जन्तु जगत

 जीव  विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत जीवों का वर्गीकरण व नामकरण का अध्ययन किया जाता है, वर्गिकी (Taxonomy) कहलाता है।

 जन्तुओं को समानताओं व असमानताओं के आधार पर छोटे-छोटे समूहों में बाँटना, वर्गीकरण (Classfication) कहलाता है।

 जन्तुओं का सही निर्धारण करके वैज्ञानिक नाम देना नामकरण (Nomenclature) कहलाता है।

– अरस्तू (Aristotle) को जन्तु विज्ञान का जनक (Father of Zoology) कहते हैं।

प्रकरण के पदों का क्रम (Taxa of Classification):-

– जन्तुओं का वर्गीकरण करते समय विभिन्न स्तरों में बाँटा जाता है। यह स्तर एक निश्चित क्रम में रखे जाते हैं जिसे पदानुक्रमिक वर्गीकरण (Hierarchial Classification) कहते हैं।

– इसे निम्नलिखित तरीके से लिखा जाता है –

जगत (Kingdom) à संघ (Phylum) à वर्ग (Class) गण (Order) à कुल (Family) à वंश (Genus) जाति (Species)

द्विपद नाम पद्धति (Binomeal Nomenclature):-

– वर्गिकी (Taxonomy) को नया रूप देने का श्रेय केरोलस लिनियस को जाता है। केरोलस लिनियस को आधुनिक वर्गिकी का जनक (Father of Modern Taxonomy) व द्विनाम पद्धति का जनक (Father of Binomeal Nomenclature) कहा जाता है।

– इनके द्वारा ‘सिस्टेमा नेचुरी’ नामक पुस्तक का लेखन किया गया।

– इस पद्धति में प्रत्येक को दो नाम दिए गए-पहला नाम वंश (Genus) तथा दूसरा नाम जाति (Species)। वंश का नाम अंग्रेजी वर्णमाला के छोटे अक्षर से प्राप्त किया जाता है। वंश व जाति के नाम तिरछे (Italics) लिखे जाते हैं।

त्रिपद नाम पद्धति (Trinomeal Nomenclature):-

– त्रिपद नाम पद्धति के अनुसार प्राणी के नाम से पहले वंश, उसके बाद जाति व अंत में उपजाति (Sub species) को लिखते हैं। इस प्रकार तीन पद लिखने की प्रणाली को त्रिपद नाम पद्धति (Trinomeal Nomenclature) कहते हैं। उदाहरण– मनुष्य (Homo sapiens)

– अरस्तू ने रुधिर के रंग के आधार पर जन्तुओं को दो समूहों में वर्गीकृत किया है–

1. इनाइमा (Enaima):- इसके अंतर्गत लाल रुधिर युक्त कशेरुकी प्राणियों को रखा गया। इस समूह को दो भागों में बाँटा गया–

(i) जरायुज (Viviparous) बच्चे देने वाले जन्तु।

  उदाहरण – मनुष्य, पशु।

(ii) अण्डयुज (Oviparous) – अण्डे देने वाले जन्तु।

 उदाहरण – मछलियाँ, पक्षी।

2. एनाइमा (Anaima):- इसमें अकशेरुकी जन्तुओं को रखा गया है जिनके रक्त का रंग लाल नहीं होता है।

– द्विजगत वर्गीकरण (Classfication of Two Kingdom) – केरोलस लिनियस ने समस्त जीव जगत को दो मुख्य जगतों में विभाजित किया है–

 (i) पादप जगत (Planti Kingdom)

 (ii) जन्तु जगत (Animalia Kingdom)

पंच जगत परिकल्पना (Five Kingdom System):-

– पंच जगत वर्गीकरण रॉबर्ट एच व्हिटेकर ने प्रस्तुत किया। इसके अनुसार जीव जगत को पाँच जगतों में वर्गीकृत किया गया–

1. जगत मोनेरा (Monera)

2. जगत प्रोटिस्टा (Protista)

3. जगत पादप (Planti)   

4. जगत कवक (Fungi)

         5. जगत एनीमैलिया (Animalia)

– इस प्रणाली में वर्गीकरण का आधार पोषण विधि कोशिकीय संरचना एवं शारीरिक संगठन को माना गया है।

1. मोनेरा:- इसमें प्रोकैरियोट को रखा गया है। इसमें केन्द्रक झिल्ली अनुपस्थित होती है। कशाभ पाए जाते हैं । इकाई झिल्ली युक्त कोशिकांग अनुपस्थित होते हैं। उदाहरण- जीवाणु एवं नील हरित शैवाल।

2.  प्रोटिस्टा:- इसमें यूकैरियोटिक कोशिका पाई जाती है। केन्द्रक कला उपस्थित होती है। इकाई झिल्ली युक्त कोशिकांग पाए जाते हैं। उदाहरण – एककोशिकीय शैवाल एवं प्रोटोजोआ।

3. प्लान्टी:- ये बहुकोशिकीय होते हैं एवं उनमें यूकैरियोटिक कोशिका पाई जाती है। इनमें हरित लवक पाया जाता है। इनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता पाई जाती है। उदाहरण—बहुकोशिकीय पादप।

4.  कवक:- इनमें हरित लवक नहीं पाया जाता है। प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया नहीं होती है। यह अवशोषण द्वारा बाहर से भोजन प्राप्त करते हैं। इनमें भोजन ग्लाइकोजन के रूप में संचित किया जाता है। उदाहरण – कवक (खमीर, मशरूम)

5. एनीमेलिया:- इसमें सभी बहुकोशिकीय जन्तु रखे गए हैं। 

– व्हिटेकर ने उक्त वर्गीकरण को मुख्य रूप से निम्न लक्षणों पर आधारित किया है।

 कोशिकीय संरचना:- प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिकीय संरचना।

– पोषण विधियाँ – निम्न विधियों को आधार बनाया है–

(a)  स्वयंपोषी (Autotrophic):- ये स्वयं प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं अर्थात् उत्पादक श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

(b)  विषमपोषी (Heterotrophic):- ये अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते हैं। भोजन पादपों व जन्तुओं से प्राप्त करते हैं। परजीवी, मृतोपजीवी, सहजीवी एवं कीटभक्षी।

(c)  जन्तु (Animals):- उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं। आहार के आधार पर ये शाकाहारी, मांसाहारी, सर्वाहारी एवं परजीवी होते हैं।

(d)  अपघटक (Decomposer):- ये जीव-मृत पादपों एवं जन्तुओं को सड़ा-गलाकर सरल कार्बनिक पदार्थों में परिवर्तित कर देते हैं जिनको हरे पादप अवशोषित कर भोजन निर्माण करते हैं। उदाहरण-कवक विघटक श्रेणी के जीव।

वर्गीकरण का आधार:–

– प्राणियों की संरचना एवं आकार में भिन्नता होते हुए भी उनकी कोशिका व्यवस्था, शारीरिक सममिति, प्रगुहा की प्रकृति, पाचन-तंत्र, परिसंचरण-तंत्र व जनन-तंत्र की रचना में कुछ आधारभूत समानताएँ पाई जाती हैं।

(A)  संगठन के स्तर:-

–  यद्यपि प्राणि जगत के सभी सदस्य बहुकोशिकीय हैं लेकिन सभी एक ही प्रकार की कोशिका के संगठन को प्रदर्शित नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए, स्पंज में कोशिका बिखरे हुए समूहों में हैं अर्थात् वे कोशिकीय स्तर का संगठन दर्शाती हैं। कोशिकाओं के बीच श्रम का कुछ विभाजन होता है।

– सिलेंटरेट कोशिकाओं की व्यवस्था अधिक जटिल होती है। उसमें कोशिकएँ अपना कार्य संगठित होकर ऊतक के रूप में करती हैं। इसलिए इसे ऊतक स्तर का संगठन कहा जाता है।

– इससे उच्च स्तर का संगठन जो प्लेटीहेल्मिंथीज के सदस्य तथा अन्य उच्च संघों में पाया जाता है जिसमें ऊतक संगठित होकर अंग का निर्माण करता है और प्रत्येक अंग एक विशेष कार्य करता है।

 प्राणी में जैसे, ऐनेलिड, आर्थोपोड, मोलस्क, एकाइनोडर्म तथा रज्जुकी के अंग मिलकर तंत्र के रूप में शारीरिक प्राणि जगत कार्य करते हैं। प्रत्येक तंत्र एक विशिष्ट कार्य करता है। इस तरह की संरचना को अंगतंत्र के स्तर का संगठन कहा जाता है।

 विभिन्न प्राणी समूहों में अंगतंत्र विभिन्न प्रकार की जटिलताएँ प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए पाचन भी अपूर्ण व पूर्ण होता है। अपूर्ण पाचन तंत्र में एक ही बाह्य द्वार होता है, जो मुख तथा गुदा दोनों का कार्य करता है, जैसे प्लेटीहेल्मिंथीज।

– पूर्ण पाचन-तंत्र में दो बाह्य द्वार होते हैं मुख तथा गुदा।

(B)  सममिति:-

असममिति:-

– किसी भी केंद्रीय अक्ष से गुजरने वाली रेखा प्राणी के शरीर को दो बराबर भागों में विभाजित नहीं करती।

– उदाहरण – स्पंज

अरीय सममिति:-

– जब किसी भी केंद्रीय अक्ष से गुजरने वाली रेखा प्राणी के शरीर को दो समरूप भागों में विभाजित करती है तो इसे अरीय सममिति कहते हैं।

– उदाहरण – सिलेंटरेट, टीनोफोर, तथा वयस्क एकाइनोडर्म

द्विपार्श्व सममिति:-  

– एक  ही अक्ष से गुजरने वाली रेखा द्वारा शरीर दो समरूप दाएँ व बाएँ भाग में बाँटा जा सकता है। इसे द्विपार्श्व सममिति कहते हैं।

– उदाहरण– ऐनेलिड, आर्थोपोड

(C) जनन स्तर:-

– द्विकोरिक जन्तु:- जिन प्राणियों में कोशिकाएँ दो भ्रूणीय स्तरों में व्यवस्थित होती हैं यथा- बाह्य एक्टोडर्म (बाह्य त्वचा) तथा आंतरिक एंडोडर्म (अंतः त्वचा) वे द्विकोरिक कहलाते हैं। जैसे – सिलेन्टरेट

 त्रिकोरकी जन्तु:- वे प्राणी जिनके विकसित भ्रूण में तृतीय भ्रूणीय स्तर मीजोडर्म होता है, त्रिकोरकी कहलाते हैं। जैसे – प्लेटीहेल्मिंथीज से रज्जुकी तक भ्रूणीय स्तर का प्रदर्शन

(D) देहगुहा (Coelom):-

– देहगुहा के आधार पर जन्तुओं को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है–

1. एसीलोमेट्स (Acoelomate)

2. कूटगुहीय या स्यूडोसीलोमेट्स (Pseudocoelomate)

3. यूसीलोमेट्स (Eucoelomates)

1. एसीलोमेट्स (Acoelomates):-

– ऐसे जन्तु जिनमें देहगुहा नहीं पाई जाती है उन्हें एसीलोमेट्स कहते हैं। उदाहरण-फाइलम-प्लेटीहेल्मिंथीज।

2. कूटगुहीय या स्यूडोसीलोमेट्स (Pseudocoelomates):-

– ऐसे जन्तु जिनमें कूटगुहा या स्यूडोसीलोम पाई जाती है, उन्हें स्यूडोसीलोमेट्स कहते हैं। उदाहरण-फाइलम एस्केहेल्मिथीज।

3. यूसीलोमेट्स (Eucoelomates):-

– इनमें वास्तविक देहगुहा पाई जाती है। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित संघ आते हैं – एनेलिडा, आर्थोपोडा, मोलस्का, इकाइनोडर्मेटा, हेमीकॉर्डेटा एवं कॉर्डेटा।

– देहगुहा के परिवर्धन (Development of Coelom) के आधार पर यह दो प्रकार की होती है–

(i)  शाइजोसीलोमेट्स (Schizocoelomates)

(ii)  एन्टेरोसीलोमेट्स (Enterocoelomates)

(i)  शाइजोसीलमेट्स (Schizocoelomates):- इसमें आद्यान्त्र बनने के बाद एण्डोडर्म से दो कोशिकाएँ उद्गमित होती हैं जिन्हें टीलोब्लास्ट या 4d कोशिकाएँ कहते हैं। इसमें वृद्धि द्वारा पट्टिका का निर्माण होता है जो भविष्य की मीसोडर्म (Mesoderm) का निर्माण करती है। इस पट्टी के विपाटन से मध्य में एक गुहा का निर्माण होता है। इस गुहा को शाइजोसील कहते हैं। इस प्रकार के जन्तुओं को शाइजोसीलोमेट्स कहते हैं। उदाहरण –एनेलिडा, आर्थोपोडा एवं मोलस्का।

(ii)  एन्टेरोसीलोमेट्स (Enterocoelomates):-  इसमें आद्यान्त्र से दो पार्श्व कोष्ठ उभार के रूप में उद्गमित होते हैं। यह कोष्ठ भविष्य की मीसोडर्म का निर्माण करते हैं। कोष्ठ वृद्धि करने के बाद पृथक् होकर सीलोम का निर्माण करते हैं। इसे एन्टेरोसीलोम (Enterocoelom) कहते हैं। ऐसे जन्तुओं को एन्टेरोसीलोमेट्स कहते हैं। उदाहरण- इकाइनोडर्मेटा, हेमीकॉर्डेटा  व कॉर्डेटा।

(E)  खण्डीभवन (Segementation):-

 शरीर का खण्डों में बँटा होना खण्डीभवन (Segementation) कहलाता है। खण्डीभवन निम्नलिखित प्रकार का होता है–

(i)  वास्तविक खण्डीभवन

(ii)  सतही खण्डीभवन।

(i)  वास्तविक खण्डीभवन (Metamerical Segmentation):-

– इसमें खण्ड बाहर व भीतर दोनों ओर स्पष्ट होते हैं। वास्तविक खण्डीभवन एनेलिडा, आर्थोपोडा व कशेरुकी प्राणियों में पाया जाता है।

(ii) सतही खण्डीभवन (Superficial Segmentation):-

– इसमें केवल बाहरी सतह पर ही खण्डीभवन पाया जाता है। उदाहरण – टीनिया सोलियम।

(F)  भ्रूणीय विकास के आधार पर वर्गीकरण (Embryogenesis):-

– भ्रूणीय विकास (Embryogenesis) के दौरान मुख एवं गुदा की उत्पत्ति के आधार पर प्राणियों को दो भागों में वर्गीकृत किया गया।

1. प्रोटोस्टोमिया (Protostomia):- ऐसे जन्तु जिनमें कोरक रन्ध्र (Blastopore) से मुख का निर्माण होता है, उन्हें प्रोटोस्टोमिया कहते हैं। इनमें सर्पिल प्रकार का विदलन पाया जाता है उदाहरण-प्लेटीहैल्मिन्थीज, एनेलिडा, आर्थोपोडा एवं निमेटोडा।

2. डयूटेरोस्टोमिया (Deuterostomia):- ऐसे जन्तु जिनमें कोरक रंध्र से गुदा का निर्माण होता है अर्थात् परिवर्धनकाल में गुदा का निर्माण पहले तथा मुख का निर्माण बाद में होता है, उन्हें ड्यूटेरोस्टोमिया कहते हैं। उदाहरण – इकाइनोडर्मेटा व कॉर्डेटा।

(G) पृष्ठरज्जु:-

– शलाका रूपी पृष्ठरज्जु नोटोकोर्ड मध्य त्वचा मीसोडर्म से उत्पन्न होती है जो भ्रूणीय परिवर्धन विकास के समय पृष्ठ सतह में बनी होती है। पृष्ठरज्जु युक्त प्राणी को रज्जुकी (कोर्डेट) कहते हैं तथा पृष्ठरज्जु रहित प्राणी को अरज्जुकी (नोनकोर्डेट) कहते हैं। जैसे पोरीफेरा से इकाइनोडर्मेटा।

मौलिक लक्षणों के आधार पर प्राणी जगत का विस्तृत वर्गीकरण

संघ : प्रोटोजोआ:-

प्रोटोजोआ के मुख्य लक्षण:-

– सभी प्रोटोजोअन्स विषम पोषी होते हैं, (प्राणिसमभोजी पोषण) और परभक्षी या परजीवी के रूप में जीवित रहते हैं। सहजीवी (ट्रिपनोसोमा, दीमक के आन्त्र में रहकर सेल्यूलोज पाचन में मदद करता है) और सहभोजी के रूप में (एन्टअमीबा कोलाई, मानव की वृहदान्त्र में) रहता है।

– इनमें लार्वा का निर्माण नहीं होता, क्योंकि भ्रूण का निर्माण नहीं होता है।

– शरीर संगठन का स्तर – जीवद्रव्य स्तर का।

– वर्गीकरण:- सभी प्रोटोजोअन्स को गमनांगों के आधार पर 4 वर्गों में बाँटा गया है।

1.  अमीबीय प्रोटोजोअन्स:-

– गमनांग:- कूटपाद (1 या 2 अधिक)

– आवास:- अलवणीय जल, समुद्रीय जल या नम मिट्टी में।

– भोजन पकड़ना:- कूटपादों (आभासी पादों) के द्वारा शिकार को पकड़ा जाता है।

– फोरामिनिफेरीन:- कुछ समुद्री प्रारूपों में सिलिकायुक्त सतह पर सूक्ष्म-छिद्र उपस्थित होते हैं, जिसे फोरामिनिफेरीन कहते हैं।

– उदाहरण – रेडियोलेरिया

 (फोरा : छिद्र, मिनि : छोटे/सूक्ष्म, फेरा : सम्बन्धित/ व्यवस्था)

  उदाहरण – अमीबा, एन्टअमीबा

2.  फ्लैजिलेटेड (कशाभिकीय) प्रोटोजोअन्स:-

 गमनांग – कशाभ

– स्वभाव व आवास:- स्वतन्त्रजीवी या परजीवी, कुछ जलीय।

– भोजन का अशन:- भोजन के अन्तः ग्रहण के लिए साइटोस्टोम कोशिका मुख और बहिः स्त्रावण के लिए साइटोफेमी होती है, जलीय रूपों में पाचन खाद्य रिक्तिका में होता है (यूग्लीना), किन्तु रोगजनकों मे ऐसा नहीं पाया जाता है।

उदाहरण–

 ट्रिप्नोसोमा – निद्रालु रोग व चागास- रोग।

 लीशमानिया – काला-अजार रोग

 ट्राइकोमोनास – मानव मादा की योनि में ल्यूकोरिया

 ट्राइकोनिम्फा – दीमक की आन्त्र में सेल्यूलोज पाचन के लिए सहजीवी।

 प्रोटेरोस्पन्जिया – यह प्रोटोजोआ व पोरीफेरा के मध्य योजक कड़ी है।

3.  सिलिएटेड (पक्ष्माभी) प्रोटोजोअन्स:-

 गमनांग:- पक्ष्माभ, जो अधिक संख्या में उपस्थित होते हैं और सक्रिय गमन में सहायक होते हैं और जल में, भोजन को मुख गुहा की ओर निर्देशित करते हैं।

 स्वभाव व आवास – जलीय स्वतंत्र जीवी, परजीवी व सहभोजी।

 उदाहरण–

 बेलेन्टिडियम – मनुष्य में डायरिया उत्पन्न करता है।

 पैरामीशियम – स्लीपर कृमि

 औपेलाइना – मेंढक के मलाशय का अन्तः सहभोजी।

 नॉक्टोथीरस – मेंढक के मलाशय का अन्तः सहभोजी।

4.  स्पोरोजोअन:-

 गमनांग – अनुपस्थित

– स्वभाव व आवास:- सभी परजीवी, मुख्यतः अन्तः कोशिकीय परजीवी।

– बीजाणु:- इस समूह के सभी सदस्यों के जीवन चक्र में संक्रामक अवस्था बीजाणु के रूप में पाई जाती है इसी कारण इन्हें वर्ग स्पोरोजोआ में रखा जाता है।

उदाहरण:-

 प्लाज्मोडियम – मानव में मलेरिया उत्पन्न करते हैं।

 नौसीमा – रेशमकीट में पैबरियन रोग उत्पन्न करते हैं।

संघ पोरीफेरा:-

– पोरीः = छिद्र या सूक्ष्म छिद्र, फेराः = धारण करना अर्थात् छिद्र युक्त प्राणी

पोरीफेरा के लाक्षणिक लक्षण:-

– छिद्रित शरीर, बहुत से ऑस्टिया (मुख) व एकल ऑस्कुलम (गुदा) और कशाभित कोएनोसाइट्स की उपस्थिति

– जल नाल तन्त्र की उपस्थिति (न कि जल संवहन तन्त्र क्योंकि यह इकाइनोडर्म में पाया जाता है।

– अन्तः कंकाल में स्पांजिन तन्तुओं व कंटिकाओं की उपस्थिति।

– केन्द्रीय देहगुहा, स्पंज गुहा होती है।

– पोरीफेरा के उदाहरण

(a) साइकन (साइफा), (b) यूस्पांजिया (साइफा), (c) स्पांजिला

पोरीफेरा के कुछ अन्य लक्षण:-

–  द्विजनन स्तरीय, देह संगठन कोशिकीय स्तर का, मुख्यतयाः असममित, दुर्लभतया अरीय सममित स्वतन्त्रजीवी

देहभित्ति (द्विजननस्तरीय)
बाह्य सतह – पिनेकोडर्ममध्य सतह – अकोशिकीय जिसे मीसेनकाइमा कहा जाता है।आन्तरिक सतह – कौएनोडर्म

– सभी जलीय प्राणी, मुख्यतया समुद्री और कुछ अलवण जलीय।

– जल-नाल तन्त्र विशिष्ट लक्षण है, जो निम्नलिखित कार्यों में उपयोगी है–

– भोजन पकड़ने में

– गैसों के विनियम में

– अपशिष्टों के निष्कासन में

– कशाभित कोएनोसाइट्स रेखा, स्पंजगुहा और कशाभित नाल, निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है–

– एकदिशीय जल धारा को बनाए रखती है अर्थात् ऑस्टिया में ऑस्कुलम की तरफ।

– अन्तरा कोशिकीय पाचन।

– बाह्य कंकाल शरीर को अवलम्बन प्रदान करता है और कंटिकाओं (कैल्सियम कार्बोनेट व सिलिका) या स्पंजिन तन्तुओं (प्रोटीनयुक्त और स्नान स्पंज के रूप में उपयोगी) का निर्माण करता है।

– स्वभाव तथा संरचना:- स्पंज निवही प्रकृति के होते हैं, परन्तु इसमें अत्यधिक कठोर रूप से व्यक्तित्व भिन्नता पाई जाती है। किन्तु ऑलिएन्थम अवस्था, एकल स्पंज के लिए विचारणीय है ये बहुत सारे ऑस्टिया व एकल ऑस्कुलम युक्त होते हैं।

– पाचन:- स्पंज मांसाहारी है। ये छोटे सूक्ष्मजीवों को खाते हैं। कोएनोसाइट्स व अमीबीय कोशिकाओं की खाद्य रिक्तिकाओं में भोजन का अन्तरा कोशिकीय पाचन होता है।

– श्वसन व उत्सर्जन – सामान्य देह सतह द्वारा।

– लैंगिकता – उभयलिंगी

– जनन:- अलैंगिकः आन्तरिक मुकुलन (जेम्यूल)

