प्रजनन और विकास
परिवर्धनीय जीव विज्ञान –
– इसमें सजीवों के सम्पूर्ण परिवर्धन का अध्ययन किया जाता है। परिवर्धन मृत्यु तक चलता है।
1. युग्मज (Zygotic) – लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न होता है। जन्तु जो zygote से उत्पन्न होते हैं, Oozoids कहलाते हैं। Zygote से जन्तु का परिवर्धन Embryogenesis कहलाता है।
2. कोशिका गुच्छ (Blastemic) – जन्तुओं का परिवर्धन किसी अलैंगिक संरचना से होता है, इन्हें Blastema कहते हैं। Blastema से जन्तु का परिवर्धन Blastogenesis कहलाता है।
उदाहरण – हाइड्रा में कलिकाएँ
– Blastema से उत्पन्न जन्तु Blastozoids कहलाते हैं।
– Study of Embryogenesis -Embryology कहलाता है।
भ्रौणिकी का परिचय
– भ्रौणिकी (Embryology) शब्द का मतलब है – भ्रूण का अध्ययन करना।
– युग्मनज से लेकर सम्पूर्ण जन्तु के निर्माण की क्रिया को भ्रौणिकी के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है।
– उच्च प्राणियों के सम्पूर्ण जीवन चक्र में दो भाग पाए जाते हैं ।
(a) प्रसव से पूर्व का समय – अण्डाणु के निषेचन से लेकर शिशु की अण्डजोत्पत्ति (Hatching) अथवा जन्म तक की सभी घटनाओं को प्रसव पूर्व काल (Prenatal period) में शामिल किया जाता है।
(b) प्रसव के बाद का समय – शिशु के जन्म के बाद भी अनेक परिवर्तन होते रहते हैं, इन्हें प्रसवोत्तर काल (Port natal का period) में शामिल किया जाता है।
– लैंगिक जनन या अलैंगिक जनन से सम्पूर्ण जन्तु के निर्माण को व्यक्तिवृत्तीय परिवर्धन (Ontogenic development) कहा जाता है। इसे दो भागों में बाँटते हैं –
(i) अलैंगिक जनन इकाई द्वारा निर्मित ब्लास्टेमा (Blastema) से पूर्ण जन्तु का निर्माण कोरकोद्भव (Blastogenesis) कहलाता है। अलैंगिक इकाई सम्पूर्ण शरीर, विखण्ड या मुकुल हो सकती है।
(ii) लैंगिक जनन इकाई (जाइगोट) से पूर्ण शरीर के विकास को भ्रूणोद्भव (Embryogenesis) कहते हैं।
– अलैंगिक जनन द्वारा विकसित प्राणियों को ब्लास्टोजूइड्स (Blastozooides) कहते हैं।
– लैंगिक जनन द्वारा विकसित प्राणी को उजोइडस (Oozoids) कहलाते हैं।
युग्मकजनन (Gametogenesis)
– वृषण तथा अण्डाशय में क्रमशः शुक्राणु व अण्ड (अयुग्मित युग्मक) के बनने की क्रिया युग्मकजनन (Gaemtogensis) कहलाती है। जो इस प्रकार है–
शुक्रजनन, शुक्राणुजनन (Spermatogenesis)
– वृषण में आद्य जनन कोशिका के द्वारा शुक्राणु निर्माण शुक्राणु जनन कहलाता है। कशेरुकी प्राणियों में एक जोड़ी वृषण पृष्ठ देह भित्ति से मीसोरर्कियम (Mesorchium) द्वारा जुड़े रहते हैं।
– प्रत्येक वृषण हजारों नलिकाकार शुक्रजनक नलिकाओं का बना होता है। नलिकाएँ चारों ओर से ट्यूनिका प्रोपरिया झिल्ली द्वारा ढकी रहती है। इस स्तर के भीतर जनन उपकला दो प्रकार की कोशिकाएँ कायिक या सरटोली कोशिका तथा जनन कोशिका से निर्मित होती है।
– कायिक या सरटोली कोशिका शुक्राणु को आलम्बन तथा पोषण प्रदान करती है इसमें शुक्राणु का सिर धँसा रहता है। जनन (पेमेटोगोनिया) कोशिका शुक्राणु का निर्माण करती है।
– शुक्र जनन नलिकाएँ, अन्तराली कोशिकाओं (Interstitial cell or leydig cell) द्वारा पृथक् रहती है जो नर हार्मोन का स्त्राव करती है।
– वृषण एक बहिःस्त्रावी तथा अन्तःस्त्रावी रचना के रूप में कार्य करता है।
– कशेरुकी प्राणियों में शुक्रजनन एक सतत प्रक्रिया है, वृषण में, इसके निर्माण की विभिन्न अवस्थाएँ, परिधि से केन्द्रीय गुहा की तरफ होती है जो पूर्णजनी (Hologonic) प्रकार का शुक्राणुउत्पादन कहलाता है। कीटों व नीमेटोड्स में अन्त्येजनी (Telogonic) प्रकार से समीपस्थ भाग से दूरस्थ भाग की तरफ होता है।
– शुक्रजनन की क्रिया मनुष्य में 74 दिवस में पूर्ण होती है।
1. शुक्राणुपूर्व (Spermatid) का निर्माण
2. शुक्राणु में रूपान्तरण या स्पर्मेटोलियोसिस (Spermateleosis)
1. शुक्राणुपूर्व का निर्माण या स्पर्मेटोसायटोजिनेसिस (Spematocytogenesis)– यह प्रक्रिया जन्तु में लैंगिक परिपक्वता प्राप्त करने के पश्चात् शुरू होती है। प्राइमोडियल या आद्य जनन कोशिकाएँ (Primordial germ cells) से स्पर्मेटिडों का निर्माण तीन चरणों में होता है।
– गुणन प्रावस्था (Multiplication phase) – अविभेदित आद्य जनन कोशिका सतत सूत्री विभाजन के द्वारा कोशिकाओं का निर्माण करती है जिन्हें शुक्राणु मातृक या पुमणुजनन कोशिकाएँ (Spermatogonia) कहते हैं। स्पर्मेटोगानिया द्विगुणित कोशिका होती है।
– वृद्धि प्रावस्था (Growth phase) – गुणन अवस्था के अंतिम विभाजन के पश्चात् जनन कोशिकाओं से पोषण प्राप्त कर स्पर्मेटोगोनिया कुछ आकार में दो गुनी हो जाती हैं, इन्हें प्राथमिक शुक्राणुजन कोशिका (Primary Spermatocyte) कहते हैं, जो द्विगुणित होती है।
– परिपक्वन प्रावस्था (Maturation phase) – प्राथमिक शुक्राणु कोशिका में अर्धसूत्री विभाजन-प्रथम (ह्रास विभाजन) विभाजन द्वारा दो अगुणित द्वितीयक स्पर्मेटोसाइट निर्मित होते हैं। इन द्वितीयक स्पर्मेटोसाइट में अर्धसूत्री विभाजन-II (सम विभाजन या द्वितीय परिपक्वन विभाजन होता है परिणामस्वरूप प्रत्येक द्वितीयक स्पर्मेटोसाइट से दो स्पर्मेटिड निर्मित होते हैं अर्थात् एक द्विगुणित प्राथमिक स्पर्मेटोसाइट से चार अगुणित स्पर्मेटिड निर्मित हो जाते हैं।
शुक्रजनन : शुक्राणुपूर्व का विभेदीकरण (Spermiogenesis : Differentiation of spermatid)
– शुक्राणु बनने के लिए इनमें विभेदीकरण होता है। इस क्रिया को शुक्रजनन शुक्र कायान्तरण अथवा स्पर्मेटिलियोसिस (spermiogenesis or spermateleosis) कहते हैं।
– जिन परिवर्तनों से पूर्व-शुक्राणु (spermatids) शुक्राणुओं (spermatozoa) में विभेदित होते हैं, वे अत्यन्त मूलभूत होते हैं। इस विभेदन में पूर्व-शुक्राणु का केन्द्रक इसके केन्द्रक-द्रव्य (nuclear sap) से जल के निष्कासित हो जाने पर सिकुड़ता है तथा इसमें स्थित सभी गुणसूत्र परस्पर सिमट कर अपेक्षाकृत छोटे स्थान में व्यवस्थित हो जाते हैं।
