जैव प्रौद्योगिकी और इसके अनुप्रयोग
आनुवंशिकी अभियांत्रिकी (Genetic Engineering):-
– इसके द्वारा किसी प्राणी के जीन्स तथा आनुवंशिक पदार्थ में आवश्यकतानुसार परिवर्तन, मरम्मत अथवा सुधार आदि करके उनके लक्षणों (Traits) को परिवर्तित किया जा सकता है।
– एक जीव के DNA अणुओं को दूसरे DNA अणुओं से प्रत्यारोपित (Transplant) करके एक नए प्रकार का उन्नत लक्षणों युक्त DNA तैयार करना आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) या जीन प्रत्यारोपण (Gene Manipulating) कहलाता है।
– आनुवंशिकी अभियांत्रिकी (Genetic Engineering) को अन्य नामों से भी जाना जाता है। जैसे –
जीन मैनीपुलेशन (Gene Manipulation)
जीन प्रतिरोपण (Genes Transplantation)
जीन थैरेपी (Gene Therapy)
जीन प्रौद्योगिकी (Gene Technology)
– आनुवंशिकी अभियांत्रिकी में प्रयोग में लिए जाने वाले उपकरण –
1. रेस्ट्रिक्शन/प्रतिबंधित एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम (Restriction Endonuclease Enzyme):-
– जीवाणुओं में एन्जाइम (Enzyme) के ऐसे समूह (Group) पाए जाते हैं, जो DNA को विशिष्ट स्थान से अलग करने में सक्षम होते हैं। एंजाइम के ऐसे समूह को एण्डोन्यूक्लिएज (Endonuclease) कहते हैं या इन्हें केमिकल सीजर्स (Chemical Scissors) भी कहा जाता है। ये एण्डोन्यूक्लिएज बाहरी विषाणुवीय DNA (Viral DNA) को जीवाणु कोशिका में प्रवेश नहीं करने देते, इसलिए इन्हें, प्रतिबंधित एण्डोन्यूक्लिएज (Restriction Endonuclease) भी कहते हैं।
– इस प्रकार के एंजाइम में विशिष्ट न्यूक्लियोटाइड क्रम (Nucleotide sequence) होता है तथा ये DNA को विशिष्ट स्थानों पर काटने (Cleave) में सक्षम होते हैं।
– एण्डोन्यूक्लिएज एंजाइम दो प्रकार के होते हैं–
(i) प्रथम प्रकार के एन्जाइम:- इस प्रकार के एन्जाइम DNA में न्यूक्लियोटाइड्स (Nucleotides) के क्रमों (Sequence) को पहचानने में सक्षम होते हैं, किन्तु ये DNA को विशिष्ट स्थानों पर विदलित करने में सक्षम नहीं होते।
(ii) द्वितीय प्रकार के एन्जाइम:- इस प्रकार के एन्जाइम DNA में न्यूक्लियोटाइड्स के क्रमों को पहचानने के साथ-साथ DNA को विशिष्ट स्थानों पर विभक्त करने में सक्षम होते हैं।
– प्राकृतिक रूप से अनेक बैक्टीरिया (Baceteria) में पाए जाते हैं जिससे ये बैक्टीरिया अपनी रक्षा बाहरी या असंगत DNA (Foreign DNA) से करते हैं।
2. जीन क्लोनिंग (Gene Cloning):-
– रिकॉम्बिनेट DNA खण्डों को प्राप्त करने या तैयार करने की विधि को जीन क्लोनिंग (Gene Cloning) कहते हैं। इसकी निम्न विधियाँ हैं–
(i) इस विधि द्वारा विदलित DNA अणु को विषाणु या प्लाज्मिड (plasmid) के साथ सम्बन्धित करते हैं। इनका वेक्टर DNA (Vector-DNA) भी कहलाता है।
(ii) इसके बाद विषाणु अथवा जीवाणु का द्विगुणन (Replication) करके सम्बन्धित DNA की प्रतिलिपियाँ (Copies) तैयार की जाती हैं।
(iii) इस प्रकार से प्राप्त DNA की प्रतिलिपियों को, जो कि पुनर्संयोजित DNA के गुणन से प्राप्त की जाती है, इन्हें क्लोन्ड DNA (Cloned DNA) कहते हैं।
3. रिकॉम्बिनेंट डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (Recombinant DNA):-
– किसी जीव की विभिन्न प्रजातियों की कोशिकाओं के DNA को रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम (Restriction Endonuclease Enzyme) की सहायता से विखण्डित करना तथा उन खण्डों को लाइगेज (Ligase) एन्जाइम की सहायता से आपस में पुन: संयोजित करके एक विशेष प्रकार का DNA प्राप्त करते हैं जिसे पुनर्संयोजित DNA (Recombinant DNA) कहते हैं।
4. वाहक DNA (Carrier DNA):-
– कैरियर DNA, DNA के वाहक के रूप में कार्य करता है। यह एक नए उत्पादित पुनर्संयोजित DNA अणुओं को एक जीवाणुकोशा से दूसरे जीवाणु कोशा तक पहुँचाता है तथा उनके मैनीपुलेशन (Manipulation) एवं अभिज्ञानता (Recognition) में सहायता करता है।
– ये कैरियर DNA जीवाणुओं जैसे एश्चरेशिया कोलाई (E. coli) में मुख्य गुणसूत्र से अलग कोशाद्रव्य (Cytoplasm) में पाए जाने वाले DNA के ही बने स्वद्विगुणन क्षमता रखने वाली संरचनाएँ हैं। इनमें एक जीवाणु कोशा से दूसरे जीवाणु कोशा में स्थानान्तरित होने की क्षमता पाई जाती है।
– आनुवंशिक अभियांत्रिकी में वाहक DNA एक गाड़ी के रूप में कार्य करता है जिसमें स्थानान्तरित होने वाला DNA अणु सवारी (Passenger) की भाँति होता है ये वेक्टर (Plasmid or Phages) स्वद्विगुणन (Self duplication) की क्षमता रखते हैं, इन्हें क्लोनिंग वेक्टर (Cloning Vector) भी कहते हैं।
– वाहक के रूप में प्लाज्मिड (Plasmid), फेज विषाणु (Phase Virus) तथा कॉस्मिड (Cosmid) का उपयोग किया जाता है।
– रिकॉम्बिनेंट डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड तकनीक (Recombinant DNA Technology):-
– बर्ग (Berg) एवं उनके सहयोगियों ने दो भिन्न-भिन्न प्रकार के वायरस के DNA अणुओं को आपस में संयुक्त करके एक नए DNA अणु का निर्माण किया एवं इन्हें पुनर्संयोजित DNA (Recombinant DNA) नाम दिया। इस तकनीकी को पुनर्संयोजित DNA तकनीक कहा गया है।
– इस तकनीक में किसी यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic cell) के DNA को (Foreign DNA) एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम (Endonuclease Enzyme) की उपस्थिति में छोटे-छोटे टुकड़ों में अलग-अलग कर दिया जाता है।
– इसके बाद इन टुकड़ों को वेक्टर DNA के साथ निबंधित करके एश्चरेशिया कोलाई (E. coli) बैक्टीरिया में असीमित मात्रा में क्लोनिंग (Cloning) या वृद्धि (Growth) के लिए प्रेरित किया जाता है।
– रिकॉम्बिनेंट डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड तकनीक की विधि (Method of Recombinant DNA Technology):-
1. लेम्डा जीवाणुभोजी (Lembda bacterophage) तथा कैरियर प्लाज्मिड (Plasmid) का निर्माण करना:- रिकॉम्बिनेट DNA तकनीकी में रिकॉम्बिनेट DNA तैयार करने हेतु प्लाज्मिड को बैक्टीरिया से अल्ट्रासेण्ट्रीफ्यूगेशन (Ultracentrifugation) विधि द्वारा अलग किया जाता है।
2. यूकैरियोटिक कोशिका के जीन्स के पृथक्करण द्वारा DNA को बनाना:- इसमें निम्नलिखित प्रक्रियाएँ शामिल हैं–
(i) इसमें एक विशिष्ट यूकैरियोटिक विशिष्ट प्रोटीन की जीनयुक्त mRNA का संवर्द्धन टेम्पलेट (Templete) की तरह रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एन्जाइम की उपस्थिति में रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन (Reverse Transcription) द्वारा इसके कॉम्पलीमेण्टरी (Complementary) DNA के उत्पादन में किया जाता है।
(ii) इसमें प्राप्त mRNA-CDNA हाइब्रिड (Hybrid) से mRNA को पृथक् किया तथा इस प्रकार बने cDNA का एक स्ट्रेण्ड रह जाता है।
(iii) c-DNA का एक स्ट्रेण्ड डी.एन.ए. पॉलीमरेज-I (DNA Polymerase-I) एन्जाइम की उपस्थिति में प्रतिकृतीकरण करके फिलेयरीपिन की तरह डबल स्ट्रेण्डेड DNA के अणु का निर्माण करता है।
(iv) निर्मित हेयरपिन DNA को विदलित करके एक सिन्थेटिक डबल स्ट्रेण्डेड (Synthetic Double Stranded) c-DNA प्राप्त किया जाता है, जिसमें विशेष प्रोटीन की जीन उपस्थित होती है।
3. जीन को धारण करने वाले वाहक का निर्माण (Construction of the Gene Bearing Vector):-
– इस विधि से यूकैरियोटिक m-RNA के द्वारा निर्मित C-DNA असंगत (Foregin) DNA को जीवाणु से पृथक् प्लाज्मिड (Plasmid) वाहक DNA में प्रविष्ट निम्नलिखित विधि द्वारा किया जाता है–
– c-DNA को प्लाज्मिड (Plasmid) में प्रविष्ट कराने से पहले दोनों सिरों को चिपचिपे सिरों (Cohesive ends) में परिवर्तित करते हैं तथा c-DNA के दोनों डबल स्ट्रेण्डेड के विपरीत 3’end पर डीऑक्सीराइबो न्यूक्लियोटाइड रेसीड्यूस (Deoxyribonucleotide residues) या A-residues को टर्मीनल ट्रांसफेरेज एन्जाइम (Terminal Transferase Enzymes) की सहायता से संलग्न करते हैं।
– इसके बाद प्लाज्मिड (Plasmid) या DNA वेक्टर को एक विशिष्ट स्थान पर एक रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम के द्वारा विभक्त करके सीधा (Linear form) कर लिया जाता है।
– इसके बाद प्लाज्मिड के दोनों विपरीत 3’end पर स्थित A-residues की एक Poly-A Tail को टर्मिनल ट्रांसफेरेज एन्जाइम की उपस्थिति में Poly-T Tails या चिपचिपे सिरे (Cohesive ends) में रूपांतरित किया जाता है।
– इसके पश्चात् कृत्रिम माध्यम में c-DNA तथा प्लाज्मिड (Plasmid) के दोनों कॉम्पलीमेण्टरी टेल (Complementary Tail) सिरों को DNA लाइगेज नामक एन्जाइम की सहायता से परस्पर सहसंयोजित कर दिया जाता है।
– अत: प्लाज्मिड तथा C-DNA के दोनों टुकड़े मिलकर एक गोलाकार नए DNA का निर्माण करते हैं जिसे रिकॉम्बिनेंट DNA या y-DNA कहा जाता है।
4. रिकॉम्बिनेंट DNA का ट्रांसफॉर्मेशन (Transformation of Recombinant DNA):-
– इस विधि में प्राप्त रिकॉम्बिनेंट DNA को ई. कोलाई जीवाणु कोशिका के क्रोमोसोम (Chromosome) में स्थानान्तरित करके उसे वृद्धि तथा प्रतिकृतीकरण कराया जाता है तथा ट्रांसफॉर्म्ड (Transformed) ई. कोलाई कोशिकाओं की वृद्धि एवं प्रजनन के लिए उचित कल्चर माध्यम में आइसोलेशन (Isolation) करके रखते हैं।
– ये कोशिकाएँ इस प्रकार के अलैंगिक विधि द्वारा प्रजनन करके इम्प्लान्टेड असंगत जीन्स (Foreign genes) युक्त अनेक कोशिकाएँ उत्पन्न करती हैं तथा इनमें उपस्थित रिकॉम्बिनेंट DNA बैक्टीरिया की प्रोटीन्स के अतिरिक्त उन सभी विशिष्ट प्रोटीन्स का भी संश्लेषण करता है, जो इम्पलांटेड असंगत जीन्स (Implanted foreign genes) द्वारा निर्देशित होती है।
आनुवंशिक अभियांत्रिकी की सार्थकता एवं उपयोग:-
1. इसके वंशागतिक बीमारियों के लिए उत्तरदायी संदोषीजीनों को हटाकर उनके स्थान पर सामान्य जीनों को प्रत्यारोपित (Manipulate) किया जा सकता है।
2. सूक्ष्मजैविक उद्योगों में जीवाणुओं (Bacteria) में उच्च वर्गीय जन्तुओं के ऐसे जीन्स को प्रवेश कराया जाता है जो कुछ विशिष्ट प्रकार के विटामिन्स, एन्जाइम्स, एण्टीबायोटिक्स (Antibiotics) तथा हॉर्मोन्स (Hormones) आदि को कोड (Code) कहते हैं।
3. नीले हरित शैवालों (Blue green algae) तथा जीवाणुओं (Bacteria) से प्राप्त नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीन्स (Nitrogen fixation) नीफ जीन्स (Nif Genes) कहलाते हैं। नीफ जीन्स का स्थानांतरण (Transformation) कुछ मुख्य फसलों में आनुवंशिक इंजीनियरिंग के द्वारा किया जा सकता है जिससे ये फसलें स्वयं अपनी आवश्यकतानुसार वायुमण्डलीय नाइट्रोजन (Atmospheric Nitrogen) का स्थिरीकरण (fixation) कर सकती है, जिससे फसलों द्वारा प्रचुर मात्रा में प्रोटीन प्राप्त किया जा सके।
4. आनुवंशिक पदार्थ (Genetic Material-DNA) के गुणों का अध्ययन करने हेतु प्रयुक्त की जाती है।
5. पादपों की जंगली प्रजातियों से जिनमें कि परजीवियों (Parasites) तथा हानिकारक कीड़ों (Insects) के प्रति प्रतिरोधकता (Immunity) पाई जाती है, उनसे जीन्स (Genes) प्राप्त करके फसली पौधों में प्रत्यारोपित किया जा सकता है।
