के अतिरिक्त जो कि Endoderm से बनते हैं, शेष सम्पूर्ण परिसंचरण तन्त्र भ्रूण के “मीसोडर्म” (mesoderm) से बनता है।
– परिसंचरण तंत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित दो प्रकार के तन्त्र सम्मिलित हैं–
1. रुधिर संवहन तन्त्र (Blood vascular system) – इसके अन्तर्गत हृदय, रुधिर वाहिनियाँ तथा रुधिर सम्मिलित हैं।
2. लसिका तन्त्र (Lymphatic system) – इसके अन्तर्गत लसिका, लसिका वाहिनियाँ (Lymph vessels), लसिका गाँठें (Lymph nodes) तथा लसिका अंग (Lymph organ) सम्मिलित हैं।
– रुधिर संवहन तन्त्र या परिसंचरण तन्त्र के अध्ययन को ‘एन्जियो लॉजी’ (Angiology) कहते हैं।
– ‘विलियम हार्वे’ (William Harvey) – को ‘एन्जियोलॉजी’ का जनक (father of angiology) कहते हैं।
– जन्तुओं में दो प्रकार के परिसंचरण तंत्र पाए जाते हैं–
खुले प्रकार का | बंद प्रकार का |
(1) गुहिका नलिका एवं गुहा में रक्त भरा होता है जिसे हिमोसील कहते हैं तथा तरल को हिमोलिम्फ कहते हैं। | रक्त संचरण बंद नलिका में बहता है। |
(2) ऊतक, परिसंचरित तरल के सीधे संपर्क में रहते हैं। | ऊतक, परिसंचरित तरल के सीधे संपर्क में नहीं रहते हैं। |
(3) उदाहरण : ऑर्थोपोडा, नॉनसिफेलोपोड मॉलस्क | उदाहरण : एनेलिडा, सिफेलोपोड मॉलस्क, कॉर्डेट |
हृदय का दोहरा परिसंचरण (Double circulation)
– कशेरुकी जन्तुओं में शरीर के विभिन्न भागों में शुद्ध एवं अशुद्ध रक्त भेजने के लिए क्रमिक उद्विकास हुआ है।
– मछलियों में नलिकाकार ‘वीनस हृदय’ होता है इनके वीनस हृदय में एक और से अशुद्ध रक्त आता है तथा दूसरी ओर से निकलकर शुद्धीकरण हेतु जल क्लोमो में जाता है। इसे ‘हृदय का इकहरा परिपथ’ (Single heart circuit) भी कहते हैं।
– उभय चरों जैसे मेंढक तथा सरीसृपों में दाहिने व बाएँ आलिन्द अलग-अलग विभाजित होते हैं। दाहिने आलिन्द में अशुद्ध रक्त तथा बाएँ आलिन्द में शुद्ध रक्त शरीर से पहुँचता है परन्तु निलय एक ही होता है या अपूर्ण रूप से विभाजित होता है अतः यहाँ पर आकर शुद्ध एवं अशुद्व रक्त मिल जाता है।
– कुछ सरीसृपों (मगरमच्छ, घड़ियालों एवं एलीगेटर) तथा सारे पक्षियों एवं स्तनियों (mammals) में हृदय दो आलिन्दों एवं दो निलयों में विभाजित होता है। अतः हृदय के भीतर परिसंचरण के समय शुद्ध एवं अशुद्ध रक्त बिल्कुल अलग रहते हैं। हृदय का दायाँ भाग अशुद्ध रक्त को शरीर से लेकर फेफड़ों में शुद्धीकरण हेतु भेजता है। बायाँ भाग फेफड़ों से शुद्ध रक्त लेकर इसे सारे शरीर में भेजता है।
– हृदय का दायाँ भाग ‘पल्मोनरी हृदय’ (Pulmonary Heart) तथा बायाँ भाग ‘सिस्टेमिक हृदय’ (Systemic Heart) कहलाता है। इसे ही ‘हृदय का दोहरा परिपथ’ (Double heart circulation) कहते हैं।
– इसकी खोज सर्वप्रथम “विलियम हार्वे”(William Harvey) ने की थी।
रक्त का परिसंचरण

– दोनों परिपथ जो पूर्ण रूप से अलग नहीं होते हैं।
उदाहरण – मेंढक में निलय में रक्त मिश्रित होता है।
– रुधिर प्राप्ति के आधार पर हृदय के प्रकार –
(i) शिरीय हृदय (Vanous/Branchial – fishes)
(ii) धमनीय हृदय (Arterial – Prawn/झींगा)
(iii) धमनी शिरापरक हृदय (Arterio venous – Lung fishes, tetrapods)
मानव में रक्त का दोहरा परिसंचरण

हृदय की संरचना (Structure of Heart)
हृदय की बाह्य संचरण (External Structure of heart) –
– हृदय वक्ष गुहा के मध्यावकाश (Mediastinal Space) में अधर तल की ओर दोनों फेफड़ों के बीच स्थित होता है। यह त्रिकोणाकार होता है। इसका अग्र चौड़ा भाग थोड़ा सा दायीं तरफ (पृष्ठ) झुका होता है। सँकरा भाग बायीं तरफ झुका रहता है जो बाएँ फेफड़े पर दाब डालता है जिससे कार्डियक नोच बनती है। हृदय के आवरण को पेरकार्डियम कहा जाता है। जिसमें दो स्तर होते हैं –
(i) बाह्य – पेराइटल पेरीकार्डियम जिसमें दो उप स्तर होते हैं –
(a) बाहरी की ओर तंतुमय योजी ऊतक
(b) अंदर की ओर सरल शल्की उपकला (सीरस झिल्ली)
(ii) आंतरिक – विसरल पेरीकार्डियम या ऐपीकार्डियम जो सरल शल्की उपकला की बनी होती है।
– इन दोनों झिल्लियों के मध्य की सँकरी जगह को पेरिकार्डियल गुहा कहते हैं। इसमें भरे द्रव्य को पेरिकॉर्डियल द्रव्य (Pericardial fluid) कहते हैं। यह द्रव्य Pericardium द्वारा स्त्रावित होता है।
– पेरिकार्डियल गुहा एक वास्तविक सीलोम होती है।
पेरिकार्डियल द्रव्य के कार्य –
– यह हृदय की बाह्य आघातों से सुरक्षा करता है।
– हृदय को सदैव नम रखता है तथा हृदयावरण की दोनों झिल्लियों को चिपकने से रोकता है।
– यह स्पंदन में होने वाले घर्षण के दुष्प्रभाव से बचाता है।
– एक कक्षीय हृदय (single chambered heart) अकशेरूकियों तथा प्रोटोकॉड्रेटा (protochordates) में पाया जाता है।
– द्विकक्षीय हृदय (two chambered) मछलियों (fishes) में पाया जाता है। त्रिकक्षीय हृदय एम्फिबिया में पाया जाता है।
– सरीसृपों (Reptiles) में हृदय लगभग चौवेश्मी (Four chambered) दो स्पष्ट आलिन्द और दो अस्पष्ट निलय, होते हैं। लेकिन क्रोकोडाइल, सारे पक्षियों और सभी स्तनियों में हृदय चार कक्षीय (four chambered) होता है।
– मनुष्य का हृदय चार कक्षीय (four chambered) होता है। दो आलिन्द तथा दो निलय। मनुष्य का हृदय गुलाबी रंग का मांसल, खोखला तथा शंक्वाकार होता है। हृदय का भार 300 ग्राम होता है। हृदय का ऊपरी चौड़ा भाग आलिन्द भाग (auricular part) तथा निचले शंक्वाकार भाग को निलय भाग (ventricular part) कहते हैं।

हृदय की संरचना
– आलिन्दों तथा निलयों के मध्य एक स्पष्ट खाँच पाई जाती है जिसे ‘कोरोनरी सल्कस’ या ‘हृदय खाँच’ (coronary sulcus) कहते हैं। यह खाँच आलिन्दों की तरफ ज्यादा होती है इस कारण आलिन्द, निलयों से छोटे होते हैं।
(a) आलिन्द (Auricles) – आलिन्द भाग चौड़ा किन्तु छोटा और गहरे रंग का होता है। इसकी दीवारें पतली होती है यह एक खाँच द्वारा दाएँ और बाएँ आलिन्दों में विभाजित होता है। इस खाँच को अंतराआलिन्द खाँच (inter auricular sulcus) कहते हैं। यह खाँच कुछ बायीं ओर होने के कारण दायाँ आलिन्द (right auricle) बाएँ आलिन्द (left auricle) से बड़ा होता है। प्रत्येक आलिन्द अपने पीछे की ओर एक मोटा उभार बनाता है। जिसे ऑरीकुलर – एपेन्डिक्स कहते हैं। यह अपनी ओर वाले निलय के कुछ भाग को ढक लेता है।
(b) निलय (Ventricles) – निलय भाग चौड़ा मांसल व हल्के रंग का होता है। दोनों निलयों का विभाजन करने वाली खाँच अन्तरानिलय खाँच (inter – ventricular groove) कहलाती है, यह तिरछी होती है। यह हृदय की नोक तक नहीं पहुँच पाती है। इसी कारण दायाँ निलय (right ventricle) बाएँ निलय (left ventricle) से छोटा होता है।
– बायाँ निलय (left ventricle) दाएँ से अधिक पेशीय (muscular) तथा मोटी भित्ति वाला होता है, क्योंकि बायाँ निलय रुधिर को उन वाहिनियों में पम्प करता है, जो इसे पूरे शरीर में ले जाती है, जबकि दायाँ निलय केवल फेफड़ों को ही अपना रुधिर पम्प करता है। केरोनरी धमनी के बाईपास ग्राफ्टिंग के लिए आंतरिक दुग्ध धमनी या सेफनस शिरा को नलिका के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