– यह सचल शुक्राणु का भार कम करने के लिए आवश्यक होता है। यही नहीं, लगभग सभी व्यर्थ पदार्थ केन्द्रक से हटाए जाते हैं जैसे RNA आदि। केन्द्रक में प्रमुख रूप से केवल DNA अर्थात् आनुवंशिक पदार्थ बचा रहता है। केन्द्रक का आकार भी बदल जाता है तथा यह जल में सुलभता से तैरने हेतु गोलाकार से लम्बा एवं सँकरा हो जाता है।
– शुक्राणु के शीर्ष का आकार जो इसमें केन्द्रक के आकार पर निर्भर करता है, विभिन्न जन्तुओं में भिन्न होता है। उदाहरणार्थ, मनुष्य तथा साँड में यह अण्डाकार तथा पार्यों से चपटा, चूहों तथा मेंढक में कटार-रूपी तथा चिड़ियों में सर्पिल आकार का होता है।
– गॉल्जी-काय (Golgi bodies) के विभेदन से बनता है।
– पूर्व-शुक्राणु (spermatid) की गॉल्जीकाय अनेक चक्रों में व्यवस्थित कलाओं की जो मध्य में अनेक रिक्तिकाओं को घेरे होती है, की बनी होती है।
– विभेदन-क्रिया के अन्तर्गत एक या अधिक रिक्तिका परिमाण में बढ़ने लगती है तथा साथ ही रिक्तिका के भीतर एक सूक्ष्म सघन-काय जिसे पूर्व-एक्रोसोमल कण कहते हैं, दिखाई देने लगता है।
– यह कणयुक्त रिक्तिका केन्द्रक के शिखर से संलग्न हो जाती है। कण परिमाण में बढ़ता है, इसे अब एक्रोसोमल कण कहते हैं तथा यह एक्रोसोम का क्रोड बनाता है। स्वयं रिक्तिका का द्रव्य बाहर निकल आता है तथा इसकी कला, एक्रोसोमलकण तथा केन्द्रक के अग्र अर्द्धांश को द्विपालित टोपी की तरह ढक लेती है।
– एक्रोसोम-कण में किण्वक स्थित होते हैं जो निषेचन के समय अण्डाणु-कलाओं को घोलने का कार्य करते हैं।
शुक्राणु में रूपान्तरण (Spermateleosis) –
– शुक्राणु में पूर्व, शुक्र कायान्तरण द्वारा आकारिकी, उपापचयी तथा क्रियात्मक रूप से विभेदित शुक्राणु में विभेदित होते हैं। इस प्रक्रिया में स्पर्मेटोसाइट से निर्मित गोलाकार, अगतिशील, अगुणित स्पर्मेटिड एक धागे समान, गतिशील एवं अगुणित शुक्राणु में परिवर्तित हो जाते हैं।
– स्पर्मेटिड का केन्द्रक एवं गॉल्जीकॉय सिर (एक्रोसोम), माइटोकॉन्ड्रिया मध्यका (Middle piece) तथा दूरस्थ तारक काय पूँछ के हिस्से का निर्माण करते हैं। स्पर्मिजेनेसिस के बाद शुक्राणु का सिर सरटोली कोशिकाओं में घुसा हुआ रहता है। अन्त में शुक्राणुत्याग (Spermi on) क्रिया द्वारा शुक्रजनन नलिकाओं से त्याग दिए जाते हैं।
– प्राणियों में शुक्राणु का निर्माण, तापक्रम, हार्मोन्स, मानसिक अवस्था तथा पीयूष ग्रन्थि के अग्र पिण्ड द्वारा स्त्रावित हार्मोन्स (ल्यूटिनाइजिन्ग हार्मोन्स, LH तथा फॉलिकल स्टीमूलेटिंग हार्मोन्स FSH के द्वारा होता है।
– वयस्कता पर महत्त्वपूर्ण मात्रा में गोनेडोट्रोपिन रीलिजिंग हार्मोन (GnRH) की अधिकता हो जाने पर शुक्राणुजनन प्रारम्भ हो जाता है। यह हाइपोथेलेमिक हार्मोन्स है जो पीयूष ग्रन्थि के अग्र भाग का उद्दीपन करता है।

– शीर्ष (Head) – यह केन्द्रक तथा एक्रोसोम से बना होता है। आनुवंशिक कार्य हेतु अयुग्मित गुणसूत्र केन्द्रक में प्रोटेमीन प्रोटीन (Protamine) के साथ पाया जाता है।
– एक्रोसोम शुक्राणु के अग्र सिरे पर केन्द्रक तथा प्लाज्मा झिल्ली के मध्य स्थित होता है। शुक्राणु शीर्ष पर अम्लीय प्रोटीन एन्टी-फर्टिलाइजिन (Antifertilizin) पाया जाता है एवं अन्दर स्पर्म लायजिन (Lysin) एन्जाइम जैसे हायलयूरोनीडेज (Hyaluronidase) एवं केटेफीन (Cathepsins) पाए जाते हैं।
मध्य खण्ड (Mid piece) –
– माइटोकॉन्ड्रिया अक्षीय तन्तु के चारों ओर थोड़ा-सा कुण्डलित होता है तथा इसे माइटोकॉन्ड्रियल स्पाइरल (Mitochondrial Spiral) कहते हैं।
– माइटोकॉन्ड्रिया मादा जनन भाग में शुक्राणु को गति के लिए ऊर्जा देते हैं। अत: मध्य भाग को शुक्राणु का शक्तिगृह (Power House of the sperm) कहते हैं।
पूँछ (Tail)
– यह शुक्राणु का सबसे लम्बा भाग है।
– यह नुकीला भाग बनाता है जो तैरने में मदद करता है।
अण्डजनन (Oogenesis)
– अण्डजनन का काल विभिन्न जन्तुओं में अलग होता है। मानव मादाओं में अण्डजनन जन्म से पूर्व शुरू होता है लेकिन केवल निषेचन के पश्चात् ही पूर्ण होता है।
– अण्डजनन तीन प्रावस्थाओं में पूर्ण होता है –
(i) गुणन प्रावस्था (ii) वृद्धि प्रावस्था (iii) परिपक्वन प्रावस्था
(i) गुणन प्रावस्था (Multiplication Phase) – आद्य जनन कोशिका, अण्ड मातृक कोशिका (Egg mother cell) में परिवर्तित हो जाती है। इसमें लगातार सूत्री विभाजन द्वारा उगोनिया का निर्माण होता है। एक उगोनिया अण्डाणुजनन में भाग लेता है शेष उगोनिया पोषक कोशिकाओं (Nurse cells) या फोलिकल कोशिकाओं (Follicle cells) में परिवर्तित हो जाती है।
(ii) वृद्धि प्रावस्था (Growth Phase) –
– अण्डजनन की वृद्धि प्रावस्था लम्बी होती है।
– वृद्धि प्रावस्था के दौरान प्राथमिक ऊसाइट पुटिका कोशिकाओं से भोजन लेकर आकार में बड़ी हो जाती है।
(iii) परिपक्वन प्रावस्था (Maturation phase)–
– द्वितीयक ऊसाइट अर्द्धसूत्रण-द्वितीय प्रदर्शित करती है तथा दो असमान अगुणित कोशिकाएँ निर्मित करती हैं। बड़ी कोशिकाओं को Ootid कहते हैं। ये सम्पूर्ण कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) का वहन करती है तथा छोटी कोशिकाएँ द्वितीय ध्रुवीय काय कहलाती है। ऊटिड अण्डाणु में रूपांतरित हो जाती है। अण्डजनन में, एक द्विगुणित ऊगोनियम, एक अगुणित अण्डाणु (Ovum) तथा तीन ध्रुवीय काय बनते हैं।
– अण्डाशय से अण्डाणु द्वितीयक ऊसाइट अवस्था में मुक्त होता है। द्वितीयक ऊसाइट का परिपक्वन केवल निषेचन के पश्चात् ही पूरा होता है।
अण्डाणु की संरचना
– स्तनधारियों के अण्डे अपीतकी तथा समपीतकी प्रकार के होते है। अण्डाशय से निर्मुक्त अण्डाणु पूर्ण परिपक्व नहीं होता है यह द्वितीयक ऊसाइट होता है।
– केन्द्रक बड़े आकार का जन्तु गोलार्द्ध की तरफ अवस्थित होता है। योक की मात्रा अत्यन्त अथवा नगण्य होती है। कोशिका झिल्ली के बाहर पारदर्शी, अकोशिकीय जोना पेल्यूसिडा (Zona pellucida) नामक आवरण पाया जाता है।