क्लोनिंग (Cloning):-
– क्लोन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द से हुई जिसका अर्थ है ‘ट्विग’ (Twig) अर्थात् एक वृक्ष की शाखाएँ जैसे समान होती हैं, वैसे ही क्लोन्स भी समान होते हैं।
– क्लोन वह जीवधारी होता है, जो एक अकेले जनक (Parent) से अलैंगिक (Asexual) तरीकों से उत्पन्न होता है तथा अपने जनक से भौतिक (Physically) एवं आनुवंशिक (Genetically) दृष्टिकोण से बिल्कुल समान होता है।
– क्लोनिंग का आधार यह है कि प्रत्येक प्राणी बहुत-सी कोशिकाओं से बना होता है तथा प्रत्येक कोशिका में अणु रूप में वह पदार्थ या तत्त्व होता है जिससे कि पूर्ण वयस्क प्राणी का निर्माण हो सके। विकसित होने की प्रक्रिया या क्रम भी कोशिका का अपना गुण है। अतः अगर किसी प्राणी या नस्ल की कोई जीवित कोशिका (Living cell) उपलब्ध है तो उसके मूल प्राणी का प्रतिरूप तैयार करना संभव है।
– इसमें न्यूक्लियर ट्रांसप्लान्टेशन तकनीक (Nuclear Transplanation Technique) द्वारा केन्द्रक रहित डिम्ब में काय कोशिका के केन्द्रक को सन्निविष्ट (Introduce) करके समान क्लोन प्राप्त किया जा सकता है।
– क्लोन में नर और मादा के समागम की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए इसमें नर की कोशिका से नर तथा मादा की कोशिका से मादा ही विकसित होगी।
– स्तनधारियों की क्लोनिंग की प्रथम सफलता स्कॉटलैण्ड (Scotland) में मिली, जब एडिनबर्ग के रॉसलिन इन्स्टीट्यूट (Roslin Institute) के वैज्ञानिकों इयान विल्गुट व उनके सहयोगियों ने एक वयस्क भेड़ की प्रतिकृति ‘डॉली’ तैयार की।
क्लोनिंग के प्रकार (Types of Cloning):-
– वस्तुतः क्लोनिंग के दो प्रकार होते हैं–
(i) जीवों में क्लोनिंग (Cloning in Living):- मनुष्य या पशु में से एकसूत्रधारी अथवा अगुणित कोशिका (n) के केन्द्रक को निकाला है तथा इसके स्थान पर द्विगुणित (2n) कोशिका का केन्द्रक प्रविष्ट करवाते हैं बाद में माता की गर्भ की अवधि पूरी होने दी जाती है। इस प्रकार वाँछित गुणों वाला जीव यानी क्लोन’ प्राप्त होता है।
(ii) जीन क्लोनिंग (Gene Cloning):- इसमें कोशिकाओं की वांछित जीन को सर्वप्रथम निकाला जाता है। मनुष्य की एक कोशिका में अनेक जीन होते हैं और इनमें से सिर्फ एक जीन को ढूँढकर उसको एक जीवाणु (Bacteria) में डाला जाता है फिर जीवाणु के कई विभाजन के साथ इस जीन का भी बहुगुणन हो जाता है यह जीन क्लोनिंग कहलाती है।
जीन मानचित्रीकरण (Gene Mapping):-
– जीन गुणसूत्रों पर रेखीय व्यवस्था में व्यवस्थित होते हैं। दो जीन्स के बीच की दूरी जीन विनिमय की आवृत्ति व सहलग्नता (Linkage) सामर्थ्य में कमी होती है।
– जीन विनिमय आवृत्ति या प्रतिशतता को गुणसूत्रों पर उपस्थित जीनों के बीच सापेक्षिक दूरी तथा क्रम व्यवस्था को ज्ञात करने के लिए काम में लिया जा सकता है। जीन रेखीय क्रम में व्यवस्थित होते हैं तो इनके मध्य दूरी का योग होना चाहिए। इसी आधार पर जीन का मानचित्रण प्रस्तावित किया गया।
– मॉर्गन तथा स्टूटेवेन्ट ने ड्रोसोफिला के X-गुणसूत्र पर पाए जाने वाले 5 जीनों की स्थिति को आरेखित किया तथा आरेख के रूप जीन का इस प्रकार दर्शाना सहलग्नता मानचित्र (Linkage Map) या जीन मानचित्र (Gene Map) कहलाता है तथा जीन मानचित्रण द्वारा बिन्दुओं द्वारा गुणसूत्र पर उपस्थित जीन की सापेक्षित स्थिति को प्रदर्शित किया जाता हैं।
– एक मानचित्र इकाई गुणसूत्र पर वह दूरी है जो दो संलग्न जीन (Linked genes) के मध्य एक पुनर्योजन की अनुमति देती है।
जैसे – A, B, C, जीन में A व B के बीच पुनर्योजन आवृत्ति 20% B व C के बीच 13% व A व C के मध्य 7% है। इन आँकड़ों के आधार पर सहलग्नता मानचित्र (जीन अनुक्रम व स्थिति) निम्न प्रकार से होगा–
– वर्तमान में DNA के न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम निर्धारण द्वारा विस्तृत आनुवंशिक मानचित्र (Genetic Map) तैयार किया जाता है।
– मानचित्र आण्विक स्तर पर तैयार किए जाते हैं। इनसे रेस्ट्रिक्शन मानचित्रीकरण विधि द्वारा DNA के खण्डों पर अभिज्ञान स्थलों का मानचित्र तैयार किया जाता है।
– जानकारी के आधार पर क्रोमोसोम वॉकिंग (Chromosome Walking) तकनीक द्वारा सम्पूर्ण क्रोमोसोम का मानचित्रीकरण किया जाता है।
– इन खण्डों को बाद में जोड़ते हुए सम्पूर्ण जीन का न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम तैयार किया गया तथा मक्का, टमाटर, आलू, ड्रोसोफिला, चूहे के जीन मानचित्र बनाए गए।
– जीन लाइब्रेरी तथा cDNA लाइब्रेरी (Genomic Library and cDNA Library):-
– क्लोनिंग वाहक (Cloning vectors) (Combination) तथा रेस्ट्रिक्शन एन्जाइम्स (Restriction enzymes) के संयोजन विभिन्न से एक वाहक (Vector) में किसी ऑर्गेनिज्म (Organism) का सम्पूर्ण जीनोम (Entire genome) किया जा सकता है। एकत्रित विभिन्न पुनर्संयोजित क्लोन्स (Recombinant Clones) का एकत्रीकरण एक लाइब्रेरी कहलाता है।
– किसी कोशिका अथवा ऊतक (Cell or Tissue) के कुल DNA द्वारा एक जीनोमिक लाइब्रेरी (Genomic Library) तैयार की जा सकती है। जीनोमिक लाइब्रेरी में क्लोन किए गए DNA (cDNA) के द्वारा ऊतकों (Tissues) में स्थित सम्पूर्ण mRNAs का प्रतिनिधित्व (Represent) किया जाता है।
– DNA को अधिक स्थानों पर विदलित (Cleave) करने वाले रेस्ट्रिक्शन एन्जाइम्स (Restriction enzymes) जैसे Sau III A के द्वारा ऊतकों में स्थित कुल DNA के आंशिक डाइजेशन (Partial diestion) के द्वारा जीनोमिक लाइब्रेरी (Genomic library) बनाई जाती है। इस हेतु DNA के बड़े खण्डों (Large pieces) को ग्रहण करने वाले फेज वाहक (Phage vectors) उपयोग में लाए जाते हैं जिसके द्वारा वाहकों में DNA के बड़े खण्डों में अधिक से अधिक जीन एक साथ रहते हैं।
– मनुष्य लाइब्रेरी (Human Library) के अन्तर्गत एक बड़े आकार का 106 रिकॉम्बीनेन्ट फ्रेगमेण्ट (Recombinant fragements) लगभग जीनोम संगृहीत कर सकता है। अतः इसमें किसी भी एकल जीन (Single gene) की कॉपी (Copy) को ज्ञात किया जा सकता है। जीनोमिक लाइब्रेरी तैयार करना।
– लाइब्रेरी (Libraries) तैयार करने हेतु सर्वप्रथम किसी ऊतक के सम्पूर्ण mRNAS को पृथक् (Isolate) किया जाता है। इसके पश्चात् इन अणुओं (Molecules) की प्रतिकृति (Copy) द्विगुणित (Double stranded) DNA में तैयार की जाती है। इस हेतु DNA पॉलीमरेज (Polymerase) तथा रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज (Reverse transcriptase) एन्जाइम्स (Enzymes) को प्रयोग में लाते हैं। इस विधि द्वारा लम्बे CDNA प्रतिलिपियों (Copies) की अपेक्षा छोटे DNA फ्रेगमेन्ट्स (Fragments) अधिक संख्या में क्लोन किए जाते हैं। cDNA लाइब्रेरीज (Libraries) में प्लाज्मिड्स (Plasmids) को वेक्टर (Vector) की भाँति उपयोग में लाया जाता है, क्योंकि ये प्लाज्मिड (Plasinid), फेजेस (Phages) अथवा कॉस्मिड्स (Cosmids) की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक होते हैं। जीनोमिक लाइब्रेरी (Genomic Library) बनाने हेतु लैम्बडा फेज वाहकों (Lambda phage vectors) का cDNA क्लोनिंग हेतु विशिष्ट महत्त्व होता है।
– वाहकों (Vectors) में रिकॉम्बिनेंट (Recombinant) DNA तकनीकी (Technology) द्वारा स्थापित जीन्स (Introduced genes) द्वारा प्रोटीन्स (Proteins) कोडेड (Coded) होते हैं एवं संश्लेषित (Synthesized) होते हैं उन्हें अभिव्यक्ति वाहक कहते हैं। इन वाहकों (Vectors) के उपयोग से जीनोमिक लाइब्रेरी (Genomic Library) में विशिष्ट cDNA अणुओं (Specific cDNA molecules) को ढूँढने (Detect) में सहायता मिलती है तथा इनके द्वारा आनुवंशिकी इंजीनियरिंग तकनीकी (Genetic Engineering Techniques) से विशिष्ट प्रोटीन्स (Proteins) बनाया जा सकता है।
– इन वेक्टर्स (Vectors) में अत्यधिक क्रियाशील प्रोमोटर्स (Promoters), ट्रांसलेशन (Transtation) को आरम्भ (Initiate) करने वाले कोडोन्स (Initiation codons), ट्रांसक्रिप्शन (Transcription) तथा ट्रांसलेशन समापन सिग्नल्स (Translation termination signals) तथा उपयुक्त (Suitable) प्रोटीन प्रोसेसिंग सिग्नल्स (Appropriate protein processing signals) उपस्थित होते हैं।
– कुछ अभिव्यक्ति वाहक (Expression vectors) में प्रोटीएज संदमक (Protease inhibitors) को कोड करने वाले जीन्स (Genes) भी पाए जाते हैं जिससे अंतिम रूप में प्राप्त होने वाले उत्पाद (Product) की मात्रा बढ़ जाती है।
– इसके निर्माण में 𝜆 (लेम्डा) प्रतीक चिह्न होता है एवं gt 11 एक महत्त्वपूर्ण वाहक (Vector) होता है।
– जीनोमिक लाइब्रेरी (Genomic library) में cDNA अणुओं (Molecules) की खोज करने हेतु विधि द्वारा पृथक् किए गए DNA या RNA की मात्रा ज्ञात करने हेतु विशेष अणुओं का उपयोग किया जाता है। ये प्रोब्स (Probes) सामान्यतः विशिष्ट DNA या RNA के खण्ड (Pieces) होते हैं, जोकि न्यूक्लियोटाइड (Nucleotides) युक्त रेडियोएक्टिव (Radioactive) 32P द्वारा चिह्नित होते हैं।
– एक विशिष्ट (Specific)m RNA द्वारा संश्लेषित (Synthesized) cDNA का उपयोग लाइब्रेरी (Library) में एक लम्बे cDNA की पहचान करने में किया जाता है। विशिष्ट जीन्स को खोजने हेतु, विशिष्ट जाति (Species) के कोडॉन (Codons) का उपयोग करके एक ओलिगो न्यूक्लिओटाइड प्रोब को निर्मित किया जाता है, जो जीनोमिक लाइब्रेरी (Genomic library) में उसके संगत DNA खण्डों को ढूँढने में सहायक होता है।
– इस विधि में यदि प्रोब्स में उपस्थित अनुक्रम (Sequence), संगत DNA के अनुक्रम से समानता प्रदर्शित करता है, तब प्रोब्स (Probes) में उपस्थित 20 न्यूक्लियोटाइड्स (Nucleotides) लम्बा भाग संकरित हो जाता है।
– cDNA प्रोब्स (Probes) का उपयोग Southern Blot Transfer Technique के अन्तर्गत DNA फ्रेगमेण्ट्स को पहचानने में तथा (Northern Blot Transfer Technique) में RNA अणुओं को पहचानने में भी किया जाता है।
जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) का नियमन:-
– यूकेरियोटिक कोशिका में स्थित सम्पूर्ण जीन (Gene) सदैव कार्यशील नहीं होते हैं। ये समय-समय पर आवश्यकता के अनुरूप क्रियाशील (Active) होते हैं तथा क्रिया विशेष के पूर्ण होने के पश्चात् ये निष्क्रिय अवस्था में आ जाते हैं। इस प्रकार यूकैरियोट्स (Eukaryotes) में जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) तथा उनका नियंत्रण (Regulation) जटिल किया है।
– यूकैरियोटिक प्राणियों में कोडॉन (Codon) तथा अमीनो अम्लों (Amino acids) के क्रम में संरेखता (Collinearity) नहीं पाई जाती, क्योंकि प्रत्येक जीन के भीतर क्रियाशील खण्डों के बीच-बीच में कुछ निष्क्रिय न्यूक्लिओटाइड्स के क्रम पाए जाते हैं।
– इन निष्क्रिय न्यूक्लिओटाइड्स के क्रम को एक्जॉन्स (Exons) कहते हैं तथा इनके बीच के खण्ड असंकेतक खण्ड कहलाते हैं। यूकैरियोट्स (Eukaryotes) में पॉलीपेप्टाइड शृंखला के संश्लेषण हेतु कोडॉन, सरेखित (Collinear) न होकर छोटे-छोटे खण्डों (Segments) में बँटे रहते हैं तथा इनके बीच-बीच में नाइट्रोजिनस क्षारकों के निष्क्रिय क्रम (Inactive sequence) उपस्थित होते हैं।