– मॉयोकार्डियल इन्फाशन (M.I.) – यह हृदयी ऊतकों का कोशिकीय क्षय है जो एनोक्सिया द्वारा होता है। कोरोनरी धमनी के पूर्णतया बंद होने पर हृदय को रक्त आपूर्ति पूर्ण रूप से रुक जाती है एवं ऑक्सीजन की कमी होने पर हृदय को अधिक कार्य करना पड़ता है। स्थिति के और बिगड़ने पर हृदयी ऊतक नेक्रोसिस द्वारा मरने प्रारम्भ हो जाते हैं और मायोकार्डियल इन्फाशन होने लगता है। यह अनुत्क्रमणीय अवस्था है। इसे सामान्य भाषा में हृदय घात Heart attack भी कहते हैं।
– कोरोनरी धमनी की left anterior descending artery (LAD) शाखा में अवरोध हृदय के लिए अत्यधिक घातक होता है। (Widows Artery)
हृदय की आन्तरिक संरचना (Internal structure of heart)
– हृदय की आन्तरिक संरचना का अध्ययन क्षैतिज काट (Cut section) द्वारा किया जाता है।
– हृदय की दीवार मुख्यत: हृदय पेशियों (cardiac muscles) की बनी होती है। हृदय पेशियाँ शाखान्वित रेखित तथा अनैच्छिक (involuntary) होती है।
1. क्षैतिज काट (Cut section)
हृदय की भित्ति में तीन स्तर होते हैं-
(i) सबसे बाहरी स्तर को “एपीकार्डियम” कहते हैं। जो मीसोडर्मल होता है और simple squamous epithelium का बना होता है।
(ii) मायोकार्डियम पेशियाँ (Myocardium)- यह मध्य स्तर रेखित किन्तु अनैच्छिक हृदय पेशियों का बना होता है।
(iii) एन्डोकार्डियम (Endocardium)- यह स्तर एन्डोडर्मल एपिथिलियम का बना होता है। यह एपीथिलियम हृदय की गुहा को रेखित करती है।
– हृदय भित्ति की मोटाई मायोकार्डियम पर निर्भर करती है। आलिन्दों की भित्ति पतली तथा निलयों की भित्ति मोटी होती है।
– इन निलयों में भी बाएँ निलय की भित्ति अधिक मोटी तथा पेशीय होती है। जिसके कारण बाएँ निलय की गुहा छोटी तथा गोलाकार या अण्डाकार (circular or oval) होती है। दाएँ निलय की गुहा आकार में अर्द्धचन्द्राकार होती है। तथा बाएँ निलय से बड़ी होती है।
– दोनों आलिन्द एक अनुलम्ब अन्तरा-आलिन्द पट (inter auricular) द्वारा एक-दूसरे से अलग रहते हैं।
– इस अन्तरा आलिन्द पट्टी के पश्च भाग में दाहिनी ओर “फोसा ओवेलिस” (foosa ovalis) नामक अण्डाकार गड्ढा होता है। भ्रूणावस्था में इसी स्थान पर “फोरामेन ओवेलिस” (foramen ovalis) छिद्र होता है।
– आलिन्दों की भित्ति से अनेक लघु पेशीय पट्टियाँ गुहा में उभरी रहती हैं, जिन्हें कंघाकार पेशियाँ या “मस्क्यूली पेक्टीनेटी” (musculi pectinati) कहते हैं।
– भ्रूणावस्था में पाए जाने वाले फोरमान ओवेलिस छिद्र द्वारा दाएँ आलिन्द से रक्त बाएँ आलिन्द में सीधे आ जाता है क्योंकि भ्रूणावस्था में फेफड़े कार्यशील नहीं होते हैं। वयस्क अवस्था में यह छिद्र बन्द हो जाता है।
– शशक में दाएँ आलिन्द में 3 – महाशिराएँ पृथक् – पृथक् छिद्रों द्वारा खुलती हैं। 2- अग्र महाशिराएँ तथा एक पश्च महाशिरा होती है। मनुष्य में एक ही अग्र महाशिरा होती है।
– पश्च महाशिरा के खुलने वाले स्थान पर एक झिल्लीनुमा वलन या “यूस्टेकियन कपाट” (Eustachian valve) पाया जाता है। उस महाशिरा के खुलने वाले स्थान पर हेवरशियन (Haverisan) कपाट होता है।
– दाएँ आलिन्द में हृदय की दीवार का अशुद्ध रुधिर आलिन्द में लाने वाला “कोरोनरी साइनस” (Coronary sinus) का छिद्र होता है।
– कोरोनरी साइनस के छिद्र पर “थिबेसियन कपाट” (Thebesian value) या कोरोनरी वॉल्व पाया जाता है।
– बाएँ आलिन्द में फेफड़ों से शुद्ध रुधिर लाने वाली पल्मोनरी या फुफ्फुसीय शिराएँ खुलती है। चारों फुफ्फसीय शिराएँ दो छिद्रों द्वारा शुद्ध रक्त को बाएँ आलिन्द में डालती है। शशक में दो पल्मोनरी शिराएँ होती हैं।
– प्रत्येक आलिन्द अपनी ओर के निलय में एक बड़े आलिन्द निलय छिद्र (auriculo – ventricular apeture) द्वारा खुलता है। इन छिद्रों पर पेशीय प्रवधों के बने हुए कपाट पाए जाते हैं।
– दाएँ छिद्र पर स्थित दायाँ आलिन्द निलय कपाट केवल तीन वलनों का बना होता है। इसे “त्रिवलन कपाट” या ट्राइकस्पिड कपाट (tricuspid valve) कहते हैं।
– बायाँ आलिन्द निलय कपाट केवल दो, अधिक बड़े व मोटे फ्लेप्स (flaps) का बना होता है। इसे “द्विवलनी कपाट या बाइकस्पिड वॉल्व” (Bicupid valve) या “मिट्रल कपाट” (mitral valve) कहते हैं। ये कपाट रक्त को आलिन्दों में से निलय में तो जाने देते हैं। किन्तु पुन: वापस नहीं आने देते।
– दोनों कपाटों के वलन या परदे कंडरीय रज्जुओं या कॉर्डा-टेन्डीनी (chordae – tendineae) द्वारा निलयों की भीतरी दीवारों पर स्थित मोटे पेशीय स्तम्भों या कोलूम्नी कॉर्नी (Columne camae) या “पैपिलरी पेशियों” (Papillary muscles) से जुड़े होते हैं।
– दाएँ निलय के बाएँ भाग से पल्मोनरी चाप (Pulmonary arch) निकलता है। जो फेफड़ों को अशुद्ध रक्त पहुँचाता है।
– इस चाप के आधार भाग पर तीन वलन वाला अर्द्धचन्द्राकार कपाट (semiunar valve) पाया जाता है। जो रक्त को पल्मोनरी चाप से उल्टे निलय में आने से रोकता है।
– “बाएँ निलय” (left ventricle) के दाएँ भाग से “कैरोटिको सिस्टेमिक चाप” या “ग्रीन दैहिक धमनी चाप” (Carotico – systemic arch of aorta) निकलता है। इसके आधार भाग पर भी तीन वलन वाला अर्द्धचन्द्राकार कपाट (Semiunar valve) पाया जाता है। जो रक्त को वापस निलय में आने से रोकते हैं।
– फुफ्फसीय चाप (pulmonary artery) तथा ग्रीवा दैहिक धमनी चाप (Caratico – systemic arch) आपस में एक-दूसरे को क्रॉस करते हैं। जहाँ पर ये दोनों चाप एक-दूसरे को क्रास करते हैं, वहाँ पर ये लिगामेन्ट्स (Ligament) द्वारा जुड़े रहते हैं। इन लिगामेन्ट को “लिगामेन्टम आरटीरियोसम” (Ligamentum arteriosum) कहते हैं।
– भ्रूणावस्था में इसके स्थान पर “डक्टस आरटीरिओसस” (Ductus arteriosus) या “डक्टस बोटेलाई” (Ductus botalli) नामक महीन धमनी होती है। यह धमनी दोनों चापों के बीच रक्त के आवागमन का मार्ग प्रदान करती है।
हृदय का संवहन मार्ग (Conduction pathway)
हृदय के संवहन मार्ग में निम्नलिखित घटक होते हैं-
S.A. Node (Pacemaker)
↓
Inter nodal pathway
↓
A.V. Node
↓
Bundle of His
↓
Purkinje fibares (Rt & Lt)
Rate of conduction is fastest in bundle of His and slowest in Av node
शिरा आलिन्द घुण्डी, खोज – Keith और Fack
– दाएँ आलिन्द की भित्ति में रूपान्तरित पेशियों की बनी हुई घुण्डी पाई जाती है। जिसे “शिरा आलिन्द घुण्डी” या साइनो-ऑरीकुलर नॉड (Sinu – auricular node of S.A node) कहते हैं।
– साइनो ऑरीकुलर नॉड को “स्पंदन केन्द्र” (Pulsation center) या गतिनिर्धारक या हृदय का गति प्रेरक (pacemaker) कहते हैं।
– स्तनधारियों में यह घुण्डी दाएँ आलिन्द में पश्च महाशिरा के छिद्र के निकट स्थित होती है।
आलिन्द निलय घुण्डी : (खोज – Kent)