– जोना पोल्यूसिडा के बाहर फोलिकल कोशिकाओं का आवरण कोरोना रेडिएटा (Corona radiata) पाया जाता है।

मानव में निषेचन (Fertilization in Human)
– अगुणित नर (शुक्राणु) व मादा (अण्डाणु) युग्मकों के संयोग व दोनों युग्मकों के प्राक्केन्द्रकों (Pronuclei) के संलयन को निषेचन कहते हैं।
– निषेचन के परिणामस्वरूप द्विगुणित युग्मनज (Zygote) का निर्माण होता है।
– युग्मकों के प्राक्केन्द्रकों का संलयन युग्मक संलयन (Karyogamy) कहलाता है।
– दो युग्मकों के दो गुणसूत्र समुच्चय का मिश्रण, उभयमिश्रण (Amphimixis) कहलाता है।
निषेचन के प्रकार (Types of Fertilization)
– निषेचन की क्रिया दो प्रकार की होती हैं –
(i) बाह्य निषेचन (External Fertilization) – बाह्य निषेचन में नर व मादा युग्मक शरीर के बाहर संलयित होते हैं। यह निषेचन क्रिया जलीय माध्यम में सम्पन्न होती है। यह अधिकांशतः मछलियों, उभयचरों तथा सभी इकाइनोडर्म में पाया होता है।
(ii) अंत:निषेचन (Internal Fertilization) – अंतः निषेचन में युग्मकों का संलयन मादा जनन नाल के कुछ भागों में तथा सामान्यतः ऑस्टियम के पास होता है। यह अण्डप्रजनक (oviparous) (सभी पक्षी, प्रोटोथीरियन), अण्डाशीशु प्रजनक तथा शिशुप्रजनक (viviparous) जीवों में पाया जाता है।
कृत्रिम वीर्य सेचन (Artificial insemination)
– अन्तः निषेचन हेतु नर द्वारा मादा के शरीर में शुक्राणुओं को मुक्त करने की क्रिया वीर्य सेचन (Insemination) कहलाती है।
– कृत्रिम रूप से शुक्राणु प्राप्त कर, परिरक्षित (preserved) एवं संचयित कर लिए जाते हैं एवं आवश्यकतानुसार मादा के गर्भाशय में मुक्त कर निषेचन करवाया जाता है, इस क्रिया को कृत्रिम वीर्य सेचन कहते हैं।
निषेचन के पद (Steps of fertilization)
(i) शुक्राणु का अण्डाणु तक पहुँचना (Approach of Sperm to Ovum)
– नर मैथुन के दौरान मादा की योनि में गर्भाशयी नाल के पास वीर्य (3-5ml) स्खलन होता है, इसे वीर्यसेचन कहते हैं। इस स्खलन में लगभग 400 मिलियन शुक्राणु पाए जाते हैं परंतु इनमें से 100 शुक्राणु ही फैलोपियन नलिका तक पहुँच पाते हैं, क्योंकि बहुत से शुक्राणु मादा से जनन नाल की अम्लीयता के कारण मर जाते हैं।
– कई शुक्राणु योनि एपीथीलियम की भक्षी कोशिकाओं द्वारा निगल लिए जाते हैं। शुक्राणु, शुक्रद्रव (Seminal fluid) में तैरते रहते हैं। शुक्राणुओं की यह गति गर्भाशयी संकुचन क्रिया तथा फैलोपियन ट्यूब की क्रमाकुंचनी (peristaltic) गति द्वारा होती है।
– शुक्राणु मादा गर्भाशय में प्रवेश के कुछ समय बाद निषेचन करने में सक्षम होते हैं। अपनी ही जाति के अण्ड (ovum) को निषेचित करने की क्षमता को शुक्राणु का योग्यतार्जन (capacitation) कहते हैं।
– इस प्रक्रिया में शुक्राणु का कार्यकीय परिपक्वन होता है, जिसमें शुक्राणु लयनकारी एन्जाइम की क्रिया के फलस्वरूप अण्डावरण को भेदकर अण्ड में प्रवेश कर जाता है। तत्पश्चात् शुक्राणु, अण्डाणु (ovum) का निषेचन करता है।
(ii) शुक्राणु का प्रवेश (Entry of Sperm)
– अण्डाणु एक रासायनिक पदार्थ स्त्रावित करता है जिसे फर्टिलाइजिन (Fertilizin) कहते हैं। इसकी सतह पर शुक्राणु स्नेही स्थल होते हैं, जहाँ पर विशिष्ट शुक्राणु अपने एण्टीफर्टिलाइजिन (Antifertilizin) स्थल द्वारा जुड़ जाते हैं। इसी फर्टीलाइजिन-एण्टीफर्टीलाइजिन अन्तःक्रिया के द्वारा अण्डे तथा शुक्राणु एक-दूसरे से चिपक जाते हैं।
– इसमें शुक्राणु का अग्रपिण्डक (Acrosome) क्रिया में भाग लेता है तथा कुछ शुक्राणुलयन (Sperm lysins) मुक्त करता है, जो अण्डे के आवरण को घोलकर शुक्राणु के प्रवेश के लिए मार्ग बनाते हैं। शुक्राणुलयन अम्लीय प्रोटीन होते हैं। इसमें एक लयनकारी एन्जाइम हायलयूरोनीडेज पाया जाता है जो अन्तरकोशिकीय अवकाशों में हायलयूरानिक अम्ल बहुलक को घोल देता है।
– यह अम्ल कोरोना रेडिएटा (Coronaradiata) की ग्रेन्युलोसा कोशिकाओं को साथ-साथ रखता है। कोरोना भेदन एन्जाइम कोरोना रेडिएटा को घोलते हैं तथा एक्रोसिन (Acrosin) जोना पेल्यूसिडा को घोलते हैं।
(iii) कॉर्टिकल अभिक्रिया (Cortical reaction)
– शुक्राणु के अण्डे में प्रवेश करने के तुरंत बाद ही, अण्डे में अन्य शुक्राणुओं के प्रवेश को रोकने के लिए वल्कुटी अभिक्रिया होती है। इस अभिक्रिया में अण्डे की प्लाज्मा झिल्ली के नीचे स्थित वल्कुटी कणों द्वारा अण्डकोषाद्रव्य तथा प्लाज्मा झिल्ली (विटेलाइन झिल्ली) के बीच रासायनिक पदार्थ होते हैं।
– शुक्राणु के अण्डाणु में प्रवेश के बाद निम्नलिखित उपापचयी क्रियाएँ उत्प्रेरित होती हैं–
– अण्डे की सतह पर निषेचन शंकु (Fertilization cone) का निर्माण होता है।
– विटेलाइन झिल्ली बढ़कर निषेचन कला (Fertilization membrane) में परिवर्तित हो जाती है।
– कोशाद्रव्य में गति पाई जाती है।
– प्लाज्मा झिल्ली की पारगम्यता बढ़ जाती है।
– प्रोटीन संश्लेषण की दर बढ़ जाती है।
– समसूत्री विभाजन प्रारम्भ हो जाता है।
(iv) प्राक्केन्द्रक संलयन (Fusion of Prounclei)
– शुक्राणु का अण्डाणु के प्रवेश एक उद्दीपन की तरह कार्य करता है। इसके परिणामस्वरूप द्वितीयक परिपक्वन विभाजन होता है।
– शुक्राणु के द्वारा लाया गया तारक केन्द्र दो भागों में विभाजित हो जाता है और सक्रिय कोशाद्रव्य के केन्द्र में गुणसूत्रीय तर्कु (Chromosomal spindle) का निर्माण करता है।
– द्वितीयक ध्रुवकाय (Polar body) के निर्माण के साथ ही अण्ड केन्द्रक (Egg nucleus) या मादा प्राक्केन्द्रक शुक्राणु सिर के नर प्राक्केन्द्रक के साथ संयोजन के लिए तैयार हो जाता है।
– नर प्राक्केन्द्रक शुक्राणु भेदन पथ (penetration path) का अनुसरण करने के बाद मादा प्राक्केन्द्रक की ओर सीधे गति करता है कई परिस्थितियों में शुक्राणु के इस मार्ग में बहुत कम परिवर्तन होते हैं। इस प्रकार की परिस्थिति में शुक्राणु के मार्ग का भाग मैथुन पथ (Copulation path) कहलाता है।
निषेचन की सार्थकता (Significance of Fertilization)
