आनुवंशिकी
मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम
– आम के वृक्ष के बीज अंकुरित होकर आम के पौधे को जन्म देते हैं और कुत्तों से पिल्ले ही पैदा होते हैं न कि किसी अन्य जन्तु के बच्चे। मनुष्य मनुष्य को ही जन्म देते हैं। संतति की इस प्रवृत्ति को, जिसमें वे अपने जनकों के ही गुण या लक्षण प्राप्त करते हैं उसे आनुवंशिकता या हेरिडिटी (Heredity) कहते हैं। जिस विज्ञान में आनुवंशिकता तथा जनकों और इनकी संतति के बीच विविधता का अध्ययन करते हैं उसे आनुवंशिकी (जेनेटिक्स, Genetics) कहते हैं।
– आनुवंशिकी विज्ञान का आरम्भ सन् 1900 में हुआ, जब मेण्डल के नियमों की पुनः खोज हुई। आनुवंशिकी (Genetics) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम विलियम बेटसन (William Bateson) ने सन् 1905 में किया था। यह ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ होने’ या वृद्धि करने’ से है (to become or to grow) इस विज्ञान के अंतर्गत आनुवंशिकता (Genetics) एवं विविधता (Variations) का अध्ययन किया जाता है।
– आनुवंशिकता का अर्थ उन विशेषकों या लक्षणों से है, जो निरंतर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी से अर्थात् माता-पिता से संतति में स्थानांतरित होते रहते हैं।
– ये लक्षण किसी प्राणी विशेष के लिए निश्चित होते हैं। आनुवंशिक विविधताएँ लैंगिक प्रजनन एवं उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप जीवों में उत्पन्न होती हैं। ये विभिन्नताएँ संतति में माता-पिता से वंशानुगत होती हैं।
– आनुवंशिकी की स्थापना मेण्डल के कार्य से हुई है।
– मेण्डल के कार्य के महत्त्व को देखते हुए उन्हें आनुवंशिकी का जनक (Father of Genetics) माना जाता है।
– मेण्डल के 30,000 मटर के पौधों पर किए गए प्रयोगों से प्राप्त परिणामों को ब्रौन सोसायटी ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के समक्ष 08 फरवरी से 08 मार्च, 1865 को प्रस्तुत किया गया तथा अपने शोध कार्य को 1866 में सोसायटी की वार्षिक पत्रिका में “पादपों में संकरण के प्रयोग” (Experiments in Plant Hybridization) नामक शीर्षक से शोध पत्र प्रकाशित किया गया।
मेण्डल के द्वारा अध्ययन के लिए मटर के पौधे का चयन
– मेण्डल ने अपने आनुवंशिकता के प्रयोगों में उद्यान मटर (Pisum sativum) का चयन निम्नलिखित कारणों से किया गया–
– इसे सरलता से उद्यान में अथवा किसी गमले में उगाया जा सकता है।
– इस पौधे का जीवनकाल बहुत ही अल्प होता है तथा यह अपना जीवन काल 01 वर्ष में पूरा कर लेता है। इसके फलस्वरूप इसकी कई पीढ़ियों का अध्ययन अल्प समय में आसानी से किया जा सकता है।
– इसके पुष्प द्विलिंगी (Bisexual) होते हैं व इनमें स्वपरागण पाया जाता है, जिससे पौधों में गुणों की शुद्धता कई पीढ़ियों तक बनी रहती है।
– इसमें पर-परागण भी हो सकता है।
– मटर के पौधों में अनेक विपर्यासी लक्षण (Contrasting characters) पाए जाते हैं।
क्र. सं. | लक्षण | अप्रभावी (Recessive) | प्रभावी (Dominant) |
1 | पादप की ऊँचाई(Height of Plant) | बौने(Dwarf) | लम्बे(Tall) |
