पारिस्थितिकी और पर्यावरण
पारिस्थितिकी:-
– जीवों के पारस्परिक तथा वातावरण के साथ उनके संबंधों के वैज्ञानिक अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।
– सर्वप्रथम Ecology शब्द का प्रयोग जर्मन वैज्ञानिक अर्नेस्ट हेकेल द्वारा किया गया।
– वर्तमान समय में पारिस्थितिकी को व्यापक अर्थों में परिभाषित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत न केवल पौधों एवं जंतुओं तथा उनके पर्यावरण के बीच अन्तर्संबंधों का अध्ययन किया जाता है।
– रामदेव मिश्रा को ‘भारतीय पारिस्थितिकी का जनक’ कहा जाता है।
पारिस्थितिकी तंत्र:-
– पारितंत्र या पारिस्थितिकी तंत्र की संकल्पना का प्रतिपादन सर्वप्रथम 1935 में ए.जी. टेन्सले ने किया।
– पारिस्थितिकी तंत्र प्रकृति की क्रियात्मक इकाई है, जिसमें इसकी जैविक तथा अजैविक घटकों के बीच होने वाली जटिल अन्योन्य क्रियाएँ सम्मिलित हैं।
– यूजिन पी. ओडम के अनुसार पारिस्थितिकी तंत्र पारिस्थितिकी की मूलभूत इकाई है, जिसमें उपस्थित जैविक एवं अजैविक घटक एक दूसरे से अंत: क्रिया करते हैं एवं दोनों घटक जीवन के सातत्य के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
पारिस्थितिकीय तंत्र की विशेषताएँ:-
– प्रत्येक पारितंत्र में जैव विविधता निहित होती है, जो कि जन्तुओं, पादपों और सूक्ष्मजीवों की एक बहुरूपता है।
– यह संरचित एवं सुसंगठित तंत्र होता है।
– पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता उसमें ऊर्जा की सुलभता पर निर्भर करती है।
– आकार के आधार पर इन्हें कई भागों में बाँटा जा सकता है तथा पृथ्वी पर अति लघु से अति विशाल तक अनेक पारितंत्र मौजूद हैं।
पारिस्थतिकीय कर्मता:-
– किसी भी क्षेत्र में प्रत्येक जाति अथवा उपजाति का उस क्षेत्र में एक निश्चित स्थानीय क्षेत्र सुरक्षित होता है तथा उसी क्षेत्र की सीमा में ये निवास करते हैं, यही सुरक्षित क्षेत्र निकेत/निलय /निक/कर्मता कहलाता है।
– किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता निक की विविधता पर निर्भर करती है क्योंकि उस पारिस्थितिकी तंत्र में ‘ऊर्जा प्रवाह ज्यादा तथा आहार शृंखलाएँ बड़ी होंगी, जिससे प्रजातियों की संख्या में उतार-चढ़ाव कम होगा’।
– निम्नलिखित कारक जो पारिस्थितिकी निक को प्रभावित करते हैं-
1. घनत्व, प्रजाति क्षेत्र, भोजन/आहार की आवृत्ति (संख्या चर)
2. दैनिक समयावधि, स्थान की ऊँचाई इत्यादि (निकेत चर)
3. ऊँचाई, ढाल की मृदा तथा मृदा उर्वरता (आवास चर)
पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य:-
– पारितंत्र जटिल परिवर्तनात्मक तंत्र है, ये विशिष्ट कार्य करते हैं, जो इस प्रकार हैं-
– खाद्य शृंखला में ऊर्जा का प्रवाह।
– परिस्थितिकी अनुक्रम या पारितंत्र का विकास।
– पोषकों का चक्रण (भू- जैव-रासायनिक चक्र) इत्यादि।