– यह अण्डे को पूर्ण परिपक्वन के लिए उद्दीपित करता है।
– यह अण्डाणु को निरन्तर समसूत्री विभाजन के द्वारा नए जीव में विकसित होने के लिए सक्रिय करता है।
– यह नर गुणसूत्र के अगुणित समुच्चय के संयोजन द्वारा युग्मनज में गुणसूत्रों की संख्या को द्विगुणित (मनुष्य में 46) करता है।
– यह अण्डे को उपापचयी रूप से अधिक सक्रिय बनाता है।
– यह दो जनकों के लक्षणों को संयुक्त करता है और विभिन्नताएँ उत्पन्न करता है। इस प्रकार यह उद्विकास में भी सहायक होता है।
– शुक्राणु के लिंग गुणसूत्र X अथवा Y होते हैं जिसके कारण यह लिंग निर्धारण में भी सहायता करता है।
– शुक्राणु के प्रवेश के बाद निषेचन कला का निर्माण होता है जिससे बहु शुक्राणुता को रोका जाता है।
– मैथुनी-पथ (Copulation path) विभाजन के अक्ष का निर्धारण करता है।
विदलन (Cleavage)
– विदलन का नाम ‘वॉन बेयर’ ने दिया।
– निषेचन में बने युग्मनज (Zygote) में एक के बाद एक समसूत्रीय विभाजन द्वारा 1, 2, 4, 8 कोशिकाओं के निर्माण को विदलन कहते हैं।
– विदलन से बनी कोशिकाओं को कोरकखण्ड (Blastomers) कहते हैं। विदलन को खण्डीभवन (Segmentation) कहते हैं।
– विदलन के लक्षण (Characteristics of Cleavage)

विदलन
– विदलन के दौरान युग्मनज समसूत्रीय विभाजन (Mitosis) द्वारा विभाजित होता है। भ्रूण की आकृति में कोई परिवर्तन नहीं होता है। इस दौरान कोरक खण्डों में वृद्धि (Growth) नहीं होती है तथा एक गुहा का निर्माण होता है जिसे कोरकगुहा (Blastocoel) कहते हैं।
– विदलन द्वारा एक ठोस गेंद का निर्माण होता है जिसे तूतक (Morula) कहते हैं। विदलन के आरम्भ में केन्द्रक-कोशिका द्रव्य अनुपात कम होता है लेकिन विदलन के साथ-साथ बढ़ने लगता है। बाद में शरीर के दैहिक कोशिका (Somatic cell) के बराबर हो जाता है।
– संगृहीत खाद्य पदार्थों को सक्रिय कोशिकाद्रव्य में रूपांतरित करते हैं। सक्रिय कोशिकाद्रव्य पदार्थों द्वारा केन्द्रकीय पदार्थ जैसे DNA, RNA व प्रोटीन का निर्मित होते हैं।
– शुरू में विदलन तुल्यकालिक (Synchronous) होता है। इसके बाद विदलन अनियमित (Irregular) हो जाता है।
– O2 की कमी व CO2 की अधिकता से विदलन की दर मंद (Slow) हो जाती है। विदलन के समय प्रोटीन्स ट्यूबुलिन (Tubulin) एवं राइबोन्यूक्लियोटाइड रिडक्टेज (Ribonucleotide reductase) का संश्लेषण होता है।
– ट्यूबुलिन प्रोटीन द्वारा विभाजन के लिए आवश्यक सूक्ष्म नलिकाओं (Microtubules) का संश्लेषण होता है। राइबोन्यूक्लियोटाइड रिडक्टेज एन्जाइम राइबोन्यूक्लियोटाइड को डीऑक्सी राइबोन्यूक्लियोटाइड में बदलता है।
विदलन के रूप (Patterns of Cleavage)–
– निम्न प्रकार के विदलन प्रतिरूप होते हैं–
1. द्विअरीय विदलन प्रतिरूप (Biradial Cleavage Pattern) – उदाहरण – टीनोफोरा।
2. द्विपार्श्व विदलन प्रतिरूप (Bilateral Cleavage Pattern) – उदाहरण – एम्फीऑक्सस, उभयचर (Amphibians), उच्च स्तनधारी (Higher Mammals)
3. सर्पिल विदलन प्रतिरूप (Spiral Cleavage Pattern) – उदाहरण – निमेटोड्स, एनेलिडा व मौलस्का।
4. अरीय विदलन प्रतिरूप (Radial Cleavage Pattern) – उदाहरण – इकाइनोडर्मेटा, अधिकांश कॉर्डेट्स।
विदलन के प्रकार (Types of Cleavage)
– विदलन को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(i) पूर्णभंजी विदलन (Holoblastic Cleavage) – इसमें पूरे अण्डे का विभाजन होता है तो इसे पूर्णभंजी विदलन (Holoblastic cleavage) कहते हैं। पूर्णभंजी विदलन अपीतकी, सूक्ष्मपीतकी व मध्यगोलार्द्ध पीतकी अण्डों में पाया जाता है। यह दो प्रकार का होता है–
(a) पूर्णभंजी समान विदलन (Holoblastic Equal Cleavage)–
उदाहरण – एम्फीऑक्सस, हर्डमानिया, मेटाथिरियन व यूथिरियन कॉर्डेट।
(b) पूर्णभंजी असमान विदलन (Iloloblastic Unequal Cleavage) –
उदाहरण – सेफेलोपोड, मौलस्क, निम्न श्रेणीय मछलियाँ व एम्फीबिया आदि।
(ii) अंशभंजी विदलन (Meroblastic Cleavage) – इसमें पूर्ण अण्डे का विभाजन नहीं होता है, केवल सक्रिय जीवद्रव्य वाले भाग में ही विभाजन होता है। यह विदलन अतिगोलार्द्धपीतकी व केन्द्रपीतकी अण्डों में पाया जाता है। यह विदलन निम्न दो प्रकार का होता है –
(a) बिम्बाभ विदलन (Discoidal Cleavage) – इस प्रकार का विदलन अतिगोलार्द्ध पीतकी अण्डों में पाया जाता है। इसमें विदलन जर्मिनल डिस्क या ब्लास्टोडिस्क (Blastodisc) में होता है। विदलन के फलस्वरूप पीतक के ऊपर कोरकखण्डों की एक परत का निर्माण हो जाता है, जिसे कोरकचर्म (Blastoderm) कहते हैं।
(b) पृष्ठी विदलन (Superficial Cleavage) – केन्द्रपीतकी (Centrolecithal) अण्डों में पृष्ठी विदलन पाया जाता है। इसके केन्द्रक में बहुत से समसूत्री विभाजन द्वारा परिधीय कोशिकाद्रव्य बहुकेन्द्रीय हो जाता है।
उदाहरण – इन्सेक्टा वर्ग के जीव
विदलन की सार्थकता –
– यह एककोशिकीय जाइगोट बहुकोशिकीय मोरुला या ब्लास्ट्रूला का निर्माण करता है।
– इसमें रासायनिक विभेदन (Chemical differentiation) आरम्भ हो जाता है।
– इसके द्वारा निर्मित कोरकगुहा (Blastocoel) गैस्ट्रूलाभवन के दौरान संरचना विकास गति के लिए स्थान देती है।
कोरकभवन (Blastulations)
– युग्मनज में निरन्तर विदलन के कारण कोशिकाओं की संख्या बढ़ती जाती है, इन्हें कोरकखण्ड (Blastomers) कहते हैं। विदलन की प्रारम्भिक अवस्था में कोरकखण्ड गोलाकार होते हैं।
– तूतक का अभाव होता है। इनमें विदलन के दौरान ही कोरक गुहा (blastocel) का निर्माण शुरू हो जाता है। कोरक (Blastula) एक खोखली बॉल के समान है, इसकी गुहा कोरक गुहा कहलाती है।
कोरक के प्रकार (Type of Blastula)
1. एम्फिब्लास्टुला (Amphiblastula) – उदाहरण – मेंढ़क।
2. प्रगुहीकोरक (Coeloblastula) – उदाहरण – इकाइनोडर्मेटा।
3. घनकोरक (Steroblastula) – उदाहरण – कुछ मोलस्कस।
4. बिम्बकोरक (Discoblastula) – उदाहरण – अस्थिल मछलियाँ, सरीसृप, पक्षी आदि।

कन्दुकन (Gastrulation)