2 | पुष्पों की स्थिति(Position of Flower) | शीर्षस्थ (Terminal) | कक्षीय (Axillary) |
3 | फली का आकार(Shape of pod) | संकुचित (Constricted) | फूली हुई(Inflated) |
4 | फली का रंग(Color of pod) | पीला(Yellow) | हरा(Green) |
5 | बीज का आकार(Shape of seed) | झुर्रीदार (Wrinkled) | गोल(Round) |
6 | बीज के कवच का रंग(Color of seed coat) | सफेद(White) | धूसर(Grey) |
7 | बीजपत्र का रंग(Color of Cotyledon) | हरा(Green) | पीला(Yellow) |
मेण्डल की संकरण तकनीक
– मेण्डल के प्रयोगों को समझने से पहले उनकी संकरण तकनीक को जानना आवश्यक है। उन्होंने निम्नलिखित संकरण तकनीक का प्रयोग किया–
– मटर एक स्वपरागण (Self Pollination) वाला पादप है, क्योंकि इसके पुष्प की संरचना इस प्रकार की होती है जिससे इसके पराग (Pollen) उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं और स्वपरागण/स्वनिषेचन करते हैं। स्वपरागण को रोकने के लिए मेण्डल, पुष्प की कली खोलकर वर्तिकाग्र (Stigma) को परिपक्व होने से पहले ही उसके पुंकेसर (Stamen) को हटा देते थे। इस प्रक्रिया को विपुंसन (Emasculation) कहा जाता है।
– इस बंध्य किए गए अथवा जनद नाशित (Castrated) पुष्प के वर्तिकाग्र पर वे ऐसे पौधे के पुष्प के परागकण को रख देते थे, जिसे उन्हें संकरण में दूसरे जनक के रूप में प्रयोग में लेना होता था।
– कृत्रिम रूप से निषेचित इन पुष्पों का कीटों द्वारा अथवा अन्य पौधों द्वारा निषेचन रोकने हेतु इन पर थैलियाँ बाँध दी जाती थी।
– इस प्रकार प्राप्त बीजों से बने पौधों में विभिन्न विपर्यासी लक्षणों; जैसे – तना, पुष्प, फली व बीजों का अध्ययन किया जाता था।
– जनक पौधों से प्राप्त प्रथम संतति पीढ़ी को प्रथम संकरण संतति कहते हैं, जिसे F1 (First filial generation) से प्रदर्शित किया जाता है।
– प्रथम संतानीय पीढ़ी (F1) के स्वनिषेचन (Self fertilization) से उत्पन्न पौधों को द्वितीय संकरण संतति कहते हैं, जिसे F2 शब्द से व्यक्त करते हैं।
– आँकड़ों के सैद्धांतिक स्पष्टीकरण (Theoretical explanation) का सूत्रण किया। इन प्रयोगों के परिणामों के सैद्धांतिक स्पष्टीकरण को ही अब मेण्डल के वंशागति के नियमों (Mendel’s laws of inheritance) के नाम से जाना जाता है।
– मेण्डल ने अपने प्रयोगों में कारक (Factor) शब्द का प्रयोग किया। वर्तमान में ये कारक ही जीन कहलाते हैं।
– मेण्डल ने उपर्युक्त संकरण विधि द्वारा मटर के विभिन्न 07 विपर्यासी लक्षणों में से एक या अधिक लक्षणों को साथ लेकर निम्नलिखित प्रयोग किए तथा आनुवंशिकी के नियमों को प्रतिपादित किया –
1. एक संकर संकरण (Monohybrid cross)
2. द्वि संकर संकरण (Di-hybrid cross)
3. बहु संकर संकरण (Polyhybrid cross)
1. एक संकर संकरण (Monohybrid cross) –

– मेण्डल ने वंशागति के अध्ययन के लिए विपरीत लक्षणों के एक युग्म विकल्पी (Alleles) के मध्य संकरण करवाया। इस हेतु उसने शुद्ध रूप से लम्बे (Pure tall) व शुद्ध बौने (Pure dwarf) पौधों के मध्य संकरण करवाया। प्रभावी लक्षण लम्बे (Tall) को T से तथा अप्रभावी लक्षण बौने (Dwarf) को t से प्रदर्शित किया।