– पारिस्थितिकी तंत्र का दो भागों में विभाजन कर सकते हैं-
(A) जैविक घटक में उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटनकर्ता को शामिल किया जाता है।
(1) उत्पादक:- ये क्लोरोफिल युक्त पादप हैं जिनमें शैवाल, घास एवं पेड़ आते हैं। ये प्रकाश संश्लेषण द्वारा सूर्य ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं, ये अधिकतर प्राणियों के लिए भोजन का स्रोत है।
– हरे पादपों को स्वपोषी भी कहते हैं क्योंकि ये अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
(2) उपभोक्ता:- वे प्राणी जो स्वयं का भोजन नहीं बना सकते है और किसी अन्य पर आश्रित रहते हैं, उन्हें उपभोक्ता कहते हैं। ये विषमपोषी होते हैं, भोजन संबंधी आदतों के आधार पर इन्हें निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया गया-
(i) प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी):- प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी) के अंतर्गत वे पशु आते हैं, जो अपना भोजन पौधों या पौधों के उत्पादों को खाकर प्राप्त करते हैं।
जैसे- गाय, हरिण, टिड्डा, खरगोश।
(ii) द्वितीयक उपभोक्ता (मांसाहारी):- इस श्रेणी में वे पशु आते हैं, जो प्राथमिक उपभोक्ता को खाकर जीवित रहते हैं; जैसे लोमड़ी, मेंढक, बिल्ली।
(iii) तृतीयक उपभोक्ता (उच्च मांसाहारी):-
– जो द्वितीयक उपभोक्ताओं को भी अपना भोजन बना लेते हैं, तृतीयक उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं। इस श्रेणी में सर्वाहारी जंतु आते हैं।
– जो अपना भोजन हरे पौधों, शाकाहारी व मांसाहारी को खाकर प्राप्त करते हैं। इनमें मानव सहित पक्षी, मछलियाँ, कुत्ते, तिलचट्टा, शेर, चीता आदि सम्मिलित हैं।
(3) अपघटक:-
– इसमें मुख्य रूप से जीवाणु तथा कवकों का समावेश होता है, जो मरे हुए उपभोक्ताओं को साधारण भौतिक तत्त्वों में विघटित कर देते हैं तथा ये फिर से वायुमंडल में मिल जाते हैं।
– पोषकों के चक्रण में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, इन्हें अपरदभोजी भी कहा जाता है।
(B) अजैविक घटक के अंतर्गत निर्जीव वातावरण आता है, जिसके आधार पर हम अजैविक घटकों को तीन भागों में विभाजित करते हैं।
भौतिक घटक:-
– इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के जलवायवीय कारक जैसे – सूर्य का प्रकाश, ताप,आर्द्रता तथा द्रव इत्यादि को शामिल किया जाता है।
– भौतिक घटकों में सूर्य-ऊर्जा मुख्य है जो हरे पौधे पर्णहरित द्वारा विकिरण ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं, जो कार्बनिक अणुओं के रूप में संचित रहती है। यही वह ऊर्जा है जो सम्पूर्ण जीवीय समुदायों में बहती है।
– कार्बनिक घटक:- इनमें प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट एवं ह्यूमसी पदार्थ सम्मिलित हैं। ये मुख्य रूप से जीवित काय से संबंधित है और अजैविक एवं जैविक यौगिकों को जोड़ते हैं।
– अकार्बनिक घटक:- इनमें पोषक तत्त्व एवं यौगिक आते हैं। जैसे– कार्बन, नाइट्रोजन, सल्फर, फॉस्फोरस, कार्बन डाईऑक्साइड एवं पानी आदि, इनका परिस्थितिकी तंत्र में चक्रण होता है।

(ii) घास का पारितंत्र:-
– ये उष्णकटिबंधीय तथा शीतोष्ण कटिबंधीय दोनों क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
– घास के मैदान उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहाँ ऊष्ण और शुष्क गर्म व वर्षामय मौसमी दशाएँ उपस्थित होती हैं।
– सवाना- उष्णकटिबंधीय घास के मैदान को कहा जाता है, ये मुख्य रूप से अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, भारत में पाए जाते हैं।
(iii) मरुस्थल पारिस्थितिकी तंत्र:- सभी वातावरणीय दशाएँ अपनी चरम सीमा पर होती हैं।
– तीन प्रकार की वनस्पतियाँ पाई जाती हैं-
(i) मरुस्थलीय पौधे, वार्षिक शाकीय झाड़ी, गूद्देदार मरुस्थलीय पौधे, छोटे वृक्ष।
(ii) सुविकसित जड़तंत्र और बड़े क्षेत्र में फैला हुआ।
(iii) जन्तुओं में भी कुछ खास अनुकूलन पाया जाता है।
– जैसे- तेज दौड़ने वाले जीव, लम्बी टाँगों वाले तथा रात्रिचर जीव।
(iv) टुण्ड्रा पारिस्थितिकी तंत्र:- टुण्ड्रा पारितंत्र को दो भागों में बाँटा जाता है- आर्कटिक टुण्ड्रा, अल्पाइन टुण्ड्रा।
2. जलीय पारितंत्र:- जलीय पारितंत्र का वर्गीकरण लवणता के आधार पर दो प्रकार से किया जाता है–