– कोरक का कन्दुक में परिवर्तित होना कन्दुकन या गैस्ट्रूलाभवन (Gastrulation) कहलाता है। इसमें तीन क्रियाएँ होती हैं–
(i) तीन जनन स्तरों का निर्माण।
(ii) आद्यान्त्र गुहा (Archenteron) बनती है।
(ii) कोरक गुहा का विलोपित होना।
– अविभेदित कोरकचर्म (Blastoderm) द्वारा जनन स्तरों का अलगाव दो चरणों में पूर्ण होता है। प्रथम चरण में एक जनन स्तर अलग होता है व दो जनन स्तर शेष रहते हैं।
– एम्फिऑक्सस मछलियाँ व उभयचर में प्रथम चरण में बाह्य जनन स्तर (Ectoderm) का पृथक्करण होता है। मध्य जनन स्तर व अन्तःजनन स्तर संयुक्त होते हैं जो मध्यान्तर्जन स्तर (Mesoendoderm) कहलाते हैं।
– रेप्टीलिया, पक्षी व स्तनधारियों में प्रथम चरण में एण्डोडर्म का अलगाव होता है।
– एक्टोडर्म व मीसोडर्म, एक्टोमीसोडर्म के रूप में जुड़ी रहती है। द्वितीय चरण में एक्टोडर्म व मीजोडर्म अलग होती है।
– कन्दुकन के द्वितीय चरण में तन्त्रिका रज्जु निर्मित होती है, इसे तन्त्रिकाभवन (Neurulation) कहते हैं।
– गैस्ट्रूलाभवन के गुण
– कोरक का कन्दुक में परिवर्तन होता है।
– कोशिकाओं में संरचना विकास गतियाँ (Morphoyenetic movement) पाई जाती हैं। इससे कोशिकाएँ अपने निर्धारित स्थल पर पहुँच जाती हैं।
– तीन जनन स्तर (Germ layers) बन जाते हैं।
– आद्यान्त्र (Archenteron) का निर्माण तथा अंत: में आद्यान्त्र गायब हो जाती है।

नोट –
– एम्फीऑक्सस व मेंढक में इन्वॉल्यूशन कारक रन्ध्र के किनारों पर होता है। मेंढक में इन्वॉल्यूशन द्वारा कोरडामीसोडर्म, आद्यान्त्र की ऊपरी सतह का निर्माण करती है।
– रेप्टीलिया तथा एवीज में आदि रेखा (Primitive Streak) का निर्माण इन्वॉल्यूशन द्वारा होता है।
– मेंढक में मीसोडर्म व कोरडामीसोडर्म कोशिकाओं का विभिन्न क्षेत्र से गति करके कोरक रन्ध्र पर एकत्रित होना अभिसरण कहलाता है।
– सरीसृप, पक्षी एवं मैमेलिया में कोशिकाओं का अनेक स्थानों पर भीतर की ओर धँसना अन्त: क्रमण (Ingression) कहलाता है।
गैस्ट्रूलाभवन की सार्थकता –
– गैस्ट्रूलाभवन रासायनिक विभेदन के कारण होता है। रासायनिक विभेदन से होने वाले परिवर्तन कई स्थानीकृत अंग निर्माणकारी क्षेत्रों में पूर्ण होते हैं।
– बहुकोशिकीय शरीर के निर्माण में गैस्ट्रूलाभवन महत्त्वपूर्ण अवस्था है। कोरकखण्ड संभावी अंगों के निर्माण स्थल पर जाकर इकट्ठा होते हैं।
– इसमें विदलन की दर धीमी हो जाती है तथा उपापचयी विभिन्नताएँ एव जैव रासायनिक विभेदन शुरू हो जाता है तथा केन्द्रक अधिक सक्रिय हो जाता है।
– तंत्रिका तंत्र के निर्माण के लिए यह क्रिया जरूरी है। यदि निर्माणकारी गतियाँ नहीं हों तो एक्सोगैस्ट्रूला (Exogastrula) नहीं बनते हैं। एक्सोगैस्ट्रूला में मध्यचर्म तथा एण्डोडर्म की कोशिकाओं में अन्तरारोहण नहीं होता है जिससे बाह्यचर्म को तंत्रिका तंत्र निर्माण हेतु प्रेरण नहीं मिल पाता है जिससे तंत्रिका तंत्र नहीं बन पाता है।
– गैस्ट्रूलाभवन के कारण तीन जनन स्तर बनते हैं।

अंग विकास (Organogenesis)
– यह भ्रूणीय परिवर्धन की अन्तिम अवस्था होती है इसमें प्रत्येक जनन परत में कोशिकाओं के समूह का विभेदीकरण (Differentiation) तथा विशिष्टीकरण (Specilization) होता है।
– कोशिकाओं का विशेष समूह परिवर्तित होकर नए जीवों के आकारिकीय तथा स्वीकृति ऊतक और अंग बनाते हैं।
– इसके बाद भ्रूण में सरल हृदय, पाद कलिकाएँ तथा नेत्र बन जाते हैं, अब भ्रूण, फीटस (Foetus) कहते हैं।
भ्रुणीय झिल्ली (Embryonic Membrane)
– रेप्टाइल पक्षियों तथा मेमेलिया (एम्निओट्स) में भ्रूण के बाहर की ओर भ्रूणीय झिल्ली ट्रोफोब्लास्ट द्वारा निर्मित होती है।
– ये कई प्रकार की होती हैं –
(A) एलेन्टॉइस (Allantois) –
– यह अन्दर की ओर एण्डोडर्म तथा बाहर की ओर मीजोडर्म द्वारा निर्मित होती है।
– यह अतिपीतकी अण्डों (Polylecithal egg) में सुविकसित होती है। उदाहरण – सरीसृप, पक्षी
– इसका प्राथमिक कार्य श्वसन उत्सर्जन का है।
(B) योक सेक (Yolk Sac) –
– योक सेक आन्तरिक एण्डोडर्म तथा बाह्य मीजोडर्म द्वारा निर्मित होती है। पक्षियों में सुविकसित होती है। रेप्टाइल तथा एडीज वर्ग तथा भ्रूणीय आन्त्र (Extra Embryonic gut) की भाँति कार्य करती है, इसलिए इसका मुख्य कार्य पाचन होता है।
(C) एम्नियोन (Amnion) –
– एक्टोडर्म तथा मीजोडर्म से बनी होती है तथा भ्रूण के ठीक ऊपर बनती है। भ्रूण तथा एम्नियोन के बीच में एक स्थान पाया जाता है जो कि एम्नियोटिक गुहा (Amniotic cavity) कहलाती है। एम्नियोटिक तरल भ्रूण तथा झिल्ली (एम्नियोन) दोनों से स्त्रावित होता है जो बाहरी आघातों से (Shock absorber) सुरक्षा करता है।
(D) कोरियोन (Chorion) –
– सबसे वलन होती है जो कि बाहर की ओर एक्टोडर्म की तथा अन्दर की ओर मीजोडर्म द्वारा बनती है।
– जो भ्रूण को सुरक्षा देती है तथा माता व भ्रूण के बीच में उपापचयी आदान-प्रदान के लिए प्लेसेन्टा (Placenta) बनाती है।
मानव में भ्रूणीय परिवर्धन
– तीन जनन स्तरों में से प्रत्येक स्तर शरीर के निश्चित ऊतकों, अंगों तथा तंत्रों का निर्माण करता है।
मानव में भ्रूणीय अवस्थाओं का क्रम
1. प्रथम सप्ताह- अण्डोत्सर्ग के 24 से 30 घंटों में निषेचन, 48 घंटों दो कोशिक अवस्था, तीसरे दिन मोरूला का निर्माण, चौथे दिन कोरकपुट्टी गर्भाशय गुहा में प्रविष्ट होती है। 7 -8वें दिन रोपण की क्रिया सम्पन्न होती है।
2. द्वितीय सप्ताह- कोरकपुट्टी गर्भाशयी एण्डोमिट्रियम में पूर्ण प्रवेश कर जाती है। भ्रूणीय बिम्ब एवं बाह्य भ्रूणीय झिल्लियों का निर्माण पूरा हो जाता है। 14वें दिन आदि रेखा (Primitive streak) का निर्माण हो जाता है।
3. तृतीय से छठे सप्ताह – तीसरे सप्ताह एक एन्डोडर्म व मीसोडर्म नामक जनन परतों का निर्माण हो जाता है। 20वें दिन तन्त्रिका भवन (Neurulation) होने लगता है। 28वें दिन हृदय का धड़कना शुरु (113 beat/mt.), ग्रसनी चाप निर्मित तथा भ्रूण के चारों ओर एम्नियोटिक द्रव (Amniotic fluid) की मात्रा बढ़ने लगती है। मस्तिष्क का तीव्र विकास होता है। फुफ्फुस व गुर्दे दिखाई देने लगते हैं।