– इस संकरण से प्राप्त बीजों को उगाने से प्राप्त F1 पीढ़ी में सभी पौधे लम्बे प्राप्त हुए। इस संकरण में मेण्डल ने यह देखा कि F1 पीढ़ी में प्राप्त सभी पौधे अपने लम्बे जनक के समान थे, इनमें से कोई बौना नहीं था। इसी प्रकार के परिणाम अन्य विपर्यासी लक्षणों में संकरण करवाने पर प्राप्त हुए। इन प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकला कि F1 पीढ़ी में दोनों विपर्यासी लक्षणों में से केवल एक लक्षण ही प्रकट हो पाता है, दूसरा लक्षण प्रकट नहीं हो पाता है।
– इसके बाद F1 पीढ़ी के पौधों में स्व-निषेचन, करवाकर बीज प्राप्त किए जिसे उसने F1 पीढ़ी कहा। F2 पीढ़ी में लम्बे व बौने दोनों प्रकार के पौधे 3:1 के अनुपात में प्राप्त हुए। इस 3:1 के अनुपात को एक संकर लक्षण प्रारूपिक अनुपात (Monohybrid Phenotypic Ratio) कहा जाता है। इनमें से बौने पौधों के बीजों को वापस उगाने व उनके स्व-निषेचन से बौने पौधे ही प्राप्त होते हैं तथा लम्बे पौधों के बीजों को वापस उगाने स्वनिषेचन से पुनः लम्बे व बौने पौधे 3:1 के अनुपात में प्राप्त हुए, जिनका जी प्रारूपिक (Genotype) अनुपात देखें तो यह 1:2:1 (1TT:2Tt:1tt) का होता है अर्थात् लम्बे पौधों में समयुग्मी TT तथा विषमयुग्मी Tt जीन है जबकि बौने पौधों में केवल समयुग्मी tt जीन हैं।
– इस प्रकार एक संकर संकरण का लक्षण प्ररूप अनुपात 3 : 1 तथा जीनी प्ररूप अनुपात 1 : 2 : 1 होता है।
– मेण्डल द्वारा किए गए प्रयोगों को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है–
– मटर के पौधों में लम्बाई का लक्षण एक जोड़ी कारकों (लम्बे व बौनेपन) अथवा युग्मविकल्पियों (Alleles) द्वारा नियंत्रित होता है। इन कारकों को वर्तमान में जीन कहा जाता है।
– F1 संतति में जो कारक अपने गुण को प्रकट करता है उसे प्रभावी कारक (Dominant) तथा वह कारक जो अपने गुण को प्रकट नहीं कर पाता है उसे अप्रभावी (Recessive) कारक कहा जाता है।
2. द्वि संकर संकरण (Di-Hybrid cross)

– जब संकरण दो जोड़ी कारकों अथवा युग्मविकल्पियों के मध्य करवाया जाता है तो इसे द्विसंकर संकरण कहते हैं। मेण्डल ने दो जोड़ी विपर्यासी लक्षणों जैसे पीले व गोल समयुग्मी बीज (Yellow and Round, YYRR) वाले पौधों का हरे तथा झुर्रीदार समयुग्मी बीज (Green and Wrinkled, yyrr) वाले मटर के पौधों से संकरण करवाया।
– इनमें संकरण करवाने पर F1 पीढ़ी (प्रथम संतानीय पीढ़ी) में सभी पौधे पीले व गोल बीजों (YyRr) वाले उत्पन्न हुए। मटर के पौधे में बीज का पीला रंग बीज के हरे रंग पर तथा गोल बीज की आकृति झुर्रीदार पर प्रभावी है। F1 पीढ़ी के पौधों से उत्पन्न बीजों को वापस उगाने पर उनमें स्वनिषेचन/स्व-परागण द्वारा F2 पीढ़ी (द्वितीय संतानीय पीढ़ी) में चार प्रकार के पौधे प्राप्त होते हैं जिनका समलक्षणी अनुपात 9:3:3:1 प्राप्त हुआ।
9/16 में दोनों प्रभावी लक्षण अर्थात्- पीले व गोल बीज
3/16 में एक प्रभावी तथा एक अप्रभावी- पीले व झुर्रीदार बीज