– इसी प्रकार की एक और घुण्डी जिसे “आलिन्द निलय घुण्डी” या “ए. वी. नॉड” (atrio – ventricular node or A.V. node) कहते हैं। अन्तरा आलिन्द पट (Inter auricular septum) के आधार भाग में दाएँ आलिन्द की ओर स्थित होती है। आलिन्द निलय नॉड से विशेष प्रकार के पेशीय तन्तु निकलते हैं, इन तन्तुओं को “बंडल ऑफ हिज” (Bundle of His) कहते हैं।
– बंडल ऑफ हिज से पेशीय तन्तु निलय भाग में शीर्ष पर दो शाखाओं में बँटकर दोनों निलयों की पार्श्व दीवारों में फैले रहते हैं। इन पेशीय तन्तु को “परकिन्जे के तन्तु” (Purkinje’s flbres) कहते हैं।
– पेसमेकर में स्पंदन की प्रेरणा शुरू होते ही संकुचन की लहरें उत्पन्न होती हैं। ये लहरें पेशीय तन्तुओं द्वारा हृदय की भित्ति में प्रसारित होती हैं।
– सबसे पहले दायाँ आलिन्द (right auricle) संकुचित होता है फिर बायाँ आलिन्द (left auricle) संकुचित होता है तथा अन्त में संकुचन की लहरें ए.वी. नॉड या “आलिन्द निलय घुण्डी” (A.V. node) में पहुँचती है। जिससे दोनों निलयों में एक साथ तीव्र संकुचन उत्पन्न होता है। A.V. घुण्डी से संकुचन प्रेरणा हिज के समूह एवं परकिन्जे तन्तुओं द्वारा पूरे निलय की दीवार में प्रसारित हो जाती है। अत: दोनों निलयों में दोनों आलिन्दों की तुलना में तीव्र संकुचन होता है।
– यद्यपि हृदय में पूर्ण तंत्रिका पेशीय पथ से आवेग पैदा होते हैं किन्तु आवेग उत्पन्न होने की आवृत्ति शिरा आलिन्द घुण्डी पर अपेक्षाकृत अन्य भागों से अधिकतम होती है और यह हृदय स्पंदन की लय को बनाए रखती है। इसलिए इसे हृदय का गतिप्रेरक कहते हैं। दूसरी ओर आलिन्द निलय घुण्डी, शिरा आलिन्द घुण्डी से तत्काल आवेगों को प्राप्त कर उन्हें तीव्र गति से आगे संचरित करती है।
हृदय की कार्यविधि (Working of heart)
हृदय एक बलपम्प की भाँति कार्य करता है। हृदय की कार्डियक पेशियों के नियमित व लयबद्ध संकुचन को हृदय स्पंदन या धड़कन कहते हैं। इसी के कारण रक्त हृदय से विभिन्न धमनियों में पम्प होता है। प्रत्येक धड़कन में कार्डियक पेशियाँ एक बार प्रकुंचन (systole) तथा एक बार शिथिलन (Disatotle) करती है।
सिस्टोल में हृदय रक्त को विभिन्न अंगों में धमनियों द्वारा भेजता है। शिथिल में विभिन्न अंगों से रक्त शिराओं द्वारा हृदय में लौटता है।
– हृदय की धड़कन की दर अलग-अलग प्राणियों में अलग-अलग होती है।
– हृदय धड़कन की उत्पत्ति के आधार पर हृदय दो प्रकार के होते हैं:-
(a) “न्यूरोजेनिक हृदय “(Neurogenic heart):- इस प्रकार के हृदय धड़कन की उत्पत्ति तन्त्रिकाओं द्वारा होती है अर्थात् स्पंदन का सूत्रपात तन्त्रिकीय संवेदनाओं के कारण होता है।
– अकशेरूकीयों (Invertebrates) में इसी प्रकार का हृ़दय पाया जाता है। जैसे- कॉकरोच में
(b) मायोजेनिक हृ़दय (Myogenic heart):- इसी प्रकार के हृदय में स्पंदन का सूत्रपात विशेष प्रकार के पेशीय तन्तुओं से बने समूह से होता है। इसे एस.ए. नॉड या “शिरा-आलिन्द घुण्डी” (S.A. node) कहते हैं। इसी नॉड द्वारा हृदय में संकुचन की लहरें उत्पन्न की जाती हैं। इसलिए एस.ए. नॉड को “हृदय का हृदय” (Heart of Heart) भी कहते हैं।
– कार्यिकी की दृष्टि से हृदय को शरीर का एक स्वायत्त अंग (autonomous organ) माना गया है।
– कशेरूकियों (vertebrates) में इसी प्रकार का हृदय पाया जाता है। जैसे- मेंढक, खरगोश, मनुष्य इत्यादि में।
– शशक में मायोजैनिक हृदय पाया जाता है। हृदय धड़कन की उत्पत्ति हृदय के अन्दर ही होती है। प्रत्येक बार स्पंदन का सूत्रपात साइनस घुण्डी या पेसमेकर से होता है।
हृदय स्पंदन का नियमन (Regulation of heart beat)
– स्पंदन का नियमन दो प्रकार से होता है-
(a) तन्त्रिकीय नियमन (Nervous control):- हृदय धड़कन को नियन्त्रित करने वाला “कार्डियक सेन्टर” (cardiac center) मस्तिष्क के मैडूला ऑब्लॉगेटा में पाया जाता है।
– इस कॉर्डियक सेन्टर की दो इकाइयाँ होती है:-
(i) कार्डियो एसिलरेटर सेन्टर (Cardio accelerator center)
(ii) कार्डियो निरोधक सेन्टर (Cardio inhibitory center)
– कार्डियो त्वरक सेन्टर से एक जोड़ी सिम्पेथेटिक तन्त्रिका (Sympathetic nerves) (S.A. node) एस.ए. नॉड में जाती है। यह कार्डियो त्वरक सेन्टर हृदय स्पंदन दर को बढ़ा देते हैं।
– जबकि कार्डियो निरोधक (Cardio inhibitory) वेगस तन्त्रिका (Cardiac branch of vagus nerve) द्वारा एस.ए. नॉड (S.A. node) को आवेग भेजता है। यह कार्डियो निरोधक सेन्टर हृदय धड़कन की दर को घटाता है।
(b) हॉर्मोनल नियन्त्रण (Hormonal control):-
– सिम्पैथेटिक नर्व फाइबर से सिम्पेथेटिन या नॉर एड्रीनलिन (sympathetin or nor-adrenaline) हॉर्मोन स्त्रावित होता है, जो हृदय धड़कन को बढ़ाता है।
– पैरासिम्पेथेटिक नर्व फाइबर से “एसिटीलकोलीन” (Acetylcholine) नामक हॉर्मोन स्त्रावित होता है। जो हृदय धड़कन को घटाता है।
– एड्रीनल मैडूला से स्त्रावित ऐड्रीनेलीन हॉर्मोन तथा थाइरौक्सिन (thyroxine) हॉर्मोन भी हृदय धड़कन को बढ़ाते हैं।
टेकीकार्डिया के सामान्य कारण-
– तापमान (Temperature):- हृदय स्पंदन दर में शारीरिक तापमान के साथ बढ़ती है। ज्वर/बुखार के कारण टेकीकार्डिया होता है क्योंकि शारीरिक ताप में वृद्धि से S.A. Node की उपापचय दर भी बढ़ जाती है जो उसकी उत्तेजनशीलता और लय को बढ़ा देती है।
– अनुकंपी तंत्रिका द्वारा उद्दीप्त होने पर (Stimulation by sympathetic nerves):- अनुकंपी तंत्रिका उद्दीप्त होने पर नॉरएपीनेक्रीन हॉर्मोन का स्त्रवण इसके तंत्रिका छोर द्वारा होता है, इसके कारण आवेग उत्पादन की आवृत्ति बढ़ जाती है, इसलिए स्पंदन की दर बढ़ जाती है।
– हृदय की कमजोर अवस्था (Weak condition of the heart):- हृदय पेशियों में कमजोरी आने पर स्पंदन की दर बढ़ जाती है क्योंकि कमजोर हृदय धमनी चाप में सामान्यत: आवश्यक रक्त की मात्रा पंप नहीं कर पाता है, इस कारण अनुकंपी प्रतिवर्त उत्पन्न होता है और स्पंदन दर को बढ़ा देता है।
– आघात/रक्त की हानि (Shock/Loss of blood):- रुधिर हानि होने पर शरीर में हृदय स्पंदन दर बढ़ती है ताकि एक निश्चित समय में अंगों में प्रवाहित होने वाले रक्त का आयतन (Cardiac output) यथावत बना रहे।
– व्यायाम (Exercise):- शारीरिक परिश्रम के कारण ऊतकों की ऑक्सीजन खपत बढ़ जाती है, इस बढ़ी हुई ऑक्सीजन आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए हृदय को अधिक आवृत्ति पर कार्य करना पड़ता है।
– साइनस टेकी कार्डिया (Sinus tachycardia):- यदि S.A-Node में स्वयं में ही विकार आने के कारण इसकी आवेग उत्पादन की आवृत्ति बढ़ जाए तो इसे साइनस टेकीकार्डिया कहते हैं।
– ब्रेडीकार्डिया (Bradycardia):- यह एक औसत वयस्क में हृदय स्पंदन दर का 60 से भी कम होने की अवस्था है।
ब्रेडीकार्डिया के कारण:-