– लैंगिकः- विषमयुग्मकी प्रकार का, क्योंकि शुक्राणु कशाभिक व चल होते हैं जबकि अण्डाणु स्थिर व अचल होते हैं।

– निषेचन:- बाह्य एवम् परनिषेचन क्योंकि पूर्वी अवस्था अर्थात् शुक्राणु, अण्डाणु के पहले ही परिपक्व हो जाते हैं, अतः ये उभयलिंगी होते हुए भी इनमें परनिषेचन पाया जाता है।

– विदलन – पूर्णभंजी, असमान।

– परिवर्धन:- अप्रत्यक्ष अर्थात् लार्वा अवस्था उपस्थित या परिवर्धन में आती है जो कि वयस्क से आकारिकीय रूप से भिन्न होते हैं, एम्फीब्लास्टुला और पैरेनकाइमेला लार्वा जीवनवृत्त में पाया जाता है।

– वयस्क स्पंज:- आलिएन्थस, नवजात स्पंज होता है, जिसमें बहुत सारे ऑस्टिया व एकल आस्कुलम व्यक्तित्व स्पंज को प्रदर्शित करते हैं।

– इस संघ को निम्नलिखित तीन वर्गों में बाँटते हैं–

1. कैलकेरिया या कैल्सिस्पांजी (Calcarea):- इस वर्ग के सभी स्पंजों में स्पीक्यूल कैल्केरियस होते हैं तथा कॉलर कोशिकाएँ विशेष रूप से बड़ी होती हैं।

– उदाहरण– ल्यूकोसोलीनिया (Leucosolenia), साइफा (Scypha)।

2. हैक्साटिनिलिडा (Hexactinellida):- इस वर्ग के स्पंजों में मिलने वाले स्पीक्यूल सिलिका के बने होते हैं और इनमें 6 शाखाएँ होती हैं। इस वर्ग को प्रायः ग्लास स्पंज कहते हैं। उदाहरण – वीनस फ्लावर बास्केट।

3. डेमोस्पॉन्जिया (Demospongia):- यह सबसे बड़ा वर्ग है, जिसकी कुछ जातियाँ झीलों और तालाबों में भी मिलती हैं। इनका आकार अनियमित होता है और इनमें सिलिका के बने स्पीक्यूल होते हैं। साथ ही इनमें स्पान्जिन के तंतु भी मिलते हैं। उदाहरण –स्पॉन्जिला।

पोरीफेरा संघ के प्रतिरूप:-

– साइकन – साइफा

– स्पांजिला – अलवण जलीय स्पंज

– यूस्पान्जिया – स्नान स्पंज

– यूप्लैक्टेला – वीनस की पुष्प मंजुषा (यह जापान में शादी के समय उपहार में दिया जाता है, क्योंकि इसमें नर व मादा दोनों जीवन पर्यन्त साथ रहते हैं।

– हायलोनीमा – काँच स्पंज।

संघ : सिलेन्ट्रेटा या निडेरिया:-

– सीलेन्ट्रॉन: सील (गुहा) + इन्ट्रॉन (आंत्रीय) (आन्त्रीयगुहा या जठरवाहिनी गुहा)

– निडेरिया = निडिय = दंश कोशिकाएँ (दंशिका उपस्थित)

विशिष्ट लक्षण:-

– मध्य जठर – वाहिका गुहा, सीलेन्ट्रॉन उपस्थित होती है।

– सभी जन्तुओं में अतिविशिष्ट कोशिकाएँ नीडोसाइट्स या दंश कोशिकाएँ उपस्थित होती हैं।

 सीलेन्ट्रेटा के कुछ अन्य लक्षण:-

– स्वभाव व आवास:-  सभी जलीय, मुख्यतः समुद्री व कुछ अलवणीय (हाइड्रा) स्थानबद्ध या मुक्त प्लावी जीव होते हैं।

– सममिति – अरीय।

– शारीरिक संगठन – ऊतकीय स्तर का।

– देहभित्ति – द्विजननस्तरीय।

देहभित्ति:-

(i) बाह्य परत – अधिचर्म (एक्टोडर्मल)

(ii)  अकोशिकीय मध्य परत – मीसोग्लिया

(iii) आन्तरिक परत – ग्रैस्ट्रोडर्मिनस (एक्टोडर्मल)

– नीडोसाइट्स (दंशिकाएँ):- ये अतिविशिष्ट दंश कोशिकाएँ होती हैं, जिनमे दंश सम्पूट में आविष हिम्नोटॉक्सिक रसायन भरा होता है। ये कोशिकाएँ ठहरने, संरक्षा व शिकार को पकड़ने का कार्य करती हैं।

– सीलेन्ट्रॉन:- केन्द्रीय जठरवाहिका गुहा में बाह्य कोशिकीय पाचन होता है, जो कि एकल सिरे हाइपोस्टोम (अधोमुख) (मुख) द्वारा होता है।

– कंकाल:- संघ सीलेन्ट्रेटा के कुछ सदस्य, मुख्यत: वर्ग एन्थोजोआ में कैल्सियम कार्बोनेट का बाह्य कंकाल पाया जाता है, जो कि प्रवाल स्क्रॉल व प्रवाल भित्ति के निर्माण के लिए उत्तरदायी होता है।

उदाहरण – कोरेलियमः लाल प्रवाल

– बहुरूपता:- संघ सीलेन्ट्रेटा के कुछ सदस्यों में कम से कम – 2 अवस्था पाई  जाती है, पॉलिप ओर मेड्यूसा अर्थात् इनमें बहुरूपता का प्रदर्शन होता है।

– पॉलिप – यह अलैंगिक, बेलनाकार अवस्था है।

– उदाहरण – हाइड्रा, ऐडिम्सा

– मैड्यूसा – छाताकार मुक्त प्लावी, लैंगिक अवस्था है।

– उदाहरण – औरेलिया (जेलीफिश)

– समएकान्तरण (मेटाजिनेसिस):- लैंगिक जनन के दौरान पीढ़ियों का एकान्तरण समैकान्तरण कहलाता है। अलैंगिक पॉलिप अवस्था में मेड्यूसा का निर्माण होता है व लैंगिक मेड्यूसा से पॉलिप का निर्माण होता है।

– लैंगिकता:- अधिकांशतः एक लिंगी होते हैं परन्तु हाइड्रा विरिडिसिमा द्विलिंगी होता है।

– युग्मकजनन:- लिंग कोशिकाओं (युग्मकों) का निर्माण अर्धसूत्री विभाजन द्वारा अन्तराली कोशिकाओं से होता है।

– निषेचन – पूर्वी अवस्था के कारण निषेचन पाया जाता है।

– विदलन – पूर्णभंजी, आसमान प्रकार का।

– भ्रूणीय परिवर्धन:- अप्रत्यक्ष अर्थात् लार्वा अवस्था उपस्थित।

– इस संघ को तीन वर्गों में बाँटा गया है–

1. हाइड्रोजोआ (Hydrozoa):- इसमें हाइड्रा अन्य प्रकार के पॉलिप, छोटी-छोटी जैलीफिश, ओबेलिया तथा कोरल आते हैं।

2. साइफोजोआ (Scyphozoa):- इसमें बहुत-सी बड़ी सामुद्रिक जैलीफिश मिलती हैं। उदाहरण – ऑरेलिया।

3. एन्थ्रोजोआ (Anthrozoa):- इस वर्ग में सामुद्रिक एनीमोन, मुंगे और कोरल आते हैं।

संघ सीलेन्ट्रेटा के प्रारूप प्रादर्श:-

– जंतु  –  सामान्य नाम

 हाइड्रा – – समुद्री दैत्य

 फाइसेलिया  – पुर्तगाली युद्ध पोत

 एडैम्सिया  – सी-एनिमॉन

 पेनेटुला  – समुद्री पेन/कलाम

 गॉगोनिया  – समुद्री पंखा

 मैन्ड्रिना  – मस्तिष्क प्रवाल

 कौरेलियम  – लाल प्रवाल

– प्रवाल भित्ति:- इनका निर्माण वर्ग एन्थोजोआ से सम्बन्धित समुन्द्री सीलेन्ट्रेट्स के जमने से होता है। प्रवाल भित्तीय विविधता की धनी होती है।

संघ– टीनोफोरा:-

– टीनो – कंघा

– फोरा – धारण करना

– इन जन्तुओं के शरीर में पक्ष्माभित कंघेनुमा प्लेट की आठ बाह्य पंक्तियाँ पाई जाती हैं।

 आवास एवं स्वभाव:- सभी जन्तु समुद्री, स्वतंत्रजीवी तथा जन्तु प्लवकों से पोषण प्राप्त करते हैं।

 बाह्य आकारिकी:- पक्ष्माभित कंघेनुमा प्लेट की उपस्थिति इनका मुख्य लक्षण है जो गमन में सहायक है।

 सममिती – अरीय या द्विअरीय सममित

 शरीर संगठन – ऊतक स्तर का

 देह भित्ति – द्विस्तरीय –

(i) बाह्य स्तर-एक्टोडर्म  

(ii) अन्तः स्तर-एन्डोडर्म

 जैव प्रतिद्विप्तता:- टिनोफोरा के सदस्य प्रकाश उत्पन्न करते हैं यह गुण जैव प्रतिद्विप्तता कहलाता है।

– लैंगिकता – उभयलिंगी

– जनन – केवल लैंगिक जनन

– निषेचन:- बाह्य तथा परिवर्धन अप्रत्यक्ष होता है जिसमें लार्वा अवस्था होती है।

 विदलन तथा परिवर्धन:- सर्पिल विदलन तथा परिवर्धन अप्रत्यक्ष अंतः सिडिपिड लार्वा अवस्था होती है।

टिनोफोरा के कुछ विशिष्ट लक्षण:-

– ये जन्तु समुद्र सतह से 300 मीटर की गहराई पर उपस्थित होते हैं।

– सामान्यतया कोम्ब जैली या समुद्री अखरोट या समुद्री गूज़बैरी कहलाते हैं।

– इनमें केवल लैंगिक जनन पाया जाता है परन्तु पीढ़ी एकान्तरण अनुपस्थित होता है।

– स्वतः निषेचन भी उपस्थित होता है।

उदाहरण – प्लूरोब्रेन्किया, टिनोप्लाना, वेलामैन, बेरॉइ

संघ – प्लेटीहेल्मिंथीज:-

प्लेटी = चपटे, हेल्मिन्थीज = कृमि अर्थात् चपटे कृमि

 स्वभाव व आवास:- मुख्यतः परजीवी (अन्तः परजीवी) और कुछ मुक्त प्लावी जलीय (प्लैनेरिया)

नोट – हुक व चूषक परजीवी रूप में उपस्थित होते हैं।

 बाह्य आकारिकी:- सामान्यतः देह अखण्डित या खण्ड रहित (प्लैनेरिया और फैसियोला) किन्तु कूट खण्डित (टीनिया)

– सममिति – द्विपार्श्व सममित।

– गमनांग:- सामान्यतः अनुपस्थित किन्तु पक्ष्माभ, गमनागों के रूप में उपस्थित (प्लैनेरिया)

– देहभित्ति– त्रिजनन स्तरीय।

– देहगुहा:- अदेहगुहीय (देहभित्ति व आहारनाल के मध्य कोई रिक्त स्थान उपस्थित नहीं होता है।)

 शारीरिक संगठन का स्तर – ऊतक स्तरीय।

 आहार नाल व पाचन:-  सामान्यतः आहारनाल अनुपस्थित। कुछ सदस्यों में अपूर्ण आहारनाल उपस्थित, जैसे (टर्बिलेरिया और ट्रिमेटोडा में), मुख उपस्थित और गुदा अनुपस्थित। निम्न स्तर का पाचन देखा गया है।

 उत्सर्जन और परासरण नियमन:- प्रथमतः उत्सर्जी अंग का विकास प्लेटीहेल्मिंथीज में ज्वाला कोशिका या फ्लेम कोशिका के रूप में पाए जाते हैं।

 श्वसन:- परजीवी रूपों में अवायवीय श्वसन, जबकि मुक्त प्लावी रूपों में श्वसन सामान्य देह सतह द्वारा।

 लैंगिकता – सभी द्विलिंगी (उभयलिंगी)

 जनन और निषेचन:- लैंगिक जनन और स्व निषेचन दोनों उपस्थित, जो आन्तरिक रूप से सम्पन्न होता है। (आन्तरिक निषेचन)

– वृद्धि:- मुख्यतः अप्रत्यक्ष, विभिन्न लार्वा अवस्था युक्त।

– लार्वा:- फीताकृमि (टीनिया) – ऑकोस्पोर हैक्साकेन्थ, सिस्टीसर्कस या ब्लैडर कृमि, फैसियोला (यकृत पर्णाभ): मिरासीडियम, स्पोरोसिस्ट, रेडिया, सर्केरिया, मेटासर्केरिया।

उदाहरण

टीनिया सोलियम  –  पोर्क फीताकृमि

टीनिया सेजिनेटा  –  गोमांस (बीफ) फीताकृमि

इकाइनोकोकस ग्रेन्यूलोसस  –  कुत्ता फीताकृमि

शिस्टोमा हिमेटोबियम  –  रक्त पर्णाभ

पैरागोनिमस  –  फुफ्फुस पर्णाभ

फैशियोला हिपेटिका  –  भेड़ यकृत पर्णाभ

प्लैनेरिया  –  इनमें अत्यधिक पुनरुद्भवन
    क्षमता पाई जाती है।

प्लेटीहेल्मिंथीज के उदाहरण–

(क) फीताकृमि (टीनिया)  

(ब) पर्णकृमि (फैसियोला)

संघ – ऐस्केहेल्मिंथीज:-

 स्वभाव व आवास:- मुक्त जीवी (जलीय और स्थलीय) परजीवी (जन्तुओं व पादपों में अन्तःपरजीवी)

 बाह्य आकारिकी:- देह अखण्डित, बेलनाकार लैंगिक द्विरूपता उपस्थित (नर और मादा को उनके आकारिकीय लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है और सामान्यतः मादा नर से बड़ी होती है।

– सममिति:- यह बेलनाकार होने के पश्चात् भी द्विपार्श्वीय सममिति दर्शाते हैं, क्योंकि अधर व पृष्ठ सतह को पृष्ठ और अधर तन्त्रिका रज्जु द्वारा पृथक् किया जा सकता है।

– गमनांग – अनुपस्थित।

– देहभित्ति – त्रिस्तरीय

 (i)  बाह्य क्यूटिकल परत

 (ii) मध्य बहुकेन्द्रकी अधिचर्म

(iii) आन्तरिक पेशीय सतह

 देह गुहा:- कूटगृहीय (देहभित्ति व आहार नाल के मध्य स्वच्छ, रिक्त स्थान उपस्थित किन्तु मीसोडर्म से रेखित नहीं, इसी कारण इसे कूटगुहा या आभासी गुहा कहते हैं।

– शारीरिक संगठन का स्तर – अंग-तन्त्र स्तर का

– आहार नाल और पाचन:- पूर्ण आहार नाल, सुविकसित, पेशीय, ग्रसनी युक्त। मुख व गुदा उपस्थित। भोजन का अपूर्ण पाचन ।

 उत्सर्जन और परासरण नियमन:- एस्केरिस में एकल रेनेट कोशिका द्वारा व्युत्पन्न ‘H’ आकार का उत्सर्जन तन्त्र उपस्थित। उत्सर्जन पदार्थ – NH3 जो कि पृथक् उत्सर्जी छिद्र द्वारा उत्सर्जित किए जाते हैं। (पृथक् अर्थात् अवस्कर के साथ नहीं)

 श्वसन और गैसों का विनिमय:- परजीवी रूप अवायवीय (ऐस्केरिस), किन्तु मुक्त जीवी प्रारूपों में वायवीय, किन्तु कोई श्वसन अंग उपस्थित नहीं और गैसों का विनिमय सामान्य देहसतहों के द्वारा होता है।

– लैंगिकता – एक लिंगी (द्विलिंगाश्रयी)

– नर जन्तु:- छोटा और पश्च सिरा वक्रित, जिसमें मैथुनी पिनीयल सीटी उपस्थित होती है।

– मादा जन्तु – लम्बी व सीधी देह।

– जनन – लैंगिक जनन, आन्तरिक निषेचन

– नर युग्मक – शुक्राणु अमीबाभ और पुच्छ रहित।

– मादा युग्मक – अण्डाणु

– भ्रूणीय परिवर्धन – सर्पिल विदलन, प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष परिवर्धन।

 प्रत्यक्ष परिवर्धन – नवजात, वयस्क में परिवर्तित होता है।

– अप्रत्यक्ष परिवर्धन – लार्वा अवस्था उपस्थित

– लार्वा – रेब्डीटि रूप (एस्कैरिस)

 फाइलेरिया (वाउचेरिया)

उदाहरण – ऐस्केरिस : गोलकृमि और आहार नाल का परजीवी।

– वाउचेरिया:- फाइलेरिया कृमि और पश्च पाद की लसिका कोशिकाओं का परजीवी।

– लोआ-लोआ – नेत्र कृमि और आई फ्लू को उत्पन्न करता है।

– ड्रेकनकुलस:- गिनी कृमि, प्राथमिक परपोषी : मनुष्य, द्वितीयक परपोषी: साइक्लोप्स, यह नारू रोग उत्पन्न करते हैं।

निमेटोड्स से सम्बन्धित कुछ विशेष बिन्दु:-

– परजीवी प्रारूप द्विजननिक और एकल जननिक दोनों हो सकते हैं–

द्विजननिक वाउचेरिया–

(i) प्राथमिक परपोषी : मानव  

(ii) द्वितीयक परपोषी : क्यूलेक्स मच्छर

– एकल जननिक:- एस्केरिस : मनुष्य की आन्त्र का परजीवी।

ऑक्सेन्टिक वृद्धि:-

– देह में कोशिकाओं की संख्या निश्चित होती है और शरीर के आकार में वृद्धि मुख्य रूप से केवल कोशिका आकार के बढ़ने से होती है।

– निमेटोड, काट में नलिका के अन्दर नलिका सदृश दिखाई देते हैं, क्योंकि खाली आहारनाल खाली देह के अन्दर पाई जाती है।

– फेज्मिड एवम् ऐम्फिड, रसायनग्राही होते हैं।

– इस संघ को छह वर्गों में बाँटा गया है–

1. प्रिआपुलोडिया (Priapulodia):-  ये जन्तु समुद्र में पाए जाते हैं। इनका शरीर तश्तरी जैसा होता है और अग्रभाग में कंटकयुक्त इण्ट्रोवर्ट (Introvert) होता है। इनकी आहारनाल सीधी तथा गुदा क्लोम लोब (Gill lobes) से घिरी और पश्चभाग में स्थिर होता है। वयस्क जीवों में परिवहन तंत्र, वृक्क एवं संवेदी अंग अनुपस्थित होते हैं। उदाहरण – प्रिआपुलस।

2. निमेटोमॉर्फा (Nematomorpha):- इस वर्ग के वयस्क पानी में स्वतंत्रजीवी रूप में रहते हैं एवं लार्वा कीटों में परजीवी रूप में रहते हैं। इनका शरीर धागे जैसा होता है तथा शरीर-गुहाओं में कोशिकाओं की परत होती है। इनका शरीर क्यूटिकल से ढका होता है।

3. काइनोर्रिका (Kinorincha):-  इस वर्ग के समुद्री जीव हैं जिनका शरीर बेलनाकार, कड़े क्यूटिकल से ढका और प्रायः एक मि.मी. लम्बा होता है। इनका शरीर ग्यारह या बारह वलयों का तथा सिर दो वलयों का बना होता है। जो कंटकों से घिरा रहता है।

4. गैस्ट्रोट्राइका (Gastrotricha):-  ये जीव साधारणतः जलवासी तथा सूक्ष्म जीव होते हैं। इनका शरीर लम्बा और धागे के समान पतला होता है। इनका औदरिक भाग पतला होता है तथा इस पर अनुदैर्ध्य दिशा में सिलिया दो कतारों में व्यवस्थित होती है जो प्रचलन में मदद करती है।  

5. निमेटोडा (Nematoda):- इस वर्ग के जीव जलीय, स्थलीय या परजीवी होते हैं। इनका शरीर अखण्डित तथा लम्बे-पतले धागे जैसा बेलनाकार होता है। इनके शरीर पर कड़े क्यूटिकल (Cuticle) होते हैं तथा दोनों सिरे नुकीले इस संघ को गया है। कृत्रिम देहगुहा (Pseudocoel) होती है तथा तंत्रिका तंत्र में एक अग्रतंत्रिका-वलय (Nerve rings) एवं छह अनुदैर्ध्य तंत्रिका रज्जु (Nerve cord) होती हैं। इनमें नर तथा मादा अलग-अलग होते हैं। उदाहरण – ऐस्केरिस

6. रॉटीफेरा (Rotifera):- इस जन्तुओं के शरीर में एक धड़ (Trunk) और पूँछ होती है। पूँछ संधियुक्त एवं पाद के साथ होती है जिसमें चिपकने के लिए ग्रंथि होती है। अग्रभाग में सिलियायुक्त ट्रोकलडिस्क होता है जो प्रचलन तथा भोजन-ग्रहण के काम में आता है। इस वर्ग का नर, जन्तु मादा से छोटा होता है। उदाहरण – हाइडाटिना।

संघ- एनीलिडा (Annulus – Small ring from):-

– स्वभाव व आवास:-  जलीय (समुद्री और स्वच्छ जलीय) या स्थलीय अथवा दोनों, अधिकांश स्वतन्त्र जीवी लेकिन कुछ परजीवी (जोंक) होते हैं।

– बाह्य आकारिकी:- देह बेलनाकार व चपटी दोनों प्रकार की किन्तु समरूपी विखण्डित (वास्तविक खण्डीभवन)

– सममिति  द्विपार्श्व।

– गमनांग:- काइटिन युक्त, सीटी जो प्रोटेक्टर व रिट्रेक्टर पेशियों से जुड़े होते हैं। इसके द्वारा सीटी को अन्दर व बाहर किया जाता है।

– देहभित्ति:- त्रिजनन स्तरिक, वर्तुल पेशीय स्तर और अनुदैर्ध्य पेशी स्तर दोनों उपस्थित जो गमन में भी सहायक होता है।

– देहगुहा:- प्रथमतः देहगुहा (यूसीलोम) एनिलिडा में दृष्टिगत होती है।

– शारीरिक संगठन का स्तर  अंग-तंत्र प्रकार का।

– देह काट  अनुप्रस्थ काट मे नलिका के अन्दर नलिका सदृश

– आहारनाल और पाचन  पूर्ण आहारनाल व बाह्य कोशिकीय पाचन।

– उत्सर्जन व परासरण नियमन:- उत्सर्जन अंग : वृक्क, उत्सर्जी पदार्थ – NH3 एवं यूरिया।

– श्वसन:- वायवीय और साधारण देह सतह-त्वचा द्वारा गैसीय विनिमय होता है। (क्यूटेनियस श्वसन)

– दैहिक द्रव व परिसंरचण  बन्द रुधिर परिसंचरण तंत्र 

– तन्त्रिकीय नियन्त्रण:- तन्त्रिका तन्त्र में एक जोड़ी गैंग्लिया पाई जाती है, जो कि पार्श्व तन्त्रिकाओं और दोहरे अधर तन्त्रिका रज्जु से जुड़ी होती है।