– इसलिए यूकैरियोट्स में पाए जाने वाले जीन्स (Genes) की अभिव्यक्ति केवल क्रिया विशेष के समय ही होती है।
– यूकैरियोटिक प्राणियों के DNA से बने mRNA में भी अवाँछित न्यूक्लिओटाइड वाले खण्ड पाए जाते हैं, जिन्हें प्रोटीन संश्लेषण (Protein synthesis) से पहले अलग करके क्रियाशील खण्डों (Active segments) को जोड़ा जाता है, यह क्रिया स्प्लिसिंग (Splicing) कहलाती है।
जीन अभिव्यक्ति की प्रक्रिया से सम्बन्धित परिकल्पना:-
– एक जीन-एक एन्जाइम सिद्धान्त (One Gene-one Enzyme Theory):-
– यह सिद्धान्त बीडल तथा टैटम द्वारा दिया गया।
– इन्होंने न्यूरोस्पोरा क्रासा (Nurospora crassa) नामक कवक पर प्रयोग करके जैव रासायनिक उत्परिवर्तन (Bio-Chemical Mutation) के आधार पर प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त (Theory) के अनुसार, जीवों के शरीर में एक जीन (प्रोटीन) का संश्लेषण करके इसके द्वारा जीवों की एक एन्जाइम विभिन्न क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
– इन्होंने यह पाया कि इन कवकों के उत्परिवर्ती (Mutant) बीजाणुओं (Spores) में थायमीन (Thymine) के संश्लेषण में 10 रासायनिक क्रियाएँ होती हैं तथा प्रत्येक क्रिया का नियंत्रण एक विशिष्ट एन्जाइम (प्रोटीन) के द्वारा होता है।
ओपेरॉन मॉडल:-
– जीवों की प्रत्येक कोशिका (Cell) में अनेक जीन्स (Genes) उपस्थित होते हैं, किन्तु प्रत्येक जीन सदैव सक्रिय (Active) नहीं होता है, कुछ जीन्स किसी विशिष्ट समय पर सक्रिय होते हैं तथा प्रोटीन (Protein) का संश्लेषण (Synthesis) करते हैं। कोई भी जीन किसी विशेष प्रकार के वातावरण में सक्रिय हो सकता है, जो कि दूसरे समय, वातावरण में परिवर्तन के कारण निष्क्रिय (Inactive) भी रहता है।
– जीन्स में पाई जाने वाली विशेषताओं के कारण ये प्रोटीन संश्लेषण में ट्रांसक्रिप्शन तथा ट्रांसलेशन में विभिन्न स्तरों (Levels) तक नियमन (Regulation) करते हैं।
– बीजाणुओं एवं विषाणुओं (Bacteria and viruses) में विभिन्न वातावरण में वृद्धि (Growth) एवं भिन्नता (Differentiation) की विभिन्न अवस्थाओं में प्रोटीन्स के विभिन्न प्रकार एवं विभिन्न मात्रा का संश्लेषण होता है। अत: जीन्स की सक्रियता का नियमन कुछ विशिष्ट जीन्स के द्वारा होता है जो नियामक जीन्स (Regular Gene) कहलाते हैं।
– जैकोब एवं मोनाड ने सर्वप्रथम ई. कोलाई जीवाणु (E. coli Bacteria) में लैक्टोज के अपचयन (Catabolism of Lactose) का अध्ययन करके एक विशिष्ट जीन्स ओपेरॉन (Operon) के बारे में बताया, जिनके अनुसार, E. Coli में ओपेरॉन ऑपरेटर (Operator), प्रोमोटर (Promotor) तथा संरचनात्मक जीन्स (structural genes) का समूह है, जो प्रोटीन संश्लेषण (Protein synthesis) की क्रिया में किसी एक प्रकार की रासायनिक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करने के लिए एंजाइमों (Enzymes) का निर्धारण करते हैं।
– ओपेरॉन, DNA से प्राप्त आनुवंशिक सूचनाओं (Genetic information) को कम या अधिक करने में समर्थ हैं। अत: ये कोशिका के आनुवंशिक रूप से नियंत्रित कोशिकीय मेटाबोलिज्म (Cellular metabolism) का नियमन (Regulation) करता हैं।
पादप ऊतक संवर्द्धन (Plant Tissue Culture):-
– इसकी सहायता से पादपों के जीवित ऊतकों को अधिक समय तक पादपों से पृथक् करके जीवित अवस्था में रखा जाता है तथा बाहर निकाले गए ऊतक को बहुत विशिष्ट प्रकार के रासायनिक एवं भौतिक वातावरण में रखा जाता है, जो वातावरण जीवधारी के शरीर में प्राप्त होते हैं।
– इस तकनीक के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के पादपों की कोशिकाओं, ऊतकों, अंगों आदि को पृथक् करके इच्छानुसार फ्लास्क (flask), परखनलियों (Test tubes) आदि में विशेषतौर से निर्जम परिस्थितियों (Aseptic conditions) में रखकर प्रयोगशालाओं में संवर्द्धन (Culture) कार्य किया जाता है।
– प्रयोगशाला में संवर्द्धन (Culture) करने के लिए कुछ तथ्यों पर ध्यान दिया जाता है; जैसे–
1. निर्जम परिस्थितियाँ (Aseptic Conditions):-
– सभी संवर्द्धन माध्यम में शर्कराएँ (Sugars) पाई जाती हैं, अतः इनमें कई प्रकार के सूक्ष्म जीव जैसे जीवाणु (Bacteria) एवं कवक (Fungi) आसानी से जन्म ले लेते हैं।
– इनका माध्यम में उगना अति हानिकारक होता है, क्योंकि कल्चर किए गए ऊतकों पर ये जीव आक्रमण करके उन्हें नष्ट कर देते हैं।
– अतः कल्चर मीडियम को प्रयोग करने से पहले अजीवित वस्तुएँ जैसे कल्चर मीडियम में काँच के उपकरण, टेस्ट ट्यूब, फ्लास्क, बीकर आदि को निर्जमीकृत किया जाता है।
2. संवर्द्धन तकनीकी (Culture Technique):-
– संवर्द्धन माध्यम में पाए जाने वाले पोषक तत्त्वों के अतिरिक्त शर्कराएँ तथा विटामिन्स को मिला देने पर ही उसमें ऊतकों का संवर्धन होता है।
3. पोषक माध्यम:-
– पोषक माध्यम को तैयार करने के लिए विभिन्न प्रकार के कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ मिलाए जाते हैं। इसके अलावा विटामिन्स, शर्कराएँ एवं कुछ वृद्धि नियामक; जैसे ऑक्जिन्स, साइटोकाइनिन्स आदि भी तैयार करते हैं।
– जैसा माध्यम (Medium) बनाना होता है उसके अनुसार रासायनिक पदार्थों को अलग-अलग तौल लिया जाता है और पानी में घोल दिया जाता है।
– इसके बाद मीडियम को पाइरेक्स (Pyrex) के बने हुए फ्लास्कों (Flasks), संवर्द्धन नलियों (Culture tubes), पेट्रीप्लेट्स (Petriplates) भरकर कॉटन का प्लग (Cotton plug) लगा दिया जाता है। इस तरह बर्तनों में भरे हुए संवर्द्धन मीडिया (Culture medium) में विभिन्न प्रकार के संवर्द्धन (Culture) तैयार किए जाते हैं।
पौधों में जीन स्थानान्तरण (Gene Transfer in Plants):-
– रूपान्तरण विधि द्वारा किसी बाहरी DNA का समावेश परपोषी जीनोम में किसी वांछनीय स्थिति पर किया जा सकता है। विदेशी जीनों को उच्चवर्गीय पादप कोशिकाओं में प्रवेश कराने तथा इससे प्रकट होने वाले लक्षणों का अध्ययन हम दो महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं के तहत कर सकते हैं–
1. जीन स्थानान्तरण (Gene Transfer)
2. रूपान्तरित पौधे या पराजीनी पौधे (Transformed or Transgenic Plants)
1. जीन स्थानान्तरण की दो विधियाँ हैं–
(i) वाहक युक्त जीन स्थानान्तरण:- इसमें प्लाज्मिड अथवा विषाणुओं के रूप में वाहकों की आवश्यकता होती है। यह दो प्रकार के होते हैं–
(a) प्लाज्मिड मध्यस्थ जीन स्थानान्तरण (Plasmid Mediated gene Transfer):-
– इसका सफल उदाहरण ट्यूमर प्रेरक “Ti” (Tumor Inducing) प्लाज्मिड पर आधारित है जो मृदा जीवाणु ऐग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस (Agrobacterium tumefacicus) में पाया जाता है। यह जीवाणु सभी चौड़ी-पत्तीधारी कृषि फसलों को तो प्रभावित करता है, लेकिन धान्य फसलों को नहीं।
– इसके द्वारा कैंसर वृद्धि को प्रेरित किया जाता है, जो क्राउन गॉल ट्यूमर (Crown gall tumour) कहलाता है। पादप कोशिकाओं में यह बदलाव उस टी आई (Ti) प्लाज्मिड द्वारा उत्पन्न किया जाता है जो जीवाणुओं द्वारा लाया गया है। ट्रांसजेनिक पौधे बनाने के लिए एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमिफेसियन्स के Ai प्लाज्मिड में विशिष्ट या वांछित जीन को पुन:स्थापित करते हैं।
– सामान्य प्लाज्मिड से पादप ट्यूमर होने का खतरा रहता है। परन्तु जीन के ट्यूमर बनाने वाले भाग (T-DNA) को हटाकर वहाँ वांछित DNA को रोपित करते हैं। इसके बाद पादप कोशिकाओं का रूपान्तरण सहकल्चर विधि से करते हैं। एग्रोबैक्टीरियम को कोशिका कल्चरों अथवा ऊतक कर्तोतकों के साथ सहकल्चर करते हैं।
– तम्बाकू तथा टमाटर की पत्तियों की डिस्कों का व्यापक उपयोग सहकल्चर में करते हैं। पत्ती की (कटी हुई) डिस्कों द्वारा उत्पादित एसीटोसिरोगोन Ti प्लाज्मिड ओपेरोनों को सक्रिय करता है। जिससे पराजीन सहित T-DNA बहुत सी कोशिकाओं में प्रवेश करता है और पादप संजीन में समाकलित होता है। दो दिन के पश्चात् रूपान्तरित पादप कोशिकाओं का उपयुक्त पोष पदार्थ पर कल्चर कर वरण करते हैं। यह तकनीक द्विबीजपत्री पादपों के लिए उपयोगी है।
(b) विषाणु मध्यस्थ जीन स्थानान्तरण (Virus Mediated Gene Transfer):-
– DNA व RNA वायरस दोनों ही उत्तम वाहक की तरह कार्य करते हैं। DNA जीनोम वाले दो वायरस समूहों (कालिमों वायरस, Caulimo virus एवं जेमिनी वायरस, Gemini virus) के द्वारा सर्वाधिक जीन स्थानान्तरण के प्रयोग किए गए हैं।
(ii) वाहक रहित जीन स्थानान्तरण (Vectorless Gene Transfer):-
– एग्रोबैक्टीरियम द्वारा जीन स्थानान्तरण केवल द्विबीजपत्री पादपों में ही होता है। अतः एकबीजपत्री पौधों में जो कि मुख्य धान्य हैं, जीन स्थानान्तरण के लिए अन्य विधियाँ काम में लेते हैं। बिना किसी जैविक कारक जैसे एग्रोबैक्टीरियम की सहायता से पादप कोशिका में DNA प्रवेश कराने तथा स्थायी रूपान्तरण प्राप्त करने को सीधा जीन स्थानान्तरण कहते हैं।
– पादप कोशिकाओं में स्वतः DNA प्रवेश बहुत ही कम होता है। इसमें विभिन्न भौतिक एवं रासायनिक उपचारों से DNA प्रवेश में सहायता करते हैं।
– वाहक रहित जीन स्थानान्तरण निम्नलिखित विधियों द्वारा होता है–
(a) इलेक्ट्रॉपोरेशन (Electroporation):- इस तकनीक में एक विद्युत धारा (Electric current) की सहायता से कोशिका झिल्लियों में ऐसे क्षणिक छिद्र (Transient pores) उत्पन्न किए जाते हैं जिनसे DNA के बड़े अणु भी कोशिका में प्रवेश कर सकते हैं। इसी विधि के प्रयोगों द्वारा ही एण्टीबायोटिक प्रतिरोध जीन का मक्के की कोशिकाओं में निवेशन (Insert) कराया गया है और यह विधि एकबीजपत्री पौधों में जीन स्थानान्तरण हेतु लोकप्रिय होती जा रही है।
(b) लिपोसोम द्वारा जीन स्थानान्तरण (Gene Transfer by Liposomes):- इसमें लिपिड की नन्हीं थैलियों में DNA को पैक कर दिया जाता है जो जीवद्रव्य के साथ संयोजित (Fuse) हो जाती है।
– सूक्ष्म इजेक्शन (Microinjection):- इस विधि में DNA को प्रोटोप्लास्टों सीधे ही विकासशील पुष्पक्रमों में दबाव के साथ प्रवेश करा दिया जाता है। इसे अनेक पादप जातियों (जैसे तम्बाकू, एल्फाएल्फा, राई आदि) में प्रयुक्त किया गया।
– स्थूलइंजेक्शन (Macroinjection):- इसमें प्रयुक्त सूइयों का व्यास कोशिका के व्यास से बड़ा होता है। DNA पुष्पीय मेरिस्टेमी कोशिकाओं के नीचे की कोशिकाओं में इस प्रकार अन्तःक्षेपित या इंजेक्ट (Inject) कर दिया जाता है कि वह जीवाणुजनक (Sporogenous) ऊतक में पहुँच जाए। इस विधि से ट्रांसजेनिक पौधे प्राप्त किए जा सकते हैं।
(c) रासायनिक विधियाँ:- कई रसायन जैसे पॉलिबिनाइल एल्कोहॉल एवं कैल्सियम फॉस्फेट पादप जीवद्रव्य में DNA का प्रवेश बढ़ाते हैं। पॉलिइथाइलिन ग्लाइकोल का प्रयोग इस कार्य के लिए विस्तृत तौर पर हुआ है। जीवद्रव्य को PEG के 20-25% घोल में रखा दिया जाता है। PEG जीवद्रव्य को कोई हानि नहीं होती। रूपान्तरित को चयन माध्यम में उगाकर मार्कर जीनों की सहायता से चयनित कर लिया जाता है। यह विधि द्वारा गेहूँ, जौ एवं चावल में जीन स्थानान्तरण एवं पराजीनी पौधे विकसित करने के लिए उपयुक्त हैं।