– तापमान (Temperature):- शारीरिक ताप के कम होने पर S.A. Node की उपापचय दर में भी कमी हो जाती है जिससे इसकी उत्तेजनशीलता और लय में कमी आ जाती है।
– वेगस परानुकंपी द्वारा उद्दीपन होने पर (Stimulation by parasympatthatic vagus):- परानुकंपी उद्दीपन के समय वेगस द्वारा स्त्रावित हॉर्मोन एसीटायल कोलीन S.A. Node पर संदमक प्रभाव उत्पन्न करता है।
– हृदय की मजबूत अवस्था (Stronger condition of the heart):- एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में एक एथलीट व्यक्ति का हृदय अधिक सक्षम होता है। इसके कारण प्रत्येक स्पंदन में हृदय से अधिक रक्त निष्कासित होता है। जब एक एथलीट विश्राम अवस्था में होता है तो इस दौरान हृदय स्पंदन दर सामान्य से कम होती है।
– विश्राम (Rest):- विश्राम अवस्था या सोते समय शरीर की ऑक्सीजन की माँग कम हो जाने के कारण भी स्पंदन की दर घटती है।
– साइनस ब्रेडीकार्डिया (Sinus bradycardia):- S.A. Node में विकार के कारण इससे आवेग उत्पादन की बारम्बारता घट जाती है जिससे स्पंदन की दर भी घट जाती है।
– एक सामान्य औसत वयस्क में स्पंदन दर और संवातन की दर का अनुपात 4:1 होता है।
हृदय चक्र या कार्डियक साइकिल (Cardiac cycle)
– हृदय के स्पंदन की क्रिया भ्रूणीय परिवर्धन के समय आरम्भ होती है। एक बार हृदय स्पंदन आरम्भ हो जाने के बाद यह जीवन पर्यन्त होता रहता है। मनुष्य में विश्राम की अवस्था में एक मिनट में हृदय-62 बार स्पंदन करता है तथा इस एक मिनट में 5-लीटर रुधिर हृदय द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में पम्प की भाँति भेजा जाता है।
– हृदय में होने वाली विभिन्न क्रमिक घटनाओं को हृदय चक्र या कार्डियक साइकिल (cardiac cycle) कहते हैं।
– आलिन्दों के संकुचन को आलिन्द प्रकुंचन या एट्रियल सिस्टोल (Atrial sytole) कहते हैं तथा इनके शिथिलन को आलिन्द शिथिलन (atrial diastole) कहते हैं।
मनुष्य के एक हृदीय चक्र में- (single cardiac cycle)-
– निलयों के संकुचन एवं शिथिलन को इसी प्रकार क्रमश: निलय प्रकुंचन (ventricular systole) तथा निलय शिथिलन (ventricular diastole) कहते हैं।
– हृदय चक्र का समय, हृदय स्पंदन दर के अनुसार इसी के उल्टे अनुपात में होता है। यदि स्पंदन दर 72 प्रति मिनट है तो हृदय चक्र का समय 60/72= 0.8 सेकण्ड होगा।
Events of both auricles & ventricles
– हृदय चक्र से सम्बन्धित निम्न घटना चक्र होते हैं:-
1. निलय प्रकुंचन (ventricular systole):- यह एक आवश्यक क्रिया होती है क्योंकि इसी क्रिया के दौरान रक्त को हृदय से बाहर धमनियों में भेजा जाता है- इसके चार भाग होते हैं-
(a) “आइसो मेट्रिक संकुचन”-(Isometric contraction):- निलयों में दाब ज्यादा होता है। इस दाब के बड़ने से “कस्पिड वॉल्व” बन्द हो जाते है। इन कपाटों के बंद होने पर प्रथम हृदय ध्वनि Lubb सुनाई देती है।
(b) “पीरियड ऑफ इजेक्शन” (Period of ejection):- इस चक्र के दौरान जब नियलों में दाब बढ़ता है तो धमनी चापों के अर्द्धचन्द्राकार कपाट (semilunar valve) खुल जाते हैं तथा रक्त तेजी से धमनी चापों के अर्द्धचन्द्राकार कपाटों को धकेलता हुआ इनमें पहुँचने लगता है।
– बाएँ निलय (left ventricles) से शुद्ध रक्त ग्रीवा दैहिक धमनी चापों में जाता है तथा दाएँ निलय (right ventricles) से अशुद्ध रक्त फुफ्फुसीय चापों में चला जाता है।
(c) “प्रोटोडायोस्टोल या आध अनुशिथिलन” (Protodiastole):- इस दौरान निलयों में रक्त के निष्कासन से निलयों में अन्त: निलय दाब घटने लगता है तथा रक्त निष्कासन धीमा पड़ जाता है।
(d) “आइसो मैट्रिक रिलेक्सेशन”- (Isometric relaxation):- निलय और अधिक सिकुड़ना बंद कर देते हैं तथा रक्त निष्कासन से निलयों का दाब धमनी चापों के दाब के समान हो जाता है तो निलयों से रक्त का निष्कासन बंद हो जाता है।
2. निलय अनुशिथिलन (Ventricular diastole):- निलय प्रकुंचन के दौरान आलिन्द शिराओं से रक्त प्राप्त करते हैं। निलय अनुशिथिलन के प्रारम्भ में निलय दाब चापों के रक्त दाब से भी कम हो जाता है जिसके कारण दोनों अर्द्धचन्द्राकार कपाट Dup हृदय ध्वनि के साथ बंद हो जाते हैं। निलय अनुशिथिलन की दो प्रावस्थाएँ होती हैं।
(a) रेपिड इनफ्लो (Rapid-inflow):- निलयों में सिस्टोल होने से निलय दाब बहुत कम हो जाता है। यह निलय दाब घटकर आलिन्द दाब से भी कम हो जाता है। इस कारण “कस्पिड वॉल्व” खुल जाते हैं तथा रक्त तेजी से आलिन्दों से निलयों में आ जाता है। इस दौरान तृतीय हृदय ध्वनि सुनाई देती है।
(b) डायस्टैसिस या पूर्ण विश्रामावस्था (Diastasis):- रेपिड इनफ्लो के बाद जिस गति से आलिन्द शिराओं से रक्त प्राप्त करते हैं। उसी गति से रक्त को निलयों में स्थानान्तरित कर देते हैं। जिस कारण रक्त का अन्त:प्रवाह (inflow) धीमा पड़ जाता है।
3. आलिन्द प्रकुंचन (Auricle systole):- अलिन्दों में संकुचन से बचा हुआ रक्त निलयों में आ जाता है। इसके कारण आलिन्द दाब शून्य हो जाता है।
4. आलिन्द अनुशिथिलन (Auricle diastole):- आलिन्दों में इस शून्य दाब के कारण आलिन्द, अनुशिथिलन के दौरान शिराओं से अधिक मात्रा में रक्त प्राप्त करते हैं। इस दौरान चतुर्थ हृदय ध्वनि सुनाई देती है।
हृदय चक्र से संबंधित रक्त के आयतन
– निलय प्रसारण के दौरान अधिकतम 120 mililitres तक रक्त भर लेते हैं। यह End diastolic volume कहलाता है। अब जब इनमें संकुचन होता है तो इसमें से 70 mililitres रक्त बाहर निकलता है। यह Stroke volume कहलाता है। systole के बाद कक्ष में बचा हुआ रक्त End systolic volume कहलाता है। (120-70=50 ml)
– End diastolic volume का वह हिस्सा जो कि पम्प कर दिया जाता है। उसका अनुपात Ejection fraction कहलाता है। यह सामान्यत: 60% होता है।
1. प्रथम हृदय ध्वनि (Ist sound):- यह संकुचन ध्वनि है। जो निलय संकुचन का आरम्भ प्रदर्शित करती है। यह ध्वनि मिट्रल कपाट (mitral valve) तथा ट्राइकस्पिड कपाट (tricuspid) के बन्द होने से उत्पन्न होती है। यह ध्वनि हल्की होती है तथा यह “लब (lubb) (L-U-B-B)” के रूप में सुनाई देती है।
2. द्वितीय हृदय ध्वनि (IInd sound):- यह शिथिलन ध्वनि (diastolic sound) है जो निलय शिथिलन (ventricular diastole) के आरम्भ को प्रदर्शित करती है। यह ध्वनि दोनों चापों या एओर्टा में स्थित “अर्द्धचन्द्राकार कपाटों (semilunar valve)” के बन्द होने से उत्पन्न होती है तथा “डब (Dub) के रूप में सुनाई देती है। यह द्वितीय ध्वनि प्रथम ध्वनि से तीखी तथा कम समय की होती है।
– हृदय की इन ‘लब’ तथा ‘डब’ ध्वनियों को “स्टेथॉस्कोप” (stethoscope) नामक यन्त्र द्वारा सुना जा सकता है।
– हृदय ध्वनियों को एक ग्राफ द्वारा अंकित कर अध्ययन करना “फोनो- कार्डियोग्राफी” (phonocardiography) कहलाता है।
– हृदय मरम्मत हृदय की ‘लब’ ओर ‘डब’ ध्वनियों के अतिरिक्त कपाटों की विकृति के कारण अन्य किसी ध्वनि का सुनाई देना।
ELECTROCARDIOGRAM (E.C.G.)