– लैंगिकता:- मुख्यतः उभयलिंगी (द्विलिंगी)। उदाहरण – केंचुआ कुछ एकलिंगी (द्विलिंगाश्रयी)। उदाहरण – नेरिज।

– जनन और निषेचन:- लैंगिक जनन और परनिषेचन बाह्य होता है, द्विलिंगी जातियों में।

– वृद्धि:- मुख्यतः प्रत्यक्ष कभी-कभी अप्रत्यक्ष, लार्वा पाया जाता है। लार्वा – ट्रोकोफोर

– एनीलिडा संघ के प्राणियों को चार वर्गों में विभक्त कर सकते हैं–

1. ऑलिगोकीटा (Oligochaeta):-  इन जन्तुओं में बाहरी तथा भीतरी दोनों ही प्रकार का विखण्डन होता है। आमतौर से सभी के शरीर के अगले सिरे के समीप कॉलर के समान क्लाइटेलम होता है। यह एक प्रकार का स्त्राव पैदा करता है जो कड़ा होकर कोकून का निर्माण करता है। उदाहरण – केंचुआ।

2. पॉलीकीटा (Polychaeta):- इस वर्ग के प्राणी सामुद्रिक होते हैं। इस वर्ग के सभी जंतुओं में पेरापोडिया भली-भाँति विकसित होते हैं तथा जीवों में ट्रोकोफोर लार्वा भी मिलते हैं। उदाहरण – नेरीज।

3. आर्कीएनीलिडा (Archiannelida):- थोड़े ही जंतु मिलते हैं जो अपेक्षाकृत कम विकसित होते हैं। ये सामुद्रिक होते हैं जो इन जंतुओं के चलन तथा श्वसन में सहायता देते हैं। आमतौर पर ये सभी जंतु उभयलिंगी होते हैं। उदाहरण – पोलीगोर्डियस।

4. हीरुडीनेरिया (Hirudinaria):- ये जन्तु जलीय अथवा स्थलीय और उभयलिंगी होते हैं। शरीर के अगले सिरे पर स्थित कुछ खंड मिलकर एक चूषक का निर्माण करते हैं।

उदाहरण –

नेरिज:- जलीय, इसे सामान्यत: रेतकृमि, बालू कृमि या क्लैम वर्म कहते हैं।

पोलीनोई:- जैवप्रतिदीप्ति युक्त, सामान्यतः इसे शल्क कृमि कहा जाता है।

हिरुडीनेरिया  रक्त चूषक जोंक।

फेरेटिमा – केंचुआ

संघः ऑर्थोपोडा:-

– ओर्थोस = युग्मित

– पोड्स पाद या उपांग

– यह जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है, क्योंकि 80%, (2/3) जातियाँ इसी संघ में पाई जाती हैं।

– स्वभाव व आवास:- यह, जल, स्थल, वायु पर्वतों के हिम शिखरों पर, समुद्र की गहराइयों में पाया जाता है। मुक्त जीवी और परजीवी (बाह्य परजीवी) या दोनों, इनकी अत्यधिक आर्थिक महत्ता है।

– बाह्य आकारिकी:- देह खण्डित और सिर, वक्ष व उदर या शिरोवक्ष और उदर पर युग्मित उपांग उपस्थित।

– सममिति  द्विपार्श्व।

– देह भित्ति:- त्रिजननस्तरीय, बाह्य परत, क्यूटिकल काइटिन की बनी होती है, जो बाह्य कंकाल की भाँति कार्य करती है।

– देह गुहा:- देहगुहा पूर्ण, किन्तु कुछ वयस्कों में यह ह्वासित होती है और हीमोसील द्वारा भरी होती है और जनदों के द्वारा सीमित होती है।

– शारीरिक संगठन का स्तर  अंगतन्त्र।

– आहार नाल व पाचन:- पूर्ण आहार नाल, सुविकसित पेशीय ग्रसनी युक्त। पाचन बाह्य कोशिकीय।

– उत्सर्जन व परासरण नियमन:- मैल्पीघीयन नलिकाएँ, और ग्रीन या कॉक्सल ग्रन्थियों द्वारा।

– उत्सर्जी पदार्थ :-  यूरिक अम्ल à स्थलीय ऑर्थोपोडा में अमोनिया à जलीय ऑर्थोपोडा में।

– दैहिक द्रव्य और उनका परिसंचरण:- खुला परिसंचरण तन्त्र।

– संवेदी अंग:- साधारण या संयुक्त नेत्र : प्रकाशग्राही।

एन्टिनी – घ्राण या स्पर्श ग्राही।

स्टेटोसिस्ट – सन्तुलक।

– लैंगिकता:- एकलिंगी, लैंगिक द्विरूपता सुस्पष्ट।

– जनन और निषेचन:- लैंगिक और अन्तः निषेचन, किन्तु भ्रूण का परिवर्धन देह के बाहर।

अण्ड प्रजक  अधिकांश कीट

शिशु प्रजक  बिच्छू

– परिवर्धन – प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष।

लार्वा  निम्फ : कॉकरोच

मैगट – घरेलू मक्खी

कैटरपीलर – तितली और शलभ

– ऑर्थोपोडा को निम्नलिखित तीन उपसंघ में बाँटा गया है–

1. ओनाइकोफोरा (Onychophora):-  इन जन्तुओं में काइटिन युक्त बाह्य कंकाल कड़ा नहीं होता है, बल्कि एक कोमल आवरण बनाता है। ये श्वास नलियों या ट्रेकी से साँस लेते हैं। दोनों सेन्ट्रल नर्व कॉर्ड अलग-अलग होते हैं।

2. चेलीसेरेटा (Chelicerata):- इसे निम्नलिखित दो वर्गों में विभाजित किया गया है–

(a) मीरोस्टोमेटा (Merostomata):- इनका शरीर सिरोवक्ष तथा उदर में विभाजित रहता है। समुद्री प्रकृति के होते हैं। श्वसन Book lungs द्वारा होता है। यह जीवित जीवाश्म है। उदाहरण– लिमुलस (किंग क्रेब)।

(b) एरेकनिडा (Arachnida):- इन प्राणियों में ऐन्टिनी तथा असली जबड़ों का अभाव होता है तथा उपांगों की प्रथम जोड़ी को ग्राहिका या केलीसेरी (Chelicerae) कहते हैं।

– इसे चार वर्गों में विभाजित करते हैं–

1. क्रस्टेशिया (Crustacea):- इन जन्तुओं में क्यूटिकल कैल्सियम कार्बोनेट की उपस्थिति के कारण अधिक कड़ी हो जाती है। इसके सिरे पर दो मैंडिबल, चार मैक्सिली और चार एण्टिनी होते हैं। वक्ष के कुछ अथवा सभी खंड सिरे से जुड़े रहते हैं जिससे शिरोवक्ष बन जाता है। उदाहरण – पेलीमॉन, डैफनिया, लाबस्टर, झींगा इत्यादि।

2. डिप्लोपोडा (Diplopoda):- इनका शरीर अधिक लम्बा होता है और उसमें अनेक खंड होते हैं तथा शरीर के दोनों ओर अनेक उपांग होते हैं। उदाहरण – कनखजूरा तथा मिलीपीड इस वर्ग के प्राणी हैं।

3. इनसेक्टा (Insecta) (कीट-वर्ग):-

– इन जन्तुओं का शरीर तीन भागों में बाँटा जा सकता है – सिर, वक्ष, उदर।

– ‘सिर पर ऐन्टिनी का एक जोड़ा होता है। श्वास लेने के लिए सभी कीटों में श्वास नलियाँ (Trachea) होती हैं। ये वक्ष तथा उदर के पार्श्व में श्वास रंध्रों द्वारा खुलती है। उत्सर्जन दो या अनेक मैल्पीघी नालों द्वारा होता है। उदाहरण – तिलचट्टा, मक्खी, मच्छर, मधुमक्खी, रेशम का कीड़ा इत्यादि।

4. चीलोपोडा (Chilopoda):- ये जीव स्थलीय होते हैं। शरीर सिर व धड़ में विभक्त रहता है। श्वसन ट्रेकिया द्वारा व उत्सर्जन मैल्पीघी नलिका द्वारा होता है। पैरों का प्रथम जोड़ा विषैले नखर में बदल जाता है। उदाहरण – सेन्टीपीड (Centipede)

उदाहरण – आर्थिक महत्त्व के कीट :

एपिस – मधुमक्खी

बोम्बिक्स – रेशम कीट

लैस्सिफर – लाख कीट

पेलिमॉन – झींगा

ऑर्थोपोडा के उदाहरण

(a) टिड्डी

(b) तितली

(c) बिच्छू

(d) झींगा (प्रॉन)

वाहक:-

– मस्का – हैजा और अतिसार (जीवाणु + प्रोटोजोआ)

– एनाफिलीज – मलेरिया (प्लाज्मोडियम)

– क्यूलेक्स – फिलेरिएसिस (निमेटोड)

– एडीस – पीत ज्वर (विषाणु)

विषैले:-

– स्कोर्पियन (बिच्छू), वास्पस (ततैया), बीज (मधुमक्खियाँ), स्कोलोपेन्ड्रा (सेन्टोपीड)

– जीवित जीवाश्म

– लिम्युलस (किंग केकड़ा)

संघ-मोलस्का:-

– मोलिस = मुलायम

– कोमल देह वाले प्राणी, जिनकी देह कैल्सियमी कवच से ढकी रहती है। यह जन्तु जगत का द्वितीय सबसे बड़ा संघ है।

 स्वभाव व आवास:- प्रायः जलीय (समुद्री व स्वच्छ जलीय दोनों) किन्तु कुछ स्थलीय भी होते हैं। जैसे- (हेलिक्सः स्थलीय घोंघा) मुख्यतया मोलस्का परभक्षी होते हैं (स्क्विड और आक्टोपस)।

– बाह्य आकारिकी – देह अखण्डित और

a. शीर्ष

b. पेशीय पाद

c. आन्तरांगी पुंज में विभेदित होती हैं।

– देह, कठोर कैल्सियमी कंकाल से ढकी होती है।

– मेन्टल (प्रावार):- यह त्वचीय वलन होता है, जो आन्तरांगी पुंजों को ढके रहता है तथा कैल्सियमी कवच का कार्य करता है।

– सममिति:- द्विपार्श्व सममित किन्तु यह वलन के कारण असममित हो जाती है।

– गमनांग:- पेशीय पाद गमनांग होते हैं, जो सरकने (खिसक कर) चलने में मदद करते हैं। ये बिलकारी व तैराक होते हैं।

– देहभित्ति – त्रिजननस्तरीय।

– देहगुहा:- यूसीलोम (वास्तविक देहगुहा), किन्तु वयस्कावस्था में ह्वासित और परिहद गुहा द्वारा सीमांकित।

– शारीरिक संगठन का स्तर – अंग – तन्त्र।

– आहार नाल और पाचन:- आहारनाल सीधी ‘U’ आकार की या कुण्डलित होती है। सुविकसित और मुख पर पंक्तिबद्ध रेंगने वाले अंग उपस्थित होते हैं, जिन्हें रैडुला कहते हैं।

– श्वसन:-  वायुवीय श्वसन होता है। कवच व प्रसार के बीच में रिक्त स्थान पाया जाता है, जिसे प्रवार गुहा कहते हैं। इस गुहा में पिच्छ युक्त गिल्स पाए जाते हैं, जो श्वसन क्रिया करते हैं। (गिल्स को टीनिडियम कहा जाता है।

– दैहिक तरल और उनका परिसंचरण:- खुला परिसंचरण तन्त्र और हीमोसायनिन, एक नीले रंग का वर्णक, श्वसन वर्णक के रूप में उपस्थित।

– उत्सर्जन और परासरण नियमन:- आधारी उत्सर्जी अंग मेटानेफ्रिडिया किन्तु गिल्स भी यह कार्य सम्पादित करते हैं।

उत्सर्जी पदार्थ  अमोनिया।

संवेदी अंग:-

(i)  आँखें:- प्रकाशग्राही, ऑक्टोपस में यह मनुष्य की आँखों के समवृत्ति (Analogous) होती है।

(ii)  टेन्टेकल्स (स्पर्शक):- अग्र देह व शीर्ष पर स्पर्शग्राही उपस्थित होते हैं।

(iii)  ऑस्फेडियम:- यह जल के स्वाद व शुद्धता के लिए, रसायनग्राही की भाँति कार्य करते हैं।

– लैंगिकता:- अधिकांश मोलस्का एकलिंगी (द्विलिंगाश्रयी) होते हैं और मोलस्का अण्डप्रजक होते हैं।

– जनन व निषेचन :- लैंगिक, बाह्य व आन्तरिक निषेचन, सभी अण्डप्रजक।

– वृद्धि – प्रत्यक्ष किन्तु कभी-कभी अप्रत्यक्ष।

लार्वा:-

– ट्रोकोफोर – डेन्टेलियम, काइटन

 वेलिजर  मसल

– ग्लोकीडियम  मसल और पाइला

– इस संघ को निम्नलिखित छः वर्गों में बाँटा गया है –

1. गैस्ट्रोपोडा (Gastropoda) :- इस संघ में यह वर्ग सबसे बड़ा है। इनका कवच सर्पिल विधि से कुंडलित होता है। मुखपाद या ओरल फुट चपटा होता है। सिर पर दो आँखें होती हैं और टेन्टेकिल भी होते हैं। इनके मुख में दाँत नहीं होते, केवल खुरदरी जीभ होती है। उदाहरण – पाइला ग्लोबोसा तथा एपिल स्नेल।

2. पेलिसिपोडा (Pelecypoda):- इन जीवों का द्विकपाटी कवची बाइवॉल्व सेल होने के कारण इन्हें प्रायः द्विकपाटी या बाइवॉल्व कहते हैं। इनका सिर अलग नहीं दिखाई पड़ता है। मनुष्य के लिए इस वर्ग के प्राणी बड़े ही महत्त्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये भोजन के काम में आते हैं। इस वर्ग के कुछ प्राणियों द्वारा मोती का निर्माण किया जाता है। उदाहरण – सीप।

3. पॉलिप्लेकोफोरा (Polyplacophora):- इस वर्ग के जीव समुद्र के किनारे पत्थरों आदि पर पाद द्वारा चिपके रहते हैं। शरीर, चपटा, अण्डाकार होता है, जिसके पृष्ठतल पर आठ टुकड़ों का कैल्सियम कार्बोनेट का बना कवच होता है। ये एकलिंगी होते हैं। सिर व नेत्र अस्पष्ट होते हैं। उदाहरण – काइटिन।

4. सेफेलोपोडा (Cephalopoda):- इसमें मिलने वाले मोलस्का सबसे अधिक विकसित होते हैं। कुछ प्राणियों में दो नेत्र होते हैं जो रचना में वर्टिब्रेट्स के नेत्रों के सदृश होते हैं। इनमें प्रायः एक स्पष्ट सिर भी होता है जो वास्तव में सिर और वैन्ट्रल फुट के मिलने से बनता है। पाद के मध्य भाग में मुख्य द्वार होता है जो चारों ओर अनेक बाहुओं से घिरा होता है। वास्तव में इन प्राणियों में वैन्ट्रल फुट के विभाजन से ही बाहुओं का निर्माण होता है। प्रत्येक बाहु में अनेक चूषक होते हैं जिनकी सहायता से ये शिकार को आसानी से पकड़ लेते हैं। इन प्राणियों में कवच का लगभग अभाव होता है। इस वर्ग के सुविख्यात प्राणी स्क्विड है।

5. मोनोप्लेकोफोरा (Monoplacophora):- ये प्राणी बहुत कुछ एनीलिड्स से मिलते हैं। मोलस्का के लक्षण शरीर पर कवच तथा श्वसन हेतु गिल का पाया जाना है।

6. स्कैफोपोडा (Scaphopoda):- ये कृमिरूपी मोलस्क समुद्र की रेत में धँसे रहते हैं तथा पाद से मिट्टी खोदने का काम करते हैं। शरीर पर श्वेत कवच चढ़ा होता है। उदाहरण – डेन्टेलियम या टूथ शेल।

उदाहरण–

नीओपिलिना  यह एनिलिडा और मोलस्का के मध्य की योजक कड़ी है।

पाइला  एप्पल स्नेल

पिनेक्टेडा  पर्ल ऑयस्टर

सीपीया  कटल फिश

लोलिगो  स्क्विड

ऑक्टोपस  डेविल फिश

एप्लेशिया – सी-हेयर

डेन्टेलियम  एलीफेन्ट टस्क शैले

कीटोप्ल्यूरा  काइटिन

संघ इकाइनोडर्मेटा (शूलयुक्त प्राणी):-

– इस संघ के प्राणियों में कैल्सियम युक्त अंत: कंकाल पाया जाता है।

– इनका नाम एकाइनोडर्मेटा (शूलयुक्त शरीर) है।

– सभी समुद्रवासी हैं तथा अंग-तंत्र स्तर का संगठन होता है।

– वयस्क एकाइनोडर्म अरीय रूप से सममित होते हैं, जबकि लार्वा द्विपार्श्व रूप से सममित होते हैं।

– ये सब त्रिकोरकी तथा प्रगुही प्राणी होते हैं। पाचन-तंत्र पूर्ण होता है तथा सामान्यतः मुख अधर तल पर एवं मलद्वार पृष्ठतल पर होता है।

– जल संवहन-तंत्र इस संघ की विशिष्टता है, जो चलन (गमन) तथा भोजन पकड़ने में तथा श्वसन में सहायक है। स्पष्ट उत्सर्जन-तंत्र का अभाव होता है।

– नर एवं मादा पृथक् होते हैं तथा लैंगिक जनन पाया जाता है।

– निषेचन सामान्यतः बाह्य होता है। परिवर्धन अप्रत्यक्ष एवं मुक्त प्लावी लार्वा अवस्था द्वारा होता है।

उदाहरण – एस्टेरियस (तारा मीन) एकाइनस (समुद्री-अर्चिन) एंटीडोन (समुद्री लिली) कुकुमेरिया (समुद्री कर्कटी) तथा ओफीयूरा (भंगुर तारा)

– इकाइनोडर्मेटा को निम्नलिखित पाँच वर्गों में विभाजित किया जा सकता है–

1. क्राइनॉडिया (Crinodea):- इसमें जल नलिनी (Sea-Lily) या फेदर स्टार होते हैं। प्राणी प्रायः डंठल के समान रचना द्वारा समुद्र की तट में लगे रहते हैं। इनकी बाहुएँ प्रायः बहुशाखान्वित होती हैं।

2. होलोथूरॉइडिया (Holothuroidea):- इसमें सी कुकुम्बर होते हैं। इन प्राणियों का शरीर लम्बा, पेशीय तथा कंटविहीन होता है। इनकी कार्यभित्ति कोमल या चमड़े के समान दृढ़ होती है। शरीर के अगले सिरे पर शाखान्वित संकुचनशील टेन्टेकल होते हैं।

3. ऑफियोरॉइडिया (Ophiuroidea):- इस वर्ग में विभिन्न बाहु केन्द्रीय बिम्ब से बिल्कुल साफ-साफ अलग दिखाई पड़ते हैं। Ambulacral groove का पूर्ण अभाव होता है और नाल पर चलने में सहायता नहीं देते हैं। इस वर्ग में ब्रिटिल स्टार, सरपेंट स्टार, बास्केट स्टार इत्यादि प्राणी होते हैं।

4. इकाईनॉडिया (Echinodea):- ये जीव सी अर्चिन होते हैं, जिनका शरीर गोल तथा काँटों से ढका होता है। इनमें बाहुओं का पूर्ण अभाव होता है।

5. एस्टेरॉइडिया (Asteroidea):- इसमें विभिन्न प्रकार की स्टारफिश आती हैं। इनके बाहुकेन्द्रीय बिम्ब (Central Disc) स्पष्ट रूप से पृथक् नहीं होते। ट्यूब फीट (Ambulacral groove) में प्रत्येक बाहु के निचली सतह पर होते हैं। उदाहरण – तारा मछली

उप संघ : हेमीकॉर्डेटा (अर्धरज्जुकी):-

(कशेरुकी व अकशेरुकी के बीच की योजक कड़ी):-

– शरीर कोमल और अखण्डित। सूंड (proboscis), कॉलर एवं धड़ (trunk) में विभाजित।

– द्विपार्श्व सममित, त्रिजननस्तरीय, देहगुहीय

– आहारनाल पूर्ण, श्वसन गिल्स के द्वारा सम्पन्न

– रुधिर रंगहीन, अकणिकीय। परिसंचरण तन्त्र खुले प्रकार का

– लिंग पृथक्-पृथक्, भ्रूणीय विकास – प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, लार्वा टॉर्नेरिया, बाह्य निषेचन

– ‘पृष्ठ रज्जु’ शरीर के अग्र भाग में ही बन्ध्य, इसी कारण इसे हेमी कॉर्डेट कहा जाता है।

– हेमी कॉर्डेट में पृष्ठ रज्जु वस्तुतः मुख अंध नाल या स्टोमोकोर्ड होती है।

– इसमें कॉर्डेटा के सदृश प्राथमिक तीन प्रमुख संरचनाएँ-पृष्ठीय नलिकाकार खोखली तन्त्रिका रज्जु, गिल छिद्र उपस्थित होती हैं।

– श्वसन गिल्स के द्वारा होता है।

– प्रोबोसिस ग्रन्थि उत्सर्जी अंग है।

कॉर्डेटा से विभेदन:-

– शिरोद्भवन, खण्ड, युग्मित उपांग, पूँछ, बाह्य कंकाल, अवस्कर, जीवित अंतः कंकाल, हीमोग्लोबिन और RBC’s अनुपस्थित।

– हृदय पृष्ठ सतह पर उपस्थित

– खुली तन्त्रिका गुहा

– बहुसंख्यक जनद उपस्थित

– हेमीकॉर्डेटा में गिल छिद्र पृष्ठ सतह पर उपस्थित होते हैं जबकि कॉर्डेटा में पार्श्व में उपस्थित होते हैं।

– हेमीकॉर्डेट्स में इकाइनोडर्म के सदृश तन्त्रिका तन्त्र, देहगुहा, लार्वा अवस्था उपस्थित। इनके स्वभाव, पारिस्थितिकी के समान होते हैं और पुनरुद्भवन की अधिक क्षमता पाई जाती है।

– उद्विकास की दृष्टि से हेमीकॉर्डेट्स को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। ये कॉर्डेट तथा नॉन-कॉर्डेट के बीच की योजक कड़ी का कार्य करते हैं। जैसे-बेलेनोग्लोसस (जीभ कृमि या एकोर्न कृमि) सेक्कोग्लोसस।

संघ-कॉर्डेटा (Chordata):-

– सभी कॉर्डेट्स के जीवन इतिहास की किसी न किसी अवस्था में 3 अद्वितीय लक्षण उपस्थित होते हैं। ये चार लक्षण निम्नलिखित हैं–

(i) पृष्ठीय नलिकाकार खोखली तन्त्रिका रज्जु

(ii)  अनुदैर्ध्य अवलम्बित पृष्ठ रज्जु

(iii) जीवन काल में ग्रसनी गिल दरारों की श्रेणी

(iv) इनका संगठन अंग-तन्त्र स्तर का होता है, में द्विपार्श्व सममित, त्रिजनन स्तरीय, वास्तविक देहगुहीय होते हैं।

– संघ कॉर्डेटा को कपाल की स्थिति के आधार पर दो वर्गोँ में बाँटा गया है–

(i) ऐक्रनिया (प्रोटोकॉर्डेट)  