4. छठे से आठवें सप्ताह– बाहरी कान उभरने लगते हैं। यकृत में RBC निर्माण शुरु, डायफ्राम का छठे सप्ताह में निर्माण, स्तनांगों का निर्माण, सातवें सप्ताह में कोहनिया व अंगुलियाँ दिखाई देनी प्रारम्भ, 7 वे सप्ताह अस्थि निर्माण की प्रक्रिया भी शुरु हो जाती है। 8वें सप्ताह के अन्त तक एक छोटे मनुष्य की भाँति भ्रूण का आकार हो जाता है। अब इसे गर्भ (Foetus) कहते हैं हृदय पूर्ण विकसित हो जाता है और 167 बार प्रति/मिनट धड़कता है। 8वें सप्ताह में 80 प्रतिशत भ्रूणों में दाहिना हाथ क्रियाशील हो जाता है अन्यथा बायाँ। यह दाएँ या बाएँ हाथ के व्यवहार का प्रथम साक्ष्य है। आठवें सप्ताह भ्रूण करवट लेता है और थोड़ा सक्रिय भी होने लगता है। आँख की पलके विकसित होने लगती हैं। 8वाँ सप्ताह भ्रूणीय अवधि की समाप्ति होती है। इस समय तक प्रौढ़ व्यक्ति में पायी जाने वाली संरचना का 90 प्रतिशत से अधिक भाग विकसित हो जाता है।
5. नौ से बारहवें सप्ताह- नौ वें सप्ताह में अंगूठा चूसना आरम्भ कर देता है। हाथ पैरों में गतियाँ संभव हैं। पलकें बंद हो जाती है कंठों में वाक् रज्जु विकसित होने लगते हैं। इस दौरान बाह्य लिंग विकसित हो जाते हैं। जिससे लड़का या लड़की की पहचान संभव है। 9वें व 10वें सप्ताह में भार 75 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। 11वें सप्ताह में गर्भस्थ शिशु जम्हाई लेने लगता है और अधिकांश शिशु दाहिना अंगूठा चूसने लगते हैं। 10वें – 11वें सप्ताह में अंगुलियों के निशान व नाखून पूर्ण विकसित हो जाते हैं। 11वें सप्ताह के अन्त तक होंठ व नाक भी विकसित हो जाते हैं।
6. तीसरे से चौथे महीने तक- मुँह में स्वाद कलिकाओं का विकास, नवजात शिशु ग्रहण की गई ग्लूकोज को आन्त्र द्वारा पचाता है और मिकोनियम, शिशु के द्वारा निष्कासित मल होता है। बालिका शिशु नर शिशु की तुलना में अधिक चलती है। दाँतों का विकास होने लगता है। माँ को स्पष्ट रूप में शिशु हलचल का पता चलना शुरू हो जाता है इसे क्लिक्निंग कहते हैं।
7. चार-छह महीने- श्वसन नलिकाओं का पूर्ण विकास, गर्भस्थ शिशु एक सफेद द्रव से ढक जाता है जिसे वर्निक्स कहते हैं। शिशु के श्रवनांग व आन्तरिक कर्ण पूर्ण विकसित हो जाते हैं और शिशु उच्च ध्वनि तीव्रता के प्रति प्रतिक्रिया करता है। छठे महीने सिर पर बाल उगने लगते हैं। त्वचा में विभिन्न ग्रन्थियों का विकास प्रारम्भ हो जाता है। फेफड़ों में सांस लेने की क्षमता का विकास हो जाता है।
8. छह महीने से जन्म तक- छठे महीने में शिशु पलकें झपकाने लगता है इस समय मस्तिष्क में तेजी से वृद्धि और इसका भार बढ़ जाता है। 7वें माह में अश्रु ग्रन्थि विकसित हो जाती है। सूंघने की क्षमता का विकास हो जाता है। गर्भस्थ शिशु चेहरे की अभिव्यक्ति बदलता है त्वचा के नीचे भूरी वसा का निर्माण होता है, जो जन्म के बाद ताप नियन्त्रण में सहायता करता है। 8वें माह में फुफ्फुस में कूपिकाओं का विकास होने लगता है गर्भस्थ शिशु के पीयूष ग्रन्थि से स्त्रावित ऑक्सीटोसिन से माता को प्रसव दर्द होने लगता है जिससे बच्चे का जन्म हो जाता है।
अपरा (Placenta)
– अपरा (Placenta) भ्रूण तथा गर्भाशय की भित्ति के मध्य अस्थायी संयोजी अंग है। यह जन्तुओं में वह अंग है जो दो विभिन्न जीवों, माता तथा भ्रूण से व्युत्पन्न ऊतकों का बना होता है, अपरा आंशिक रूप से भ्रूण की कोरियोएलेन्टॉइक झिल्ली से तथा आंशिक रूप से माता की गर्भाशय भित्ति (Uterine wall) द्वारा निर्मित होता है।
– अपरा का वह भाग जो फीटस के द्वारा बना हो, फीटल प्लेसेन्टा (Foetal Placenta) कहलाता है तथा अपरा का वह भाग जो माता की गर्भाशय भित्ति के योगदान द्वारा बनता है, उसे मेटर्नल प्लसेन्टा (Maternal placenta) कहते हैं। मनुष्य का प्लेसेन्टा केवल कोरियोन का बना होता है, अतः यह कोरियोनिया प्लेसेन्टा (Chorionia Placenta) कहलाता है।
– मेटाथीरियन्स में वास्तविक प्लेसेन्टा अनुपस्थित होता है। अपरा गर्भावस्था (Pregnancy) के अन्त तक उपस्थित होता है।
– प्लेसेन्टा के जैविक कार्य –
– पोषण (Nutrition) का कार्य – भोज्य पदार्थ प्लेसेन्टा द्वारा माता के रक्त से फीटस के रक्त में प्रवाहित किए जाते हैं।
– संचय (Storage) का कार्य – यकृत बनने से पूर्व प्लेसेन्टा फीटस के लिए ग्लाइकोजन तथा वसा का संग्रह करता है।
– श्वसन (Respiration) क्रिया में उपयोगी – ऑक्सीजन माता के रक्त से प्लेसेन्टा से विसरण द्वारा फीटस के रक्त को प्रवाहित हो जाती है। इस प्रकार कार्बन डाइ ऑक्साइड प्लेसेन्टा द्वारा फीटल रक्त से माता के रक्त में विसरित हो जाती है तथा अन्तत: माता के फेफड़ों द्वारा बाहर निकाल दी जाती है।
– उत्सर्जन (Excretion) में उपयोगी – फीटल उत्सर्जी पदार्थ प्लेसेन्टा द्वारा माता के रक्त में विसरित हो जाते हैं तथा माता के वृक्क द्वारा उत्सर्जित हो जाते हैं।
– अपरा कई हार्मोन्स का स्त्रावण करता है जो कि निम्नलिखित हैं– एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरॉन, ह्यूमन कोरियोनिक गोनेडोट्रोफिन (Human Chorionic Gonadotrophin-HCG)।
– यह हार्मोन्स गर्भकाल (Prognancy) के 6 महीने बाद कोरियोन के संयोजी ऊतकों द्वारा स्त्रावित होते हैं।
– आँवल/प्लेसेन्टा के प्रकार (Types of Placenta) – भ्रूणीय झिल्ली के योगदान के आधार पर प्लेसेन्टा 3 प्रकार का होता है –
(a) कोरियोनिक आँवल (Chorionic Placenta) – यह मनुष्य में पाई जाती है।
(b) कोरियो एलेन्टॉइक आँवल (Chorio Allantoic Placenta) – यह यूथीरियन्स तथा कुछ मेटाथिरियन्स में उपस्थित होती है।
(c) योक सेक आँवल (Yolk Sac Placenta) – कंगारू में पाई जाती है।
– प्रसव के समय गर्भाशय भित्ति के भविष्य के आधार पर प्लेसेन्टा के प्रकार –
(a) पाती आँवल (Deciduate Placenta)– गर्भाशय ऊतक का कुछ भाग क्षतिग्रस्त हो जाता है तथा प्रसव (Parturition) के समय Decidua के रूप में बाहर निकल जाता है।