(d) जीनगन (Gene gun):- इसे शॉटगन (Shot-gun) भी कहते हैं। DNA से विलोपित (Coated) स्वर्ण टंगस्टन के 2-3 माइक्रो मी. व्यास वाले कणों को बुलेट (Bullet) के द्वारा उच्च वेग से लक्ष्य कोशिकाओं में दाग दिया जाता है। जिससे यह कोशिका भित्ति को भेद कर कोशिका के अन्दर प्रविष्ट हो जाते हैं तथा DNA को कोशिका के DNA में निवेशित होकर एकीकरण के लिए छोड़ देते हैं। सोयाबीन, धान, गेहूँ आदि में सफलतापूर्वक जीन स्थानान्तरण किया गया है।
2. ट्रांसजेनिक पौधे (Transgenic Plants):-
– पौधों में वाँछित जीनों के प्रवेश से उत्तम गुणों का समावेश हो जाता है तथा ये जीन भावी पीढ़ियों में निरन्तर बने रहते हैं, इन्हें पराजीनी पादप अथवा ट्रांसजेनिक पादप कहते हैं। जीन अभियांत्रिकी की सहायता से कई एकबीजपत्री व द्विबीजपत्री पादपों में जीन स्थानान्तरण कर लिया गया है।
– पराजीनी जीव ही आनुवंशिक रूपान्तरित जीव (Genetically Modified Organism = GMOs) कहलाते हैं।
– पराजीनी पादपों द्वारा प्राप्त भोजन आनुवंशिक रूपान्तरित भोजन’ (Genetically Modified Food) कहलाता है।
(i) पराजीनी पादप बनाने में निम्न चरण शामिल है –
(a) वाहक एवं स्थानान्तरित किए जाने वाले जीन को अलग करना।
(b) पुनर्योगज प्लाज्मिड का निर्माण एवं एग्रोबैक्टीरियम का रूपान्तरण।
(c) रूपान्तरित एग्रोबैक्टीरियम का पादप काय में स्थानान्तरण।
(d) रूपान्तरित कोशिकाओं को चुनना एवं पादपों में पुनर्जनन।
(e) वांछित जीन की पराजीनी पादप में अभिव्यक्ति की जाँच।
(ii) पराजीनी पादपों में उत्पन्न किए गए महत्त्वपूर्ण लक्षण –
(a) अजैविक प्रतिबल प्रतिरोधिता (Abiotic Stress Resistance)
(b) जीवाणु एवं कवक प्रतिरोधिता (Bacterial and Fungal Resistance)
(c) विषाणु प्रतिरोधिता (Virus Resistance)
(d) शाकनाशी प्रतिरोधिता (Herbicide Resistance)
(e) कीट प्रतिरोधिता (Insect Resistance)
(f) फलों के परिपक्वन (Delayed Fruit Ripening) में विलम्बन
पर्यावरण तथा मनुष्य पर पराजीनी पादपों का हानिकारक प्रभाव:-
(i) जीन का समान प्रजाति की फसलों और मिलते-जुलते जंगली पादपों में स्थानान्तरण।
(ii) अधिक प्रतिरोध क्षमता वाली फसल से नई महामारियों और बीमारियों के पैदा होने का खतरा।
(iii) नई किस्म की एलर्जी का खतरा।
(iv) सूक्ष्मजीवों तथा वायरस के आनुवंशिक पदार्थों के पौधों में प्रविष्ट होने का भय और इसके प्रभाव।
(v) पादप जैव विविधता के समाप्त होने का खतरा और नई प्रजातियों का प्राकृतिक वरण।
– जैव-तकनीकी के अनुप्रयोग (Application of Bio-technology):-
जैव तकनीकी का कृषि में अनुप्रयोग:-
– कृषि (Agriculture) के विभिन्न क्षेत्रों में जैव तकनीकी (Biotechnology) के अनुप्रयोग निम्नानुसार हैं–
1. पौधों की उत्पादक क्षमता में सुधार:-
– पौधों के न्यूक्लियर (Nuclear) तथा क्लोरो-प्लास्ट (Chloroplast) के जीन्स (Genes) को परिवर्तित करके अन्य प्रकार के पौधों में प्रकाश संश्लेषण क्षमता में सुधार किया जा सकता है तथा संगृहीत बीजों की प्रोटीन्स में पोषक पदार्थों का सुधार।
– नाइट्रोजन स्थिरीकारक सूक्ष्म जीवों (Micro-organisms) में नाइट्रोजिनेज (Nitrogenase) एन्जाइम पाया जाता है जिसके द्वारा जैवीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है। आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering) इसे क्लेबसीला निमोनी (Klebsiella Pneumonae) नामक जीवाणु के nif जीन्स को ई. कोलाई (E. coli) नामक जीवाणु में स्थानान्तरित कर इसमें नाइट्रोजन स्थिरीकरण का गुण उत्पन्न किया जा सकता है।
2. फसल बचाव के उपायों में सुधार:-
– आनुवंशिक इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी (Genetic Engineering Technology) द्वारा पादपों की उन्नत किस्मों (Improved varieties) को उगाया जाता है जिन पर कीट (Pests) एवं रोगजनक (Pathogens) आसानी से आक्रमण नहीं कर पाते हैं।
– विभिन्न प्रकार के रोग (Disease) बेकार जीन्स (Useless genes) द्वारा उत्पन्न हो सकते हैं, जिनको इस तकनीकी (Technology) द्वारा अलग किया जा सकता है एवं बचाया जा सकता है; उदाहरण–
– जैव तकनीकी (Biotechnology) की सहायता से अनेक नाशक कीट (Pests) रोधी (Resistance) पौधों का विकास किया गया है; जैसे– Dt-2 नामक विषैला जीन बेसीलस थ्यूरिन्जेनेसिस में पाया जाता है, जो लेपीडोप्टेरा लारवी के लिए घातक होता है।
– ये विष कृषि में अनेकनाशक कीटों (Pests); जैसे हिलियोथिस जिया के लार्वा को भी समाप्त कर देते हैं ।
– विषाणु रोगों (Viral diseases) का नियंत्रण पोषक पदार्थों को प्रतिरोधी (Resistance) बनाकर किया जा सकता है।
– इस क्रिया में विषाणु प्रतिरोधी गुण के लिए पादपों में नए जीन्स (Genes) उत्पन्न किए जा सकते हैं तथा जैव तकनीकी (Biotechnology) द्वारा इस प्रकार के पौधों का विस्तार किया जा सकता है तथा खरपतवारों (Weeds) से होने वाली हानियों को भी रोका जा सकता है।
– खेती में ग्लाइकोफॉस्फेट (Glycophosphate) का प्रयोग अपतृणनाशी (Herbicides) के रूप में किया जाता है जिसके प्रभाव से फसली पौधे (Crop Plants) तथा खरपतवार (Weeds) दोनों ही नष्ट हो जाते हैं।
3. कीट रोगजनकों का परिवर्धन (Development of Entomophathogens):-
– जैव तकनीकी (Biotechnology) के द्वारा सूक्ष्म जीवों का कीटनाशियों (Insecticides) के रूप में प्रयोग किया जाता है अतः यह सूक्ष्म जीवीय कीटनाशी, कीटरोगजनक (Entomopathogens) कहलाते हैं। सूक्ष्मजीवी कीटनाशी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होते हैं।
4. जैव उर्वरकों को तैयार करना:-
– जैव तकनीकी (Biotechnology) द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले सायनो-बैक्टीरिया को तैयार करके इनका प्रयोग उर्वरकों (Biofertilizers) के रूप में किया जाता है। जैसे– लेग्यूमिनस (Leguminous) पादपों की मूल में सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) करने वाले राइजोबियम (Rhizobium) की जातियों (Species) का निर्माण तथा आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) के लिए अनेक जीवाणुओं (Bacteria); जैसे क्लोस्ट्रिडियम, क्लेबसील (Klebsiella) तथा रोडोस्पाइरुलम (Rhodospirullum) आदि जैव उर्वरक (Biofertilizers) के रूप में प्रयोग में लाए जा रहे हैं।
5. प्रकाशीय श्वसन:-
– जैव तकनीकी के द्वारा राइबुलोज डाईफॉस्फेट कार्बोक्साइलेज एन्जाइम की कोडिंग (Coding) जीन द्वारा करवाई जा सकती है जिससे इसके द्वारा निर्मित पदार्थ केवल कार्बन डाई ऑक्साइड से संयोग करते हैं तथा ऑक्सीजन से क्रिया नहीं करते, इस प्रकार C3 पादपों में प्रकाश श्वसन (Photorespiration) को नियंत्रित करके पौधों के जैवभार (Biomass) में वृद्धि की जाती है।
– जैव तकनीकी का औषधीय अनुप्रयोग (Application of Biotechnology in Medicines):-
(a) टीका (Vaccine):- रोगों जैसे-टाइफाइड (Typhoid), कॉलेरा (Cholera), हेपेटाइटिस (Hepatitis), ल्यूकेमिया (Leukemia) आदि रोगों का प्रक्रिया रहित (Immune) इलाज वैक्सीन द्वारा किया जा सकता है जो जैव तकनीकी द्वारा निर्मित की जाती है।
(b) आनुवंशिक रोग (Genetic Disease):- आनुवंशिक दोषों को आनुवंशिकी इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) द्वारा हटाया जा सकता है या खराब जीन्स को हटाकर नवजात शिशु को रोगमुक्त बनाया जा सकता है। इस तकनीक में दोषमुक्त जीन हटाकर वाँछित जीन्स (Genes) को पुनः संयोजित (Recombination) करके आनुवंशिक रोगों का उपचार किया जाता है।
(c) सोमेटोस्टेटिन (Somatostatin):- यह मनुष्य के मस्तिष्क (Brain) के हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) द्वारा स्त्रावित होने वाला वृद्धि हॉर्मोन (Growth hormone) है। हर्बर्ट बोयर (Herbet Boyer) ने जैवतकनीकी (Biotechnology) की सहायता से इस हॉर्मोन को ई. कोलाई (E. coli) नामक जीवाणु से प्राप्त किया है।
(d) हॉर्मोन के रूप में:- स्तनधारी के अग्न्याशय के आइसलेट्स ऑफ लेगरहेन्स (Iselets of lagerhans) की बीटा कोशिकाओं (-Cell) से स्त्रावित होने वाले इन्सुलिन (Insulin) का उपयोग मधुमेह (Diabetes) रोग के निदान (cure) में करते हैं।
– आनुवंशिक अभियांत्रिकी द्वारा जीवाणुओं (Bacteria) में इन्सुलिन के निर्माण से सम्बन्धित जीन्स (Genes) को प्रत्यारोपित करके इन्सुलिन हॉर्मोन (Hormone) का उत्पादन किया जा सकता है।
– जैव तकनीकी का उद्योगों में अनुप्रयोग (Application of Biotechnology in Industries):-
– भोज्य पदार्थों का निर्माण:- इस तकनीक द्वारा ऐसे सूक्ष्म जीवों को तैयार किया जा सकता है जो न खाने योग्य (Inedible) जैवभार (Biomass) को प्रोटीनयुक्त भोजन में परिवर्तित कर सकते हैं, जिन्हें मनुष्य भोजन रूप में प्रयोग कर सकता है एवं सूक्ष्म जीवों को इस तकनीकी द्वारा तैयार करके पदार्थों का निम्नीकरण (Degradation) कराया जा सकता है जिसके फलस्वरूप जानवरों (Cattles) के खाने योग्य कार्बनिक पदार्थों का निर्माण हो सके।
– किण्वन तकनीक में:- किण्वन उद्योगों में निर्मित विभिन्न प्रकार के पदार्थों जैसे एल्कोहॉल (Alcohol), ऑर्गेनिक अम्ल आदि।
– पॉलीमरेज चैन रिएक्शन (PCR- Polymerase Chain Reaction):-
परिचय (Introduction):-
– किसी भी इच्छित जीन के प्रवर्द्धन (Gene amplification) अर्थात् DNA की अधिक संख्या में प्रतिलिपियाँ (Copies) प्राप्त करने हेतु सर्वप्रथम कैरी मुलिस ने एक तकनीक विकसित की जिसे पॉलीमरेज शृंखला क्रिया (Polymerase Chain Reaction PCR) तकनीक नाम दिया गया। यह तकनीक जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत उपयोगी साबित हुई। इस तकनीक द्वारा कुछ ही घण्टों में इच्छित DNA अथवा RNA खण्डों की अरबों प्रतियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। वर्तमान समय में PCR विधि को पूर्ण रूप से स्वचालित (automated) किया जा चुका है।
पॉलीमरेज शृंखला क्रिया जीवित कोशिका से बाहर (in vitro) कृत्रिम माध्यम में सम्पन्न करवायी जाती है। इसके लिए निम्नलिखित की आवश्यकता होती है–
1. एक ऐसा माध्यम तैयार करना होता है जिसमें प्रवर्द्धन हेतु इच्छित DNA अथवा RNA खण्ड जिनकी प्रतिलिपियाँ प्राप्त करनी हो, उपस्थित हो।
2. करीब 20 क्षारीय लम्बे दो ओलिगो न्यूक्लिओटाइड प्रारम्भकों (प्राइमर्स) की आवश्यकता होती है, जो कि इच्छित DNA खण्ड की दोनों शृंखलाओं के 3′ छोर पर उपस्थित अनुक्रमों के पूरक हों।
3. 4 प्रकार के DNA न्यूक्लिओसाइड ट्राइफॉस्फेट्स जिनके नाम क्रमशः डी-ऑक्सी थायमीन ट्राईफॉस्फेट (dTTP), डी-ऑक्सी साइटिडीन ट्राइफॉस्फेट (dCTP), डी-ऑक्सी एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट (dATP) तथा डी-ऑक्सी ग्वानोसीन ट्राइफॉस्फेट (dGTP) हैं, इनकी आवश्यकता होती है।