– सर्वप्रथम Waller ने रिकॉर्ड किया, इन्थोवेन = ECG के जनक।
– ई.सी.जी. हृदय की वैद्युत क्रिया को रिकॉर्ड करता है। हृदय में विद्युत संचार पथ होता है। जब हृदय पेशियों (Cardiac Muscles) के सम्पर्क में आती है तो धारा का संवहन शरीर की भित्ति में भी हो जाता है। इस धारा प्रवाह को जो वक्ष से electrodes द्वारा प्राप्त किया जाता है तथा आवर्धित है व Voltage/time रेखाचित्र (graph) के रूप में दर्शाया जाता है। यह शरीर के विभिन्न स्थितियों पर 12 लीड की मदद से लिया जाता है।
ECG के अवयव
– Waves: “P” wave- यह आलिन्द के विध्रुवण को प्रदर्शित करती है जो कि आलिन्द में संकुचन उत्पन्न करता है। इसका प्रथम आधा भाग दायाँ आलिन्द तथा द्वितीय आधा भाग बायाँ आलिन्द को प्रदर्शित करता है।
– “QRS” compex- यह निलय के विध्रुवण को प्रदर्शित करता है जो कि निलय में संकुचन उत्पन्न करता है।
– “T” wave- यह निलय के पुन: ध्रुवण को दर्शाती है इस दौरान निलय में अनुशिथिलन होता है।
E.E.G. या Electro-encephalography (Berger Waves):
– इसकी खोज Satton (1875) के द्वारा की गई थी तथा प्रथम E.E.G. Berger (1929) द्वारा गैल्वेनोमीटर से मानव मस्तिष्क की Record की गई थी। E.E.G. एक वैद्युत संचालित उपकरण है जो कि 16-30 इलेक्ट्रॉड रखता है। इसे जब कपाल से जोड़ा जाता है तो वैद्युत तरंगों के रूप में मस्तिष्क के विभिन्न भागों की सूचना देता है। यह अघातक तकनीक है।
रक्त दाब या बी.पी. (Blood pressure or B.P.)
– रक्त बन्द नलिकाओं में बहता है। अत: यह नलिकाओं की दीवार पर दबाव डालता है। जैसे ही रक्त धमनियों में पम्प किया जाता है। यह धमनियों की दीवार पर दबाव डालता है। इसी को रक्त दाब (Blood Pressure) कहते हैं।
रक्त दाब को दो अवस्थाओं में नापा जाता है-
1. प्रकुंचन दाब (Systolic pressure):- यह रक्त दाब की ऊपरी सीमा (Higher-limit) है। जो हृदय संकुचन की अवस्था को प्रदर्शित करती है। मनुष्य में यह सीमा- 120 mm Hg होती है।
2. शिथिलन दाब (Diastolic pressure):- यह रक्त दाब की निचली सीमा (lower-limit) है। जो हृदय शिथिलन की अवस्था को प्रदर्शित करती है।
– मनुष्य में यह सीमा-80-mm Hg होती है।
– जिस यन्त्र द्वारा रक्त दाब नापा जाता है उसे “दाबान्तर मापी” या “स्फिग्मोमैनोमीटर” (sphygmomanometer) कहते हैं।
– रक्त दाब मनुष्य में बाजू (arm) की ब्रेकियल धमनी (brachial artery) में नापा जाता है।
[स्वस्थ मनुष्य का रक्त दाब (B.P): 120/80 mm Hg होता है।]
– सर्वप्रथम “हैल्स (Hales)” ने घोड़े में रक्त दाब नापा था।
– रक्त दाब को प्रभावित करने वाले कारक:- रक्त दाब निम्नलिखित कारकों से प्रभावित हो सकता है–
– परिश्रम (exercise):- शारीरिक परिश्रम के समय रक्त दाब बढ़ जाता है।
– भावुकता और उत्तेजना (Emotions and excitement):- मनुष्य की उत्तेजित अवस्था या भावुकता की अवस्था में B.P. बढ़ जाता है।
– रक्त नलिकाओं का संकुचन (Contraction of blood vessels):- विशेषकर धमनियों एवं केशिकाओं में अधिक संकुचन के कारण B.P. बढ़ जाता है।
– शारीरिक स्थिति (Body-posture):- लेटे हुए मनुष्य में खड़े रहने की स्थिति से B.P. कम रहता है।
– लिंग (Sex):- स्त्रियों में पुरुष की तुलना में मामूली-सा B.P. कम होता है।
– मुटापे (Obesity):- इसके कारण B.P. बढ़ जाता है। एड्रीनल स्त्रावण के समय, डर (fear) के समय तथा कुछ आनुवंशिक स्थितियों में भी B.P. बढ़ जाता है।
– आयु:- बढ़ती आयु के साथ धमनियों की भित्ति में Vasomotor तनाव बढ़ता है जिसके कारण B.P. बढ़ता है।
नब्ज (pulse):-
– मनुष्य की कलाई में स्थित रेडियल धमनी (Radial artery) में नब्ज महसूस की जाती है। इसे गर्दन की धमनी में भी महसूस किया जा सकता है। नब्ज नापने के यन्त्र को “स्फिग्मोमीटर” (sphygmometer) कहते हैं। धमनी की नब्ज को अंकित करने वाला उपकरण “स्फिग्मोग्राफ (sphygmograph) कहलाता है।
परिसंचरण तंत्र से संबंधित रोग (Disorders Related to the Circulatory System)
– परिसंचरण तंत्र अथवा हृदय में होने वाली सभी प्रकार की असामान्य अवस्था परिसंचरण की कार्यिकी को प्रभावित कर सकती है। प्राय: यह कई प्रकार के रोगों के रूप में व्यक्त होता है। जैसे –
अतितनाव (Hypertension):- यह किसी व्यक्ति के रक्त-दबाव में वृद्धि की अभिव्यक्ति है। एक स्वस्थ व्यक्ति का सामान्य प्रकुंचन एवं अनुशिथिलन दबाव क्रमश: 120 mmHg एवं 80 mmHg होता है। कई कार्यिकी अवस्थाओं में अल्प उतार-चढ़ाव हो सकता है परंतु प्रकुंचन रक्त दबाव का 140 mmHg से अधिक एवं अनुशिथिलन रक्त दबाव का 90mmHg से अधिक होने को उच्च रक्त दबाव (hypertension) कहते हैं यह मध्यम से उच्च तक परिवर्तनशील हो सकता है। धमनी रक्त दबाव के निरंतर बढ़े रहने की अवस्था को अतितनाव कहते हैं। उच्च रक्त दबाव तीन अनिवार्य अंगों, हृदय, मस्तिष्क एवं गुर्दे को प्रभावित कर सकते हैं। उच्च रक्त दबाव के कारण हृदय को अधिक कार्य करना पड़ता है, जिसके कारण रक्ताधिक्य हृदय रोग कम उम्र में हो सकता है। इसके अतिरिक्त मस्तिष्क अथवा गुर्दे में धमनी के फट जाने के कारण रक्तस्त्राव हो सकता है। मस्तिष्क में रक्तस्त्राव के कारण मस्तिष्क के एक भाग की मृत्यु हो सकती है। जिससे मस्तिष्क ऊतक क्षय हो जाता है। गुर्दे में हुए रक्तस्त्राव के कारण गुर्दा खराब हो सकता है एवं वृक्कीय विफलता हो सकती है।
अल्पतनाव (Hypotension):- इसे निम्न रक्त दाब भी कहते हैं। अल्पतनाव का अर्थ संकुचन दाब का 100 mmhg से कम और अनुशिथिलन दाब का 70 mmhg से कम होना है। यह धमनियों के प्रसारण और निलय के स्पंदन में कमी के कारण होता है इसका कारण कपाटों की असामान्यता, एनीमिया और भोजन में पोषकों की कमी भी होती है। निम्न रक्त दाब के कारण कमजोरी, सुस्ती और देखने में तकलीफ होती है। इसे कारण जानने के बाद ही दूर किया जा सकता है। केवल अल्पकालीन लाभ के लिए ग्लूकोज और लवण युक्त घोल की अतिरिक्त मात्रा का सेवन किया जा सकता है।