3/16 में एक अप्रभावी तथा दूसरा प्रभावी- हरे व गोल बीज
1/16 में दोनों अप्रभावी- हरे व झुर्रीदार बीज
– F2 पीढ़ी का समजीनी अनुपात 1:2:2:4:1:2:1:2:1 आता है।
– इस प्रयोग के आधार पर मेण्डल के ‘स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम’ (Law of Independent Assortment) का प्रतिपादन किया गया।
मेण्डल के वंशागति के नियम (Mendel’s laws of inheritance)–
(i) प्रभाविता का नियम (Law of Dominance) –
– मेण्डल द्वारा किए गए मटर के एक संकरण प्रयोग से प्राप्त F1 पीढ़ी में केवल एक प्रकार के लक्षण वाले पौधे ही प्राप्त हुए। यदि लम्बे पौधे का बौने पौधे से संकरण करवाया जाए तो केवल लम्बे पौधे प्राप्त होते हैं अर्थात् लम्बाई वाले लक्षण ने बौने वाले लक्षण को मटर के पौधे में प्रकट नहीं होने दिया। अत: लम्बाई वाले लक्षण को प्रभावी (Dominant Character) एवं बौनेपन वाले लक्षण को अप्रभावी लक्षण (Recessive) कहा गया। इसी प्रयोग के परिणाम को मेण्डल ने ‘प्रभाविता का नियम’ कहा। यह नियम जीवों के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।
– मनुष्य में मंदबुद्धि, मधुमेह, वर्णान्धता आदि आनुवंशिक रोगों के जीन अप्रभावी होते हैं। प्रभावी जीन की उपस्थिति में ये प्रकट नहीं हो पाते हैं जिसके फलस्वरूप मनुष्य सामान्य होता है।
(ii) युग्मकों की शुद्धता का नियम अथवा विसंयोजन का नियम (Law of Purity of gametes or Law of Segregation) – ये कारक F2 पीढ़ी में एक-दूसरे से पृथक् 75% लम्बे पौधे तथा 25% बौने पौधे बनाते हैं। इस प्रकार युग्मक अपनी शुद्धता बनाए रखते हैं, इसे युग्मकों की शुद्धता का नियम कहते हैं व युग्मक निर्माण के समय दोनों युग्मविकल्पी (Tt) एक दूसरे से विसंयोजित (Segregate) होकर अलग-अलग युग्मकों में पहुँच जाते हैं व F2 पीढ़ी में अप्रभावी लक्षण, बौनापन भी प्रकट हो जाता है। अत: इस प्रकार युग्मकों में प्रभावी तथा अप्रभावी कारकों का विसंयोजन या पृथक् होना मेण्डल का विसंयोजन का नियम कहलाता है।
विसंयोजन के नियम का महत्त्व
– इस नियम से जीन संकल्पना की पुष्टि होती है।
– जीन वंशागति की इकाई है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में लक्षणों को संचारित करती है।
– जीवों में प्रत्येक लक्षण जीन द्वारा नियंत्रित होता है।
– प्रत्येक जीन के दो युग्म विकल्पी होते हैं जो एक जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का नियंत्रण करते हैं।
– जीन के युग्म विकल्पी एक साथ रहते हुए भी सम्मिश्रित नहीं होते हैं।
– युग्मक निर्माण के दौरान युग्म विकल्पी एक-दूसरे से पृथक्-पृथक् होकर अलग-अलग युग्मकों में जाते हैं।
(iii) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment) –
– यह नियम द्विसंकर तथा उच्च स्तर के संकरणों पर लागू होता है।