(i) स्वच्छ जलीय पारितंत्र:-
– धरातल पर जल जिसका चक्रण निरंतर चलता रहता है, जिसमें अल्पमात्रा में लवण होते हैं, स्वच्छ जलीय पारितंत्र कहलाता है।
– उदाहरण – तालाब, झील, दलदल, नदियाँ आदि।
(ii) समुद्री पारितंत्र:- समुद्री पारितंत्र का संबंध समुद्र के साथ-साथ समुद्री जीवों से भी होता है, जिनके आधार पर इस पारितंत्र को खुला समुद्र, बैरियर द्वीप, प्रवाल भित्ति तथा तटरेखा आदि प्रदेशों में बाँटा जाता है।
– मानव निर्मित पारितंत्र– इसमें सामान्य कृषि पारितंत्र, नगरीय पारितंत्र, वृक्षारोपण एक्वाकल्चर, बाँध, जलाशय, नहरें, प्रयोगशाला संवर्धन इत्यादि को शामिल किया जाता है।
खाद्य शृंखला:-
– किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में “जीवधारियों की एक ऐसी शृंखला जिसमें एक जीवधारी दूसरे का उपयोग करता है या दूसरे का आहार बनता है” आहार शृंखला कहलाती है।
– उदाहरण – घास à टिड्डा à मेंढक à साँप à बाज

– प्रत्येक जीव द्वारा किसी अन्य जीव का भक्षण किया जाना या एक-दूसरे का भोजन बनना ही खाद्य शृंखला बनाती है।
– वे खाद्य शृंखलाएँ जो पौधों से प्रारम्भ होकर शाकाहारियों, मांसाहारियों की ओर अग्रसर होती है, चारण या परभक्षी खाद्य शृंखला कहलाती है।
– आहार शृंखला में हरे पौधे प्रथम पोषण स्तर की रचना करते हैं, शाकाहारी दूसरे पोषण स्तर की तथा मांसाहारी उच्चतर पोषण स्तर की रचना करते हैं।
खाद्य शृंखला | – | पोषण स्तर |
घास | – | प्रथम |
टिड्डा | – | द्वितीय |
मेंढक | – | तृतीय |
साँप | – | चतुर्थ |
बाज | – | पंचम् |
– आहार शृंखला में जब हम एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर की ओर बढ़ते हैं, तो हर पोषण स्तर पर ऊर्जा का ऊष्मा के रूप में ह्वास होता है, लगभग 10% ऊर्जा ही अगले स्तर में पहुँचती है।
घास à | हरिण à | कुत्ताà | भेड़ियाà | शेर |
(10,000 कैलोरी) | (1000 कैलोरी) | (100 कैलोरी) | (10 कैलोरी) | (1 कैलोरी) |
खाद्य जाल:-
– खाद्य शृंखला में उत्पादक तथा प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक उपभोक्ताओं में सरल संबंध होता है लेकिन जब परितन्त्र में कई जातियों के जंतु एक ही प्रकार के भोज्य पदार्थ को खाते हैं या एक ही प्रकार की जाति कई पकार के भोज्य जंतुओं का भक्षण करते हैं तो आहार शृंखला जटिल हो जाती है।