(ii) क्रेनिएटा (यूकॉर्डेटा)

(i) एक्रेनिया (प्रोटोकॉर्डेटा):- सभी समुद्र में पाए जाते हैं। आदिम कॉर्डेट्स हैं, जिनमें सिर, कपाल, मेरुदण्ड, जबड़े और मस्तिष्क अनुपस्थित होता है इसे 3 उपसंघ में विभाजित किया गया है-हेमीकॉर्डेटा, यूरोकॉर्डेटा और सिफेलोकॉर्डेटा यह विशेष रूप से पृष्ठ रज्जु की उपस्थिति पर आधारित है–

(ii) क्रेनिएटा (यूकॉर्डेटा):- इसमें केवल एक उपसंघ वर्टिब्रेटा को सम्मिलित किया गया है। इसे दो उपश्रेणियों में विभाजित किया गया है–

(A)  एग्नेथा (जबड़े रहित वर्टिब्रेट्स):- इस श्रेणी में दो वर्ग आते हैं – ऑस्ट्रैकोडर्मी एवं साइक्लोस्टोमेटा

(B)  नेथोस्टोमेटा  इस समूह के जंतुओं में जबड़े व जोड़ीदार उपांग पाए जाते हैं। इन्हें दो अधिवर्गों में विभाजित किया गया है–

a.  पिसीज: कॉण्ड्रिक्थीज, ऑस्टिकथीज

b.  टेट्रापोडा: इसे चार वर्गों में विभाजित किया गया है – उभयचर (एम्फीबिया), सरीसृप (रेप्टीलिया), पक्षी, स्तनी (मैमेलिया)

प्रभाग I – एग्नैथा (जबड़ा-रहित कशेरुकी):-

– आदिम जबड़े रहित, मीन की तरह कशेरुकी, जिनमें वास्तविक जबड़े और युग्मित उपांग अनुपस्थित होते हैं।

वर्ग: साइक्लोस्टोमेटा:-

–  इस वर्ग के सभी सदस्य मछलियों पर बाध्य परजीवी होते हैं।

– त्वचा कोमल, शल्क रहित।

– मुख जबड़े रहित और हमेशा खुला हुआ।

– मुख गोल व चूषक।

– उपास्थि रश्मियों सहित मध्य फिन उपस्थित लेकिन युग्मित उपांग अनुपस्थित, पूँछ पाई जाती है।

– अंतः कंकाल उपास्थि का बना होता हैं। कपाल व कशेरुक दण्ड उपस्थित।

– पाचन तन्त्र आमाशय रहित होती है। आन्त्र व टिफलोसोल पाया जाता है।

– यह समुद्री जन्तु है, जो जनन के लिए मीठे पानी की ओर प्रवास करते हैं और जनन के कुछ दिनों पश्चात् इनकी मृत्यु हो जाती है, कायान्तरण के पश्चात् इनका लार्वा पुनः समुद्र की ओर लौटता है।

– गिल छिद्रों की संख्या 5 से 16 जोड़ी होती है।

– हृदय 2 खण्डों में उपस्थित, असमतापी जन्तु

– दो मीसोनेफ्रिक वृक्क उपस्थित।

– पृष्ठीय तन्त्रिका रज्जु उपस्थित। 8 से 10 जोड़ी कपालीय तन्त्रिका उपस्थित।

– एकल मध्य घ्राण अंग व नासाछिद्र उपस्थित।

– श्रवण अंग, एक या दो अर्धवृत्ताकार नलिकाओं सहित उपस्थित

– लिंग संयुक्त व अलग-अलग, बाह्य निषेचन व परिवर्धन प्रत्यक्ष और लम्बी लार्वा अवस्था पाई जाती है।

– लार्वा : एमोसीट लार्वा कहलाता है। उदाहरण – लैम्प्रे (पेट्रोमाईजॉन), हैगमछली (मिक्सीन)

प्रभाग II – नैथोस्टोमेटा:-

– जबड़े युक्त कशेरुकी, इनमें वास्तविक जबड़े व युग्मित उपांग उपस्थित।

– सभी मछलियों और मछलियों की तरह के सदस्यों को अधिवर्ग पिसीज में रखा गया है जबकि 4 पैरों वाले स्थलीय ग्नैथोस्टोमेटा को अधिवर्ग टेट्रापोडा में रखा गया है।

तालिका – पिसीज व टैट्रापोडा (चतुष्टपाद) में अन्तर

पिसीज (Pisces)चतुष्पाद (Tetrapoda)
1. पूर्णतः जलीय2. युग्मित उपांग, यदि उपस्थित है, तो फिन्स के रूप में3. मध्य फिन उपस्थित4. त्वचा प्रायः नम और शल्की5. गिल्स के द्वारा जलीय श्वसन6. संवेदी अंग जल में कार्य करते हैं।1. जलीय या स्थलीय। कुछ वृक्षचारी व वायवीय2. युग्मित, 5 अंगुलीयुक्त उपांग उपस्थित।3. मध्य फिन अनुपस्थित4. त्वचा प्रायः शुष्क और सख्त5. वायवीय श्वसन, फेफड़ों के द्वारा6. संवेदी अंग वायु में कार्य करते हैं।

अधिवर्ग-1 : पिसीज:-

वर्ग : कॉण्ड्रीक्थीज (उपास्थिल मछलियाँ):-

– शरीर पार्श्व भाग से दबा हुआ व पृष्ठ प्रतिपृष्ठ से चपटा होता है। यह सिर, धड़ व पूँछ में विभेदित।

– कड़ी फिन रश्मियाँ, फिन्स को अवलम्बन प्रदान करती है।

– नर मछलियों में श्रोणि पंख के भीतर भाग में एक जोड़ी मैथून अंग, आलिंगक पाए जाते हैं, जो कि पश्च भाग में स्थित होते हैं।

– इनमें सामान्यतः 2 पृष्ठ फिन पाए जाते हैं। पूँछ पंख विषमपालित/असममित होता है।

– त्वचा एकल अधिचर्म, श्लेष्मीय ग्रन्थियों और त्वचीय शल्कों (प्लैकॉइड शल्के) की बनी होती है।

– अंतः कंकाल पूरी तरह से उपास्थि का बना होता हैं। पृष्ठ रज्जु पूरे जीवन में पाई जाती हैं।

– मुख प्रतिपृष्ठ सतह पर, जबड़े सुविकसित, आहारनाल अवस्कर में खुलती है आन्त्र में स्क्रॉल वॉल्व पाया जाता है।

– दाँत प्लैकाइड (पट्टाभ) शल्कों में रूपान्तरित होते हैं जो कि पीछे की ओर मुड़े होते हैं।

– श्वसन तन्त्र 5-7 जोड़ी परतीय (प्लेट सदृश) गिल होते हैं। गिल छिद्र बिना ढके हुए (या बिना ऑपरकुलम) अपवाद काइमेरा (कॉण्ड्रिक्थीज व ऑस्टिक्थीज के मध्य योजक कड़ी है)

– तैरने के लिए हवा से भरा हुआ थैला होता है जिसे स्विम ब्लैडर कहते हैं। यह उत्प्लावकता नियमन का कार्य करता है, यदि यह अनुपस्थित होता है तो इसके लिए वायु आशय होता है जिसकी सहायता से ये डूबते नहीं हैं और लगातार तैरते रहते हैं।

– हृदय 2 कोष्ठीय होता है। इसमें एक आलिन्द व एक निलय पाया जाता है शिरा व धमनी उपस्थित होती है वृक्क रुधिर तन्त्र सुविकसित होता है। लाल रक्त कणिकाएँ अण्डाकार होती हैं तथा केन्द्रक युक्त व उभयोत्तल होती हैं ये असमतापी जन्तु होते हैं। इनमें शरीर का तापमान -नियमन की क्षमता का अभाव होता है।

– इनमें 10 जोड़ी कपालीय तन्त्रिकाएँ पाई जाती हैं।

– घ्राणपिण्ड, नासा छिद्र के द्वारा मुख गुहा में नहीं खुलते हैं तीन अर्द्धवृत्ताकार नलिकाओं युक्त, केवल श्लेष्मीय आन्तरिक कर्ण पाया जाता है पार्श्व रेखीय संवेदी अंग सुविकसित। जो कि पानी की धारा व लहरों की पहचान करते हैं।

– अपशिष्ट पदार्थ नाइट्रोजन युक्त यूरिया होता है।

– नर व मादा अलग-अलग। जनन नलिका अवस्कर में खुलती है। नर में प्रायः आलिंगक पाए जाते हैं जो कि संयुग्मन के समय काम आते हैं। आन्तरिक निषेचन पाया जाता है इनके मुख्य प्रारूप अण्डजरायुज या अण्डज होते हैं। कुछ जरायुज भी होते हैं। इनका जीवन इतिहास सरल होता है।

– प्रायः कॉन्ड्रीक्थीज समुद्री होते हैं। ये सभी परभक्षी होते हैं।

उदाहरण

स्कोलियोडोन – कुत्ता मछली (Dog fish)

स्पाइरिना/जाइगीना – हथौड़-शीर्षी शार्क (Hammer headed shark)

प्रिस्टिस (Pristis) – आरा मछली (Saw fish)

टॉरपीडो (Torpedo) – विद्युत-रे (Electric ray)

ट्राइगॉन (Trygon) – दंश-रे (Sting ray)

काइमेरा (Chimaera) – चूहा या खरगोश मछली या हैरिंग्स का राजा

कॉरकेराडॉन (Carcharodon) – ग्रेट व्हाइट शार्क (Great white shark)

वर्ग : ऑस्टिक्थीज (अस्थि मछलियाँ):-

– इसके अन्तर्गत समुद्री व अलवण जलीय मछलियों को जिनमें अस्थिल अन्तःकंकाल पाया जाता है, को सम्मिलित किया गया है।

– शरीर प्रायः धारा रेखीय होता है जो कि इसे पानी में गमन में सहायता प्रदान करता है।

– फिन उपास्थिल या अस्थिल फिन रश्मियों द्वारा सधे हुए होते हैं। अंस व श्रोणि पंख संतुलन व रोकने का कार्य करते हैं। नर व मादा दोनों में ही आलिंगक अनुपस्थित होते हैं इनमें प्रायः एकल पृष्ठ पंख (फिन) पाया जाता है। पुच्छ पंख समपाली होता है। इनमें पूँछ इनके पार्श्व गमन में पूर्णतया सहायक होती है।

– त्वचा एक कोशिकीय श्लेष्मीय ग्रन्थियों और त्वचीय शल्कों से बनी होती है और ये (साइक्लॉयड) चक्राभ या टीनॉइड (कंकताभ) शल्कों से ढकी होती है।

– अन्तः कंकाल आंशिक या पूर्णतया अस्थिल होता है। यह पृथक् रूप से कोशिका को स्थानान्तरित कर देता है।

– मुख की उपास्थि अन्तस्थ होती है। आहार नाल गुदा के द्वारा बाहर खुलती है आन्त्र में प्राय: स्क्रॉल द्वार अनुपस्थित होता है।

– श्वसन तन्त्र में 4 जोड़ी गिल पाए जाते हैं। गिलछिद्र गिलप्रच्छद द्वारा ढके हुए होते हैं।

– वायु आशय उपस्थित जो कि उत्प्लावकता नियमन करता है। कुछ अस्थिल मछलियाँ वायु आशय को फुफ्फुस के समान वायु श्वसन के लिए उपयोग करती है।

– हृदय 2-कोष्ठीय होता है इसमें एक धमनी व एक शिरा पाई जाती है। शिरा कोटर और महाधमनी उपस्थित होती है। ये असमतापी जन्तु होते हैं। ये शीत रुधिर जन्तु हैं।

– इसमें 10 जोड़ी कपालीय तन्त्रिका पाई जाती हैं।

– घ्राण अंग पृष्ठ सतह पर घ्राण अंग केवल फुफ्फुस मछलियों में मुख गुहा में खुलते हैं। कर्ण आन्तरिक कर्ण के रूप में, अर्धवृत्ताकार नलिकाओं युक्त होते हैं। पार्श्व रेखीय संवेदी अंग सुविकसित।

– उत्सर्जी पदार्थ नाइट्रोजन युक्त : अमोनिया।

– नर व मादा सामान्य रूप से, बाह्य रूप में अविभेदित होते हैं निषेचन सामान्यतः बाह्य मुख्य प्रारूप अण्डज। कुछ अण्डजरायुज व जरायुज कुछ मछलियों में अण्डों का पैतृक संरक्षण भी पाया जाता है।

– अस्थिल मछलियाँ, अलवणीय, लवणीय, गर्म व ठण्डे जल में पाई जाती है। बहुत गहरे पानी में पाई जाने वाली मछलियाँ प्रतिदीप्ति प्रदर्शित करती हैं कुछ मछलियाँ रंग बदल सकती हैं। कुछ मछलियाँ पानी को छोड़कर जमीन पर रेंगती हैं ये मछलियाँ भोजन के रूप में अस्थिल मछलियों का भक्षण करती हैं भारत में सामान्य रूप से पाई जाने वाली मछलियाँ–

(a) अलवणीय जातियाँ(b) समुद्री जातियाँ
(i) लेबियो रोहिता (रोह)हारपॉडान (बाम्बेक्स डक)
(ii) लेबियो कालबासु (कालबासु)एंग्विला (सर्पमीन)
(iii) कतला-कतला (कतला)सार्डिनेला (साल्मान)
(iv) साइप्रिनस कार्पियो (कार्प)हिल्सा (हिल्सा)

उदाहरण

– एंग्यूला-सर्पमीन, लेबियो-रोहू, हिप्पोकैम्पस-समुद्री घोड़ा, एनाबस-(ऊपर चढ़ने वाली मछली) पर्च, गैम्बूसिया – मच्छर मछली, नियोसोरेटोडस – ऑस्ट्रेलियन फुफ्फुस मछली, मछली, कतला-कतला, क्लेरियस (मगुर), एक्वेरियम-बैट्टा (लड़ाकू मछली), पैट्रोफाइलम – देवदूत मछली (Angel Fish)

अधिवर्ग-II : चतुष्पाद (टेट्रापोडा):-

वर्ग-उभयचर (एम्फीबिया):-

– इसके सदस्य जलीय एवं थलीय दोनों प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं। इसलिए इन्हें जलस्थल चर (Amphibians) कहते हैं।

एम्फीबिया के लक्षण (Characteristics of Amphibia):-

– लार्वा सदैव जल में रहते हैं तथा गिल्स से साँस लेते हैं।

– वयस्क प्राणियों में दो जोड़ी टाँगें होती हैं तथा ये फेफड़े से साँस लेते हैं, इनके आन्तरिक नासाछिद्र मुखगुहा में खुलते हैं।

– इनके लार्वा तथा प्रौढ़ प्राणी दोनों ही में अयुग्मित पंख हो सकते हैं किन्तु इन्हें आलम्बन देने के लिए फिन रेज का सदैव अभाव होता है।

– खोपड़ी में दो अनुकपाल अस्थिकंद (Occipital Condyle) होते हैं, जो शीर्षधर कशेरुकाओं के अगले सिरे पर स्थित दो अंडाकार गर्तों से संघायित होते हैं। इसलिए इसे द्विकन्दीय कहते हैं।

– हृदय त्रिवेश्मी होता है तथा शारीरिक ताप सदैव वातावरण के अनुसार बदला करता है।

– आहार नाल के अन्तिम भाग को अवस्कर (Cloaca) कहते हैं। इसी में मूत्र वाहिनियाँ तथा अण्डवाहिनियाँ खुलती हैं।

– लार्वा प्रौढ़ प्राणियों से रचना तथा स्वभाव में भिन्न होते हैं। परिवर्धन में कायान्तरण (Metamorphosis) की आवश्यकता पड़ती है।

– एम्फीबिया के जीवित सदस्यों को तीन गणों (Order) में बाँटा जाता है–

1. गण-कॉडेटा या यूरोडेला (Order-Caudata or Urodela):-

– शरीर स्पष्ट रूप से सिर, धड़ तथा पुच्छ में विभक्त होता है।

– दो जोड़ी पाद पाए जाते हैं जो समान लम्बाई के होते हैं। तथा त्वचा पर शल्कों का अभाव होता है।

– इनके दोनों जबड़ों पर दाँत उपस्थित होते हैं।

– बाह्य क्लोम केवल लार्वा (Larva) में होते हैं।

– कशेरुकाएँ संख्या में अधिक होती हैं। इनका सेन्ट्रम एम्फीसीलस या ऑपिस्थोसीलस (Ophistocoelus) प्रकार का होता है।

– नर में मैथूनी अंग अनुपस्थित होता है।

– इनका लार्वा जलीय होता हैं; कभी-कभी कायान्तरण न होने पर जीवन पर्यन्त लार्वा अवस्था में ही रहते हैं। इस अवस्था में जनन अंग विकसित हो जाते हैं तथा ये जनन करने लग जाते हैं। इस अवस्था को चिरभ्रूणता (Neoteny) कहते हैं। जैसे –एक्सोलोट्ल लार्वा।

– एम्बाइस्टोमा:- चीता सेलामेण्डर : इसका लार्वा एक्सोलोट्ल कहलाता है जो चिरभ्रूणता प्रदर्शित करता है। प्रोटियस अन्धा गुफा सेलामेण्डर : इनके अग्र पाद में 3-3 तथा पश्चपाद में 2-2 अंगुलियाँ पाई जाती हैं।

2. गण-एन्यूरा या सैलेन्शिया (Order-Anura or Salientia):-

– इनमें दो जोड़ी पाद पाए जाते हैं पश्चनाद अग्रपाद की अपेक्षा बड़े होते हैं तथा पश्चपादों की अंगुलियाँ जालयुक्त होती है।

– इनमें अण्ड निक्षेपण, निषेचन एवं परिवर्धन हमेशा जल में होता है।

– इनका कशेरुक दण्ड बहुत छोटा होता है इसमें 5-9 कशेरुकाएँ पाई जाती हैं।

– इनमें परिवर्धन अप्रत्यक्ष, लार्वा अवस्था, भेक शिशु’ (Tadpole) पाई जाती है तथा इनमें पूर्ण कायान्तरण होता है।

उदाहरण – राना टिग्रीना Indian bull frog, बूफो – साधारण टोड, हायला-वृक्षीय मेंढक, रेकोफोरस – उड़ने वाला मेंढक, गोलिएथ – सबसे बड़ा मेंढक।

3. गण-जिम्नोफायोना अथवा एपोडा (Order-Gymnophiona orApoda):-

– बिलकारी उभयचर होते हैं।

– शरीर लम्बा, संकरा एवं कृमिरूपी एवं इनमें पाद अनुपस्थित होते हैं।

– त्वचा पर अनुप्रस्थ झुर्रियाँ पाई जाती हैं तथा छोटे-छोटे शल्क धँसे रहते हैं।

– इनका सिर मजबूत, शिशु में नेत्र अर्धविकसित व पलक रहित ये अन्धे तथा बहरे होते हैं।

– नर में बाहर निकलने वाला मैथूनी अंग (Copulatoxy organ) उपस्थित होता है।

वर्ग : रेप्टीलिया (REPTILIA):-

(रेंगने वाले जन्तु):-

– इस वर्ग में क्रेनियेट जन्तु आते हैं जो अपने आप को पूर्ण रूप से थल पर रहने के लिए विकसित कर चुके हैं।

– एम्निऑटिक कशेरुकी हैं जिनमें कवच युक्त अण्डे देने का स्वभाव है।

– इस वर्ग के जन्तुओं का मीसोजोइक युग में आधिपत्य था, इसीलिए इस युग को ‘रेप्टाइल्स का स्वर्ण युग’ कहते हैं। इसी युग में दैत्य डायनोसॉर्स तथा प्लीसीओसॉर्स का क्रमशः पृथ्वी तथा समुद्र पर आधिपत्य था। रेप्टीलिया वर्ग के अध्ययन को हरपेटोलॉजी (Herpatology) कहते हैं।

रेप्टीलिया के लक्षण (Characteristics of Reptilia):-

– इस वर्ग के सभी प्राणियों का प्रमुख लक्षण रेंगना है। इनका शरीर पूर्ण रूप से शल्कों (Scales) से ढका रहता है।

– शल्क शृंगीय होते हैं और एपिडर्मिस के परिवर्तन से बनते हैं। इस वर्ग के प्राणियों की त्वचा सूखी होती है तथा उसमें ग्रन्थियाँ नहीं होती।

– असमतापी होते हैं अर्थात् वातावरण के अनुकूल इनका शारीरिक ताप घटता-बढ़ता रहता है। इसमें अपूर्ण चार वेश्मी हृदय होता है।

– ऐलैन्टोइस होता है जो भ्रूण को श्वसन तथा उत्सर्जन में सहायता देती है। रेप्टाइल्स में गिल नहीं होते, जिससे ये फेफड़ों से साँस लेते हैं।

– इस वर्ग का वर्गीकरण इनकी करोटि के टेम्पोरल भाग में टेम्पोरल छिद्र की अनुपस्थिति या उपस्थिति होने पर तथा इन छिद्रों की संख्या के आधार पर किया जाता है।

– इस वर्ग को पाँच उपवर्गों (Sub-class) में विभक्त किया गया है। इनमें तीन उपवर्गों के प्राणी लुप्त हो चुके हैं। यहाँ केवल जीवित जातियों युक्त उपवर्ग का ही वर्णन किया जा रहा है–

उपवर्ग-डाइऐप्सिडा (Subclass-Diapsida):-

– टेम्पोरल भाग में एक जोड़ी ऊपरी (Superior) तथा एक जोड़ी निचले (Inferior) टेम्पोरेल छिद्र (Temporal fossae) तथा पोस्ट आर्बिटल (Post orbital) तथा स्क्वेमोजल (Squamosal) के द्वारा ऊपरी तथा निचले टेम्पोरल छिद्र पृथक होते हैं।

– इस उप वर्ग को दो महागणों (Super order) में विभक्त किया जाता है–

– महागण लेपीडोसॉरिया (Super Order : Lepidosaria) – इसे दो गणों में विभक्त किया जाता है।

गण-रिन्कोसिफैलिया (Order-Rhynchocephalia):-

–  अधिकांश जातियाँ जीवाश्मों के रूप में मिलती हैं केवल स्फीनोडॉन पन्कटेटम (Sphenodon punctatum) जाति अभी भी जीवित है। शरीर छिपकली के आकार का लगभग 75 सेमी. लम्बा होता है। इसकी पूँछ पार्श्व सतह से चपटी होती है।

– पाँव पंचागुलिक व नखरयुक्त होते हैं। ये जलाशयों के पास भूमि में बिल बनाकर रहते हैं।

– कशेरुकाएँ उभयगर्ती (Amphicoelous) प्रकार की होती है।

– अवस्कर छिद्र अनुप्रस्थ (Transverse) होता है।

– उदाहरण – स्फीनोडॉन पन्क्टेटम। इसे ‘जीवित जीवाश्म’ (Living fossil) भी कहते हैं क्योंकि इसमें प्राचीन काल के जूरेसिक होमियोसॉर्स से समानताएँ पाई जाती हैं।

गण-स्क्वैमेटा (Order-Squamata):-

– इसमें साँप तथा छिपकली आते हैं। इनकी त्वचा शृंगीय शल्कों या प्लेटों से ढकी होती है।