4. इनके अतिरिक्त एक ताप स्थिर (Heat stable) DNA पॉलीमरेज जैसे-Taq जिसे थर्मस एक्वेटिक्स (Thernus acquaticus) जीवाणु से विलगित किया जाता है, Pfu पाइरोकोकस फ्यूरिओसस (Pyrococcus furiosus) द्वारा विलगित तथा Vent जिसे थर्मोकोकस लिटोरेलिस (Thermococcus litoralis) जीवाणु द्वारा विलगित किया जाता है, इनकी आवश्यकता होती है। इसमें से Pfu तथा Vent पॉलीमरेजेज़ Taq पॉलीमरेज की तुलना में अधिक क्षमता वाले होते हैं।
PCR की विधि (Procedure of PCR):-
– पॉलीमरेज शृंखला अभिक्रिया के प्रारम्भ में सर्वप्रथम जीनोमिक DNA जिसके खण्ड की प्रतिलिपियाँ प्राप्त करनी होती हैं, उसे दो अतिरिक्त ओलिगोन्यूक्लिओटाइड प्रारम्भक अणुओं (Primers), चारों प्रकार के डीआक्सी राइबोन्यूक्लिओसाइड ट्राइफॉस्फेट्स तथा DNA पॉलीमरेज के साथ मिलाकर अभिक्रिया मिश्रण तैयार किया जाता है। तत्पश्चात् क्रमबद्ध निम्नलिखित चरणों में क्रिया सम्पन्न की जाती है–

– PCR विधि के विभिन्न चरणों का आरेखीय प्रदर्शन जिसमें DNA खण्ड प्रवर्धन हेतु उपयोग में लिए जाने वाले प्रारम्भक इस खण्ड के 3′ छोर के सम्पूरक होते हैं।
I. चरण (I step):- इस चरण में अभिक्रिया मिश्रण को प्राय: 90-98°C ताप पर गर्म किया जाता है, जिससे DNA का विकृतीकरण (Denaturation) हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप DNA के दोनों रज्जुक पृथक् हो जाते हैं तथा DNA संश्लेषण हेतु टेम्पलेट के रूप में कार्य करते हैं।
II. चरण (II step):- अब इस मिश्रण को सामान्यत: 40-60°C ताप तक ठण्डा किया जाता है जिससे दोनों प्राइमर्स इच्छित DNA टेम्पलेट के 31 छोर पर उपस्थित सम्पूरक क्षारक अनुक्रमों से जुड़ जाते हैं । यह क्रिया एनीलिंग (Annealing) कहलाती है।
III. चरण (III step):- इस चरण में तापक्रम लगभग 40-60° C तक स्थिर किया जाता है जिससे DNA पॉलीमरेज प्रारम्भक के 31-OH सिरे को उपयोग में लेकर सम्पूरक शृंखला का निर्माण करता है। यह अभिक्रिया पूर्णरूप से जीवित कोशिका में होने वाली DNA प्रतिकृतीकरण (Replication) क्रिया के समान ही होती है। संश्लेषित होने वाली सम्पूरक शृंखला जीवित कोशिका में DNA द्विकुण्डलन के पृथक् होने के बाद बनने वाली लीडिंग शृंखला के समान ही होती है। इस चरण में दोनों प्रारम्भक एक-दूसरे से विपरीत दिशा में विस्तारित अथवा खिंच जाते हैं जिससे उन दोनों के मध्य उपस्थित DNA खण्ड का प्रतिलिपीकरण (DNA fragment copied) कर लिया जाता है।
– जब माध्यम से Taq DNA पॉलीमरेज का उपयोग किया जाता है तो तापक्रम 70° से 75°C तक रखा जाता है। इस ताप के अन्य लाभ भी होते हैं, जैसे जीवाणु ई. कोलाई DNA पॉलीमरेज़ के लिए अनुकूल ताप 37°C की तुलना में 70° से 75°C ताप पर 20 क्षारी लम्बे प्रारम्भकों तथा DNA के मध्य युग्मन (Pairing) अधिक विशिष्ट होता है तथा यह अवाँछित (Undesirable) DNA के बहुगुणन को भी रोकता है। वाँछित DNA के प्रवर्द्धन को, प्रारम्भक की लम्बाई तथा Mg++ आयन्स की उपयुक्त मात्रा द्वारा बढ़ाया जा सकता है।

DNA प्रवर्धन का प्रथम चक्र पूर्ण (8 DNA अणु)
– तृतीय चरण के पूर्ण होते ही DNA प्रवर्द्धन (DNA Amplification) का प्रथम चक्र पूर्ण हो जाता है। इसे पूरा होने में लगभग 1-3 मिनट का समय लगता है।
IV. चरण (IV Step):- DNA प्रवर्द्धन का दूसरा चक्र DNA विकृतीकरण (Denaturation) से प्रारम्भ होता है। जिसमें नव संश्लेषित DNA शृंखला पुरानी DNA शृंखला से पृथक् हो जाती है तथा DNA एनीलन (शीतन) के समय प्रारम्भक नई एवं पुरानी दोनों शृंखलाओं से क्षार युग्म बनाता है। इस समय DNA शृंखलाओं की कुल संख्या पूर्व में उपस्थित DNA शृंखलाओं की संख्या से दुगुनी होती है। इस प्रकार DNA प्रवर्द्धन का द्वितीय चक्र पूर्ण होता है, जिसमें इच्छित DNA (अथवा RNA) खण्ड की प्रतिलिपियाँ होती हैं।
– उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रत्येक चक्र में नई व पुरानी दोनों शृंखलाएँ प्रारम्भक से जुड़ती हैं तथा DNA संश्लेषण हेतु टेम्पलेट के रूप में कार्य करके पूर्व में उपस्थित DNA प्रतिलिपियों की संख्या को दुगुनी करती है। इन चक्रों की संख्या 60 तक हो सकती है। किन्तु 20-30 चक्र उपयुक्त संख्या होती है सम्पूर्ण प्रक्रिया हेतु उपयोग में ली जाने वाली स्वचालित PCR मशीनें थर्मल साइक्लर्स कहलाती हैं।
PCR की विविधताएँ (Variations of PCR):-
– PCR तकनीक को विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति तथा विभिन्न अनुप्रयोगों हेतु रूपान्तरित किया गया है, जिन्हें PCR की विविधताएँ (Variations of PCR) कहते हैं। उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण विविधताएँ निम्नानुसार वर्णित हैं–
(i) प्रतिलोमी PCR (Inverse PCR):- इस प्रकार की PCR तकनीक का उपयोग DNA अणु के दोनों सिरों पर उपस्थित ज्ञात क्षारीय अनुक्रमों को प्रवर्धित करने के लिए किया जाता है। इस तकनीक में इच्छित DNA खण्ड के 51 सिरे पर उपस्थित अनुक्रमों के सम्पूरक ओलिगोन्यूक्लिओटाइड प्रारम्भकों का उपयोग किया जाता है। यह प्रारम्भकों के 31OH स्वतन्त्र सिरे को बाहर की ओर पलट देता है। इसके परिणामस्वरूप नव संश्लेषित शृंखला उपयोग में लिए जाने वाले DNA खण्ड से दूर विपरीत दिशा में वृद्धि करती है। इसे प्रतिलोमी PCR कहते हैं।
(ii) सलांगी PCR (Anchored PCR):- जब किसी जीन अथवा इच्छित DNA खण्ड के केवल एक ही सिरे (31 end) पर उपस्थित अनुक्रम ज्ञात हो तब इस सिरे का अथवा 31 रज्जुक के सम्पूरक प्रारम्भक का उपयोग कर DNA एकल शृंखला की अनेकों प्रतिलिपियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। इस हेतु (Poly G) पूँछ (Tail) अथवा कोई भी समबहुलक (Homopolymer) पूँछ को, PCR द्वारा संश्लेषित एकल रज्जुक के 31 सिरे पर जोड़ा जाता है, जिसके लिए कोई प्रारम्भक उपलब्ध नहीं होता है। इसके परिणामस्वरूप सम्पूरक पॉली C समबहुलक का उपयोग एक प्रारम्भक के रूप में कर लिया जाता है। इससे PCR द्वारा निर्मित एक रज्जुकी DNA को कॉपी (Copy) करके पूर्ण DNA द्विकुण्डल (DNA Duplex) प्राप्त किए जाते हैं। संश्लेषित DNA द्वि कुण्डल को सामान्य प्रक्रिया द्वारा प्रवर्धित किया जाता है। यह प्रक्रिया संलागी PCR कहलाती है।
(iii) अतिव्यापन विस्तार द्वारा स्थल निर्दिष्ट उत्परिवर्तन जनन के लिए PCR (PCR for site Directed Mutagenesis by Overlapping Extension):- इस PCR तकनीक का उपयोग किसी जीन में विशिष्ट स्थल पर उत्परिवर्तन को प्रेरित करने के लिए किया जाता है। इसके लिए जिस स्थल पर उत्परिवर्तन प्रेरित करना होता है उसका क्षार अनुक्रम ज्ञात होना चाहिए। इस अनुक्रम को PCR तकनीक में उपयोग में आने वाले प्रारम्भक के निर्माण हेतु उपयोग में लिया जाता है। इच्छित उत्परिवर्तन का प्रेरण प्रारम्भकों के क्षार अनुक्रमों में परिवर्तन करके किया जाता है। इन रूपान्तरित प्रारम्भकों; जिनके क्षार क्रमों को उत्परिवर्तित किया जा चुका होता है, उन्हें PCR तकनीक द्वारा प्रवर्धन हेतु उपयोग में लिया जाता है। उत्परिवर्तन हेतु प्रारम्भकों का उपयोग इसलिए किया जाता है चूँकि उनमें उत्परिवर्तन प्रेरण आसान होता है।
– किसी जीन के आन्तरिक स्थल को रूपान्तरित करने के लिए अतिव्यापन विस्तार PCR तकनीक काम में ली जाती है। इसके लिए जीन के जिस स्थल में उत्परिवर्तन प्रेरित करना होता है, उसके क्षार अनुक्रमों को उपयोग में लेकर दो सम्पूरक प्रारम्भक तैयार किए जाते हैं। इन प्रारम्भकों में क्षार क्रमों को परिवर्तित करके इच्छित उत्परिवर्तन प्रेरित कर दिए जाते हैं। ये प्रारम्भक जीन के 31 सिरे पर उपस्थित क्षार क्रमों के लिए विशिष्ट होते हैं। इस PCR को दो पृथक् अभिक्रियाओं द्वारा पूर्ण किया जाता है (1) पहली अभिक्रिया में प्रथम 31 छोर प्रारम्भक तथा पहला आन्तरिक स्थल प्रारम्भक का उपयोग किया जाता है। (2) दूसरी अभिक्रिया में द्वितीय 31 छोर प्रारम्भक तथा दूसरा आन्तरिक स्थल प्रारम्भक का PCR हेतु उपयोग किया जाता है।
– उपर्युक्त अभिक्रिया में PCR द्वारा जीन की एक पूर्ण तथा एक अपूर्ण शृंखला का निर्माण होता है। दोनों अभिक्रियाओं द्वारा संश्लेषित अपूर्ण शृंखलाओं में कुछ सम्पूरक अनुक्रम पाए जाते हैं। अपूर्ण शृंखलाओं को इलेक्ट्रोफोरेसिस द्वारा पृथक् कर लिया जाता है, फिर उन्हें मिश्रित करके एनीलन द्वारा उनसे जीन डुपलेक्स तैयार कर लिए जाते हैं, जिनमें आन्तरिक स्थल पर विशिष्ट उत्परिवर्तन मौजूद होते हैं।
(iv) DNA अनुक्रमण हेतु असममित PCR (Asymmetric PCR for DNA Sequencing):- इस प्रकार की PCR तकनीक का उपयोग DNA अनुक्रमण (DNA sequencing) हेतु काम में लिए जाने वाले DNA अनुक्रमों की एकल रज्जुकी शृंखलाओं के निर्माण के लिए किया जाता है। इसके लिए सम्बन्धित खण्ड के पूरक प्रारम्भकों की मात्रा का अनुपात 100:1 रखा जाता है, जिन्हें अभिक्रिया मिश्रण में मिलाया जाता है। इससे PCR पूर्ण होने से पूर्व एक प्रारम्भक दूसरे प्रारम्भक की तुलना में लगभग 10 चक्र पहले ही समाप्त हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप अन्तिम 10 चक्रों में केवल एक रज्जुकी DNA खण्ड की ही प्रतिलिपियाँ प्राप्त होती हैं। PCR के इस रूपान्तरण को असममित PCR कहते हैं।

स्थल निर्दिष्ट उत्परिवर्तनजनन के लिए अतिव्यापन PCR:-
PCR के अनुप्रयोग (Applications):-
1. आनुवंशिकी में उपयोग (Use in Genetics):-
– आनुवंशिकी के क्षेत्र में PCR तकनीक का उपयोग कर किसी जीव का जाति विशेष के सदस्यों, विभिन्न कायिक कोशिकाओं अथवा युग्मकों में उपस्थित किसी विशिष्ट जीन अथवा DNA खण्ड को प्रवर्द्धित (Amplify) किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप प्राप्त प्रतियों का उपयोग क्लोनिंग (Cloning) में भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जीन्स को अनुक्रमित (Gene sequencing) कर विभिन्न जीवों, कोशिकाओं अथवा युग्मकों के जीन्स में होने वाले उत्परिवर्तनों के विषय में सूचना प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार प्राप्त सूचनाओं का उपयोग बीमारियों के निदान, समष्टि आनुवंशिकी (Population Genetics) आदि में किया जा सकता है।
– इसके अलावा किसी जीव प्रजाति में लिंकेज मैप (Linkage map) बनाने हेतु विशिष्ट जीनों के मध्य पुनर्योजन आवृत्ति (Recombination frequency) को आकलित कर मानव में लिंकेज मैप (सहलग्नता मानचित्रण) सरलता से बनाए जा सकते हैं। इस हेतु PCR व DNA अनुक्रमणता तकनीकों का एक साथ प्रयोग किया जाता है।
– PCR तकनीक द्वारा किसी गुणसूत्र अथवा सूक्ष्म विच्छेदित गुणसूत्र खण्डों को आवर्धित करके किसी जीन की भौतिक स्थिति का पता लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त PCR तकनीक द्वारा भ्रूण के लिंग का पता भी लगाया जा सकता है।