एथिरोकाठिन्य (Atherosclerosis):- इसका अभिप्राय वृहद् एवं मध्यम आकार की धमनियों की गुहा में लिपिड विशेष कर कॉलेस्टेरॉल के निक्षेपण से है। ऐसे निक्षेपण को एथिरोमेटस अथवा एथिरोकाठिन्य प्लाक कहते हैं। यह सूक्ष्म कॉलेस्टेरॉल कण अथवा रवों का ट्यूनिका इंटिमा एवं चिकनी पेशियों पर निक्षेपित होने के साथ शुरू होता है।
रक्त वाहिनियाँ (Blood- Vessels)
– बन्द प्रकार के परिसंचरण तन्त्र में रुधिर वाहिनियाँ दो प्रकार की होती हैं–
1. धमनियाँ
2. शिराएँ (veins)
– सामान्यत: धमनी रक्त को हृदय से अंगों तक ले जाती है तथा धमनियों में बहने वाला रक्त शुद्ध होता है।
– शिराएँ सामान्यत: अंगों से अशुद्ध रक्त को हृदय में ले जाती है।
धमनियों और शिराओं की औतिकी:- रुधिर वाहिनियों की दीवार में आदर्श रूप से तीन स्तर होते हैं–
1. बाह्य स्तर या ट्यूनिका एक्सटर्ना (Tunica externa):- यह सबसे बाहरी स्तर होता है। यह ढीले संयोजी ऊतक का बना होता है। अनेक कॉलेजन तन्तु, इलास्टिन, तन्तु तथा अनुलम्ब पेशियाँ पाई जाती हैं।
2. मध्यस्तर या ट्यूनिका मीडिया (Tunica media):- यह स्तर वर्तुल अरेखित पेशियाँ और इलास्टिन तन्तुओं के जाल से बना मोटा स्तर होता है।
3. अन्त:स्तर या ट्यूनिका इन्टर्ना (Tunica interna):- यह स्तर शल्की उपकला का (squamous epithelium) बना होता है। इसे “एण्डोथिलियम (endothelium)” भी कहते हैं।
– बड़ी धमनियों की भित्ति में एक और परत पाई जाती है। जिसे इलास्टिक झिल्ली कहते हैं। यह इलास्टिक झिल्ली ट्यूनिका मीडिया तथा इन्टर्ना के मध्य में पाई जाती है।
– उपर्युक्त सभी स्तर शिराओं की तुलना में धमनियों में अधिक विकसित होते हैं।
– धमनियों की दीवार मोटी तथा अधिक पेशीय होती है। इनकी दीवार प्रत्यास्थ (elastic) तथा पिचकने वाली नहीं (Non-collapsable) होती है।
– इसके विपरीत शिराओं की दीवार पतली तथा कमजोर होती है। इनकी दीवार अप्रत्यास्थ (non elastic) तथा पिचकने वाली होती है।
– रक्त केशिकाओं (Blood capillaries) की दीवार में केवल “एन्डोथिलियम” स्तर (endothelium) पाया जाता है। जिसकी कोशिकाएँ चपटी व शल्की होती है। इनकी भित्ति छिद्रित (perforated) होती है। यह रक्त कोशिकाएँ धमनियों को शिराओं से जोड़ती हैं।
– इनकी खोज “मारसेलो मैल्पीघी” (Marcello malpighi) नामक वैज्ञानिक ने की थी।
– स्वयं रुधिर वाहिनियों की दीवार में रक्त सप्लाई व आवश्यक पदार्थ पहुँचाने हेतु महीन रुधिर वाहिनियों का जाल होता है। इस रुधिर सप्लाई को “वासा वैसोरम” (Vassa-Vasorum) कहते हैं।
धमनियों व शिराओं में प्रमुख अन्तर –
धमनी (Artery) | शिरा (Vein) |
1. रुधिर को हृदय से अंगों की ओर ले जाती है। | 1. रुधिर को अंगों से हृदय की ओर लाती है। |
2. सभी धमनियों में शुद्ध रुधिर पाया जाता है केवल फुफ्फुसीय धमनी में अशुद्ध रक्त पाया जाता है। | 2. सभी शिराओं में अशुद्ध रक्त पाया जाता है केवल फुफ्फुसीय शिरा में शुद्ध रक्त (Pure Blood) पाया जाता है। |
3. इसमें रुधिर अधिक दबाव के साथ बहता है। | 3. इनमें रुधिर बहुत कम दाब से धीमी गति से बहता है। |
4. धमनियाँ सामान्यत: शरीर में गहराई में स्थित होती हैं। | 4. शिराएँ सामान्यत: त्वचा में कम गहराई पर स्थित होती हैं। |
5. धमनियों की भित्ति दृढ़ तथा मोटी होती है। | 5. शिराओं की भित्ति पतली तथा कोमल होती है। |
6. इनकी गुहा संकरी होती है। | 6. इनकी गुहा (Lumen) चौड़ी होती है। |
7. इनके भीतर कपाट (Valves) नहीं पाए जाते हैं। | 7. इनके भीतर कपाट होते हैं। |
8. ये गुलाबी या चटक लाल रंग की होती हैं। | 8. ये गहरी लाल या नीली-सी होती हैं। |
9. दीवार मोटी होने के कारण धमनियाँ खाली होने पर पिचकती नहीं है। | 9. शिरा के खाली होने पर दीवार पिचक जाती है। |
10. इनका मध्य स्तर अधिक मोटा होता है। | 10. इनका मध्य स्तर अपेक्षाकृत कम मोटा होता है। |
निवाहिका तन्त्र (Portal system)
– जब शरीर के किसी भाग की शिरा, महाशिरा, या सीधी हृदय में खुलने के बजाय किसी अन्य अंग में जाकर कोशिकाओं में बँट जाती है और इस प्रकार इसका रक्त अन्य अंगों की शिरिका द्वारा हृदय में ले जाया जाता है तो ऐसी व्यवस्था वाले शिरा तन्त्र को ‘निवाहिका तन्त्र’ कहते हैं।
– यह तीन प्रकार के होते हैं –
1. वृक्क निवाहिका तन्त्र (Renalportal system)
2. यकृत निवाहिका तन्त्र (Hepatic portal system)
3. हाइपोफाइसियल निवाहिका तन्त्र (Hypophysial portal system)
वृक्क निवाहिका तन्त्र (Renal portal system) –
– इसके अन्तर्गत शरीर के पश्च भागों तथा टाँगों से रक्त लाने वाली शिराएँ आपस में संयुक्त होकर वृक्क निवाहिका शिरा बनाती है। यह शिरा वृक्कों में जाकर केशिकाओं में बँट जाती है। वृक्क इस रक्त में से नाइट्रोजीनस अपशिष्ट पदार्थों को पृथक् कर देता है। वृक्कों से होता हुआ रक्त फिर हृदय में पहुँचाया जाता है।
– स्तनधारियों में वृक्क निवाहिका तन्त्र अनुपस्थित होता है। जैसे – शशंक में
– मेंढक में वृक्क निवाहिका तन्त्र तथा यकृत निवाहिका तन्त्र दोनों उपस्थित होते हैं।
यकृत निवाहिका तन्त्र (Hepatic portal system) –
– यह सभी कशेरुकियों में पाया जाता है स्तनधारियों (mammals) में यह सुविकसित होता है। निम्नलिखित शिराओं के सम्मिलन से एक यकृत निवाहिका शिरा (Hepatic portal vein) बनती है।
(i) पश्च आँत्र योजनी शिरा – (Posterior mesenteric vein) – जो मलाशय व गुदा से आती है।
(ii) अग्र आँत्र योजनी शिरा – (Anterior mesenteric vein) – जो कोलन, सीकम, तथा क्षुद्रान्त्र से रक्त लाती है।
(iii) Cystic शिरा (Cystic vein) – जो पित्तकोश से रक्त लाती है।
(iv) लीनोगैस्ट्रिक शिरा (liemogastric vein) – जो आमाशय व प्लीहा से रक्त लाती है।
(v) नाभि के आस-पास की त्वचा से आने वाली paraumbilical शिरा।
(vi) ग्रहण शिरा – ग्रहणी एवं अग्न्याशय से।
– यकृत निवाहिका शिरा यकृत के बाएँ पिण्ड में घुसकर केशिकाओं में बँट जाती है। आहारनाल से अवशोषित आवश्यकता से अधिक पोषक पदार्थों को यकृत कोशिकाएँ रक्त से ले लेती है। यह रक्त हीपेटीक शिरा द्वारा हृदय में पहुँचता है।