– दाँत पार्श्वदन्ती (Pleurodont) प्रकार के होते हैं तथा पाद नखरयुक्त होते हैं। कशेरुकाएँ अग्रगर्ती (Procoelous) होती हैं। पसलियाँ एक सिर वाली होती हैं।

– गण-स्क्वैमेटा को दो उपगणों में वर्गीकृत किया गया है–

1. लैसर्टीलिया  

2. ऑफिडिया

1.  उपगण-लैसर्टीलिया (Suborder-Lacertilia):-

– इन जन्तुओं को साधारण भाषा में छिपकलियाँ (Lizards) कहते हैं।

– इन जन्तुओं में पाद तथा मेखलाएँ पूर्ण विकसित होती हैं। आँखों की पलकें गतिशील एवं आँखों पर निमेषक झिल्ली (Nictitating membrane) भी उपस्थित होती है।

– ऊपरी टेम्पोरल छिद्र उपस्थित होता है।

– कर्ण पटह (Tympanum) उपस्थित होता है।

– उदाहरण– हेमीडेक्टाइल्स : (साधारण छिपकली), हीलोडर्मा : (विषैली छिपकली), ड्रेको : (उड़न छिपकली), वेरेनस : (गौह) आदि।

2. उपगण-ऑफिडिया (Suborder-Ophidia):-

– इस उपगण के प्राणी साधारणतया सर्प कहलाते हैं।

– नेत्र, अचल एवं पारदर्शी झिल्ली द्वारा ढके रहते हैं। इनमें निमेषक पटल (Nictitating membrane) नहीं होती है।

– कर्ण छिद्र तथा कर्ण की पटह अनुपस्थित होते हैं।

– मेन्डीबल्स की अस्थियाँ लचीले स्नायु द्वारा जुड़ी रहती हैं इसीलिए मुख काफी चौड़ा हो सकता है तथा जिह्वा पतली, लम्बी तथा द्विशाखी (Bifid) है।

– उदाहरण – नाजा, वाइपर, हाइड्रोफिस, एरिक्स, क्रोटेलस, टिफ्लोस: अन्धा सर्प, अजगर : सबसे बड़ा सर्प इसमें पश्चपाद के अवशेष पाए जाते हैं तथा यह सर्प जहरीला नहीं होता है।

गण-क्रोकोडिलिया (Order-Crocodilia):-

–  सभी सदस्य जल स्थलचर होते हैं इस गण में मगरमच्छ, घड़ियाल आदि जन्तु रखे गए हैं।

– शरीर ठोस तथा भारी होता है तथा सिर बड़ा व लम्बा होता है। इनके दाँत गर्तदन्ती (Thecodont) होते हैं। इसकी पूँछ तथा पैर जल में तैरने में सहायक होते हैं।

– इनकी त्वचा मोटी, चमड़े के समान होती है जो अधिचर्मी शल्कों से ढकी रहती है।

– इनका हृदय चार-वेश्मी (Four chambered) होता है तथा दोनों निलय सेप्टम के द्वारा पूर्णतः अलग-अलग होते हैं।

– मादा रेत में गड्ढे बनाकर उसमें अण्डे देती है।

– उदाहरण– क्रोकोडिलस : मगरमच्छ, गेवियेलिस : घड़ियाल, एलिगेटर

उपवर्ग-ऐनेप्सिडा (Subclass-Anapsida):-

– करोटि की छत पूर्ण होती है तथा क्वाड्रेट, कर्ण अस्थि से जुड़ी रहती है।

– इस उपवर्ग में गण कॉटिलौसॉरिया (Order-Cotylosauria) के सभी सदस्य लुप्त तथा केवल एक गण किलोनिया (Order-Chelonia) के सदस्य जीवित हैं।

1. गण-किलोनिया (Order-Chelonia):-

– शरीर चौड़ा तथा अण्डाकार होता है।

– समस्त शरीर दृढ़ अस्थिल कवच से घिरा रहता है। इसका पृष्ठ भाग कैरापेस (Carapace) तथा अधर भाग प्लेस्ट्रोन (Plastron) कहलाता है।

– इस गण के जीवों के पाद मजबूत होते हैं। पादों पर नखर और तैरने के लिए झिल्ली या जाल (Web) होता है। ग्रीवा, पाद तथा पुच्छ पर शल्क पाए जाते हैं। इन तीनों अंगों को केरापेस के अन्दर खींच लिया जाता है।

– दाँत अनुपस्थित होते हैं लेकिन शृंगीय (Horny) चोंचनुमा जबड़े होते हैं। वक्ष की कशेरुकाएँ तथा पसलियाँ कवच से जुड़ी रहती है।

– अवस्कर लम्बवत् (Longitudinal) होता है।

– उदाहरण– किलोन–समुद्री कछुए, ट्रायोनिक्स – भारतीय स्वच्छ जलीय कछुए आदि।

वर्ग-पक्षी (AVES):-

– इसके वर्ग में गौरैया, तोता, आर्किओर्निस, कबूतर आदि आते हैं एवीज के लक्षण (Characteristics of Aves)

– समतापी (Homothermal) होते हैं।

– सभी प्राणियों का शरीर कोमल परों से ढका रहता है जो वास्तव में शल्कों तथा बालों की ही भाँति एपिडर्मल संपरिवर्तन होते हैं।

– टाँगे शल्कों से ढकी रहती हैं। स्तनधारियों की भाँति इनका भी हृदय चार वेश्मी होता है।

– शरीर का ताप स्तनधारियों की अपेक्षा अधिक होता है।

– पूँछ छोटी होती है और पूँछ वर्टिब्री मिलकर पाइगोस्टाइल (Pygostyle) बनाती हैं।

– दाँत नहीं होते, दाँतों की कमी चोंच पूरी करती है।

– पक्षियों में चार भ्रूणीय झिल्लियाँ (Embryonic membrane) होती हैं, जिन्हें एम्नियान, कोरिआन, योकसैक तथा एलैन्टाइस कहते हैं। वर्ग-एवीज को दो उपवर्गों में बाँटा गया है

1. उपवर्ग-निओर्निथीज (Subclass-Neornithes):-

– जबड़े चोंचयुक्त एवं दंतविहीन लेकिन विलुप्त जातियों में दाँत पाए जाते थे।

– इनकी अग्रपादों की अंगुलियाँ संयुक्त होती है जिन पर नखर अनुपस्थित होते हैं।

– इनका स्टर्नम काफी बड़ा तथा कील सहित होता है।

– इनकी वक्षीय पसलियाँ अंकुशी प्रवर्ध के साथ उपस्थित परन्तु उदरीय पसलियाँ अनुपस्थित।

– अन्तिम कशेरुकाएँ समेकित होकर पाइगोस्टाइल बनाती हैं।

– इस उपवर्ग को चार अधिगणों (Supcrorders) में बाँटा गया है–

(i) ओडोन्टोन्गेथी विलुप्त दाँतयुक्त पक्षी क्रिटेशियस (Creataccous) काल में पाए जाते थे। इनमें पाइगोस्टाइल नहीं पाया जाता था। उदाहरण – हेसपेरार्निस।

(ii)  केरिनेटी (Carinatae):-

– इसमें आधुनिक तथा दन्तविहीन उड़ने वाले पक्षी आते हैं। पाइगोस्टाइल उपस्थित तथा पुच्छ में केवल 5 या 6 स्वतंत्र कशेरुकाएँ उपस्थित।

– पंख अधिकांश में विकसित होते हैं लेकिन कुछ में अवशेषी होते हैं।

– करोटि की अस्थियों के सीवन (Suture) प्रारम्भिक अवस्था में लुप्त हो जाते हैं।

– उदाहरण – सिटेकुला-तोता, सिग्नस-हंस, पेसर डोमेस्टीकस-घरेलू चिड़िया, कार्वस स्प्लैन्डेंस-कौआ, बुबो बुबो-उल्लू है।

(iii) रेटाइटी (Ratitae):-

– इनमें दौड़ने की क्षमता तो होती है लेकिन पंखों का विकास कम होने की वजह से उड़ने का सामर्थ्य नहीं होता है।

– पुच्छीय कशेरुकाएँ अलग-अलग होती है।

– ध्वनि यंत्र (syrin voice Theox) अनुपस्थित होता है।

– उदाहरण – ऑस्ट्रिच (Ostrich)  – शुतुरमुर्ग, केसोवरी (Casovarics), ऐप्टेरिक्स-कीवी (Aptcryx-Kiwi) आदि।

(iv) इम्पेनी (Super order-Impeymac):-

– जलीय पक्षी होते हैं। अग्रपाद चापूओं (Tippers) में रूपान्तरित हो जाते हैं एवं पाद जालयुक्त (Weblocal) होते हैं। उदाहरण – पेंग्विन (Panguin)

2. उपवर्ग-आर्किओर्निथीज (Subclass-Archaeornithes):-

– इसमें जुरैसिक काल के आदिम ‘छिपकली सदृश’ पक्षी आते हैं। इन पक्षियों में परयुक्त पूँछ पाई जाती थी तथा दोनों जबड़ों में दाँत सोकेट्स में स्थित होते थे।

– ये रेप्टाइल्स तथा पक्षियों के बीच की योजक कड़ी कहलाते हैं।

उदाहरण– आर्किऑप्टेरिक्स : ये सरीसृप समान पक्षी दन्तयुक्त एवं लम्बी पूँछ वाले थे।

वर्ग– मेमेलिया:-

– मेमेलिया वर्ग में सभी स्तनधारी प्राणियों को सम्मिलित किया जाता है।

– सीनोजोइक काल को “स्तनधारी काल” (Age of Mammals) कहा जाता है तथा स्तनधारियों के अध्ययन को मैमोलॉजी (Mammology) कहते हैं।

वर्ग मेमेलिया के मुख्य लक्षण:-

– इनकी त्वचा शुष्क, मोटी एवं जलरोधी एवं तेल ग्रन्थियाँ युक्त होती हैं। बाह्य कर्ण पाया जाता है।

– इनमें स्तन ग्रन्थियाँ होती हैं जो शिशु के पोषण में सहायता करती हैं।

– ये नियततापी (Homiothermal) होते हैं।

– इनका कपाल द्विकन्दकीय (Dicondylic) होता है। इनमें निचले जबड़े का निर्माण केवल डेन्टरी अस्थि से होता है।

– ये चतुष्पादी होते हैं परन्तु सिटेशिया (Cetacea), व्हेल व साइरेनिया समुद्री गाय में पाद अनुपस्थित होते हैं।

– इनमें वक्ष व उदर के मध्य पेशीय तनुपट (Diephragam) पाया जाता है।

– इनकी RBC केन्द्रक रहित, उभयावतल व गोलाकार होती है।

– इनका मस्तिष्क सुविकसित, प्रमस्तिष्क गोलाकार (Cerebral hemisphere) बड़े होते हैं।

– दृष्टि पिण्ड (Optic lobes) चार होते हैं जो कॉरपोरा क्वाड्रिजेमिना (Corpora quadrigemina) कहलाते हैं।

– इनमें दाँत गर्तदन्ती (Thecodont), विषमदन्ती (Heterodont) एवं द्विबारदन्ती (Diphyodont) होते हैं। टिम्पैनिक अस्थियाँ टिम्पैनिक बुल्ला बनाती हैं।

– इनके हृदय में चार वेश्म (T our chambered) पाए जाते हैं।

– इनमें मूत्राशय पाया जाता है। मूत्र तरल होता है। उत्सर्जन के आधार पर यूरियोटैलिक जन्तु है।

– इनके वृषण वृषणकोण में पाए जाते हैं जो देह से बाहर होते हैं।

– जन्तु एकलिंगी होते हैं। नर मैथून अंग शिश्न पेशीय तन्तुओं से बना होता है। इसका शीर्ष भाग (Glans penis) संवेदी होता है।

– इनके अण्डे गर्भाशय में परिवर्धित होते हैं। बाह्य भ्रूणीय झिल्लियाँ एम्नियोन, योक सेक, कोरियोन एवं एलेन्टोइस पाई जाती है जो अपरा (Placenta) बनाती हैं व शिशु का पोषण करती हैं।

– इनमें उच्च कोटि का पैतृक संरक्षण (Parental care) पाया जाता है।

– वर्ग मेमेलिया को दो उपवर्गों में वर्गीकृत किया गया है–

1. उपवर्ग-प्रोटोथीरिया (Sub class-Prototheria):-

– इनके लक्षण (Characteristics of Prototheria)

– आदिम (Primitive) प्रकार के अण्डे देने वाले (Oviparous) स्तनधारी हैं।

– अण्डे अतिपीतकी (Polyecithal) एवं कवच युक्त (Shelled) होते हैं। इनकी स्तन ग्रन्थियों (Mammary glands) में चूचुकों (Nipples) का अभाव होता है।

– इनमें कर्णपल्लव (Earpinna) अनुपस्थित होता है। अन्तःकर्ण कोकलिया (Cochela) कम कुण्डलित होता है।

– मस्तिष्क में कॉर्पस केलोसम (Corpus callosum) नहीं होता है।

– आंशिक समतापी (Partially Honothermal) होते हैं। ये शरीर के ताप को आंशिक रूप में स्थिर रख पाते हैं।

– इसके सदस्य ऑस्ट्रेलिया (Australia), तस्मानिया (Tasmania) व न्यूगुइना (Newguinea) में पाए जाते हैं।

– इसमें एक ही गण (Order) आता है जिसे मोनोट्रिमेटा (Monotremata) कहते हैं।

उदाहरण:-

(i) टैकीग्लोसस तथा इकीडना। इसे कंटकीय चींटीखोर (Spiny Anteater) भी कहते हैं।

(ii) आर्निथोरिकस या डक बिल्ड प्लेटीपस।

2. उपवर्ग-थीरिया के लक्षण (Characteristics of Theria) :-

– इस प्रकार के स्तनधारी जरायुज (Viviparous) होते हैं, जो शिशुओं को जन्म देते हैं।

– कर्ण पल्लव (Pinna) उपस्थित होता है।

– ये समतापी (Homothermal) होते हैं।

– इनके गुदा (Anus) व मूत्रोजनन छिद्र (Urinogenital) अलग-अलग होते हैं।

– इनका भ्रूण (Embryo) प्लैसेन्टा द्वारा गर्भाशय की भित्ति से जुड़ा रहता है। थीरिया को दो अधोवर्गों में बाँटा गया है–

(a) मैटाथीरिया (Infraclass-Metatheria):-

– इनके शिशु अपरिपक्व अवस्था में पैदा होते हैं। इनका शेष परिवर्धन मादा के उदर पर स्थित मार्सूपियम में पूर्ण होता है तथा स्तनग्रन्थियों में चूचुक (Nipples) होते हैं। ये भी मार्क्सपियम (शिशुधानी) के अन्दर स्थित होते हैं।

– एकबारदन्ती (Monophyodont) होते हैं।

– मार्क्सपियल अस्थि पाई जाती है।

– योक सेक (Yolk Sac) प्लैसेन्टा पाया जाता है। इस अधोवर्ग में सिर्फ एक गण मार्क्सपियेलिया होता है। इसके लक्षण मेटाथीरिया के समान ही हैं। उदाहरण – मेक्रोपस (कंगारू), ओपोसम (डाइडेलिफिस)।

(b) यूथीरिया (Infra class-Eutheria):-

– भ्रूण मादा के गर्भाशय में वास्तविक प्लैसेन्टा एलेन्टॉइक प्लैसेन्टा से पोषण प्राप्त करते हैं।

– इनमें मार्क्सपियम तथा एपीप्यूबिक अस्थि अनुपस्थित होती है।

– इनमें अवस्कर (Cloaca) का अभाव, गुदा उपस्थित होती है।

– गर्भाशय एवं योनि केवल एक-एक पाई जाती है।

जन्तु ऊतक

– एक ऊतक को निम्नानुसार परिभाषित किया जा सकता है -“एक अथवा अनेक प्रकार की कोशिकाएँ जिनकी उत्पत्ति समान होती है तथा जो किसी विशिष्ट कार्य (कार्यों) के लिए विशिष्टीकृत (specialized) होती हैं, का समूह (अंतरकोशिकीय पदार्थ सहित) ऊतक कहलाता है।” ऊतकों के अध्ययन से संबंधित जीव-विज्ञान की शाखा औतिकी (Histology) कहलाती है।

– कोशिका की संरचना उसके कार्य के अनुसार बदलती रहती है। इस प्रकार ऊतक भिन्न-भिन्न होते हैं और उन्हें मोटे तौर पर निम्नलिखित से चार प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है–

1. उपकला ऊतक   

2. संयोजी ऊतक

3. पेशी ऊतक  

4. तंत्रिका ऊतक

– एक एपीथीलियम (उपकला ऊतक), कोशिकाओं की एक या अधिक परतों (layers) से निर्मित ऊतक होता है; जो शरीर-सतह को आवृत (Covered) करता है और इसकी विभिन्न गुहाओं (Cavities) को आस्तरित (Lined) करता है।

– यह सुरक्षा, स्त्रावण व उत्सर्जन का कार्य करता है।

– यह ऊतक त्वचा तथा अंगों की बाह्य सतहों पर पाया जाता है।

– एपीथीलियम विभिन्न गुहाओं (Cavities) मार्गों (Tracts) व वाहिकाओं के आस्तरों (Linings) का निर्माण करता है।

– जन्तु जगत में सर्वप्रथम उद्विकसित (Evolved) होने वाला ऊतक ‘उपकला ऊतक’ ही है। इसकी उत्पत्ति तीनों प्राथमिक जनन स्तरों (Primary germ layers) से होती है।

संरचना:-

– उपकला ऊतक की कोशिकाएँ एक या अनेक स्तरों में सघन रूप से (Compactly) व्यवस्थित रहती हैं और उनके मध्य अंतरकोशिकीय मैट्रिक्स नहीं पाया जाता है।

– समीपस्थ कोशिकाएँ अंतरकोशिकीय संयोजी रचनाओं (Intercellular junctional complex) द्वारा परस्पर संयोजित रहती हैं। जैसे – डेस्मोसोम्स, टाइटजंक्शन्स, इण्टरडिजिटेशन्स आदि।

– सबसे निचले स्तर की कोशिकाएँ सदैव एक अजीवित आधारीय झिल्ली (Basal laminaor Basement membrane) पर स्थित रहती है। आधारीय झिल्ली, उपकला ऊतक की कोशिकीय उत्पादों द्वारा निर्मित नहीं होती है।

– यह म्युकोपॉलीसैकेराइड्स, ग्लाइकोप्रोटीन्स तथा कोलेजन (रेटिकुलर) तन्तुओं से बनी होती हैं।

– उपकला ऊतक में रक्त वाहिनियाँ अनुपस्थित रहती हैं परन्तु तंत्रिकीय सिरे उपकला में अन्दर प्रवेश करते हैं इसमें पुनरुद्भवन (समसूत्री विभाजन द्वारा) की उच्च क्षमता पाई जाती है।

– समीपस्थ उपकला कोशिकाओं को परस्पर संयोजित रखने हेतु इनकी प्लाज्मा झिल्ली में निम्नलिखित प्रकार की संयोजक संरचनाएँ पाई जाती हैं।

– संयोजी ऊतक को तीन प्रकारों में विभक्त किया गया है–

(i) लचीले संयोजी ऊतक

(ii) सघन संयोजी ऊतक

(iii) विशिष्टीकृत संयोजी ऊतक

– डेस्मोसोम्स:- उपकला ऊतक में डेस्मोसोम्स भी पाए जाते हैं। प्रत्येक कोशिका की प्लाज्मा झिल्ली से निकलने वाले दोनों फाइब्रिल्स व स्थुलित क्षेत्र (Thickened area) मिलकर डेस्मोसोम्स बनाते हैं। मैक्युलाएडहेरेन्स एक प्रकार का डेस्मोसोम है। उदाहरण – वेजाइना, मूत्राशय।

– गैप जंक्शन्स:- अनेक स्थानों पर निकटवर्ती कोशिकाएँ आयन-प्रचुर (Ion rich) ‘गैप जंकशन’ का निर्माण करती हैं, जो अंतरकोशिकीय संवहन (Intercellular communication) तथा रासायनिक विनिमय सम्पन्न करते हैं। ये जंक्शन्स संभवत: भौतिक या यांत्रिक सहारा (Physical support) प्रदान नहीं करते हैं।

– टाइट जंक्शन्स या जोना ऑक्ल्यूडेन्स:- निकटवर्ती कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्लियाँ कुछ निश्चित स्थानों पर दृढ़तः संकुलित (Tightly packed) या परस्पर संलयित (Fused) रहती हैं। उदाहरण – मस्तिष्क।

– इन्टरडिजिटेशन्स – ये समीपस्थ कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्ली के अंगुली-सदृश अंतरसंग्रंथित (Interwoven) प्रवर्ध है।

– अंतरकोशिकीय सेतु – ये समीपस्थ कोशिका झिल्लियों से निकलने वाले सूक्ष्म उभार (Minute projections) हैं। अंतरकोशिकीय सेतु एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं।

– माइक्रोविलाई:- यह एक सरल तथा सूक्ष्म सायटोप्लाज्मिक उभार है जो कोशिका की मुक्त सतह से उत्पन्न होते हैं तथा पदार्थ का अवशोषण करते हैं। उदाहरण – आन्त्र।

– स्टीरियोसीलिया:- यह गतिहीन सायटोप्लाज्मिक उभार है। उदाहरण – अधिवृषण, शुक्रवाहिनी।

– काइनोसीलिया:- यह संकुचनशील, गतिशील तन्तुमय उभार है जो बेसल ग्रेन्यूल्स से उत्पन्न होता है। उदाहरण- अण्डवाहिनी, फैलोपियन नलिका।

कार्य:-

– उपकला ऊतक शरीर में विस्तृत रूप से वितरित रहते हैं और अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं, जो निम्नलिखित हैं-

– सामान्य सुरक्षा, झिल्लीकृत एपीथीलियम का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है, त्वचा का अपेक्षाकृत कठोर व अपारगम्य एपीथीलियल आवरण शरीर को यांत्रिक व रासायनिक आघातों एवं आक्रमणकारी जीवाणुओं व अन्य रोगजनक सूक्ष्मजीवों से सुरक्षित रखता है।

– त्वचा, नाक, नेत्र व कान में विशिष्टीकृत उपकला-संरचनाएँ (Specialized epithelial structures) पाई जाती हैं, जो संवेदना संबंधी कार्य करती हैं।

– ग्रंथिल उपकला ऊतक स्त्रावी क्रियाओं के लिए अनुकूलित होता है। यह हॉर्मोन्स, म्यूकस, पाचक रसों व पसीने का स्त्रावण करता है।

– आहारनाल एवं श्वसन मार्ग का उपकला आस्तर (Epithelial lining) आँत्र की गुहा से पोषक पदार्थों का अवशोषण सुगम बनाता है।

– वृक्क नलिकाओं का विशिष्ट उपकला आस्तर, उत्सर्जन व सांद्रण (मूत्र में उत्सर्जी पदार्थों का) का कार्य करता है।

– विभिन्न अंगों के आस्तर (Lining) में उपस्थित सीलिएटेड (पक्ष्माभिकीय) उपकला ऊतक द्रवों, म्यूकस व अन्य पदार्थों की गति (संवहन) में सहायता करता है।

– शुक्रजनन नलिकाओं व अण्डाशयों की जनन-एपीथीलियम क्रमशः शुक्राणुओं व अण्डाणुओं का निर्माण करती है।