अनेक आहार शृंखलाओं से बना खाद्य जाल
– इस जटिल आहार शृंखला को ही आहार जाल कहते हैं।
– इस प्रकार उत्पादक तो एक ही है परंतु उपभोक्ता अलग-अलग हैं। (चूहा, टिड्डी, मानव), ये आहारजाल का निर्माण करते हैं।
– खाद्य जाल जितना जटिल होगा, पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही स्थायी होगा।
पारिस्थितिकी उत्पादकता:-
– इकाई समय में उत्पादकों द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र में कार्बनिक पदार्थों की जो मात्रा एकत्र होती है, उसे पारितंत्र उत्पादकता कहते हैं।
– पारितंत्र की उत्पादकता दो कारकों पर निर्भर करती है।
– प्रथम- सौर ऊर्जा की मात्रा।
– द्वितीय- प्राथमिक उत्पादक द्वारा सौर ऊर्जा को रासायनिक उर्जा (आहार) में रूपांतरित करने की क्षमता पर।
– प्राथमिक उत्पादकता:- पौधों द्वारा प्रकाश ऊर्जा का भोजन के रूप में रूपांतरण, प्राथमिक उत्पादकता कहलाता है। इनमें मुख्यत: शुद्ध प्राथमिक उत्पाद (NPP) और सकल प्राथमिक उत्पाद (GPP) पाया जाता है।
– सकल प्राथमिक उत्पादकता:- प्राथमिक उत्पादकों द्वारा निश्चित इकाई क्षेत्रफल व समय में बनाए गए कार्बनिक पदार्थों की कुल मात्रा (GPP) Gross Primary Productivity कहलाती हैं।
– नेट प्राथमिक उत्पादकता– पादप ऊतकों में संचित कार्बनिक पदार्थों की उस मात्रा से है, जो श्वसन क्रिया में प्रयुक्त कार्बनिक पदार्थों के बाद बचती है।
– NPP = GPP ‒ उपचय क्रियाओं में उपभोग कर ली गई ऊर्जा
पारिस्थितिक पिरामिड:-
– पारिस्थितिकी पिरामिड की अवधारणा सर्वप्रथम चार्ल्स एल्टन द्वारा प्रस्तुत की गई।
– पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न पोषस्तर पर जीवों की संख्या, जीवों का भार तथा ऊर्जा में अंतर पाया जाता है तथा इस अंतर को एक ग्राफ में प्रदर्शित करते हैं, जिसे पिरामिड कहा जाता है।
– पारिस्थितिकी पिरामिड तीन प्रकार के होते हैं-
1. जीव संख्या पिरामिड
2. जीव द्रव्यमान पिरामिड
3. ऊर्जा पिरामिड
(1) जीव संख्या पिरामिड:- यह विभिन्न पोषण स्तर में जीवों की संख्या को दर्शाता है, ये सीधे व उल्टे दोनों प्रकार के होते हैं।
उदाहरण–

– यहाँ घास की संख्या सबसे अधिक, शाकाहारी जंतुओं की उससे कम तथा मांसाहारी जंतुओं की सबसे कम है।
– पेड़ पारितंत्र में पिरामिड उल्टा बनेगा क्योंकि यहाँ पर उपभोक्ताओं की संख्या ज्यादा जबकि उत्पादक (पेड़) की संख्या केवल एक है।

(2) जीव द्रव्यमान/भार पिरामिड:- इस प्रकार के पिरामिड किसी पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों के भार को निरूपित करते हैं अर्थात् “खड़ी फसल” को निरूपित करते हैं।
खड़ी फसल:-
– जीवों में कुल कार्बनिक पदार्थ की मात्रा खड़ी फसल कहलाती है।
– यह पिरामिड उल्टे व सीधे दोनों बन सकते हैं।


ऊर्जा के पिरामिड:-
– इस प्रकार के पिरामिड किसी पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों की ऊर्जा को निरूपित करते हैं।
– ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा बनता है।
– उत्पादक से उपभोक्ताओं की तरफ बढ़ने पर ऊर्जा के मान में सदैव कमी आती है।
– ऊर्जा का पिरामिड उत्पादकता को निरूपित करता है।

उदाहरण –
घास à | टिड्डा à | मेंढक à | साँप à | मोर à |
(1000 कैलोरी) | (100 कैलोरी) | (10 कैलोरी) | (1कैलोरी) | (0.1 कैलोरी) |
– पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा प्रवाह- पृथ्वी पर ऊर्जा का एकमात्र शाश्वत स्रोत सूर्य का प्रकाश है।
– हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा सूर्य की विकिरण ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा (भोजन) में रूपान्तरित करते हैं।
– कार्बोहाइड्रेटस के रूप में संचित यही भोजन विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रों में उपभोक्ताओं द्वारा प्रयुक्त होता है।
– पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवेश तथा विभिन्न स्तरों तक इसका वितरण उष्मागतिकी के सिद्धान्तों के अनुरूप होता है।
(1) ऊर्जा संरक्षण का नियम:- इस नियम के अनुसार ऊर्जा का न तो निर्माण किया जा सकता है और न ही उसे नष्ट किया जा सकता है, उसका एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन होता रहता है।
– उदाहरण – पौधों द्वारा प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में तथा रासायनिक ऊर्जा का श्वसन द्वारा उष्मा ऊर्जा में रूपांतरण होना।
(2) एन्ट्रॉपी का नियम:- उष्मा गतिकी के द्वितीय नियमानुसार, जब ऊर्जा का रूपांतरण एक प्रारूप से दूसरे प्रारूप में होता है, तो कुछ ऊर्जा का ह्रास हो जाता है तथा ये ऊर्जा वायुमंडल में विसरित हो जाती है।
– कोई भी सजीव अपने द्वारा प्राप्त कुल ऊर्जा का औसत 10% हिस्सा ही अपने शरीर के निर्माण हेतु उपयोग में लेता है।
– इस प्रक्रिया में खाद्य शृंखला के प्रत्येक स्तर पर केवल 10% ऊर्जा ही एक पोषक स्तर से दूसरे पोषक स्तर पर स्थानान्तरित हो पाती है।
– इसी कड़ी में दशांक नियम या 10% Law लिण्डमान द्वारा दिया गया।
उत्पादक à | प्राथमिक उपभोक्ता à | द्वितीयक उपभोक्ता |
(100% ऊर्जा) | (10% ऊर्जा) | (1% ऊर्जा) |