– एक संकर संकरण पर लागू नहीं होता है। मेण्डल द्वारा किए गए द्विसंकर तथा उच्च संकरण के प्रयोगों में जब दो या दो से अधिक विपर्यासी लक्षणों के मध्य संकरण करवाया जाता है तो प्रथम F1 पीढ़ी में प्रभावी लक्षण वाले संयोग प्राप्त होते हैं परन्तु जब इनसे प्राप्त बीजों को उगाया जाता है एवं उनमें स्वनिषेचन करवाया जाता है तो वे एक-दूसरे से प्रभावित हुए बिना, स्वतंत्र रूप से संतति में प्रकट होते हैं अर्थात् एक लक्षण की वंशागति का दूसरे लक्षण की उपस्थिति से किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी को स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम कहते हैं।
– लक्षणों के जीन एक-दूसरे से प्रभावित हुए बिना एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वतंत्र रूप से लक्षणों को ले जाते हैं।
– मेण्डल ने शुद्ध पीले व गोल बीज (YYRR) वाले पौधों का हरे व झुर्रीदार बीज (yyrr) वाले पौधों से संकरण करवाया तथा यह पाया कि F1 पीढ़ी में पीले व गोल बीज (YyRr) वाले पौधे प्राप्त हुए। F1 पीढ़ी वाले पौधों में स्वपरागण के बाद चार प्रकार के पौधे निम्नानुसार अनुपात में प्राप्त हुए –
पीले व गोल बीज = 9
पीले व झुर्रीदार बीज = 3
हरे व गोल बीज = 3
हरे व झुर्रीदार बीज = 1
मेण्डल के नियमों का महत्त्व
– हॉलैंड के वैज्ञानिक ह्यूगो डी व्रीज (Hugo de Vries), जर्मनी के कार्ल कोरेंस (Karl Correns) एवं ऑस्ट्रिया के एरिक वॉन शेरमार्क (Eric von Tschermak) ने मेण्डल के किए गए कार्य के समान परिणाम प्रस्तुत किए तो मेण्डल के कार्यों को महत्त्व दिया गया। इनके द्वारा किए गए कार्यों के बाद ही आगे शोध कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को नई दिशा मिली। इसी आधार पर आनुवंशिकी के नए प्रयोग एवं नवीन खोजें हुई।
– मेण्डल को इस आनुवंशिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए आनुवंशिकी का जनक (Father of Genetics) माना गया।
– मेण्डल के प्रयोगों के आधार पर वैज्ञानिकों ने संकरण प्रक्रिया द्वारा विभिन्न सजीवों में प्रभावी एवं अप्रभावी लक्षणों का पता लगाया है। संकरण विधि द्वारा विभिन्न वंशों में पाए जाने वाले अच्छे लक्षणों को एक वंश में साथ-साथ लाया गया है।
– इसी प्रकार गाय, भैंस, बकरी तथा मुर्गी की नस्लों को भी सुधारा जा सकता है। इनकी नस्लों में अधिक दुग्ध उत्पादन एवं तीव्र गति से प्रजनन क्षमता विकसित की गई। अनेक प्राणियों में कुछ आनुवंशिक रोग या दोषपूर्ण लक्षण पाए जाते हैं उनका निराकरण भी जीन स्तर पर मेण्डल के नियमों की सहायता से ही हो सका है।
मेण्डल की सफलता के कारण
– मेण्डल ने अपने प्रयोगों में स्पष्ट रूप से दिखने वाले 07 विपर्यासी लक्षणों को ही शामिल किया तथा एक समय में केवल एक ही लक्षण की वंशागति का अध्ययन किया। इन सातों विपर्यासी लक्षणों की वंशागति को नियंत्रण करने वाले कारक अथवा जीन सात विभिन्न गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं जिसके कारण मेण्डल अत्यधिक भाग्यशाली रहे कि वे सहलग्नता के प्रक्रम से बच गए।
– मेण्डल ने पूर्ण रूप से शुद्ध गुण वाले (समयुग्मजी) पौधों को ही प्रयोग में लिया।
– मेण्डल ने अपने प्रयोग F2 एवं F3 पीढ़ी तक ही किए तथा अपने प्रयोगों के परिणामों का विधिवत लेखा रखा।
संकर पूर्वज संकरण या प्रतीप संकरण (Back Cross) एवं परीक्षण संकरण (TestCross)