– एपीथीलियम की शीघ्र पुनरुद्भवन की क्षमता के कारण घाव शीघ्रतापूर्वक ठीक (Heal) हो जाते हैं।

– रेटिना की रंजक युक्त एपीथीलियम नेत्र-गोलक की गुहा को गहरा रंग प्रदान (Darken) करती है।

उपकला ऊतकों के प्रकार:-

– उपकला ऊतकों का प्रकार मुख्यतः उनकी स्थिति व कार्यों पर आधारित है –

– सरल उपकला एक ही स्तर का बना होता है तथा यह देहगुहाओं, वाहिनियों, और नलिका का आस्तर है। संयुक्त उपकला कोशिकाओं की दो या दो से अधिक स्तरों की बनी होती है और इसका कार्य रक्षात्मक है जैसे कि हमारी त्वचा।

– सरल उपकला ऊतक (Simple epithelium) – इसकी संरचना सरल होती है और इसका निर्माण कोशिकाओं की एकल परत (Simple layer) से होता है।

(i)  सरल शल्की उपकला ऊतक (Simple squamous epithelium):-

– यह चपटी, शल्कनुमा (Scale like) कोशिकाओं की केवल एक परत से निर्मित होता है।

– ये कोशिकाएँ प्राय: बहुभुजीय (Polygonal) होती हैं तथा मोजाइक की टाइलों की भाँति परस्पर सटी रहती हैं।

– यह पेवमेन्ट एपीथीलियम भी कहलाती है। यह एपीथीलियम रक्त वाहिनियों की आंतरिक सतह, लसीका वाहिनियों, हृदयावरण, पेरिटोनियम, प्लूरा, बोमैन कैप्सूल, हेनले लूप के पतले खण्डों व फेफड़ों की एल्वियोलाई में पाई जाती हैं।

(ii)  सरल घनाकार उपकला ऊतक (Simple cuboidal epithelium):-

– यह ऊतक घनाकार कोशिकाओं की एक परत से निर्मित होता है।

– जो आधारीय झिल्ली (Basement membrane) पर स्थित रहती है।

– केन्द्रक कोशिकाओं के केन्द्र में स्थित रहते हैं।

– घनाकार उपकला ऊतक सूक्ष्म पैंक्रियाटिक डक्ट व सैलाइवरी वाहिनियों, थायरॉइड वेसीकल्स, कला लैबिरिन्थ के भागों, समीपस्थ कुण्डलित नलिका, दूरस्थ कुण्डलित नलिका, अण्डाशयों, वृषणों की शुक्रजनन नलिकाओं, सीलियरी बॉडी, कोरॉइड, नेत्र की आइरिस, पतले ब्रोकिंयोल्स व स्तनी त्वचा की स्वेद ग्रंथियों में पाया जाता है।

(iii)  सरल स्तम्भाकार उपकला ऊतक (Simple columnar epithelium):-

– यह कोशिकाओं की एकल परत से निर्मित होता है।

– इन कोशिकाओं में अनेक रूपांतरित संरचनाएँ पाई जाती हैं।

– इनमें से तीन सामान्य रूपांतरण गॉब्लेट, सीलिया व माइक्रोविलाई हैं।

– सरल स्तम्भाकार उपकला ऊतक आमाशय व आँत्र में पाया जाता है। उदाहरण- पित्ताशय की आंतरिक सतह तथा पित्त-वाहिनी (Bile duct) यह गैस्टिक ग्रंथियों, आँत्रीय ग्रंथियों, पैंक्रियाज की पालियों (Lobules) में भी पाया जाता है।

(iv)  सरल पक्ष्माभिकीय उपकला ऊतक (Simple ciliated epithelium)– इसमें अनेक कोमल, रोम सदृश, बाह्य वृद्धि पाई जाती है, जिन्हें ‘पक्ष्म’ (Cilia) कहते हैं। इनकी उत्पत्ति आधारीय कणिका से होती है और ये एक धारा (Current) उत्पन्न करके पदार्थों के परिवहन में सहायता करते हैं। पक्ष्माभिकीय उपकला ऊतक दो प्रकार की होती हैं–

(a) पक्ष्माभिकीय स्तंभाकार उपकला ऊतक (Ciliated columnar epithelium):- यह श्वसन मार्ग (ब्रोन्काई का नीचे वाला भाग), फैलोपियन नलिकाओं (अण्ड वाहिनियों), मस्तिष्क की गुहाओं (एपेण्डायमा), मेरुरज्जु की केन्द्रीय नाल (Central canal), टिम्पैनिक गुहा को आस्तरित (Lined) करती है।

(b) पक्ष्माभिकीय स्तंभाकार उपकला ऊतक (Ciliated cuboidal epithelium):-  यह वृक्कों के नेफ्रॉन्स के कुछ भागों में पाई जाती है।

(v)  कूटस्तरित घनाकार उपकला ऊतक (Pseudostratified epithelium):-

 यह सदैव, अनियमिताकार स्तंभाकार कोशिकाओं की एकल (Single) परत से निर्मित होता है, जो आधारीय झिल्ली को स्पर्श करती रहती है।

– लम्बी कोशिकाओं के केन्द्रक अण्डाकार होते हैं।

– छोटी कोशिकाओं के केन्द्रक गोल होते हैं। यद्यपि एपीथीलियम एक कोशिका मोटी होती है परन्तु इसे देखने पर स्तरित एपीथीलियम का आभास होता है। अतः इसे कूट स्तरीय (Pseudostratified) एपीथीलियम कहते हैं।

– इसमें अनेक म्यूकस स्त्रावी गॉब्लेट कोशिकाएँ पाई जाती हैं तथा सीलिया भी उपस्थित रहते हैं। यह तीन प्रकार की होती है–

(a) कूटस्तरीय स्तंभाकार पक्ष्माभिकीय उपकला ऊतक (Pseudostratified columnar ciliated epithelium):- यह ट्रैकिया व ऊपरी ब्रोंकाई की आंतरिक सतह तथा नासाग्रसनी व यूस्टेकियन नलिका में पाया जाता है।

(b) कूटस्तरित स्तंभाकार उपकला ऊतक (Pseudostratified columnar epithelium):- यह ऊतक नर मनुष्य की यूरेथ्रा के कुछ खण्डों, पेरोटिड लार ग्रंथि, वासा डिफरेंशिया व एपीडिडायमिस में पाया जाता है।

(c) स्तरित शल्की उपकला (Stratified squamous epithelium):- कोशिका में सबसे आंतरिक परत अण्डाकार केन्द्रक युक्त स्तम्भाकार ऊतक की बनी होती है। यह जननीय परत कहलाती है। इस परत की कोशिकाएँ समसूत्री विभाजन द्वारा नई कोशिका का निर्माण करती है।

– संयुक्त उपकला ऊतक (Compound epithelium):- इसकी संरचना जटिल होती है और मूलतः इसका निर्माण कोशिकाओं की दो या दो से अधिक परतों द्वारा होता है।

ग्रंथियाँ (Glands):-

– ग्रंथिल एपीथीलियम स्त्रावी कार्यों (Secretory activities) के लिए विशिष्टीकृत होता है।

– एक कोशिका, ऊतक या अंग जो किसी उपयोगी रासायनिक पदार्थ का स्त्रावण करती है, ग्रंथि (Gland) कहलाती है।

– ग्रंथियाँ घनाकार एपीथीलियल कोशिकाओं (अधिक स्त्रावी) से निर्मित होती हैं।

– सभी ग्रंथियाँ एपीथीलियम के वलनों (Folds) के रूप में उत्पन्न होती हैं।

– ग्रंथि कोशिकाओं में गॉल्जीकाय बड़ी व अधिक स्त्रावी (More secretory) होती है।

– शरीर की अधिकांश ग्रंथियाँ मीरोक्राइन (Merocrine) प्रकार की होती हैं।

– इनकी उत्पत्ति तीनों जनन-स्तरों (एक्टोडर्म, मीजोडर्म व एण्डोडर्म) से होती है।

– यकृत शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है, जो ग्रंथिल उपकला ऊतक द्वारा आस्तरित (Lined) रहती है।

ग्रंथियों के प्रकार (Types of Glands):-

– एककोशिकीय ग्रंथियाँ (Unicellular gland):- ये ग्रंथियाँ गॉब्लेट कोशिकाओं या चेलिस कोशिकाओं (Chalice cells) से निर्मित होती हैं। ये आँत्र व आमाशय की म्यूकोसा में पाई जाती हैं और म्यूकस का स्त्रावण करती हैं। म्यूकस भोजन को चिकना बनाकर पेरिस्टाल्सिस गति को सुगम बनाता है। इन ग्रंथियों का जीवनकाल 2-3 दिन का होता है।

– बहुकोशिकीय ग्रंथियाँ (Multicellular gland):- ये ग्रथियाँ अनेक कोशिकाओं से निर्मित होती हैं और अधोस्थित (Underlying) संयोजी ऊतक में स्थित होती हैं। जैसे – जठरीय (Gastric) व आँत्रीय (Intestinal) ग्रंथियाँ।

– बहिःस्त्रावी ग्रंथियाँ (Exocrine gland):- ये ग्रंथियाँ अपने स्त्रावी उत्पादों को नलिकाओं (Ducts) में डालती हैं। इन्हें नलिका युक्त (Ducted) या बाह्य स्त्रावणकारी ग्रंथियाँ (Ducts of external secretion) भी कहते हैं। जैसे – लार ग्रंथियाँ, स्तन ग्रंथियाँ व अश्रु ग्रंथियाँ।

– अंतःस्त्रावी ग्रंथियाँ (Endocrine gland):- इन्हें प्रायः नलिका विहीन ग्रंथियाँ (Ductless glands) भी कहते हैं क्योंकि ये अपने स्त्रावी उत्पादों को सीधे रक्त में पहुँचाती हैं। जैसे – पिट्यूटरी ग्रंथि, थायरॉइड, पैराथायरॉइड व एड्रीनल ग्रंथि।

– हेटेरोक्राइन ग्रंथियाँ (Heterocrine gland):- ये अंशतः एण्डोक्राइन विधि से तथा अंशतः एक्सोक्राइन विधि से स्त्राव करती हैं। जैसे – अग्न्याशय (Pancreas)

स्रावण की विधि के आधार पर ग्रंथियों का वर्गीकरण:-

– एपोक्राइन ग्रंथियाँ (Apocrine gland):- इनके स्त्रावी उत्पाद कोशिका के शीर्ष के निकट एकत्र हो जाते हैं और यह फूला हुआ (distended) शीर्ष अलग होकर एक वाहिनी में मुक्त हो जाता है। इस क्रिया में कुछ कोशिकाद्रव्य निकल जाता है और कोशिका को भी क्षति पहुँचती है। जैसे – स्तन ग्रंथियाँ (रूपांतरित स्वेद ग्रंथियाँ)

– होलोक्राइन ग्रंथियाँ (Holocrine gland):- इनके स्त्रावी उत्पाद कोशिका के अन्दर एकत्र होते हैं और कोशिका फटकर उन्हें मुक्त करती है। ये कोशिकाएँ स्वयं नष्ट होकर अपने कार्य को पूर्ण करती हैं। जैसे – सिबेशियस ग्रंथियाँ (शशक की सिबेशियस ग्रंथियाँ त्वचा की डर्मिस में पाई जाती हैं) पीनियलकाय व थाइमस को भी होलोक्राइन ग्रंथियाँ माना जाता है।

– मीरोक्राइन ग्रंथियाँ (Merocrine gland):- मीरोक्राइन ग्रंथियों (एक्राइन या एपिक्राइन ग्रंथियों) की कोशिकाएँ अपने स्त्रावी उत्पादों को प्लाज्मा झिल्ली के द्वारा मुक्त करती हैं। इस क्रिया में प्लाज्मा झिल्ली को कोई हानि नहीं होती और न ही कोशिकाद्रव्य बाहर निकलता है। जैसे – स्वेद ग्रंथियाँ, कोरूकीय अग्नाशय का एक्सोक्राइन भाग, लार ग्रंथियाँ व आँत्रीय ग्रंथियाँ आदि।

उत्पाद की प्रकृति के आधार पर ग्रंथियों का वर्गीकरण:-

– म्यूकस ग्रंथियाँ (Mucous gland):- ये स्लाइमी म्यूकस का स्त्रावण करती हैं। जैसे – गॉब्लेट कोशिकाएँ, पैलेटाइन ग्रंथियाँ, गर्भाशय की ग्रंथियाँ, कुछ गैस्ट्रिक ग्रंथियाँ, कोलन की ग्रंथियाँ।

– सीरस ग्रंथियाँ (Serous gland):- ये जल के सदृश स्त्राव (Watery secretion) उत्पन्न करती हैं। जैसे – अग्न्याशय, पैरोटिड, लार ग्रंथियाँ, स्वेद ग्रंथियाँ, आँत्रीय ग्रंथियाँ।

 सीरोम्यूकस ग्रंथियाँ (Seromucous gland):- ये मिश्रित द्रव (Mixed liquid) का स्त्रावण करती हैं। जैसे – अधिकांश गैस्ट्रिक ग्रंथियाँ, सबलिंगुअल व सबमैक्सीलरी लार ग्रंथियाँ, अग्न्याशय।

– सायटोजेनिक ग्रंथियाँ (Cytogenic gland):- ये कोशिकाओं का निर्माण करती हैं। जैसे – वृषण व अण्डाशय।

संयोजी ऊतक:-

– जटिल प्राणियों के शरीर में संयोजी ऊतक बहुतायत एवं विस्तृत रूप से फैला हुआ पाया जाता है।

– संयोजी ऊतक नाम शरीर के अन्य ऊतकों एवं अंग को एक-दूसरे से जोड़ने तथा आलंबन के आधार पर दिया गया है।

– संयोजी ऊतक में कोमल ऊतक से लेकर विशेष प्रकार के ऊतक जैसे – उपास्थि, अस्थि, वसीय ऊतक तथा रक्त सम्मिलित हैं।

– रक्त को छोड़कर सभी संयोजी ऊतकों में कोशिका संरचनात्मक प्रोटीन का तंतु स्त्रावित करती हैं, जिसे कोलेजन या इलास्टिन कहते हैं।

– ये ऊतक को शक्ति, प्रत्यास्थता एवं लचीलापन प्रदान करते हैं।

– ये कोशिका रूपांतरित पॉलिसैकेराइड भी स्त्रावित करती है, जो कोशिका और तंतु के बीच में जमा होकर अधात्री का कार्य करता है।

– सारे संयोजी ऊतक शरीर में मीजोडर्म (mesoderm) से बनते हैं।

संरचना (Structure):-

– संयोजी ऊतक की कोशिकाओं के मध्य बड़े-बड़े अंतरकोशिकीय अवकाश पाए जाते हैं, जिनमें बाह्यकोशिकीय द्रव्य (मैट्रिक्स) भरा रहता है। मैट्रिक्स का निर्माण अविलेय (Insoluble) प्रोटीन फाइबर्स तथा अमूर्त (Amorphous) व पारभासी (Transparent) आधारीय पदार्थ (Ground substance) से होता है जिसे मैट्रिक्स कहते हैं। किसी जन्तु-शरीर की वयता (Ageing) का संबंध उसके संयोजी ऊतकों की अपह्वासिता से होता है।

कार्य (Functions):-

– अंगों में विभिन्न ऊतकों को परस्पर संयोजित रखना, संयोजी ऊतक का प्रमुख कार्य है।

– कुछ संयोजी ऊतक (जैसे- एडीपोज ऊतक) वसा का संचय करते हैं।

– कंकालीय संयोजी ऊतक (अस्थियाँ व उपास्थियाँ) शरीर को सहारा देने वाला कंकालीय ढाँचा बनाते हैं।

– तरल संयोजी ऊतक (रक्त व लसीका) शरीर में विभिन्न पदार्थों का परिवहन करते हैं।

– प्लाज्मा की कोशिकाएँ एण्टीबॉडीज का निर्माण करती हैं। जैसे- मैक्रोफेजेज। लिम्फोसाइट्स हानिप्रद जीवाणुओं, विजातीय पदार्थों व कोशिकीय अवशिष्टों को अंतर्गृहीत करके शरीर की सुरक्षा करती हैं।

– संयोजी ऊतक का जैलीनुमा आधारीय पदार्थ, नेत्र-गोलकों, वृक्कों आदि अंगों के चारों ओर आघात अवशोषक (Shock-absorber) की भाँति कार्य करता है।

– अस्थिमज्जा (Bone-marrow) रक्त कणिकाओं का निर्माण करती है।

– एरियोलर ऊतक विभिन्न अंगों में पैकिंग या संकुलक पदार्थ का कार्य करता है।

– संयोजी ऊतक के कोलेजन तंतु क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत में सहयोग करते हैं।

संयोजी ऊतकों के प्रकार:-

– संयोजी ऊतक को तीन प्रकारों में विभक्त किया गया है–

1. लचीले संयोजी ऊतक (Loose connective tissue):-

(i) एरियोलर ऊतक

(ii) एडीपोज या वसामय ऊतक

2.  सघन संयोजी ऊतक (Dense connective tissue):-

(i) टेण्डन्स तथा लिगामेण्ट्स

3.  विशिष्टीकृत संयोजी ऊतक (Specialised connective tissue):-

(i) अवकाशी ऊतक (Areolar Tissue):- चिपचिपा मैट्रिक्स पाया जाता है, जिसमें अनेक प्रकार की कोशिकाएँ व फाइबर्स उपस्थित रहते हैं। इसके द्वारा संयोजित रचनाएँ (पेशियाँ एवं उनके घटक) गति करने में सक्षम रहती हैं। एरियोलर ऊतक विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं व तंतुओं से निर्मित होता है।

अवकाशी संयोजी ऊतक

(ii) एडीपोज या वसामय ऊतक:- यह अवकाशी (Areolar) ऊतक का रूपांतरण है, जो एडिपोसाइटस या विशिष्ट, वृहदाकार वसीय कोशिकाओं (त्वचा के नीचे स्थित) द्वारा निर्मित होता है। एडीपोज ऊतक मुख्यतः भोजन संचायक (Food reserves) तथा वसा-डिपो (वसा के संचय तथा वसा चयापचय हेतु) का कार्य करते हैं। इसके अलावा ये ऊष्मारोधक (Heat insulators) तथा दाब, खिंचाव व आघातों के अवशोषक का कार्य भी करते हैं। एडीपोसाइट्स दो प्रकार की होती हैं-

(a) यूनिलोक्यूलर एडिपोसाइट्स (श्वेत वसीय ऊतक):- यह शरीर की सामान्य वसा है, जिसमें एक बड़ी वसीय गोलिका (Fat globule) पाई जाती है। यह त्वचा के नीचे पाया जाता है और शरीर के तापमान का नियमन करता है। जैसे – अधः त्वचीय (Subcutaneous) वसा, पेनिकुलस एडिपोसस, व्हेल व हाथी का ब्लबर, ऊँट का कूबड़ (Hump) मेरिनो भेड़ की पूँछ, पीत अस्थिमज्जा, वृक्कों व रक्त वाहिनियों, मीसेण्ट्रीज, ओमेण्टा के परितः तथा मेंढक के वसीय-काय।

(b) मल्टीलोक्युलर एडिपोसाइट्स या भूरी वसा इसमें अनेक छोटी वसीय गोलिकाएँ पाई जाती हैं। इसमें माइटोकॉण्ड्रिया की संख्या अधिक होती है। यह भूरी वसा, ध्रुवीय भालुओं, पेंग्विन्स, सील, वालरस, नवजात शिशुओं तथा शीत निष्क्रिय स्तनियों (चूहों व अन्य रोडेण्ट्स) में पाई जाती है। इसके ऑक्सीकरण से साधारण वसा की अपेक्षा 20 गुनी अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

– श्वेत तन्तुमय ऊतक:- यह एरियोलर ऊतक का परिवर्तित रूप है। इसके मैट्रिक्स में केवल कॉलेजन तन्तु उपस्थित होते हैं। कोशिकाएँ मुख्यतः फाइब्रोब्लास्ट होती हैं। यह कपाल की अस्थियों के मध्य (संधियों को अचल बनाता है) तथा उच्च कशेरुकियों की डर्मिस में भी पाया जाता है। यह ऊतक दो प्रकार का होता है–

(i)  टेण्डन्स (Tendons):- टेण्डन्स एक अप्रत्यास्थ (Nonelastic) परन्तु मुड़ने योग्य (Flexible) ऊतक होता है। यह ऊतक कोलेजनी तंतुओं के समानान्तर समूहों से बना होता है, जिनके मध्य फाइबोब्लास्टस की पंक्तियाँ पाई जाती हैं। यह पेशियों को अस्थियों से जोड़ता है। यह ऊतक कॉर्डी-टेण्डिनी का निर्माण भी करता है।

(ii) शीथ (Sheath):- शीथ में श्वेत फाइबर्स के बण्डल्स ‘क्रिस-क्रॉस’ प्रक्रम में व्यवस्थित रहते हैं। फाइबोब्लास्टस पंक्तियों में व्यवस्थित न होकर एरियोली में बिखरी दशा में पाए जाते हैं। शीथ, विभिन्न रचनाओं के परितः रक्षात्मक आवरण बनाती हैं।

– पीत या पीला तन्तुमय ऊतक (Yellow fibrous tissue):- इसके मैट्रिक्स में असंख्य, पास-पास व्यवस्थित (Closely packed) पीले इलास्टिन तन्तु पाए जाते हैं। ये इलास्टिन तन्तु या संयोजी एरियोलर ऊतक के समान परन्तु उनसे अधिक मोटे (thicker) होते हैं। यह ऊतक प्रत्यास्थ (elastic) तथा प्रसारणीय (flexible) होता है। यह रक्त वाहिनियों की भित्ति, फेफड़ों, वास्तविक स्वर तंतुओं, ट्रैकिया, ब्रोकियोल्स तथा स्प्लीन (प्लीहा) के कैप्सूल का निर्माण करता है। यह लिगामेण्ट्स शीथ के निर्माण में भी भाग लेता है। लिगामेण्ट्स वस्तुतः रूपांतरित पीत तन्तुमय प्रत्यास्थ ऊतक होते हैं और अस्थि को अस्थि से जोड़ते हैं।

– रेटिकुलर या जालिकावत् ऊतक (Reticular tissue):- यह अवकाशी (Areolar) संयोजी ऊतक का एक रूपांतरण है। इसका मैट्रिक्स तरल प्रकृति का होता है। मैट्रिक्स में अनेक ताराकार रेटिकलर कोशिकाएँ पाई जाती हैं। प्रत्येक कोशिका से अनेक जीवद्रव्यी प्रवर्ध (Protoplasmic processes) निकलते हैं। रेटिकुलर ऊतक प्लीहा, थायमस, टॉन्सिल्स, लसीका ग्रंथियाँ, यकृत, अस्थि-मज्जा, आमाशय व आँत्र की म्यूकोसा की लेमिना प्रोप्रिया में पाया जाता है। रेटिकुलर कोशिकाएँ ‘फैगोसाइट्स की भाँति कार्य करके शरीर के सुरक्षा तंत्र (Defence system) के निर्माण में योगदान करती हैं।

– मायलॉइड या लघु ऊतक (Myeloid tissue):- यह जालिकावत ऊतक का एक रूपान्तरण है। इसका आधारीय पदार्थ प्लाज्मा होता है। इसमें जालिकावत तन्तुओं का गहन जाल पाया जाता है यह कोशिका में सक्रिय रूप से मायलोब्लास्ट रूप में होता है। यह लाल अस्थि मज्जा या हीमोपॉइटिक ऊतक एवं पीत अस्थि मज्जा के वसा संग्रह में पाया जाता है।