– स्तनियों में एक और हाइपोथैलैमस – हाइपोफीसियल निवाहिका तन्त्र (Hypothalamus – hypophysial portal system) होता है। जो पीयूष ग्रन्थि से सम्बन्धित होता है।
हाइपोफाइसियल निवाहिका तंत्र –
– Hypothalamus में hypophysial portal vein बनती है जो कि Pituitary gland या adenohypophysis में पहुँच कर समाप्त हो जाती है। Hypothalamus से Hormones इस निवाहिका तंत्र के माध्यम से Pituitary gland तक निर्देश पहुँचाते हैं।
लसिका तन्त्र (Lymphatic system)
– इसमें एक भिन्न प्रकार का परिसंचारी तरल लिम्फ होता है जो कि CO2 और अपशिष्ट उत्पादों को अंतरालीय क्षेत्र से लसिका वाहिनियों द्वारा शिराओं तक स्थानांतरित करता है। यह तरल रक्त के केशिकाओं में छनने से व्युत्पन्न होता है। इसमें RBC अनुपस्थित होती है। इसमें लसिका वाहिनियाँ होती हैं जो लसिका केशिकाओं से उत्पन्न होती हैं और दूसरे सिरे पर शिरा में या मुख्य बड़ी लसिका वाहिनी में खुल जाती है जिन्हें वक्षीय वहिनी (Thoracic duct) कहते हैं।
– यह तरल अंतरालीय अवकाश से शिराओं तक अंततः दाब में अंतर के कारण आगे बढ़ता रहता है।
– धमनियाँ ऊतकों में जाकर रुधिर केशिकाओं में बँट जाती है दूसरे सिरे पर ये केशिकाएँ संयुक्त होकर शिरा (vein) बनाती हैं। शिरा ऊतकों से रक्त को ले जाती है।
– इस प्रकार 90% से अधिक द्रव्य पुनः शिराओं में आता है किन्तु 10% से भी कम बचे हुए द्रव्य को पुनः शिराओं में पहुँचाने के लिए इस नए परिसंचरण तंत्र की आवश्यकता होती है जिसे लसिका तंत्र कहते हैं।
– रुधिर केशिकाओं के धमनिका वाले छोर पर रक्त दाब ज्यादा होता है। यह लगभग 40mm Hg होता है। रक्त का कॉलोइड परासरणी दाब 28mm Hg होता है। इस भाग में रक्त का नेट फिल्ट्रेशन दाब 12mm Hg स्तम्भ रह जाता है। यहाँ रक्त की छनाई होती है। छना हुआ रक्त ऊतक द्रव्य कहलाता है।
– शिराओं में रक्त दाब घट कर 15 mm Hg रह जाता है जबकि colloid परासरणी दाब 28 mm Hg ही रहता है अतः प्रभावी दाब (-13 mm Hg) होने के कारण लसिका वाहिनी से लसिका द्रव्य शिराओं मे गिरता रहता है।
– ऊतक द्रव्य में प्लाज्मा, श्वेत रुधिर कणिकाएँ, प्लेटलेट ऑक्सीजन तथा पोषक पदार्थ होते हैं।
– ऊतक कोशिकाएँ (Tissue cells) ऑक्सीजन तथा पोषक पदार्थों को ऊतक द्रव्य से अवशोषित करती है बदले में इसमें CO2 तथा अपशिष्ट पदार्थ डालती है ऊतक द्रव्य रक्त तथा ऊतक कोशिकाओं के मध्य माध्यम (medium) का कार्य करता है। शिरिका वाले छोर पर स्थित रुधिर केशिकाएँ छने हुए रक्त से CO2 तथा अपशिष्ट पदार्थों को अवशोषित करती है क्योंकि शिरिका वाले छोर पर रक्त दाब घटकर 15mm Hg रह जाता है शिरिका छोर पर नेट अवशोषण दाब 28-15= 13mmHg होता है। शिराओं के द्वारा अवशोषण के बाद भी ऊतक द्रव्य में कुछ मात्रा में CO2, अपशिष्ट पदार्थ रह जाते हैं। शिराओं के अलावा, ऊतक द्रव्य में बचे हुए इन पदार्थों के अवशोषण हेतु एक और प्रकार की केशिकाएँ कशेरुकियों में पाई जाती है इनको लसिका केशिकाएँ (lymph capillaries) कहते हैं। इन कोशिकाओं में स्थित द्रव्य को लिम्फ (lymph) कहते हैं।
– लिम्फ में प्लाज्मा तथा W.B.C पाई जाती है। इसमें लाल रुधिराणु तथा प्लेटलेट अनुपस्थित होते हैं। लिम्फ शरीर में द्वितीय परिसंचरण तन्त्र (second circulatory system) बनाता है। लसिका तन्त्र को सहायक परिसंचरण तन्त्र भी कहते हैं।
– लिम्फ ऊतक द्रव्य का भाग होता है। इसमें R.B.C अनुपस्थित होती है। यह रंगहीन (colourless) होता है इसमें W.B.C अधिक मात्रा में पाई जाती है। लिम्फ में बहुत कम मात्रा में ऑक्सीजन पाई जाती है। लिम्फ में उपापचयी अपशिष्ट पदार्थ ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं लिम्फ में घुलनशील प्रोटीन (soluble protein) कम मात्रा में तथा अघुलनशील प्रोटीन अधिक मात्रा में पाई जाती है।
– लिम्फ में स्कंदन (clotting) की क्षमता होती है परन्तु रुधिर की तुलना में लिम्फ का स्कंदन देर से होता है।
– लिम्फ या लसिका रुधिर से निम्नलिखित बातों में भिन्न होता है–
रुधिर (Blood) | लसिका (Lymph) |
1. परिसंचरण तन्त्र बनाता है। | 1. लसिका तन्त्र बनाता है। |
2. लाल रुधिराणु उपस्थित | 2. लाल रुधिराणु अनुपस्थित |
3. श्वेत रुधिराणु (W.B.C) कम न्यूट्रोफिल्स सर्वाधिक। | 3. श्वेत रुधिराणु अधिक : लिम्फोसाइटरा सबसे अधिक |
4. घुलनशील प्रोटीन अधिक व अघुलनशील प्रोटीन कम। | 4. घुलनशील प्रोटीन कम अघुलनशील प्रोटीन अधिक |
5. O2 एवं पोषक पदार्थ काफी मात्रा में, CO2 की मात्रा बहुत कम। | 5. O2 व पोषक पदार्थ काफी कम मात्रा में, CO2 की मात्रा अधिक होती है। |
6. लाल रंग का होता है। | 6. रंगहीन होता है। |
– लसिका तन्त्र, लसिका केशिकाओं, लसिका वाहिनियों लसिका गाँठों व अन्य लसिका अंगों का बना होता है।
लसिका केशिकाएँ (Lymph capillaries) –
– यह बहुत कोमल व महीन दीवार की बनी नलियाँ है जो त्वचा की ऐपीडर्मिस, बालों, पंजों, नेत्रों के कॉर्निया, अधिकांश उपास्थियों (cartilages) मस्तिष्क (Brain) मेरुरज्जु (spinal cord) प्लीहा तथा अस्थि मज्जा को छोड़कर शरीर के अन्य सभी ऊतकों की रुधिर केशिकाओं के बीच बीच में फैली रहती है।
– लसिका केशिकाएँ अपने स्वतन्त्र छोर पर बन्द होती है।
– आँन्त्र के सूक्ष्मांकूरों (vili) की लसिका केशिकाओं को लैक्टियल्स (lacteals) या आक्षीर वाहिनियाँ कहते हैं। इनका लिम्फ आन्त्र से अवशोषित वसा के कारण दूधिया होता है इसे “काइल” (chyle) कहते हैं।
लसिका वाहिनियाँ (Lymph vessels) –
– मनुष्य के लसिका तन्त्र में लसिका पात्र (lymph sinuses) तथा लसिका हृदय (lymph heart) नहीं होते हैं।
– मनुष्य में लसिका केशिकाएँ परस्पर संयुक्त होकर लसिका वाहिनियाँ (lymph vessels) बनाती है।
– लसिका वाहिनियाँ संरचना में शिराओं (veins) के समान होती है इनकी भित्ति अपेक्षाकृत पतली होती है इनके भीतर हृदय की ओर खुलने वाले एक तरफा अर्द्धचन्द्राकार कपाट भी होते हैं जो संख्या में शिराओं से अधिक होते हैं।