– पारिस्थितिकी दक्षता– एक पोष स्तर से दूसरे पोष स्तर में स्थानान्तरित ऊर्जा प्रतिशत मात्रा ही पारिस्थितिकी दक्षता कहलाती है।
घास à | टिड्डा à | मेंढक à | सांप à | मोर |
(10,000कैलोरी) | (1000 कैलोरी) | (100 कैलोरी) | (10कैलोरी) | (1 कैलोरी) |
मेंढक के पोष स्तर में पारिस्थितिकी दक्षता = 1001000×100=10
टिड्डे के पोष स्तर में पारिस्थितिकी दक्षता = 100010000×100=10

पारिस्थितिक तंत्र में अजैविक घटकों के प्रति जैविक घटकों की अनुक्रियाएँ:-
1. समस्थापन (Homiostatis):- यह ऐसी स्थिति है, जिसमें जीव लम्बे समय में स्थायी आंतरिक पर्यावरण विकसित कर लेते हैं। वे शरीर का तापमान तथा तरल पदार्थों का सांद्रण बाह्य परिस्थितियों के विपरीत कर स्वयं को ढाल लेते हैं।
2. नियमन करना (Regulate):- इसके तहत जीव शरीर के तापमान एवं परासरण को एक निश्चित बिन्दु पर ढाल लेते हैं। चाहे वे अंटार्कटिक में रहे या सहारा में रहे। मानव द्वारा अपने शरीर का तापमान 37°c रखना नियमन का ही उदाहरण है।
– शरीर नियमन द्वारा ही गर्मी में पसीना निकाल कर तथा जाड़े में कम्पन्न कर तापमान को अनुकूलित करता है।
3. संरूपण करना (Conform):- अधिकांश जीव अपने शरीर का तापमान एक निश्चित बिन्दु पर नियमित नहीं कर पाते है। जब ये संरूपण की क्रिया अपनाते हैं, इसके तहत जीव अपने शरीर का तापमान बाह्य परिवेश के तापमान के अनुसार बदलते रहते हैं।
4. प्रवास करना (Migrate):-
– जब परिवेश ज्यादा प्रतिकूल दबाव में हो जाता है तो जीव अधिक बेहतर क्षेत्रों में प्रवास कर जाते हैं, जैसे- ग्रीष्म ऋतु में साइबेरिया की कड़ाके की ठंड से बचने के लिए बहुत सारे पक्षी हर वर्ष भारत की ओर प्रवास करते हैं।
5. निलंबित करना (Suspend):- तापमान बढ़ने तथा घटने पर कुछ समय के लिए शरीर की क्रियाओं को रोक दिया जाता है।
उदाहरण – घोंघों तथा मछलियों द्वारा ग्रीष्म निष्क्रियता को अपनाना निलंबन का ही गुण है।
6. अनुकूलन (Adaptation):-
– विषम परिस्थितियों को उपयुक्त परिस्थितियों में बदल कर जीवित रहना ही अनुकूलन है।
– अधिकांश मामलों में अनुकूलन अल्पकाल में न होकर लम्बे समय में होता है।
उदाहरण–
– नागफनी, कैक्टस आदि में पत्तियाँ काँटों के रूप में रूपांतरित।
– ठण्डे स्थानों पर रहने वाले जीवों जैसे- भालू तथा पैंग्विन आदि के बाल दो परत में होते हैं।
Note – पौधों के द्वारा केशिकत्व जल का उपयोग किया जाता है।