विशिष्टीकृत संयोजी ऊतक:-

– कंकालीय ऊतक (Skeletal tissue):- यह ऊतक मांसपेशियों के जुड़ने हेतु सतह तथा सहारा प्रदान करता है। कंकालीय संयोजी ऊतक शरीर का ढाँचा बनाता है और शरीर को दृढ़ता प्रदान करता है। कंकालीय ऊतक विभिन्न अंगों की रक्षा करता है तथा प्रचलन में सहायता करता है। यह ऊतक तीन प्रकार का होता है- उपास्थि, अस्थि, नोटोकॉर्ड।

(a)  उपास्थि (Cartilage):- उपास्थि एक ठोस, किंतु अर्धदृढ़ (Semirigid), प्रत्यास्थ (Flexible) व असंवहनीय (Nonvascular) संयोजी ऊतक है। इसकी कोशिकाएँ कॉण्ड्रिन के मैट्रिक्स में धँसी रहती हैं। काण्ड्रिन वस्तुतः उपास्थि में पाई जाने वाली विशिष्ट प्रोटीन है। इसकी परिकॉण्ड्रियम से उपास्थि का पुनरुद्भवन (Regeneration) हो सकता है। उपास्थि को उपापचयिक रूप से निष्क्रिय माना जाता है। बच्चों में उपास्थि कोशिकाएँ दो प्रकार की वृद्धि प्रदर्शित करती हैं–

– एपोजीशनल या पेरिकॉण्ड्रल या द्वितीयक वृद्धि:- यह वृद्धि मैट्रिक्स के एकत्रण तथा परिधीय कॉण्ड्रोजेनिक कोशिकाओं के विभाजन के कारण होती है। इस वृद्धि द्वारा उपास्थि की मोटाई बढ़ती है।

– अन्तः जनित या अंतराली वृद्धि:- यह वृद्धि मैट्रिक्स के एकत्रण तथा उपास्थि की आंतरिक कोशिकाओं के विभाजन के कारण होती है। इस वृद्धि द्वारा उपास्थि का आकार (Size) बढ़ता है।

– उपास्थि के प्रकार – उपास्थि निम्नलिखित प्रकार की होती है–

(a) कांचाभ या हायलाइन उपास्थि:-  यह सबसे आद्य (most primitive) व काँच के समान उपास्थि है। इसका मैट्रिक्स पारभासी, समांग, कॉण्ड्रिन युक्त, तथा मोती सदृश सफेद या नीले-हरे रंग का होता है। कांचाभ उपास्थि अंशतः प्रत्यास्थ होती है एवं इसे आर्टिकुलर कॉर्टिलेज भी कहते हैं क्योंकि यह संधियों की संयोजक सतह (Articular surface) का निर्माण करती है। कांचाभ उपास्थि, ट्रेकिया, लैरिंक्स, ब्रोंकाई, पादास्थियाँ (हायलिन कैंप कहलाती है) स्टर्नम, हायोड उपकरण, नासापट (Nasal septum), पसलियों (स्टर्नल भाग), तथा लैरिंक्स (क्रिकॉइड, थायरॉइड) में पाई जाती है।

(b) तन्तुमय या श्वेत रेशेदार उपास्थि:- इस उपास्थि में मैट्रिक्स की कम मात्रा पाई जाती है तथा इसमें मोटे, श्वेत कोलेजन फाइबर्स के अनेक बण्डल्स उपस्थित रहते हैं। अतः यह सबसे दृढ़ तथा कम प्रत्यास्थ (Less flexible) होती है। यह उपास्थि अंतर कशेरुक डिस्क्स (Intervertebral discs) में पाई जाती है और आघात-अवशोषक (Shock absorber) का कार्य करती है। यह प्यूबिक सिम्फाइसिस में भी पाई जाती है और प्रसव में सहायता करती है। शरीर के सक्रिय रहते समय इण्टरवर्टिबल डिस्क्स संकुचित रहती हैं परन्तु आराम के समय ये शिथिल (Relaxed) हो जाती है। इस कारण नींद के समय तथा मृत्यु के पश्चात् शरीर की लम्बाई में कुछ वृद्धि हो जाती है।

(c) प्रत्यास्थ या पीली प्रत्यास्थ उपास्थि:- इस उपास्थि के मैट्रिक्स में पीले प्रत्यास्थ तन्तु पाए जाते हैं, जो सभी दिशाओं में व्यवस्थित होकर एक जाल (Network) का निर्माण करते हैं। पीले फाइबर्स की उपस्थिति के कारण यह उपास्थि बहुत प्रसारणीय होती है। यह उपास्थि विभिन्न संरचनाओं को पुनर्कुण्डलन सामर्थ्य (Recoiling power) प्रदान करती है। यह उपास्थि स्तनियों के बाह्य कर्ण (Pinna), फेरिंगो-टिम्पैनिक नलिका, एपिग्लॉटिस तथा कुछ लैरिजियल व ब्रोकियोलर उपास्थियों में पाई जाती है।

(dकैल्सीभूत उपास्थि (Calcified cartilage):- यह रूपांतरित हायलाइन उपास्थि है। मैट्रिक्स में कैल्सियम लवणों के हाइड्रोक्सी एपेटाइट के एकत्रण के कारण यह कठोर व अप्रत्यास्थ होती है यह उपास्थि प्रौढ़ मेंढक की प्यूबिस, सुप्रा स्केपुला व क्वाड्रेट उपास्थि में, शार्क की कशेरुकाओं में तथा मनुष्य की लम्बी अस्थियों के सिरों पर (ह्यूमरस व फीमर के शीर्ष पर पाई जाती है। वयता के कारण अस्थियों का कैल्सीभवन एक नियमित वृद्धि प्रक्रिया की भाँति होता है। इसके कारण उपास्थि की प्रत्यास्थता घट जाती है और दृढ़ता बढ़ जाती है।

(b)  अस्थि (Bone):- अस्थि एक अत्यधिक कैल्सीभूत या खनिजीभृत (Calcified or Mineralized), कठोर व दृढ़ संयोजी ऊतक है। यह वयस्क कशेरूकियों के अन्तः कंकाल का प्रमुख घटक है। यह शरीर के ढाँचे को यांत्रिक सहारा देती है और कोमल अंतरांगों (हृदय, मस्तिष्क आदि) की रक्षा करती है। अस्थियाँ तथा पेशियाँ शरीर की गति तथा प्रचलन में भी सहायता करती हैं। इसके अतिरिक्त अस्थि Ca,Mg a Pइत्यादि आयनों के होम्योस्टेटिक रिजरवॉयर का कार्य भी करती हैं। इस प्रकार अस्थि चयापचयित रूप से गतिक (Metabolically dynamic) ऊतक है। शरीर का लगभग 97% कैल्सियम अन्तः कंकाल (Endoskeleton) में पाया जाता है।

अस्थि की संरचना (Structure of bone):-

 पेरिऑस्टियम (Periosteum):- यह एक झिल्ली है जो अस्थि के चारों ओर एक आवरण निर्मित करती है। पेरिऑस्टियम दो स्पष्ट परतों से निर्मित होती है। इसकी बाहरी परत पतले श्वेत रेशेदार संयोजी ऊतक से बनी होती है जबकि आंतरिक परत ऑस्टियोब्लास्टस से निर्मित होती है। ऑस्टियोब्लास्टस मकड़ीनुमा अस्थि कोशिकाएँ हैं, जिन्हें ‘अस्थि निर्माणक कोशिकाएँ’ (Bone forming cells) भी कहा जाता है क्योंकि ये नवीन अस्थि-पदार्थ (Bone material) का निर्माण करती हैं।

– मैट्रिक्स:- मैट्रिक्स ओसीन प्रोटीन से निर्मित होता है। मैट्रिक्स के द्वारा पतली पट्टियों (Plates) का निर्माण होता है, जिन्हें लैमेली कहते हैं। लैमेली तीन प्रकार की होती हैं – हैवर्सियन लैमेली (हैवर्सियन नलिका के परितः), संकेन्द्रित (Concentricor Circumferential) लैमेली (जो पेरिऑस्टियम के अन्दर किंतु एण्डोस्टियम के बाहर उपस्थित रहती है) तथा अन्तराली (interstitial) लैमेली (जो हैवर्सियन तंत्र के मध्य में स्थित रहती है)। लैमेली में सूक्ष्म अस्थि कोशिकाएँ ‘ऑस्टियोसाइट्स विद्यमान रहती हैं।

– एण्डोस्टियम:- यह अस्थिमज्जा गुहा से बाहर स्थित होती है। एण्डोस्टियम वस्तुतः एक झिल्ली है, जो मज्जा गुहा (Marrow cavity) को आस्तरित (Lined) करती है। ये दो परतों से निर्मित होती है। एक परत रेशेदार संयोजी ऊतक से बनी होती है और दूसरी परत ऑस्टियोब्लास्टस से निर्मित होती है।

– अस्थि मज्जा (Bone marrow):- अस्थि मज्जा एक विशिष्ट प्रकार का कोमल, विसरित (soft, diffuse) संयोजी ऊतक है, जिसे ‘मायलॉइड ऊतक’ (Myeloid tissue) कहते हैं। यह रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भाग लेती है अतः इसे हीमोपोइटिक ऊतक भी कहा जाता है। इसका निर्माण वसीय (Adipose) ऊतक, अवकाशी (Areolar) ऊतक तथा रक्त से होता है। अस्थि-मज्जा दो प्रकार की होती है-

(a)  लाल अस्थि मज्जा (Red bone marrow):- यह अनेक रक्त वाहिकाओं की उपस्थिति के कारण लाल रंग की होती है। भ्रूणावस्था में तथा जन्म के समय यह सम्पूर्ण कंकाल में पाई जाती है किन्तु 5वें वर्ष के बाद यह पीत अस्थि मज्जा (Yellow bone marrow) द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है। 20-25 वर्ष की आयु में लाल अस्थि मज्जा पसलियों, स्टर्नम, क्लेविकल, कोरूकाओं, स्केपुला, पेल्विस तथा ह्यूमरस व फीमर के एपिफाइसिस में विद्यमान रहती है। इसके द्वारा RBCs, WBCS प्लेटलेट्स कणिकामय श्वेत रुधिराणु (जैसे – बेसोफिल, इओसिनोफिल तथा न्यूट्रोफिल) का निर्माण होता है।

(b)  पीत अस्थि मज्जा (Yellow bone marrow):- इसका रंग पीला होता है और इसमें वसीय ऊतक (adipose tissue) की मात्रा अधिक होती है। यह अस्थिमज्जा लम्बी अस्थियों के शाफ्ट (shaft) में पाई जाती है। यह आपातकालीन दशाओं में रक्त कोशिकाओं का निर्माण करती है (रक्त की अत्यधिक क्षति होने पर)। एनीमिया की दशा में पीत अस्थिमज्जा, लाल अस्थि मज्जा द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है।

 हैवर्सियन तंत्र:- एक हैवर्सियन नलिका, इसकी लैमेली तथा ऑस्टियोसाइट्स मिलकर एक हैवर्सियन तन्त्र बनाते हैं। हैवर्सियन नलिकाएँ लम्बी अस्थियों के मैट्रिक्स में पाई जाती हैं। जैसे – स्तनधारियों की ह्यूमरस में। हैवर्सियन नलिकाओं में धमनियाँ एवं शिराएँ, ऑस्टियोब्लास्ट्स (एरियोलर ऊतक में), तंत्रिकाएँ व लसीका विद्यमान रहते हैं। इसे ‘ऑस्टियॉन’ भी कहा जाता है।

अस्थियों के कार्य (Functions of bone):-

– सहारा (Support):- अस्थियाँ शरीर का ढाँचा बनाती है और शरीर की आकृति, विन्यास व स्थिति निर्धारण में भूमिका निभाती हैं।

– सुरक्षा (Protection):- अस्थियों के बॉक्स अपने अन्दर स्थित कोमल अस्थियों की सुरक्षा करते हैं।

– गति (Movement):- अस्थियाँ व संधियाँ मिलकर ‘लीवर्स’ (Leavers) का कार्य करती हैं, जो पेशियों के संकुचित होने पर गति करते हैं।

– खनिज संचय (Mineral storage):- अस्थियाँ कैल्सियम, फॉस्फोरस व अन्य खनिजों की प्रमुख संचायक होती हैं।

 रक्त उत्पादन (Haematopoiesis):- मायलॉइड ऊतक रक्त-कोशिकाओं का निर्माण करते हैं।

(c)  नोटोकॉर्ड:- यह समस्त कॉर्डेट्स में पाई जाती है। कशेरुकियों (Vertebrates) में यह कशेरुक दण्ड के द्वारा प्रतिस्थापित कर दी जाती है। नोटोकॉर्ड एक छड़ाकार रचना है। इसका निर्माण कॉर्डल कोशिकाओं (Chordal cells) द्वारा होता है।

(d)  संवहनीय ऊतक (Vascular tissues):- यह गतिशील संयोजी ऊतक है जिसकी उत्पत्ति मीजोडर्म से होती है। यह तन्तु रहित द्रव्य मैट्रिक्स का बना होता है एवं विशिष्टीकृत जीवित कोशिकाएँ इन सीटू दशा में निर्मित नहीं होती है और ये न तो विभाजन और न ही मैट्रिक्स का स्त्रावण कर सकती हैं। संवहनीय ऊतक सम्पूर्ण शरीर में सतत रूप से संचरित होता है, पदार्थों के स्थानांतरण में भाग लेता है एवं विभिन्न क्रियाओं जैसे घावों का भरना और रोगजनकों के विरुद्ध बचाव। संवहनीय ऊतक दो प्रकार का होता है – रुधिर एवं लसीका।

पेशीय ऊतक:-

– पेशी ऊतक अनेक लंबे, बेलनाकार तंतुओं (रेशों) से बना होता है, जो समानांतर-पंक्ति में सजे रहते हैं।

– यह तंतु कई सूक्ष्म तंतुकों से बना होता है जिसे पेशी तंतुक (myofibril) कहते हैं।

– समस्त पेशी तंतु समन्वित रूप से उद्दीपन के कारण संकुचित हो जाते हैं तथा पुनः लंबा होकर अपनी असंकुचित अवस्था में आ जाते हैं।

– पेशीय ऊतक की क्रिया से शरीर वातावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार गति करता है तथा शरीर के विभिन्न अंगों की स्थिति को संभाले रखता है।

– सामान्यतया शरीर की सभी गतियों में पेशियाँ प्रमुख भूमिका निभाती हैं। पेशीय ऊतक तीन प्रकार के होते हैं-

1. कंकाल पेशी

2. चिकनी पेशी  

3. हृदय पेशी

1. कंकाल पेशी (Skeletal Muscles):- कंकाल पेशी मुख्य रूप से कंकाली अस्थि से जुड़ी रहती है। प्रारूप (typical) पेशी जैसे द्विशिरस्का (biceps) (दो सिर वाली) पेशी में रेखीय कंकाल पेशी तंतु एक समूह में एक साथ समानांतर रूप में पाए जाते हैं। पेशी ऊतक के समूह के चारों ओर कठोर संयोजी ऊतक का आवरण होता है।

2.  चिकनी पेशी (Smooth Muscles):- चिकनी पेशीय ऊतक की संकुचनशील कोशिका के दोनों किनारे पतले होते हैं तथा इनमें रेखा या धारियाँ नहीं होती हैं।

– कोशिका संधियाँ उन्हें एक साथ बाँधे रखती हैं तथा ये संयोजी ऊतक के आवरण से ढके समूह रहते हैं।

– आंतरिक अंगों जैसे- रक्त नलिका, अग्नाशय तथा आँत की भित्ति में इस प्रकार का पेशी ऊतक पाया जाता है।

– चिकनी पेशी का संकुचन “अनैच्छिक” होता है, क्योंकि इनकी क्रियाविधि पर सीधा नियंत्रण नहीं होता है।

3.  हृदय पेशी (Cardiac muscle):- संकुचनशील ऊतक है जो केवल हृदय में ही पाई जाती है।

– हृदय पेशी की कोशिकाएँ कोशिका संधियों द्वारा द्रव्य कला से एकरूप होकर चिपकी रहती हैं।

– संचार संधियों अथवा अंतर्विष्ट डिस्क (interca-lated disc) के कुछ संलग्न बिंदुओं पर कोशिका एक इकाई रूप में संकुचित होती है। जैसे कि जब एक कोशिका संकुचन के लिए संकेत ग्रहण करती है तब दूसरी पास की कोशिका में भी संकुचन के लिए उद्दीप्ति होती है।

तंत्रिकीय ऊतक:-

– यह शरीर का सबसे जटिल ऊतक है, जो सघन रूप से संकुलित (densely packed), परस्पर संबंधित तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा निर्मित होता है। ये तंत्रिका कोशिकाएँ न्यूरोन्स (neurons) कहलाती हैं। मानव के मस्तिष्क में न्यूरोन्स की संख्या 1010 होती है।

– यह ऊतक शरीर के विभिन्न भागों के मध्य संचार (communication) तथा उनकी गतिविधियों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए विशिष्टीकृत (specialized) होता है।

– तंत्रिकीय ऊतक की उत्पत्ति एक्टोडर्म (न्यूरल प्लेट) से होती है।

– यह शरीर के तंत्रिका तंत्र का निर्माण करता है, जो कि शरीर के कार्यों का नियन्त्रण एवं समन्वयन करता है।

– न्यूरोन्स के मध्य कोई अंतरकोशिकीय मैट्रिक्स नहीं पाया जाता है।

– इनमें सेण्ट्रियॉल की अनुपस्थिति के कारण विभाजन की क्षमता समाप्त (पुनर्जनन की न्यूनतम क्षमता) हो जाती है।

– अतः इन्हें शरीर से बाहर (Invitro) संवर्धित (cultured) नहीं किया जा सकता है। तंत्रिका ऊतकों का मुख्य कार्य उत्तेजनशीलता है।

– तंत्रिकीय ऊतक का संघटन:- तंत्रिकीय ऊतक चार प्रकार की कोशिकाओं से निर्मित होता है–

1. न्यूरोन्स या तंत्रिका कोशिकाएँ

2. न्यूरोग्लिया

3. एपेन्डायमल कोशिकाएँ

4. तंत्रिका स्त्रावी कोशिकाएँ

 न्यूरॉन:- अपनी सभी शाखाओं सहित एक तंत्रिका कोशिका, न्यूरॉन कहलाती है। न्यूरॉन का निर्माण न्यूरोब्लास्ट (neuroblast) द्वारा होता है। यह तंत्रिका तंत्र की रचनात्मक तथा कार्यात्मक इकाई है। यह शरीर की सबसे लम्बी कोशिका है।

– न्यूरोग्लिया या ग्लिया कोशिकाएँ:- न्यूरोग्लिया मस्तिष्क, मेरुरज्जु, तथा गैंगलिया में पाई जाने वाली सहायक कोशिकाओं एवं भरण कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। ये अतंत्रिकीय कोशिकाएँ होती हैं। ये न्यूरोन्स की तुलना में संख्या में दस गुना अधिक होती हैं। शरीर के कुछ अन्य भागों में न्यूरोग्लिया को अन्य नाम से जाना जाता है जैसे- पश्च पिट्यूटरी ग्रंथि में पिट्यूसाइट एवं गैंगलिया में सैटेलाइट कोशिकाएँ।

कार्य:-

– ये विभाजन की क्षमता रखती हैं। अतः केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के क्षति की मरम्मत करने में सहायक हैं।

– ये समीपस्थ न्यूरोन्स को इन्सुलेट करती हैं। जिससे आवेगों का पार्श्वीय संचरण (lateral transmission) नहीं होता है।

– ये न्यूरोन्स को पोषण प्रदान करती हैं।

– ये फैगोसाइट्स की भाँति कार्य करके सूक्ष्मजीवों का भक्षण करती हैं।

– ये स्मृति की प्रक्रियाओं (memory processes) में सहायता करती हैं।

– ये रक्त मस्तिष्क बैरियर (Blood Brain Barrier/BBB) का कार्य करती हैं अर्थात् ये केशिकाओं की एण्डोथीलियम के साथ-साथ रक्त व न्यूरॉन्स के पारस्परिक सम्पर्क को अवरुद्ध करती हैं। रक्त व न्यूरॉन्स के मध्य विभिन्न पदार्थों का विनिमय सदैव ग्लियल कोशिकाओं के द्वारा होता है अर्थात् ये मध्यस्थ (mediator) का कार्य करती हैं।

बाह्य तथा आन्तरिक आकारिकी एवं आन्तरिक संरचना

अमीबा का जीवन चक्र (Life cycle of Amoeba):-

वर्गीकरण:-

– संघ-प्रोटोजोआ

– वर्ग-राइजोपोडा/सार्कोडिना

– गण-अमीबिना

– वंश-अमीबा

– सामान्यतया सार्कोडिना के चार समूहों में से एक समूह अमीबा को माना जाता है। अमीबा प्लाज्मासोल का जीवनद्रव्य घूमता रहता है इस क्रिया का जीवद्रव्यभ्रमण या साइक्लोसिस नाम दिया जाता है।

– यह प्लाज्माजैल को प्लाज्मासोल में तथा प्लाज्मासोल को प्लाज्माजैल मे बदलने की क्षमता रखता है। अन्तर्द्रव्य में केन्द्रक, संकुचनशील धानियाँ (Contractile Vacuole) एक या अनेक खाद्य-धानियाँ व अन्य धानियाँ, वसा धानियाँ, क्रिस्टल आदि संरचनाएँ मिलती हैं।

–  अमीबा एक अनियमित आकृति का जीव है क्योंकि इसके शरीर पर कोई भी सख्त आवरण या कवच नहीं पाया जाता है। इसमें गमन हेतु अंगुली समान प्रवर्ध निकले रहते हैं जिनकी संख्या एक या अधिक होती है। अमीबा जिस ओर गमन करता है उस ओर उभार उत्पन्न होता है, जिसे कूटपाद (Pseudopodia) कहा जाता है।

अमीबा

– अमीबा के शरीर पर प्लाज्मा कला का एक आवरण पाया जाता है। यह आवरण अपने लचीलेपन के कारण कूटपाद बनने में अवरोध उत्पन्न नहीं करता है।

– प्लाज्मा कला जीवद्रव्य को अन्दर से बाहर नहीं आने देती है परन्तु यह अर्द्धपारगम्य होने के कारण जल, प्राणवायु व कार्बन डाइऑक्साईड के आदान-प्रदान को अनुमत करती है।

– प्लाज्मा कला के नीचे दो स्तर पाए जाते हैं। पहला भाग एक पतली, स्पष्ट व अकणिकामय परत का होता है। इसे बहिद्रव्य या एक्टोप्लाज्म कहा जाता है।

– एक्टोप्लाज्म के नीचे का सम्पूर्ण भाग अन्तः द्रव्य या एन्डोप्लाज्म कहलाता है। यह कणिकामय होता है। एण्डोप्लाज्म स्वयं दो भागों का बना होता है। पहला भाग बाहरी व सख्त होता है, इसे प्लाज्माजैल दिया गया है। दूसरा आन्तरिक हिस्सा प्लाज्मासोल कहलाता है।