2. DNA की बहुरूपता का अध्ययन (Study of DNA Polymorphism):- किसी सजीन (genome) में DNA बहुरूपता (Polymorphism) ज्ञात करने हेतु इस तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ज्ञात क्षारक क्रमों वाले ओलिगोन्यूक्लिओटाइड को यादृच्छिक (random) प्रारम्भक के रूप में उपयोग में लिया जाता है। ऐसा करने पर केवल वही DNA खण्ड आवर्धित होते हैं जो कि ओलिगोन्यूक्लिओटाइड क्षारक क्रमों के सम्पूरक होते हैं। PCR का यह अनुप्रयोग यादृच्छित पॉलीमोर्फिक DNA (Random Amplified Polymorphic DNA RAPD) बनाता है जिन्हें जैल इलेक्ट्रॉफोरेसिस द्वारा पट्टिकाओं (Bands) के रूप में ज्ञात किया जा सकता है। इसके द्वारा अलग-अलग प्रभेदों या जातियों के RAPD बैण्ड्स की तुलना भी की जा सकती है। इनका उपयोग मक्का, सोयाबीन, चूहे, मनुष्य आदि में RAPD मानचित्रण बनाने में किया जा चुका है।
3. ट्रांसजीन की उपस्थिति का निर्धारण (Confirming the presence of transferred gene):- PCR तकनीक द्वारा किसी जीव में स्थानान्तरित किए गए ट्रांसजीन की उपस्थिति का पता लगाया जा सकता है। इस हेतु ट्रांसजीन के दोनों 31 सिरों के पूरक प्रारम्भकों का उपयोग कर ट्रांसजेनिक जीन में DNA आवर्धन किया जाता है। PCR द्वारा DNA आवर्धन तभी सम्भव होता है जबकि सम्बन्धित ट्रांसजीन उस जीव में उपस्थित हो। आवर्धित DNA को इलेक्ट्रॉफोरेसिस द्वारा बैण्ड्स के रूप में पहचान लिया जाता है। यद्यपि इस प्रक्रिया हेतु अन्य विधियों; जैसे – न्यूक्लिक अम्ल संकरण विधियों ( डॉट ब्लॉट, सदर्न तथा नदर्न संकरण) का प्रयोग किया जा सकता है, किन्तु उनमें अधिक समय लगता तथा रेडियोधर्मिता का उपयोग होता है। इनकी तुलना में PCR तकनीक में केवल एक दिन का समय लगता है तथा रेडियोधर्मिता का उपयोग नहीं होता है। इसमें केवल DNA पट्टिका पहचान हेतु इथीयम ब्रोमाइड अभिरंजक की आवश्यकता होती है।
DNA फिंगर प्रिन्टिंग (DNA Finger Printing):-
परिचय (Introduction):-
– वर्तमान समय में फोरेन्सिक मेडीसिन (Forensic Medicine) के क्षेत्र में अपराधियों व अवैध सन्तानों के वास्तविक जनकों (Parents) तथा पादप जातियों की पहचान हेतु DNA का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए प्रयुक्त होने वाली विधि DNA फिंगर प्रिन्टिंग (DNA finger printing) अथवा DNA प्रोफाइलिंग (DNA profiling) कहलाती है। इस तकनीक को सर्वप्रथम सन् 1986 में एलेक जैफरीज (Alec Jeffrey’s, 1986) एवं उसके साथियों ने विकसित किया।
– सामान्यत: इस तकनीक में सम्बन्धित व्यक्ति के बाल, रक्त नमूने, रक्त के धब्बे, वीर्य आदि में उपस्थित DNA खण्डों का उपयोग DNA फिंगर प्रिन्टिंग विधि में किया जाता है तथा अपराधी की पहचान की जाती है। इसके अतिरिक्त इस तकनीक में DNA प्रोब (DNA Probe) की आवश्यकता होती है। प्रोब (Probe) DNA के वे छोटे (15 से 30 क्षार युक्त) न्यूक्लिओटाइड अनुक्रम होते हैं जिनका प्रयोग किसी दूसरे न्यूक्लिक अम्ल (DNA) के अनुक्रमों को पहचानने हेतु किया जाता है प्रोब कहलाते हैं। इन प्रोब्ज का उपयोग DNA फिंगर प्रिन्टिंग तकनीक में पादप जातियों व किस्मों, अपराधियों व बच्चों का उनके जनकों से पैतृक सम्बन्ध आदि की पहचान हेतु किया जाता है। यह विधि अन्य विधियों से अधिक विश्वसनीय है।
DNA फिंगर प्रिन्टिंग विधि (Method of DNA Finger Printing):-
– DNA फिंगर प्रिन्टिंग विधि को निम्नलिखित चरणों द्वारा समझा जा सकता है–
1. प्रथम चरण में सर्वप्रथम जिस अपराधी अथवा पादप जाति की पहचान करनी होती है उसका DNA प्रतिदर्श (DNA sample) प्राप्त किया जाता है। जिसे अधिकतर रक्त नमूनों अथवा ठोस ऊतकों से प्राप्त किया जाता है। किन्तु इसे कई वर्ष पुराने रक्त धब्बों, कपड़ों पर लगे वीर्य, योनि स्त्राव तथा मृत व्यक्ति के बाल व बोन मैरो (Bone Marrow) आदि से भी प्राप्त किया जा सकता है। इस हेतु DNA की सूक्ष्म मात्रा अर्थात् कुछ नैनोग्राम मात्रा में ही DNA की आवश्यकता होती है।
2. दूसरे चरण में अपराधी अथवा सम्बन्धित व्यक्ति के DNA प्रतिदर्श को उपयुक्त प्रतिबन्ध एण्डोन्यूक्लिएज (Restriction Endonuclease) के साथ मिलाकर पाचन (digestion) करवाया जाता है। उसके पश्चात् प्राप्त पचय (digest) का जैल विद्युत संचलन (Gel electrophoresis) करवाया जाता है। जिसमें एगरोज जैल (Agarose gel) अथवा पॉलीएक्रेलेमाइड (Polyacrylamide) का उपयोग किया जाता है। यह तकनीक सदर्न हाइब्रिडाइजेशन ब्लोटिंग (Southern hybridization blotting) कहलाती है। इस विधि में जैल (gel) से विकृतिकृत DNA का स्थानान्तरण नाइट्रोसेल्यूलोज फिल्टर मेमब्रेन में हो जाता है। फिल्टर मेमब्रेन को 80°C ताप गर्म करके DNA को स्थिर (fix) किया जाता है।

DNA फिंगरप्रिन्टिंग विधि का आरेखीय प्रदर्शन
3. नाइट्रोसेल्यूलोज फिल्टर मेमब्रेन पर उपस्थित DNA का एक उपयुक्त एकल रज्जुकी रेडियो एक्टिव प्रोब से संकरण (Hybridization) करवाया जाता है। इसके परिणामस्वरूप स्वतन्त्र प्रोब पृथक् हो जाता है। केवल उन पट्टिकाओं (Bands) जिनमें प्रोब तथा DNA का संकरण हो चुका होता है, उन्हें ऑटोरेडियोग्राफी द्वारा पहचान लिया जाता है।
– DNA फिंगर प्रिन्टिंग में उपयोग में लिए जाने वाले प्रोब्ज को मिनी सैटेलाइट (Mini satellite) अथवा माइक्रो सैटेलाइट DNA (Micro satellite DNA) द्वारा तैयार किया जाता है। इस प्रकार के प्रोब्ज अधिक विविधताओं युक्त होते हैं, क्योंकि इनमें टेन्डम रिपीट्स की संख्या में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं, उदाहरणत: GGAGG TGGGCAGGAG (or A) G. इसके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रोब्ज के उदाहरण-प्रोब 33.6 [(CAGGGCTGGAGG)3]18, प्रोब 33.15 (AGAGGTGGG CAGG TGG)29 आदि हैं। ये प्रोब मिनी सैटेलाइट DNA के बहुरूपी विस्थल (Polymorphic loci) पर संकरण करते हैं। इसी क्रम में धारीदार क्रेट सर्प के लिंग गुणसूत्र से एक सरल सार्वत्रिक (Universal) प्रोब (BKm) विकसित किया गया है, जिसमें GATA टेन्डम पाया जाता है। यह प्रोब न केवल मानव अपितु अन्य जन्तुओं व पादपों की DNA फिंगर प्रिन्टिंग में अधिक उपयोगी साबित हुआ है। सामान्यत: पादपों में इस प्रकार के प्रोब्ज उपलब्ध न होने के कारण पादप जातियों की पहचान हेतु रेस्ट्रिक्शन फ्रेगमेन्ट लेन्थ पॉलीमोर्फिजम (RFLPs) का उपयोग किया जाता है। DNA फिंगर प्रिन्ट प्राप्त करने हेतु पुनरावृत्त ओलिगोन्यूक्लिओटाइड अनुक्रमों का प्रोब के रूप में उपयोग किया जाता है। उदाहरण – (CT)n or (AC)n तथा मिनी सेटेलाइट DNA प्रोब्ज का चावल की किस्मों को पहचानने में किया जाता है।
– DNA फिंगर प्रिन्टिंग की उपयोगिता (Uses of DNA Finger Printing):-
1. अपराधी की पहचान (Identification of Culprit or Criminal):- अपराधी की पहचान हेतु संदेह के घेरे में पाए जाने वाले व्यक्ति/व्यक्तियों के DNA फिंगर प्रिन्ट्स में प्राप्त होने वाले बैण्ड्स (Bands) की तुलना टेस्ट DNA फिंगर प्रिन्ट्स में प्राप्त होने वाले बैण्ड्स (Bands) से की जाती है, जिसे अपराधी द्वारा छोड़े गए प्रमाण जैसे-रक्त तथा वीर्य के धब्बों आदि से प्राप्त किया जाता है। यदि दोनों में पूर्ण समानता पाई जाती है तभी वास्तविक अपराधी की पहचान हो पाती है।
2. बच्चे के वास्तविक जनकों की पहचान (Identification of Real Parents of a Child):- जब किसी बच्चे के असली माँ व पिता होने का विवाद हो, ऐसे मामलों में बच्चे के DNA फिंगर प्रिन्ट्स की तुलना माँ तथा सन्देहिल (Suspected) पिता दोनों के DNA फिंगर प्रिन्ट्स से की जाती है। पहले बच्चे के DNA फिंगर प्रिन्ट में प्राप्त होने वाले बैण्ड्स का मिलान माता के DNA फिंगर प्रिन्ट में प्राप्त होने वाले बैण्ड्स से किया जाता है तथा समान होने पर उसे अंकित कर लिया जाता है। इसके पश्चात् बच्चे के DNA फिंगर प्रिन्ट में बचे हुए बैण्ड्स का मिलान माता के DNA फिंगरप्रिन्ट में प्राप्त होने वाले बैण्ड्स की तुलना पिता के DNA फिंगर प्रिन्ट में उपस्थित बैण्ड्स से की जाती है। यदि दोनों में समानता होती है तो वही बच्चे का असली पिता होता है।
3. चिकित्सा में उपयोग (Use in Medicine):- चिकित्सा के क्षेत्र में DNA फिंगर प्रिन्टिंग का बहुत अधिक महत्त्व है। इसका प्रयोग आनुवंशिक परामर्शों (Genetic Counselling) में, बोन मैरो ट्रांसप्लान्ट में दाता कोशिकाओं की आवृत्ति जानने हेतु, ऊतक संवर्धन में कोशिकाओं की पहचान आदि में किया जाता है। इनके अतिरिक्त पेटेन्ट (Patent) कराने हेतु पादप किस्मों की पहचान तथा उनके जनकों व लक्षणों को चिह्नित करने तथा सूक्ष्म जीवों के प्रभेदों की पहचान करने में DNA फिंगर प्रिन्टिंग विधि अधिक उपयोगी साबित हुई है।
– भारत में DNA फिंगर प्रिन्टिंग टेस्ट कोशिका एवं आण्विक जीव विज्ञान केन्द्र हैदराबाद में होता है।
– आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित फसलें (Genetically Modified Crops):-
परिचय (Introduction):-
– जैव प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत अपनाई जाने वाली पुनर्योगज DNA तकनीक अथवा जीन अभियांत्रिकी द्वारा आर्थिक महत्त्व की खाद्य फसलों के जीनोम (Genome) में वांछित लक्षणों की अभिव्यक्ति हेतु जीन्स को निवेशित कर आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित (Genetically modify) किया गया है, जिन्हें आम भाषा में GM खाद्य फसलें कहा जाता है। जिन पादप प्रजातियों के जीनोम को रूपान्तरित किया जा चुका होता है, उन्हें ट्रांसजेनिक पादप कहते हैं।
– जैसा कि हम जानते हैं कि खाद्य फसलों की उत्पादन क्षमता को विभिन्न कीट व रोगकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित करते हैं, जिन्हें नियंत्रित करने के लिए विभिन्न रासायनिक कीटनाशियों का असीमित उपयोग किया जाता है, जिससे पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इन रसायनों का कम से कम उपयोग हो इस हेतु ट्रांसजेनिक पादप विकसित करना एक सुरक्षित विकल्प है। इसे अपनाकर खाद्य फसलों में विभिन्न वांछित लक्षणों को अभिव्यक्त करने वाले ट्रांसजेनिक पादप विकसित किए जा सकते हैं। वर्तमान समय तक आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित की गई प्रमुख खाद्य फसलें निम्नलिखित हैं :
गोल्डन-राइस (Golden-Rice):-
– ‘गोल्डन-राइस’ एक Vit-A बाहुल्यता वाली चावल की ट्रांसजेनिक प्रजाति है। बच्चों में Vit-A की कमी कई देशों जैसे-अफ्रीका, लैटिन अमेरिका व कैरेबियन देशों में भी होती है।
– यद्यपि Vit – A की कमी को दवाइयों, टीके आदि द्वारा दूर किया जा सकता है फिर भी Vit-A बाहुल्य ट्रांसजेनिक पादप विकास एक महत्त्वपूर्ण विकल्प है। Vit-A की कमी से उबरने में जीन अभियांत्रिकी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इस हेतु चावल व सरसों के ट्रांसजेनिक पादप विकसित किए गए हैं। Vit-A की अधिक मात्रा युक्त चावल गोल्डन राइस (Golden Rice) व सरसों गोल्डन सरसों (Golden Mustard) कहलाते हैं। Vit-A की अधिक मात्रा के कारण चावल के दाने गोल्डन रंग के होते हैं, इसलिए इन्हें गोल्डन राइस कहते हैं।
गोल्डन राइस का विकास (Development of Golden rice):-