– लसिका वाहिनियाँ परस्पर मिलकर दो बड़ी लसिका वाहिनी बनाती हैं। बायीं वक्षीय लसिका वाहिनी (left thoracic lymph duct) तथा दायीं वक्षीय लसिका वाहिनी (Right thoracic lymphduct)
– इनमें से दायीं (Right) कुछ छोटी होती है व इनमें सिर, ग्रीवा व वक्ष के दाएँ भाग की तथा दाएँ हाथ की लसिका वाहिनियाँ खुलती है। यह दायीं वक्षीय लसिका वाहिनी, दायीं राबक्लेवियन शिरा (right subclavian vein) में खुलती है।
– बायीं वक्षीय लसिका वाहिनी (शरीर की सबसे बड़ी लसिका वाहिनी) में सिर, ग्रीवा व वक्ष के बाएँ भागों, बाएँ अग्रपादों तथा दोनों पश्चपादों आहारनाल तथा वक्ष व उदर गुहा के कुछ अन्य भागों की लसिका वाहिनियाँ खुलती हैं।
– यह वाहिनी डायफ्रॉम के ठीक पीछे उदर भाग में एक बड़ी थैलीनुमा “सिस्टर्ना काइलाई” (cisterna chyli) से जुड़ी होती है। और आगे की ओर बायीं सबक्लेवियन शिरा (left subclavian vein) में खुलती है।
लसिका अंग व लसिका गाँठें (Lymphoid organs and lymph nodes) –
– लसिका तन्त्र में लसिका केशिकाओं व वाहिनियों से ही संबंधित लसिका ऊतक के बने अंग होते हैं। लसिका गाँठें, प्लीहा, थाइमस, पेयर के पिण्ड, टॉन्सिल (tonsil) आदि इसी प्रकार के अंग हैं।
(a) लसिका गाँठें (lymph nodes) –
– कई स्थानों पर लसिका वाहिनियों के सिरे फूलकर घुण्डीनुमा हो जाते हैं। इन्हीं सिरो को “लिम्फ नोड” कहते हैं। उदाहरण – टॉन्सिल, पेयर के पिण्ड इत्यादि। इनके निम्नलिखित कार्य होते हैं–
(i) ये लिम्फो लाइटरा का निर्माण करके इन्हें लसिका में मुक्त करते हैं।
(ii) लसिका को छानकर साफ करते हैं।
(iii) एन्टीबॉडीज का संश्लेषण करती हैं।
(iv) जीवाणु तथा हानिकारक पदार्थों का भक्षण करके इन्हें नष्ट करती है।
– पेयर्स के पिण्ड आँत्र की श्लेष्मिका में तथा गलांकुर (tonsils) ग्रसनी की श्लेष्मिका में पाए जाते हैं।
– थाइमस तथा प्लीहा को लिम्फॉइड अंग कहते हैं।
– लिम्फ नॉड्स शरीर के सभी भागों में पाई जाती है लेकिन गर्दन, हाथ की बगलों, पाँव की बगलों तथा उदर में इनकी संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। गर्दन (Neck) में इनकी संख्या बहुत ज्यादा होती है।
प्लीहा (Spleen)

– प्लीहा को शरीर की सबसे बड़ी लिम्फ ग्रन्थि कहते हैं प्लीहा को शरीर का “ब्लड-बैंक ” (Blood bank) कहते हैं।
– प्लीहा को “R.B.C का कब्रिस्तान” (graveyard of R.B.C) भी कहा जाता है।
– प्लीहा की उत्पत्ति भ्रूणीय “मीसोडर्म” (Mesoderm) से होती है।
– प्लीहा एक लाल रंग की लसिका ग्रन्थि होती है जो आमाशय के पार्श्व भाग में एक मीसेन्ट्री द्वारा सधी रहती है।
– यह रेटिकुलो- ऐन्डोथिलियमी ऊतक का शरीर में सबसे बड़ा पिण्ड होता है।
– प्लीहा के चारों ओर तन्तुमय योजी ऊतक का आवरण पाया जाता है। इसे “स्प्लैनिक कैप्सूल” (splenic capsule) कहते हैं।
– इस कैप्सूल से कई पट (septa) निकलते हैं, जो प्लीहा को अपूर्ण रूप से कई पिण्डों में बाँट देते हैं। इन पटों को “ट्रेबीक्यूली” (trabeculae) कहते हैं।
– प्लीहा के अन्दर एक विशेष प्रकार का योजी ऊतक भरा रहता है। जिसे रेटिकुलो – एन्टोथिलिथल ऊतक या “स्प्लीनिक पल्प” (splenic pulp) कहते हैं। इस स्प्लैनिक पल्प के दो भाग होते हैं–
श्वेत मज्जा (white pulp) –
– यह अनियमित आकार के लम्बे व भूरे क्षेत्रों के रूप में स्प्लीनिक पल्प में बिखरा होता है इसमें अनेक ग्रन्थिकाएँ (nodules) होती हैं जिनमें महीन धमनियाँ प्रवेश करती हैं।
– श्वेत मज्जा के स्ट्रोमा में जालिका तन्तुओं व विभिन्न आकार के लिम्फो साइट्स का जाल होता है।
लाल मज्जा (Red pulp) –
– यह प्लीहा का सर्वाधिक भाग बनाता है। यह लाल रुधिर कणिकाओं की अधिकता से लाल रंग का होता है तथा यह शिरा विवरों (venous sinuses) का बना होता है इनके बीच के स्थानों में ऊतक भरा रहता है जो स्प्लीनिक कॉर्ड (splenic cord) बनाते हैं।
– प्लीहा के लाल मज्जा में जालक तन्तु, एरिथ्रोसाइटस लिम्फोसाइटस, मैक्रोफेज, मोनोसाइटस आदि होते हैं। जहाँ ये संख्या में वृद्धि करते हैं।
– प्लीहा में (बिलरोथ के कार्ड) “cord of billroth” पाए जाते हैं। जो बड़े रक्त पात्र होते हैं।
– प्लीहा के स्प्लीनिक पल्प में कुछ बड़े आकार की भक्षक (Phagocyte) कोशिकाएँ पाई जाती हैं जिन्हें “मैक्रोफेज कोशिकाएँ” कहते हैं। ये कोशिकाएँ मृत तथा निरर्थक लाल रुधिराणुओं जीवाणुओं, विषपदार्थों हानिकारक रंगों आदि पदार्थों का भक्षण करके रक्त की सफाई करती है।
प्लीहा के कार्य (Function of Spleen) –
– प्लीहा की मेक्रोफेज कोशिकाएँ टूटे-फूटे शिथिल रुधिराणुओं का भक्षण करती है।
– भ्रूणावस्था में यह लाल रुधिराणुओं का निर्माण करती है।
– यह कुछ प्रतिरक्षी (antibodies) पदार्थों का संश्लेषण करती है।
– वयस्कावस्था में प्लीहा “ब्लड बैंक” का कार्य करती है तथा आवश्यकता पड़ने पर यह सर्वप्रथम शरीर को रक्त प्रदान करती है।
– प्लीहा “आयरन” का संग्रह करती है।
– प्लीहा का आकार मलेरिया के समय बड़ा हो जाता है क्योंकि इसमें लिम्फोसाइट्स तथा मृत आर.बी.सी की संख्या बढ़ जाती है।
– शिरापात्र तथा धमनी काण्ड (Sinus venosus, conus arterious) – मनुष्य में शिरापात्र तथा धमनी काण्ड नहीं होते, जबकि मेंढक में पाए जाते हैं। मनुष्य में शिरापात्र भ्रूण में तो बनता है लेकिन बाद में यह दाएँ आलिन्द की दीवार का ही अंश बन जाता है। अतः अग्र व पश्च महाशिराओं (precavals and post caval) द्वारा एकत्रित अशुद्ध रक्त सीधे दाएँ आलिन्द में आता है। पल्मोनरी शिराओं द्वारा फेफड़ों से लाया गया शुद्ध रक्त सीधे बाएँ आलिन्द (left auricle) में आता है।
– धमनी काण्ड के अभाव तथा निलय के विभाजन के कारण शशांक में पल्मोनरी चाप (pulmonary arches) दाएँ निलय से तथा कैरोटिको – सिरटेमिक चाप या एओर्टा, बाएँ निलय (left) से निकलते हैं।
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