उदाहरण – आँवल, रोडेन्ट्स, खरगोश, कुत्ता इत्यादि।
(b) अपाती आँवल (Non-Deciduate Placenta) –
उदाहरण – घोड़ा, सूअर।
– रसांकुर (Villi) के वितरण के आधार पर आँवल हैं –
(i) विसरित आँवल (Diffused Placenta) –विलाई कोरियॉन की पूर्ण सतह पर वितरित होते हैं। उदाहरण – घोडे, सूअर, तथा लीमर
(ii) बीजपत्री आँवल (Cotyledionary Placenta) – उदाहरण – गाय, भेड़, हरिण।
(iii) प्रदेशीय आँवल (Zonary Placenta) – विलाई वितरित होकर एक विशिष्ट आकार बनाते हैं। उदाहरण – कुत्ता, बिल्ली
(iv) बिम्बाभ अपरा (Discoidal Placenta) – रसांकुर पार्श्वीय डिस्क के रूप में होते हैं। उदाहरण – खरगोश, मानव, चमगादड़ तथा रोडेन्टस
– औतिकी के आधार पर वर्गीकरण –
(i) उपकला-जरायु आँवल (Epitheliochorial) –
उदाहरण – घोड़ा, सूअर तथ मवेशी
(ii) जरायुयोजी (Syndesmochorial) –
उदाहरण – गाय, भेड़
(iii) एन्डोथीलियो कोरियल आँवल (Endotheliochorial)–
उदाहरण – कुत्ते, बिल्ली तथा भालू
(iv) हीमोकोरियल आँवल (Haemochorial) – विभाजित करने वाली परतों की संख्या 3 होती है।
उदाहरण – मच्छर तथा चमगादड़
परखनली शिशु (Test Tube Baby)
– नि:संतानता इन दिनों महिला-पुरुषों में बड़ी समस्या बनती जा रही है लेकिन नवीनतम चिकित्सा तकनीकों ने इलाज के कई विकल्प उपलब्ध कराए हैं जो उम्मीद की किरण जगाते हैं। आईवीएफ (IVF) भी ऐसी ही तकनीक है।
– आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन कृत्रिम गर्भाधान की तकनीक है। इसकी मदद से नि:संतान दम्पत्ति भी संतान सुख पा सकते हैं। इसमें महिला के अंडे और पुरुष के स्पर्म को प्रयोगशाला में एक साथ रखकर फर्टिलाइज करने के बाद महिला के गर्भ में ट्रांसफर कर देते हैं। इस प्रक्रिया को एम्ब्रियो कल्चर व टेस्ट ट्यूब बेबी भी कहते हैं। 70-80 फीसदी नि:संतान दम्पत्ति का इलाज दवाओं और 20-30 फीसदी मरीजों को आईवीएफ की जरूरत पड़ती है।
– नि:सन्तानता के कारण (Causes of Infertility) –
(A) पुरुष कारक (Male factor) – नि:सन्तानता में पुरुषों की भूमिका 40 % तक होती है। इनके निम्न कारण हैं –
1. एजोस्पर्मिया (Azospermia) – वीर्य में शुक्राणुओं का अनुपस्थित होना एजोस्पर्मिया कहलाता है।
2. ओलिगोस्पर्मिया (Oligospermia) – वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या का सामान्य से कम होना।
3. शुक्राणुओं की गति में कमी होना।
(B) स्त्री कारक (Female factor) –
– अण्डाणुओं का निर्माण नहीं होना।
– फेलोपियन नलिका का अवरुद्ध होना।
– अण्डाशय का नहीं पाया जाना।
– गर्भाशय कम विकसित होना।
– इसके अलावा अन्य कारक भी हो सकते हैं। जैसे –
– आनुवंशिक कारण भी हो सकते हैं।
– नर व मादा गोनेरिया रोग से पीड़ित हैं तो भी उनमें नि:सन्तानता उत्पन्न होती है। नि:संतान दम्पतियों को चिकित्सक द्वारा सलाह लेकर उपचार करवाना चाहिए।
– कृत्रिम गर्भाधान (Intrauterine Insemination) विधि उपयोगी है। इसमें पति के वीर्य से स्वस्थ शुक्राणु प्राप्त करके कृत्रिम रूप से इन्हें गर्भाशय तक पहुँचाया जाता है। इसमें निषेचन की सफलता 25-30% तक होती है।
– पात्रे निषेचन (In-Vitro Fertilization) (IVF) को परखनली शिशु (Test-tube Baby) भी कहा जाता है। इस विधि में शरीर के बाहर निषेचन करवाया जाता है व कुछ समय के परिवर्धन के बाद इसे पुन: गर्भाशय में आरोपित कर दिया जाता है।
– IVF व निषेचन के बाद भ्रूण को गर्भाशय में आरोपित करना ET (Embryo transfer) कहलाता है। इस सम्पूर्ण विधि को IVF-ET कहते हैं।
– हमारे देश में प्रथम परखनली शिशु उत्पन्न करने का श्रेय डॉ. इन्द्रा हिन्दुजा को जाता है।
– IVF विधि में निम्नलिखित चरण होते हैं –
– स्त्री की प्रारम्भिक जाँच की जाती है। इसके अन्तर्गत अल्ट्रा सोनोग्राफी, रक्त जाँच, हार्मोन जाँच आदि की जाती हैं।
– स्त्री को हार्मोन थेरेपी देकर डिम्ब उत्पादन में वृद्धि करता है।
– सोनोग्राफी से उचित समय पर महिला से डिम्ब प्राप्त करना तथा कृत्रिम माध्यम में डिम्बों को उसके पति के शुक्राणु द्वारा निषेचित करवाया जाता है। निषेचन के बाद युग्मनज इस माध्यम में विदलन प्रारम्भ कर देता है।
– निषेचन के लगभग 48 घण्टे बाद भ्रूण को माता के गर्भाशय में प्रतिस्थापित किया जाता है।
– गर्भाशय की जाँच-भ्रूण प्रतिस्थापन के लगभग 15 दिन बाद रक्त परीक्षण द्वारा की जाती है।
विकास अथवा परिवर्धन के विशिष्ट पहलू
(Specific Aspect of Development)
कोशिका में वृद्धि –
– जीवों के आकार, भार में वृद्धि तथा नए जीवद्रव्य के संश्लेषण को वृद्धि (Growth) कहते हैं।
– उपापचय दर (Anabolic rate), अपचय दर (Catabolic rate) से अधिक होना वृद्धि के संकेत हैं।
– विस्तारण वृद्धि (Auxetic Growth) – शरीर का आयतन कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि के बिना केवल शरीर कोशिकाओं के आकार में वृद्धि के कारण बढ़ता है। उदाहरण – रोटीफर्स, ट्यूनीकेटस।
– गुणात्मक वृद्धि (Multiplication Growth) – इसमें मुख्यतः कोशिका की संख्या में समसूत्री विभाजन होता है। उदाहरण – भ्रूण (Embryo)।
– अवस्थाएँ (Stage of Growth) – वृद्धि में निम्न अवस्थाओं को शामिल करते हैं–
(i) जन्म से पूर्व की अवस्था – भ्रूणीय परिवर्धन लगभग 280 दिन
(ii) प्रारम्भिक बाल्यकाल अवस्था – 10 माह से 5 वर्ष की आयु तक
(iii) बाल्यावस्था – 5 से 14 वर्ष तक (यौवनावस्था का समय)।
(iv) किशोरावस्था – 14 से 22 वर्ष तक
– मानव सहित उच्च जन्तुओं के वृद्धि वक्र, ‘S’ आकृति के होते हैं इसे सिग्मॉइड वृद्धि वक्र (Sigmoid Growth Curve) कहते हैं।
– मानव में थाइरॉक्सिन हॉर्मोन वृद्धि दर को नियंत्रित करता है।
विरूपजनन (Teratogenesis)
– एक ऐसा परिवर्धन जिसमें संरचना विकास अनियमित हो जाए तथा दानव रूपी संरचना का निर्माण हो उसे विरूपजनन (Teratogenesis) कहते हैं। विरूपजनन का अध्ययन टेरोटोलॉजी (Teratology) कहलाता है।