– चावल करोड़ों लोगों के लिए मुख्य खाद्य फसल है। इसके भ्रूणपोष में कोई भी प्रोविटामिन-A (Provitamine -A) नहीं पाया जाता है। किन्तु इसके अपरिपक्व भ्रूणपोष में जिरेनाइल-जिरेनाइल डाइफॉस्फेट (GGPP) मध्यवर्ती (Intermediate) उत्पाद संश्लेषित करने की क्षमता होती है। जिसका उपयोग एक रंगहीन कैरोटीन फाइटोइन (Carotene-phytoene) उत्पादित करने में किया जा सकता है। जिसके लिए चावल के भ्रूणपोष में फाइटोइन सिंथेज (Phytoene-Synthase) एन्जाइम अभिव्यक्त होना अति आवश्यक है। बीटा कैरोटीन के संश्लेषण के लिए तीन पादप एन्जाइम्स की आवश्यकता होती है, अर्थात् गोल्डन राइस को विकसित करने के लिए (1) पादप फाइटोइन सिंथेज जीन (psy) नारसिसस पादप प्रजाति (Narcissus pseudonurcissus) से (2) पादप जीन -लाइकोपीन -साइक्लेज (Icy) भी इसी पादप से विलगित किए गए। एक अन्य (3) जीन फाइटोइन डीसेचुरेज (crtl) जीवाणु इरविनिया यूरिडोवोरा (Erwrinia uredovora) से विलगित किया गया।
– गोल्डन राइस को विकसित करने के लिए इनगोपोट्रिक्स (Ingopotrykus) ने स्विट्जरलैण्ड में व पीटर बेयर (Peter Beyer) ने जर्मनी में तथा यी. व अन्यों (Ye et. al) ने सन् 1996-2000 तक अनुसंधान कार्य किए व ट्रांसजेनिक गोल्डन राइस विकसित करने में सफलता हासिल की। इस ट्रांसजेनिक राइस में बीटाकैरोटीन व कैरोटिनोइड्स (Beta carotene & Carotenoids) उपस्थित थे जो कि Vit-A के अग्रगामी (Precursor) होते हैं।
– इस हेतु चावल में एग्रोबैक्टीरियम मध्यस्थ रूपान्तरण विधि का उपयोग कर चावल के भ्रूणपोष में सम्पूर्ण -Carotene जैव संश्लेषण परिपथ को निवेशित कर दिया गया। उपर्युक्त तीनों जीन्स को भ्रूणपोष विशिष्ट ग्लूटेलिन (Gtl) व CaMV 35S प्रमोटर के नियंत्रण में रखा गया। फाइटोइन सिंथेज़ जीन एक कार्यात्मक ट्रॉजिट पेप्टाइड को कोड करता है तथा crtl जीन में पी रूबिस्को की छोटी इकाई के लिए ट्रांजिट पेप्टाइड (tp) अनुक्रम होता है। ये दोनों भ्रूणपोष में लाइकोपीन निर्माण को निर्देशित करते हैं। जो कि जिरेनाइल-जिरेनाइल डाइफॉस्फेट निर्माण स्थल होता है। तीसरा जीन लाइकोपीन 𝛽-साइक्लेज़ में कार्यात्मक ट्रांजिट पेप्टाइड अनुक्रम होता है। जो कि लवकों को लाने व मार्कर के लिए आवश्यक होता है। इस प्रकार उपर्युक्त ट्रांसजीन आवश्यक एन्जाइम क्रियाशीलता प्रदर्शित करते हैं। परिणामस्वरूप ट्रांसजेनिक राइस पादपों में पर्याप्त मात्रा में 𝛽-carotene उत्पादित होता है जो कि Vit-A में परिवर्तित हो जाता है।
– इस प्रकार गोल्डन राइस का विकास गरीबी खत्म करने व मानव स्वास्थ्य सुधार हेतु विटामिन A की कमी को खत्म करने के लिए अन्य विकल्पों के अलावा एक उपयोगी विकल्प साबित हुआ। इस ट्रांसजेनिक पादप को विकसित करने के लिए कई प्राइवेट कम्पनियों को बौद्धिक सम्पदा अधिकार व लाइसेंस प्रदान किए गए जो कि ट्रांसजेनिक गोल्डन राइस विकसित करने की तकनीक को विकासशील देशों में मानव उपयोग हेतु प्रदान कर सकती थी। सन् 2001 में गोल्डन राइस के बीजों [International Rice Research Institute (IRRI)] को फिलीपाइन्स में इसकी उपयोगिता व सुरक्षा जाँच हेतु (Field trials) भेजा गया। जाँचों के पश्चात् सन् 2005-06 में किसानों को इसकी खेती करने के लिए मुक्त कर दिया गया।
Bt-कपास (Bt-Cotton):-
– Bt-Cotton कपास की आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित किस्म है जो कि एक कीटनाशी (Insecticide) उत्पादित करती है, Bt-Cotton कहलाती है। इसे अमेरिकन कम्पनी मोनसेन्टो (Monsanto) ने विकसित किया तथा भारत में महाराष्ट्र हाइब्रिड कम्पनी (Mahyco) ने इसका वितरण किया।
– सन् 2000 व 2001 में इस ट्रांसजेनिक Bt-Cotton की व्यावसायिक स्तर पर सात देशों अमेरिका, चीन, मेक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, साउथ अफ्रीका व इन्डोनेशिया में खेती की गई। भारत में (Mahyco) कम्पनी ने सन् 2000 से पूर्व इसे विकसित किया तथा सन् 2000 के मध्य पर्यावरण मंत्रालय ने Bt-Cotton को विस्तृत स्तर पर सुरक्षा की दृष्टि से इसकी जाँच हेतु (Field trial) स्वीकृति प्रदान की।
1. Bt-कपास का विकास (Development of Bt-Cotton):-जीवाणु बेसीलस थूरिनजिएन्सेस लगभग 200 विभिन्न प्रोटीन्स का समूह है जो कि प्राकृतिक रूप से कुछ कीटों के प्रति रासायनिक कीटनाशी उत्पन्न करते हैं। ये रसायन मुख्य रूप से मोथ, बटरफ्लाईज, बीटल्स, कॉटन बॉलवर्म तथा फ्लाईज के लार्वा (Larva) के लिए हानिकारक होते हैं किन्तु अन्य जीवों के लिए नहीं। Bt-विष(toxin) को कोड करने वाले जीन को कपास में निविष्ट किया गया, जिससे कपास के ऊतकों में प्राकृतिक रूप से इस कीटनाशी को उत्पन्न करने की क्षमता प्राप्त हुई। अधिकतर क्षेत्रों में कपास की फसल पर लेपिडोप्टेरेन लार्वा (Larva) संक्रमण करते हैं। जब लार्वा ट्रांसजेनिक कपास के किसी भी ऊतक का भक्षण करते हैं। तो Btprotein (विष) के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है। ट्रांसजेनिक कपास के उपयोग के कारण बाह्य हानिकारक रासायनिक कीटनाशियों की आवश्यकता नहीं पड़ती है, जो कि मनुष्यों, जन्तुओं व पर्यावरण के लिए हानिकारक साबित हुए हैं।
2. Bt-कपास की कार्यविधि:- Bt-Cotton को विकसित करने के लिए कपास में Bt-टॉक्सिन क्रिस्टल प्रोटीन को कोड करने वाले जीन स्थानान्तरित कर ट्रांसजेनिक पादप तैयार किए गए थे, जिनके प्रत्येक ऊतक से यह प्रोटीन उत्पादित हो सकता था। जब कोई भी लेपिडोप्टेरेन लार्वा इस कॉटन पादप को संक्रमित करता है तो उसके गट (gut) में ऊतकों के साथ क्रिस्टल टॉक्सिन भी चला जाता है। कीट के गट में pH का स्तर अधिक (9.5) होने के कारण यह प्रोटीन घुल जाता है। इस घुलित व सक्रिय क्रिस्टल टॉक्सिन के अणु कीट की एपीथिलियल कोशिकाओं पर उपस्थित केथेरिन-लाइकोप्रोटीन से बंधित हो जाते हैं। जिससे पोटैशियम आयन हेतु चैनल बन जाते हैं तथा पोटैशियम आयन्स का सान्द्रण नियंत्रित नहीं रह पाता। परिणामतः पोटैशियम आयन्स के नियमन के अभाव में एपीथिलियल कोशिकाएँ मृत हो जाती हैं। कोशिकाओं के मृत हो जाने के कारण ब्रश बोर्डर मेमब्रेन में खाली स्थान बन जाते हैं। जिनसे बैक्टीरिया व Bt-बीजाणु कीट की बॉडी केविटी में प्रवेश कर जाते हैं तथा कीट की मृत्यु हो जाती है।
3. भारत में Bt-कपास (Bt-Cotton in India):-
– भारत में Bt-cotton के आने के पश्चात् ही इसका उपयोग बढ़ता गया। वर्तमान में, संसारभर में भारत कपास उत्पादन में दूसरे नम्बर पर है। भारत से अन्य देशों में कपास निर्यात किया जाता है। भारत में पादप प्रजनन द्वारा Bt-cotton की कई किस्में जैसे-बीकानेरी नरमा तथा हाइब्रिड जैसे NHH-44 तैयार की गई हैं जो कि आर्थिक दृष्टि से बहुत उपयोगी हैं। सर्वे द्वारा ज्ञात हुआ है कि भारतीय किसानों के लिए Bt-cotton खेती, आर्थिक व पर्यावरण की दृष्टि से बहुत लाभकारी है। इसके उपयोग से बाह्य रासायनिक कीटनाशियों की आवश्यकता घटकर आधी रह गई है किन्तु कपास का उत्पादन दुगुना बढ़ चुका है।
– फिर भी भारत में इसकी सफलता पर पुनः विचार आवश्यक है। क्योंकि Monsanto से प्राप्त किए जाने वाले बीज महँगे होते हैं तथा उनकी ओज (Vigour) एक पीढ़ी बाद ही समाप्त हो जाती है। इसलिए ICAR को सस्ती Bt-cotton किस्में व ऐसे बीज विकसित करने चाहिए जिन्हें दुबारा उपयोग में लिया जा सके।
– चूँकि सर्वप्रथम Monsanto द्वारा विकसित Bt-cotton में मृदा जीवाणु बेसीलस थूरिनजिएन्सिस से विलगित केवल एक जीन Cry 1 AC समावेशित किया गया था जो कि बॉलवर्म के लिए विषैला प्रोटीन उत्पन्न करता था। किन्तु इसकी उत्पादन क्षमता बहुत कम थी व इसमें एक DNA अनुक्रम था, इसलिए Monsanto ने इस प्रथम पीढ़ी ट्रांसजीनिक Bt-cotton को तुरन्त हटा दिया था, अतः हमें भी इस दिशा में अनुसंधान करने चाहिए।
Bt-बैंगन (Bt-brinjal):-
– बैंगन (Brinjal) को एग प्लान्ट (Egg plant) अथवा ऑबरजिन (Aubergine) भी कहा जाता है बैंगन की ट्रांसजेनिक किस्में Bt-brinjal कहलाती हैं। इन्हें भी Bt-कपास के समान बेसीलस थूरिनजिएन्सिस से विलगित किए गए क्रिस्टल प्रोटीन जीन (Cry 1AC) को बैंगन की विभिन्न किस्मों में निवेशित कर प्राप्त किया गया है। बैंगन में इस जीन का निवेशन (Insertion) अन्य आनुवंशिक तत्त्वों; जैसे – प्रमोटर्स, टर्मिनेटर्स तथा एक प्रतिजैवी (Antibiotic) मार्कर जीन के साथ किया गया है। इस प्रकार के ट्रांसजेनिक पादप एग्रोबेक्टीरियम मध्यस्थ जीन रूपान्तरण तकनीक द्वारा तैयार किए गए हैं। Bt-brinjal को लेपिडोप्टेरेन कीटों के प्रति प्रतिरोधी बनाया गया है। यह ट्रांसजेनिक बैंगन विशेष रूप से तना व फल बोरर कीट (Leucinoides orbonalis) (FSB) के प्रति प्रतिरोधकता प्रदर्शित करता है। इसे भारतीय महाराष्ट्र हाइब्रिड कम्पनी (Mahyco) जालना (महाराष्ट्र) द्वारा तैयार किया गया। इस आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित बैंगन को Bt-brinjal Event EE-1 कहा गया। इसके पश्चात् Mahyco कम्पनी ने संकर बैंगन तैयार करने की स्वीकृति प्राप्त की। इस क्रम में पादप प्रजनन विधियों का उपयोग कर Event EE-1 किस्म से जीन्स स्थानीय किस्मों मालपुर लोकल, मंजरी गोटा, कूडाची लोकल तथा पाबकावी लोकल में यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज, धारवाड़ तथा तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी कोयम्बटूर द्वारा स्थानान्तरित किए गए। इसे सन् 2009 में व्यावसायिक स्तर पर खेतों में उगाने के लिए स्वीकृति प्राप्त हुई। किन्तु जनता व अन्यों द्वारा आपत्ति उठाए जाने पर भारतीय पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश ने इस ट्रांसजेनिक बैंगन की खेती करने पर रोक लगा दी। साथ ही यह शर्त रखी गई कि जब तक इस पर जैव सुरक्षा परीक्षण नहीं कर लिए जाते, इसे मुक्त नहीं किया जाए। किन्तु सन् 2013 में Bt-brinjal को बांग्लादेश में व्यावसायिक स्तर पर खेती करने हेतु मुक्त कर दिया गया।
1. Bt-बैंगन का विकास (Development of Bt- brinjal):-
– भारत में इसे विकसित करने हेतु Mahyco को लाइसेंस प्राप्त हुआ। इस हेतु अमेरीकी संस्थान Monsanto से Cry 1AC जीन व दो सहायक जीन npt 11 तथा aad प्राप्त किए गए। जीन Cry 1AC एक वाइरस प्रमोटर (Ca MV35S) द्वारा नियंत्रित होता है जो कि इस जीन की अभिव्यक्ति को बैंगन के सभी ऊतकों में सुनिश्चित करता है npt 11 तथा aad मार्कर जीन्स हैं। npt 11 का उपयोग ट्रांसजेनिक पादपों की नॉन ट्रांसजेनिक पादपों से पहचान करने के लिए किया जाता है तथा aad का उपयोग यह जानने के लिए किया जाता है कि उपयोग में लिया जाने वाला जीवाणु रूपान्तरित हुआ अथवा नहीं। Bt-brinjal प्राप्त करने के लिए वांछित जीन्स के निवेशन हेतु ऐग्रोबेक्टीरियम मध्यस्थ तकनीक का उपयोग किया गया।
2. कीटों के प्रति प्रभाव (Effectiveness against insects):-
– जब कीट लार्वा Bt-brinjal पादप के तने व फल को खाते हैं तो उनके पाचन तंत्र में ऊतकों के साथ Bt-प्रोटीन (टॉक्सिन) Cry 1 AC भी प्रवेश कर जाता है। कीट के गट में क्षारीय PH (PH> 9.5) होने के कारण प्रोटीन घुल जाता है तथा गट प्रोटीन एन्जाइम द्वारा सक्रिय हो जाता है। यह Bt-प्रोटीन कीट गट झिल्ली में उपस्थित एक विशिष्ट रिसेप्टर प्रोटीन से बंधित हो जाता है तथा झिल्ली में छिद्र हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप पाचन क्रिया रुक जाती है तथा तना व फल बोरर कीट लार्वा मृत हो जाते हैं।