– प्लाज्मासोल अपेक्षाकृत अधिक तरल होता है। अमीबा अन्य प्रोटोजोआ के जीवों, शैवालों तथा मृत जीवों को भोजन के रूप ग्रहण करता है। जब कोई उचित भोज्य पदार्थ है तो अमीबा के कूटपाद उस ओर बढ़ कर उस पदार्थ या जीव को घेर लेते हैं तथा इसे अन्तर्गृहीत कर लेते हैं।

– अन्तर्गृहीत भोजन खाद्य-धानियों में रहता है। जो साइक्लोसिस के कारण भ्रमणशील रहती है। अम्लीय स्त्रावों से भोजन को घोला जाता है तथा किण्वकों द्वारा इसे पचाया जाता है। अनुपयोगी पदार्थ का बहिःक्षेपण कर दिया जाता है।

–  इसे विशेष प्रकार के गमन के कारण जाना जाता है। यह गमन अमीभाब गमन कहलाता है। अमीबा के कूटपाद अग्र सिरे से कुन्द होने के कारण पालिपाद कहलाते हैं। अमीबा कूटपाद की सहायता से गमन करते हैं।

–  यह उपापचय के दौरान उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड विसरण द्वारा बाहर के जल में छोड़ दी जाती है तथ जल में मौजूद ऑक्सीजन भी विसरण द्वारा ही शरीर में ले ली जाती है। भोजन के अन्तर्गहण के समय अमीबा पानी भी निगल जाता है उपापचय से भी जल उत्पन्न होता है।

– इसके अतिरिक्त स्वच्छ जल में रहने वाले अमीबा के शरीर में परासरण के कारण भी बाहर से जल प्लाज्माकला से अन्दर प्रविष्ट हो जाता है।

– आवश्यकता से अधिक जल अमीबा की आकृति, आकार, सांद्रता आदि को प्रभावित कर सकता है, अतः उसका नियमन आवश्यक है इसे परासरण-नियमन कहा जाता है।

– अन्तःद्रव्य में संकुचनशील धानी पाई जाती है। संकुचनशील धानी कोई भी स्थायी रचना नहीं है, इसका आकार भी नियत नहीं है, यदि अमीबा के शरीर में अधिक जल आएगा तो अधिक तेजी से धानियाँ बनेंगी वा प्लाज्माकला तक जाकर पानी बाहर छोड़ देगी।

– इसमें लैंगिक जनन नहीं पाया जाता है। अमीबा सामान्यतया विभाजन द्वारा प्रजनन करता है। इस क्रिया में अमीबा दो भागों मे बँट कर दो सन्ततियाँ बनाता है। केन्द्रक समसूत्रण द्वारा दो भागों मे विभक्त हो जाता है।

 – अमीबा की कभी वृद्धावस्था से मृत्यु नहीं हो सकती है। यदि दुर्घटना वश अमीबा दो भागों मे कट जाए तो पुनरुद्भवन द्वारा प्रत्येक केन्द्रक युक्त भाग नए अमीबा में विकसित हो जाएगा।

केंचुए का जीवन चक्र (Life Cycle of Earthworm):-

केंचुए का वर्गीकरण (Classification of Earthworm):-

– संघ – ऐनेलिडा

– वर्ग – ओलिगोकीटा

– गण – आपिस्थोपोरा

– वंश – फेरेटिमा

– जाति – पोस्थुमा

– केंचुआ नम मिट्टी में बिल बनाकर रहता है। इसलिए इसे मिट्टी कृमि (Earthworm) कहते हैं। रात्रिचर (Nocturnal) प्राणी है। यह मादा में पाए जाने वाले सड़े-गले पदार्थों को भोजन के रूप में उपयोग करता है।

– केंचुआ अपने नुकीले सिर व ग्रसनी से मिट्टी चूसकर बिल बनाता है। अपचित भोजन वर्म कास्टिंग्स (Castings) या कृमि क्षिप्तियों के रूप में तथा बिलों के मुख पर एकत्रित करता है।

बाह्य आकारिकी:-

– इसका शरीर लम्बा, पतला, नलाकार होता है। इसकी लम्बाई 15 से 20 सेमी. एवं मोटाई 0.3 सेमी. से 0.5 सेमी. होती है। पोरफाइरिन वर्णक के कारण इसका रंग भूरा होता है।

आंतरिक आकारिकी:-

– केंचुए में वास्तविक खण्डीभवन (Metameric Segmentation) पाए जाते हैं। समान आकार के 100 से 120 खण्ड पाए जाते हैं।

– केंचुए के प्रथम खण्ड को परितुण्ड कहते हैं। इसके आधार पर मुख पाया जाता है। मुख को पृष्ठ से ढके हुए परितुण्ड से एक त्रिभुजाकार उभार निकला होता है जिसे पुरोमुख कहते हैं। केंचुए के अन्तिम खण्ड को पाइजिडियम कहते हैं।

 पर्याणिका खण्ड संख्या 14, 15 व 16 में पाई जाती है। यह ग्रंथिल भाग है।

– केंचुए की बाहरी सतह पर अनेक छिद्र पाए जाते हैं।

– मुख छिद्र प्रथम खण्ड के अधर पर स्थित, छिद्र की संख्या एक होती है।

– गुदा छिद्र अन्तिम खण्ड के सिरे पर स्थित, छिद्र की संख्या एक होती है।

 नर जनन छिद्र 18वें खण्ड के अधर तल के पार्श्वों में स्थित, छिद्र की संख्या एक जोड़ी होती है।

– मादा जनन छिद्र 14वें खण्ड के अधर तल पर स्थित, छिद्र की संख्या एक होती है।

– शुक्रगाहिका छिद्र 5-9 विखण्डनों के खाँचों के अधर तल के पार्श्वों पर स्थित, छिद्र की संख्या चार जोड़ी होती है।

– पृष्ठ छिद्र 12वें खण्ड के बाद अन्तिम खण्ड को छोड़कर अन्तराखण्डीय खाँच के पृष्ठ पर स्थित, छिद्र की संख्या एक होती है।

– शूक (Setae) प्रथम, अन्तिम व पर्याणिक (14, 15 व 16) को छोड़कर सभी में शूक पाए जाते हैं। केंचुए की गमनता में यह सहायक है। इनकी आकृति S के समान होती है।

– इसकी देहभित्ति पतली एवं लसलसी होती है। इसमें बाहर से भीतर की ओर पाँच प्रमुख स्तर पाए जाते हैं जिसमें क्यूटिकल, अधिचर्म, वर्तुलपेशी स्तर, अनुलम्ब पेशी स्तर तथा देहगुहीय उपकला उपस्थित होती है।

– अधिचर्म में चार प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं जिसमें अवलम्ब कोशिकाएँ, ग्रन्थिल कोशिकाएँ, आधारी कोशिकाएँ तथा ग्राही कोशिकाएँ उपस्थित होती हैं।

– ग्रन्थिल कोशिकाएँ:- यह दो प्रकार की होती है जिसमें श्लेष्मा कोशिकाएँ तथा एलब्यूमेल कोशिकाएँ उपस्थित होती हैं।

– देहगुहा (Ceolom):- केंचुए के शरीर में वास्तविक देहगुहा (True Coelom) पाई जाती है। देहगुहा में पाए जाने वाले द्रव को देहगुहीय द्रव (Coelomic Fluid) कहते हैं।

– इसमें चार प्रकार की कणिकाएँ पाई जाती हैं; जैसे – भक्षाणु, म्यूकोसाइट्स, वृत्ताकार कणिकाएँ तथा रेणुपीत कणिकाएँ

– आहारनाल में अग्रलिखित अंग पाए जाते हैं; जैसे – मुख, मुख गुहिका, ग्रसनी, ग्रसिका, पेषणी, आमाशय, आन्त्र तथा गुदा आदि।

– कैल्शियमधर ग्रन्थियाँ आमाशय में पाई जाती हैं जो मिट्टी में उपस्थित ह्यूमिक अम्ल को उदासीन करती है।

– टिफ्लोसोल (Typhlosole):- अवशोषण के लिए रसांकुर (Villi) पाए जाते हैं। एक रसांकुर (Villi) का आकार बड़ा होता है जिसे टिफ्लोसोल (Typhlosole) कहते हैं। यह अवशोषण की सतह को बढ़ाता है।

केंचुए का रक्त परिसंचरण तंत्र

– रक्त परिसंचरण तंत्र बंद प्रकार का होता है। इसमें रुधिर वाहिनियाँ एवं हृदय सम्मिलित हैं। रुधिर (Blood) में तरल पदार्थ प्लाज्मा का बना होता है। हीमोग्लोबिन के कारण रक्त का रंग लाल होता है। हीमोग्लोबिन प्लाज्मा में घुला होता है।

– रुधिर भोजन O2, CO2 व यूरिया को शरीर के विभिन्न भागों को पहुँचाता है। पृष्ठरुधिर वाहिनी आहारनाल के पृष्ठ तल पर स्थित होती है, अग्र से पश्च भाग तक फैली रहती है। यह पेशीय, मोटी, सबसे बड़ी तथा इसमें संकुचन व विमोचन होता रहता है। इसमें रुधिर पश्च से अग्र भाग की तरफ रहता है।

– यह 14 खण्डों से पीछे तक रुधिर का संग्रह करती है, लेकिन शुरू से 13 खण्डों में रुधिर का वितरण करती है।

– अधर रुधिर वाहिनी में रक्त अग्र से पश्च भाग की ओर बहता है। यह आहारनाल के अधर तल पर पाई जाती है। यह रुधिर के वितरण का कार्य करती है।

– केंचुए में चार जोड़ी नलिकाकार हृदय पाए जाते हैं। यह 7वें, 9वें, 12वें व 13वें खण्ड में पाए जाते हैं। हृदय पेशीय स्पंदनशील व कपाटयुक्त होते हैं।

– केंचुए का हृदय दो प्रकार का होता है- पार्श्व हृदय तथा पार्श्व ग्रसिका हृदय, पार्श्व हृदय दो जोड़ी 7वें व 9वें खण्ड में तथा इसमें चार जोड़ी कपाट पाए जाते हैं जबकि पार्श्व ग्रसिका हृदय दो जोड़ी 12वें व 13वें खण्ड में तथा इसमें तीन जोड़ी कपाट पाए जाते हैं।

– उत्सर्जन हेतु केंचुए में वृक्क अथवा नेफ्रीडिया पाए जाते हैं। नेफ्रीडिया का वर्गीकरण स्थिति व कार्यिकी के आधार पर किया गया। यह तीन प्रकार के होते हैं-

– पटीय नेफ्रीडिया 15वें खण्ड के पश्चात् पटों की दोनों सतहों पर एक-एक पंक्ति में होते हैं। प्रत्येक खण्ड में इनकी संख्या 80 से 100 तक होती है। इसके चार भाग होते हैं-

 (a) वृक्कमुख या नेफ्रोस्टोम (Nephrostome)

 (b) ग्रीवा

 (c) वृक्कक शरीर – सीधा पिण्ड व कुण्डलित भाग

 (d) अनस्थ नलिका

– यह आन्त्रमुखी नेफ्रीडिया होते हैं।

– अध्यावरणी नेफ्रीडिया पहले 6 खण्डों को छोड़कर सभी खण्डों में पाए जाते हैं। प्रत्येक खण्ड में इनकी संख्या 200 से 250 होती है। क्लाइटेलम के प्रत्येक खण्ड में इनकी संख्या 2000 से 2500 तक होती है। इसलिए क्लाइटेलम को नेफ्रीडिया का जंगल (Forest of Nephridia) कहते हैं। यह आकार में सबसे छोटे नेफ्रीडिया हैं।

– ग्रसनीय नेफ्रीडिया 4, 5 व 6वें खण्ड में ग्रसनी व ग्रसिका के दोनों ओर युग्मित गुच्छे के रूप में स्थित होते हैं। उत्सर्जन के आधार पर केंचुआ यूरियोटेलिक प्राणी है।

– तंत्रिका तंत्र केंचुए में सुविकसित होता है जो तीन भागों में विभक्त होता है-

 (i) केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र

 (ii) परिधीय तंत्रिका तंत्र

 (iii) अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र

केंचुए का जनन तंत्र

– केंचुआ एक द्विलिंगी (Hermaphrodite) या उभयलिंगी (Monoecious) जन्तु है। इसमें पुपूर्वता (Cross Fertilization) पाया जाता है।

– केंचुए का नर जनन तंत्र निम्न संरचनाओं से मिलकर बना होता है जो इस प्रकार हैं वृषण, वृषण कोष, शुक्राशय, शुक्रवाहिनी कीप, शुक्रवाहिका, प्रोस्टेट ग्रंथियाँ तथा सहायक ग्रंथियाँ।

 मादा जनन तंत्र निम्न संरचनाओं से मिलकर बना होता है जो इस प्रकार हैं अण्डाशय, अण्डवाहिनी कीप, अण्डवाहिनी तथा शुक्रग्राहिका आदि।

– पर्याणिका की ग्रंथियाँ स्त्रावित कर कोकून का निर्माण करती है। कोकून में ही निषेचन क्रिया सम्पन्न होती है। एक कोकून में एक ही केंचुए का परिवर्धन (Development) होता है।

कॉकरोच का जीवन-चक्र (Life-Cycle of Cockroach)

वर्गीकरण (Classification):-

– संघ-ऑर्थोपोडा

– वर्ग-इंसेक्टा

– गण-ऑर्थोप्टेरा

– वंश-पेरिप्लेनेटा

– जाति-अमेरिकाना

– कॉकरोच (पेरिप्लेनेटा अमेरिकाना) सर्वभक्षी, रात्रिचर, नम, अंधेरे व गर्म स्थानों को पसंद करने वाला, सरल रचना कीट है।

बाह्य आकारिकी:-

– कॉकरोच एक द्विपार्श्व सममित एवं एकलिंगी जन्तु है। इसका रंग लाल, भूरा एवं चमकीला होता है। शरीर खण्डयुक्त होता है। इसका शरीर तीन भागों में बँटा होता है – सिर, वक्ष एवं उदर।

– सिर छह, वक्ष तीन व उदर 10 खण्डों का बना होता है। मुख नीचे की ओर झुका रहता है, अतः इसे हाइपोग्नेथस अवस्था कहते हैं। इसका सिर त्रिभुजाकार या नाशपती के समान होता है।

– सिर पर युग्मित संयुक्त नेत्र, एन्टिना व सरल नेत्र पाए जाते हैं। सिर अनेक अस्पष्ट सीमा वाले क्षेत्रों-वर्टेक्स, फ्रांस, क्लाइपियस, अनकपाल व जीनी में बँटा होता है। मुख के चारों ओर मेडीबुलेट मुखांगों की उपस्थिति के कारण मुख छिद्र से पहले मुखपूर्वी गुहा बन जाती है।

– सिर पर एक जोड़ी वृक्काकार संयुक्त नेत्र पाए जाते हैं। प्रत्येक संयुक्त नेत्र में क्रियात्मक व संरचनात्मक इकाइयाँ पाई जाती हैं जिन्हें ओमेनटिडिया (Ommetidia) कहते हैं।

 शृंगिकाएँ एक जोड़ी पाई जाती हैं, शृंगिकाएँ संयुक्त नेत्रों के पास एक गड्ढे से उद्गमित होती हैं। इसे शृंगिका सॉकेट (Antenna Socket) कहते हैं। प्रत्येक शृंगिका में तीन भाग पाए जाते हैं–

(a) स्केप (Scape):- यह सबसे आधार वाला खण्ड है, बाल व सॉकेट सन्धि बनाता है।

(b) वृन्त:- यह शृंगिका का दूसरा अखण्डित खण्ड है।

(c) फ्लैजिलम:- यह सबसे लम्बा खण्ड है। इसमें अनेक खण्ड पाए जाते हैं।

– शृंगिका के निम्न कार्य –

(i) भोजन की तलाश में सहायता करती हैं।

(ii) यह घ्राणग्राही भी होती हैं।

(iii) यह मैथुन के दौरान नर व मादा को पहचानने में सहायता करती हैं।

– कॉकरोच के मुखांग, मुख को चारों ओर से घेरे रहते हैं। कॉकरोच में काटने व चबाने वाले प्रकार के मुखांग (Bitting and Chewing) होते हैं।

– लेब्रम (Labrum), मेन्डीबल (Mandible), मेक्सिला (Maxilla), द्वितीय मेक्सिला या लेबियम तथा हाइपोफेरिंक्स (Hypopharynx) इसके मुखांग के प्रकार हैं।

– अग्र वक्ष खण्ड, मध्य वक्ष खण्ड तथा पश्च वक्ष खण्ड द्वारा वक्ष निर्मित होता है।

– कॉक्सा (Coxa), ट्रोकेंटर (Trochanter), फीमर (Femur), टिबिया (Tibia) तथा टारसस (Tarsus) प्रत्येक टांग के खण्ड है।

– चिकनी सतह पर चलने व दीवारों पर चलने में प्लेन्टयूली व ऐरोलियम सहायता करते हैं। नखर (Claws) खुरदरी सतह पर चलने में सहायता करते हैं।

– कॉकरोच में दो जोड़ी पंख पाए जाते हैं जो मध्य वक्ष खण्ड व पश्च वक्ष खण्ड पर पाए जाते हैं। पंख का पहला जोड़ा मोटा, कठोर, अपारदर्शी व चर्मिल प्रकार का होता है। इसे एलाइट्रा (Elytra), टेगमाइना (Tegmina) या ढापन पंख कहते हैं। पंख की दूसरी जोड़ी कोमल, महीन एवं पारदर्शी होती है।

– कॉकरोच में 10 जोड़ी श्वासरंध्र पाए जाते हैं। दो जोड़ी वक्ष में व 8 जोड़ी उदर में पाए जाते हैं। श्वासरंध्र की पहली व तीसरी जोड़ी सदैव खुली रहती है।

– क्यूटिकल (Cuticle), अधिचर्म अथवा हाइपोडर्मिस (Epidermis or Hypodermis) तथा आधार कला (Basement Membrane) कॉकरोच की देहभित्ति में बाहर से भीतर की ओर पाई जाने वाली परतें हैं।

– आहारनाल (Alimentary Canal) एक लम्बी नलिकाकार रचना है। इसके एक सिरे पर मुख व दूसरे सिरे पर गुदा पाया जाता है। आहारनाल में निम्न तीन भाग पाए जाते हैं–

1.  अग्र आँत्र या स्टोमोडियम (Stomodaeum)

2.  मध्यान्त्र या मेसेन्ट्रान (Mesentron)

3.  पश्चान्त्र या प्रोक्टोडियम (Proctodaeum)

– अग्र आन्त्र में मुखगुहिका (Buccal cavity), ग्रसनी (Pharynx), ग्रसिका (Oesophagus), अन्नपुट (Crop) तथा पेषणी (Gizzard) पाए जाते हैं।

– मध्यान्त्र के अगले सिरे की कोशिकाओं द्वारा पेरोट्रेफिक झिल्ली का स्त्रावण होता है जो मध्यान्त्र की कठोर भोज्य कणों से सुरक्षा प्रदान करती है। मध्यान्त्र में दो प्रकार की रचनाएँ पाई जाती हैं–

(a)  यकृतीय अन्धनाल (Hepatic Caeca)

(b) मैल्पीघी नलिकाएँ (Malpighian Tubules)

– पश्चान्त्र (Hind gut) में क्षुद्रान्त्र, वृहदान्त्र (Colon) तथा मलाशय (Rectum) पाए जाते हैं।

– पेषणी (Gizzard) में 6 कठोर दाँत होते हैं जो भोजन को पीसने का कार्य करते हैं। पेप्सिन को छोड़कर, कशेरुकों में पाए जाने वाले लगभग सभी एन्जाइम्स कॉकरोच की आहारनाल में पाए जाते हैं। पेषणी का अग्र भाग आर्मेरियम कहलाता है।

– कॉकरोच में एक जोड़ी लार ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। यह अन्नपुट (Crop) के दोनों ओर व उस पर चिपकी रहती हैं। लार ग्रन्थियों द्वारा लार व श्लेष्मा का स्त्रावण किया जाता है।

– खुले प्रकार का परिसंचरण तन्त्र होता है। इनका रक्त रंगहीन होता है। इनमें श्वसन वर्णक (हीमोग्लोबिन) का अभाव होता है।

– इसका हृदय वक्ष के पहले खण्ड से उदर के अन्तिम खण्ड तक फैला रहता है। हृदय की भित्ति पेशीयुक्त होती है एवं हृदय स्पंदनशील होता है।

– हृदय 13 छोटे-छोटे समखण्डीय वेश्मों में बँटा होता है। प्रत्येक वेश्म कीप रूपी होता है। कॉकरोच का हृदय न्यूरोजेनिक प्रकार का होता है।

– इसकी देहगुहा अर्थात् हीमोसील दो महीन झिल्लियों द्वारा तीन क्षैतिज आयाम पात्रों (Sinuses) में बँटी होती है जिन्हें विभाजक पट्टियाँ (Diaphragm) कहते हैं।

– श्वसन (Respiration) के लिए शरीर में प्रवास नलियों का जाल फैला होता है। यह नलियाँ श्वास रन्ध्र द्वारा शरीर से बाहर खुलती हैं।

– उत्सर्जन (Excrection) के लिए मैल्पिघियन नलिकाएँ होती हैं।

– वसा काय, युरिकोस ग्रन्थियाँ, क्यूटिकल तथा नेफ्रोसाइट्स उत्सर्जन में सहायक है।

– उत्सर्जन के आधार पर कॉकरोच यूरिकोटेलिक प्राणी है।

– प्रकाशग्राही या संयुक्त नेत्र, स्पर्शग्राही, ध्वनि ग्राही, श्रवणग्राही तथा प्रोपियाग्राही इसके संवेदी अंग हैं।

नर जनन तंत्र

– नर कॉकरोच में जननांग एक जोड़ी वृषण (Testis), शुक्र वाहिकाएँ (Vasdeference), स्खलन वाहिनी (Ejaculatory duct), छत्ररूपी ग्रन्थि (Mushroom gland) तथा फैलिक ग्रन्थि (Phallic gland) होते हैं। इसके अतिरिक्त नर में गोनोपोफाइसिस (Gonopophyses) नामक बाह्य जननांग (External genitalia) भी होते हैं।

मादा जनन तंत्र:-

– मादा कॉकरोच के जननांग में एक जोड़ी अण्डाशय, अण्डवाहिनी, योनि, शुक्रग्राहिका तथा कोलेटीरियल ग्रन्थियाँ होती हैं। इसके अतिरिक्त मादा में बाह्य जननांग अथवा गोनोपोफाइसिस उपस्थित होते हैं।

– मादा कॉकरोच नर को आकर्षित करने हेतु फीरामोन्स का स्त्रावण करती है।

– विदलन अंशभंजी एवं पृष्ठीय प्रकार का होता है। युग्मनज का भ्रूणीय विकास ऊथिका के अन्दर होता है। भ्रूणीय विकास के अन्त में अण्डकवच के ऊपरी सिरे पर एक अनुलम्ब दरार बन कर कट जाती है इसमें से छोटे-छोटे शिशु बाहर आ जाते हैं, जिन्हें निम्फ कहते हैं।

– कॉकरोच के निम्फ व वयस्क की संरचना एवं रहन-सहन में विशेष अन्तर नहीं होता है। अतः कायान्तरण में की वृद्धि ही प्रमुख परिवर्तन होता है। ऐसा कायान्तरण हेमीमेटाबोलस कहलाता हैं।

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