– टेरोटोलॉजी भ्रूण विज्ञान की वह शाखा है जिसमें असामान्य परिवर्धन तथा इसके अन्य उत्पाद से सम्बन्धित अध्ययन किया जाता है।
– विरूपोत्पत्ति उत्पन्न करने वाले टेरेटोजेनिक होते हैं। विरूपता दो प्रकार की होती है–
– संरचनात्मक असंगतियाँ – फीनोटाइप से संबंधित होती है। जैसे मनुष्य में कभी-कभी बिना पैरों के शिशु का जन्म अथवा छः अंगुलियाँ होना इसके कारण ही जुड़वाँ बच्चे जो शरीर के किसी भाग से आपस में जुड़े हुए पैदा होते हैं।
– कार्यात्मक असंगतियाँ – हीमोफिलिया एवं वर्णान्धता कार्यात्मक असंगतियाँ हैं।
आयुकरण (Ageing)
– जीवों के शरीर की कोशिकाओं, ऊतकों एवं अंगों की संरचना एवं कार्यों में होने वाले ह्वास को आयुकरण (Ageing) कहते हैं।
– क्षतिग्रस्त ऊतकों, अंगों एवं अंग तंत्रों की मरम्मत में गिरावट आना आयुकरण का लक्षण है।
– आयु के साथ होने वाले विभिन्न परिवर्तन-आयुकरण की दर अलग-अलग प्राणियों में भिन्न-भिन्न होती है।
– आयुकरण के साथ केल्सियम की उपलब्धता में कमी आने से हड्डियाँ पतली, कम लचीली हो जाती हैं। जिससे ऑस्टीयोपोरोसिस नामक रोग हो जाता है।
– गमन तंत्र में कंकाल पेशियाँ तथा कंदराओं के कोलेजन प्रोटीन में आए परिवर्तन से इनके लचीलेपन में कमी आ जाती है जिससे पेशियाँ कमजोर हो जाती हैं।
– हृदय कमजोर होने से रुधिर प्रवाह में कमी आ जाती है।
– लाल अस्थि मज्जा में कमी तथा उत्सर्जन कम होना।
– त्वचा पर झुर्रियाँ तथा सूखापन।
– शैशवावस्था में प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय तथा वृद्धावस्था में निष्क्रिय हो जाता है।
मृत्यु (Death)
– मृत्यु जीवन का अंतिम प्रक्रम है। मृत्यु के समय शारीरिक क्रियाएँ बन्द हो जाती हैं।
– हृदय, रुधिर अथवा तंत्रिका तंत्र के काम करना बन्द करने से मृत्यु हो जाती है।
– ऊतकों के क्षीण हो जाने से इनमें अनुत्क्रमणीय, कार्यिकीय एवं उपापचयी परिवर्तन होते हैं जिनसे हृदय, फेफड़े, यकृत, वृक्क आदि अव्यवस्थित होकर कार्य करना बन्द कर देते हैं जिससे जीवन की जैविक क्रिया थम जाती है।
– प्रतिरक्षा तंत्र के क्षीण हो जाने से व्यक्ति द्वारा रोगों से लड़ने की क्षमता में कमी आ जाती है। धीरे-धीरे सूक्ष्म जीवों का संक्रमण बढ़ने लगता है।
– मृत्यु भी सभी जीवों की आवश्यक जैविक प्रक्रिया है जिससे पृथ्वी पर जीवों की संख्या का संतुलन बना रहे तथा नई पीढ़ी को स्थान मिलता रहे।
परिवर्धन (Development)
– प्रत्यक्ष परिवर्धन (Direct Development) में निषेचित अण्ड पूर्ण जन्तु में रूपान्तरित हो जाता है जो कि देखने में वयस्क प्राणी के समान होता है केवल आकार छोटा होता है। उदाहरण-स्तनधारी, पक्षी, सरीसृप आदि।
– अप्रत्यक्ष परिवर्धन (Indirect Development) में निषेचित अण्ड भिन्न आकृति के प्राणी में रूपान्तरित होता है जिसे डिम्भक या लार्वा (Larva) कहते हैं, जो किसी भी प्रकार से अपने वयस्क अवस्था से मेल नहीं खाता। इसका आवास, भोजन एवं व्यवहार भी वयस्क अवस्था से भिन्न होता है।
– निषेचित अण्ड संरचनात्मक एवं कार्यात्मक भिन्नता सहित एक सीमित अवधि तक स्वतंत्र जीवन व्यतीत करता है। इस अवधि में यह बड़ी मात्रा में पोषण करता हुआ वृद्धि करता है एवं धीरे-धीरे वयस्क के समान स्वरूप ले लेता है।
कायान्तरण
– लार्वा अवस्था से वयस्क अवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया कायान्तरण (Metamorphosis) कहलाती है। कायान्तरण का होना या न होना अण्डाणु में पाए जाने वाले पोषक पीतक (Yolk) की मात्रा निर्धारित करती है।
– कायान्तरण प्रमुख रूप से दो प्रकार का होता है–
(i) प्रगामी कायान्तरण (Progressive Metamorphosis) –लार्वा अवस्था के जटिल एवं संरचनात्मक दृष्टि से अधिक विकसित वयस्क स्वरूप में परिवर्तन को प्रगामी कायान्तरण (Progressive Metamorphosis) कहते हैं। उदाहरण – कीट एवं मेंढक
– कायान्तरण के दौरान होने वाले परिवर्तनों को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है–
(ii) प्रतिगामी कायान्तरण (Reterogressive Metamorphosis) – इसमें लार्वा अवस्था वयस्क से अधिक विकसित होती है। लार्वा में पाए जाने वाले कुछ विकसित लक्षण वयस्क में विलुप्त हो जाते हैं एवं वयस्क लार्वा की तुलना में संरचनात्मक संगठन वाला प्राणी हो जाता है इस प्रकार का कायान्तरण प्रतिगामी कायान्तरण कहलाता है। उदाहरण – ट्यूनिकेटा (यूरोकॉर्डेटा) समूह का हर्डमानिया (Herdamania)
– कायान्तरण की प्रक्रिया में थाइरॉक्सिन हॉर्मोन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका स्त्रावण थायरॉइड ग्रन्थि द्वारा होता है। पीयूष ग्रन्थि (Pituitary gland) TSH (Thyroid Stimulating Hormones) द्वारा इस ग्रन्थि को थायरॉक्सिन के स्त्रावण हेतु उत्तेजित किया जाता है।
– एम्फीबिया प्राणियों में प्रोलेक्टिन (Prolactin) हॉर्मोन द्वितीय कायान्तरण हेतु आवश्यक होता है।
– इनसेक्टा वर्ग के प्राणियों में इकडायसोन (Ecdisone) एवं जुवेनाइल (Juvenile) हॉर्मोन स्त्रावित किए जाते हैं जो कि क्रमशः वृद्धि, विभेद (Differentiation) निर्मोचन (Moulting) का नियंत्रण करते हैं।
पुनरुद्भवन (Regeneration)
– किसी जीव के पश्च भ्रूणीय जीवन के क्षतिग्रस्त संरचनाओं के विस्थापन, मरम्मत को एक या छोटे से खण्ड से सम्पूर्ण शरीर के पुनर्निर्माण (Reconstitution) को पुनरुद्भवन (Regeneration) कहते हैं।
– पुनरुद्भवन निम्न श्रेणी के जन्तुओं में पाया जाता है।
– जन्तुओं के पुनरुद्भवन दो प्रकार का होता है–
(i) पुनःपूरक पुनरुद्भवन (Reparative Regeneration)
– यह घावों को भरने तक ही सीमित रहता है।
– अकशेरूकियों तथा कशेरूकियों दोनों में पाया जाता है।
– स्तनधारियों के यकृत में सर्वाधिक पुनःपूरक पुनरुद्भवन पाया जाता है।
(ii) पुनःस्थापक पुनरुद्भवन (Restorative Regeneration)
– यह पुनरुद्भवन अकशेरूकियों में पाया जाता लेकिन कशेरूकियों में भी उपस्थित है।
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