3. भारत में Bt-बैंगन का व्यवसायीकरण (Commercialisation of Bt-brinjal in India):-
– सन् 2005 में Bt-brinjal के व्यवसायीकरण हेतु Mahyco व दो विश्वविद्यालयों (University of Agricultural Sciences, Dharwad & TamilNadu Agricultural University, Coimbatore) के बीच प्रथम सहमति बनी। सन् 2006 में Mahyco द्वारा Bt-brinjal से संबंधित दिए गए जैव सुरक्षा डेटा की जाँच हेतु विशेषज्ञों की एक कमेटी (EC-1) बनाई गई। उस कमेटी ने अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि Bt-brinjal सामान्य Brinjal के समान सुरक्षित है। किन्तु इसके बावजूद भी Bt-brinjal के लाभ व उससे फसल को होने वाली कीट सुरक्षा को स्थापित करने के लिए कई प्रयत्न (Trials) किए गए तथा उच्च स्तर पर Bt-brinjal की जाँच को स्वीकृति प्रदान की गई।
– सन् 2009 में द्वितीय कमेटी (EC-II) ने उपर्युक्त जाँचों से प्राप्त डेटा का मुआयना कर निष्कर्ष निकाला कि Bt-brinjal जैव-सुरक्षा व कीट प्रतिरोधकता की दृष्टि से सही है। इसके परिणामस्वरूप Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC) ने इसके व्यवसायीकरण की स्वीकृति प्रदान की। किन्तु कुछ वैज्ञानिकों, किसानों एवं GM एन्टी कार्यकर्ताओं ने इसके विपरीत आवाज उठाई। इसके परिणामस्वरूप भारतीय गवर्नमेन्ट ने घोषणा की कि Bt-brinjal को भारत में मुक्त करने की अत्यावश्यकता नहीं है। इस हेतु पर्यावरण मंत्री ने स्थगन आदेश पारित किया। जिसमें यह आदेश दिया गया कि यदि किसी के पास Bt-brinjal बीज है तो वे गवर्नमेन्ट तथा NBPGR में रजिस्टर्ड होने चाहिए। Bt-brinjal बीजों को संगृहीत करने की जिम्मेदारी NB PGR को सौंपी गई। चूँकि Bt-brinjal को विकसित करने में स्थानीय किस्मों व विदेशी तकनीक का उपयोग किया गया था। इसके लिए बायोडाइवरसिटी ऑथोरिटी से इजाजत के अभाव में पार्लियामेन्ट कमेटी ऑन एग्रीकल्चर ने 9th अगस्त, 2012 को GM फसलों के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया। Bt-बीजों को बेचने के लिए Mahyco को प्राप्त लाइसेंस को महाराष्ट्र गवर्नमेन्ट ने खारिज कर दिया।
नैतिक मुद्दे तथा बायोपायरेसी:-
– बायोप्रोस्पेक्टिंग जैविक संसाधनों पर आधारित नए उत्पादों की खोज और व्यवसायीकरण की प्रक्रिया का वर्णन करने वाला एक छत्र शब्द है।
– बायोप्रोस्पेक्टिंग अक्सर पौधों और जानवरों के उपयोग और विशेषताओं के बारे में स्वदेशी ज्ञान पर आधारित होता है।
– बायोप्रोस्पेक्टिंग में बायोपायरेसी शामिल है।
– बायोपायरेसी एक ऐसी स्थिति है जहाँ स्वदेशी लोगों से उत्पन्न प्रकृति के स्वदेशी ज्ञान का उपयोग दूसरों द्वारा लाभ के लिए किया जाता है, बिना अनुमति के और स्वयं स्वदेशी लोगों को बहुत कम या कोई मुआवजा या मान्यता के बिना।
– उदाहरण के लिए जब बायोप्रोस्पेक्टर औषधीय पौधों के स्वदेशी ज्ञान पर आकर्षित होते हैं, जिसे बाद में चिकित्सा कंपनियों द्वारा इस तथ्य को स्वीकार किए बिना पेटेंट कराया जाता है कि ज्ञान नया नहीं है, या पेटेंटकर्ता द्वारा आविष्कार किया गया है और स्वदेशी समुदाय को प्रौद्योगिकी के वाणिज्यिक शोषण के अधिकारों से वंचित करता है। जिसे उन्होंने खुद विकसित किया था।
– ये प्रथाएँ जैव विविधता में समृद्ध विकासशील देशों और ‘बायोपायरेसी’ में संलग्न कंपनियों की मेजबानी करने वाले विकसित देशों के बीच असमानता में योगदान करती हैं।
– बायोप्रोस्पेक्टिंग का एक प्रसिद्ध मामला नीम और बासमती चावल के पेटेंट के बारे में है। अमेरिका स्थित फार्मास्युटिकल रिसर्च फर्म को पूरे भारत और नेपाल में उगने वाले नीम के पेड़ से एंटीफंगल एजेंट निकालने की तकनीक पर पेटेंट प्राप्त हुआ। भारतीय ग्रामीण लंबे समय से पेड़ के औषधीय महत्त्व को समझते हैं। व्यापक सार्वजनिक आक्रोश, विकासशील दुनिया भर में गूँज उठा। भारत सरकार द्वारा कानूनी कार्रवाई का पालन किया गया, पेटेंट को अंततः उलट दिया गया।
– यूएस कॉर्पोरेशन राइसटेक ने बासमती चावल के कुछ संकरों को पेटेंट कराने का प्रयास किया। भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया और पेटेंट के कई दावों को अमान्य कर दिया गया।
जैविक विविधता पर कन्वेंशन (सीबीडी):-
– सीबीडी 1993 में लागू हुआ। इसने उन देशों के लिए आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच को नियंत्रित करने के अधिकार सुरक्षित कर लिए जिनमें वे संसाधन स्थित हैं। सीबीडी का एक उद्देश्य कम विकसित देशों को अपने संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान से बेहतर लाभ के लिए सक्षम बनाना है। सीबीडी के नियमों के तहत, बायोप्रोस्पेक्टर्स को ऐसे संसाधनों तक पहुँचने के लिए सूचित सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता होती है और जैव विविधता संपन्न देश के साथ किसी भी लाभ को साझा करना चाहिए।
– हालाँकि, कुछ आलोचकों का मानना है कि सीबीडी बायोपायरेसी को रोकने के लिए उचित नियम स्थापित करने में विफल रहा है। दूसरों का दावा है कि सीबीडी के प्रावधानों को लागू करने वाले उपयुक्त कानूनों को पारित करने में राष्ट्रीय सरकारों की विफलता मुख्य समस्या है।
– बौद्धिक संपदा अधिकारों (टीआरआईपी) के व्यापार-संबंधित पहलुओं पर 1994 का समझौता आगे एक प्रासंगिक समझौता है।
– 1960 के दशक के अंत के दौरान, ग्रामीण कृषि और भारत की स्थिर गति से विकास और औद्योगीकरण की इच्छा के बीच एक उपयुक्त संतुलन खोजने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
– पेटेंट अधिनियम 1970 को निवेशक और उपभोक्ता हितों के बीच एक उचित संतुलन के रूप में सराहा गया, क्योंकि इसने अप्रतिबंधित तरीके से औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया। पौधों और जानवरों को प्रतिबंधित किया गया था, ताकि उनका पेटेंट नहीं कराया जा सके, इसके अलावा खाद्य उत्पादों, रासायनिक आविष्कारों और दवाओं को भी प्रतिबंधित किया गया। केवल प्रक्रिया पेटेंट के लिए पात्र पेटेंट को उनके आवेदन की तारीख के बाद 7 साल के लिए वैध माना जाता था।
– यह सब बदल गया क्योंकि भारत ने आर्थिक उदारीकरण के एक नए चरण में प्रवेश किया, एक व्यवहार्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भागीदार के रूप में गले लगाने की उम्मीद में।
– भुगतान संतुलन संकट के जवाब में, 1991 की नई आर्थिक नीति (एनईपी 1991) ने भारत में बड़े बदलाव किए। अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक महाशक्तियों के लिए ‘पकड़ने’ की बढ़ती इच्छा के साथ, कृषि क्षेत्र जैसे गहरी जड़ों वाले उद्योगों ने 1991 के बाद से इसे मंजूरी दे दी है।
– गैट से विश्व व्यापार संगठन में परिवर्तन एक महत्त्वपूर्ण समय है जब विकासशील देशों में ग्रामीण समुदायों के अधिकारों और संप्रभुता से संस्थागत रूप से समझौता किया गया था। इसे अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक जुड़ाव में वृद्धि के परिणामस्वरूप अधिकारियों द्वारा स्वीकार किया गया है। विश्व व्यापार संगठन की तुलना में, GATT ने देशों को अपने स्वयं के IPR कानूनों को विकसित करने और उनका पालन करने की अधिक स्वतंत्रता प्रदान की। पेटेंट कानून के संबंध में गैट विशिष्ट नहीं था। विश्व व्यापार संगठन का एक प्रमुख विशिष्ट कारक ट्रिप्स समझौता है। देशों को विश्व व्यापार संगठन के सदस्य के रूप में स्वीकार करने के लिए, उन्हें इसके सभी कानूनों का पालन करना होगा, जिसमें ट्रिप्स भी शामिल हैं। इस प्रकार, विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के लिए मंजूरी देने के लिए, देशों को किसी भी राष्ट्रीय पेटेंट कानून में संशोधन करना पड़ा जो टीआरआईपी के विपरीत हो।
– भारत ने 1995 में विश्व व्यापार संगठन में हस्ताक्षर किए और तब से एक उत्कृष्ट व्यापारिक भागीदार के रूप में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा पूरी तरह से गले लगाने के लिए कई कदम उठाए हैं।
बासमती बायोपायरेसी:-
– राइसटेक का बासमती पेटेंट संसाधन चोरी का मामला है क्योंकि एक प्राकृतिक संसाधन (बासमती चावल) किसी विशिष्ट देश से बिना किसी अनुमति या सार्वजनिक मान्यता के लिया गया था।
– यह आर्थिक चोरी का मामला है क्योंकि राइसटेक ने अपने हाइब्रिड चावल का विज्ञापन करने के लिए ‘बासमती’ शब्द का इस्तेमाल किया, ताकि ग्राहकों को मूल बासमती के समान सुगंधित उत्पाद की तलाश में आकर्षित किया जा सके।
– अंत में, यह बौद्धिक और सांस्कृतिक दोनों चोरी का मामला था क्योंकि राइसटेक ने बासमती के अधिग्रहण के माध्यम से बिना अनुमति के ग्रामीण समुदायों के चावल उत्पादन करने वाले चावल के एक प्रमुख विरासत टुकड़े का पेटेंट कराया था।
– यह स्पष्ट है कि ट्रिप्स समझौता एक अनुचित, पक्षपाती एकतरफा पश्चिम समर्थक ढाँचे को बढ़ावा देता है। भारत जैसे विकासशील देशों के पास या तो अनुरूप होने का विकल्प है और परिणामस्वरूप उनकी आबादी पर आँखें मूंद लेना या अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से काली सूची में डाल दिया जाना है।
– राइसटेक की बायोपायरेसी की गंभीरता को कम करके नहीं आंका जा सकता है, क्योंकि यह समूह बासमती की भौतिक विशेषताओं जैसे पौधे की ऊँचाई और अनाज की लंबाई का आविष्कार करने का दावा कर रहा था।
– चावल के पौधे के स्वामित्व का दावा करके, राइसटेक सीधे ग्रामीण कृषक समुदायों को धमका रहा था। सदियों के विकास के दौरान, भारतीय किसानों ने चावल की लगभग 200,000 किस्मों का उत्पादन किया है।
– इसलिए, यदि राइसटेक को बासमती चावल संयंत्र का स्वामित्व होना चाहिए, तो किसानों की स्वायत्तता और साझा करने की तकनीकों (ग्रामीण समुदायों का एक मूलभूत) में संलग्न होने की क्षमता से समझौता किया जाएगा। किसानों की निराशा के लिए, आईपीआर कानून और टीआरआईपी समझौते दोनों की नजर में, खेती की तकनीकों को साझा करना अवैध माना जाएगा।
– पुरानी पीढ़ियों से पारित कृषि ज्ञान और खेती की तकनीक अपने साथ अंतर्निहित बीज अनुकूलन और नवाचारों को लेकर चलती है।
– सामूहिक बीज संवर्धन जैसे एकाधिकार के लिए भूमि पर काम करने और आसपास के वातावरण का उपयोग करने की क्षमता से समझौता किया जाता है। जैव विविधता को स्वाभाविक रूप से खतरा है। इसके अलावा, कृषि-व्यवसाय समूहों के पास यह सुनिश्चित करने की कोई वास्तविक जिम्मेदारी नहीं है कि विकासशील देशों के किसानों को “समान लाभ साझाकरण” का ध्यान रखा जाए, जैसा कि जैविक विविधता के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (सीबीडी) द्वारा परिकल्पित किया गया है।
– 1992 में रियो डी जिनेरियो में सीबीडी भारत जैसे विकासशील देशों द्वारा मुख्य रूप से प्रचारित संसाधनों पर संरक्षण, साझाकरण और राज्य संप्रभुता की वकालत करता है, सीबीडी स्वदेशी पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत और संरक्षित करने का प्रयास करता है। सीधे तौर पर, सीबीडी ने ग्रामीण संसाधनों के संप्रभु अधिकारों का आह्वान किया। तथ्य यह है कि सीबीडी एक ढाँचा है और कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।