– कारक (Factor) – एक विशेष लक्षण की वंशागति व अभिव्यक्ति के लिए उत्तरदायी एकक अथवा कारक। अब कारक को जीन कहा जाता है।
– जीन (Gene) – DNA अणु का विशेष खण्ड जो एक विशिष्ट गुण की वंशागति व अभिव्यक्ति को निर्धारित करता है।
– युग्मविकल्पी या एलील या ऐलीलोमार्फ – ऐलील किसी भी कारक अथवा जीन के दो या दो से अधिक विकल्पी रूप। उदाहरण के लिए मटर के पौधे में बीज को आकृति प्रदान करने वाले जीन के दो विकल्पी रूप हो सकते हैं: गोल (R) व झुर्रीदार (r)। गोल व झुर्रीदार बीजों के लिए दोनों जीन एक-दूसरे के ऐलील हैं। इसी प्रकार मनुष्यों में रक्त समूह को नियंत्रित करने वाले जीन के तीन ऐलील IA. IB तथा Io (I = इम्यूनोहीमोग्लोबीन जीन)। समजाती गुणसूत्र में एलील समान स्थान पर रहते हैं।
– लक्षण या विशेषक (Trait) – यह अभिव्यक्त लक्षण है; उदाहरण – फूल का रंग, बीज की आकृति आदि।
– जीनप्ररूप (Genotype) – एक व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना को, जो नर या मादा अपने जनकों से वंशानुक्रम में प्राप्त करते हैं, जीनप्ररूप (जीनोटाइप) कहलाते हैं; उदाहरणतः विशुद्ध गोल बीज वाले जनक मटर के पौधे का जीनोटाइप RR है।
– लक्षणप्ररूप (Phenotype) – किसी जीव के किसी एक या अधिक गुणों की बाह्य अभिव्यक्ति को लक्षणप्ररूप (फीनोटाइप) कहते हैं; उदाहरण बीजों के लिए गोल या झुर्रीदार आकृति फीनोटाइप है।
– समयुग्मजी – किसी गुण के लिए एक समान एलील वाला जीव समयुग्मजी कहलाता है, उदाहरणतया RR ऐलील युक्त पादप, बीज की आकृति के लिए समयुग्मजी है।
– विषमयुग्मजी – किसी गुण के लिए एक जीव के दोनों एलील असमान होने की स्थिति को विषमयुग्मजी कहते हैं। उदाहरणतया Rr ऐलील वाला पादप बीज के आकार के लिए विषमयुग्मजी होता है।
– परीक्षण क्रॉस (Test cross) – F1 संतति व समयुग्मजी अप्रभावी गुणों वाले जनक के बीच क्रॉस को परीक्षण क्रॉस कहते हैं। यदि F, संतति विषमयुग्मजी हो तो परीक्षण क्रॉस के परिणामस्वरूप 1:1 का अनुपात पाया जाता है।
– व्युत्क्रम क्रॉस (Reciprocal cross) : इस प्रकार के क्रॉस में माता-पिता (जनकों) का लिंग उत्क्रमित कर दिया जाता है अर्थात् यदि पहले क्रॉस में पिता बौना व माँ लम्बी हो तब व्युत्क्रम क्रॉस में माँ बौनी व पिता लंबे लिए जाएंगे।
मेण्डल के नियमों से विचलन
अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete dominance)
– मेण्डल द्वारा प्रयोग में लिए गए सात जोड़ी विपर्यासी लक्षणों में से एक लक्षण प्रभावी एवं दूसरा अप्रभावी था। इसके परिणामस्वरूप F1 पीढ़ी में प्रभावी लक्षण ही प्रकट हुआ परन्तु बाद में बहुत से वैज्ञानिकों द्वारा किए गए प्रयोगों में ये लक्षण इसी प्रकार प्रकट नहीं हुए।
– गुल अब्बास 4′ O clock plant, Mirabilis jalapa) व स्नेपड्रेगन (Antirrhinum) में प्रभाविता का सिद्धांत लागू नहीं होता है। इसमें जब एक समयुग्मजी लाल फूल वाले पौधे (RR) का दूसरे समयुग्मजी सफेद फूल वाले पौधे से संकरण कराया जाता है तो F, पीढ़ी में प्रभावी तथा अप्रभावी के बीच का लक्षण अर्थात् मध्यवर्ती लक्षण प्राप्त होता है।
– F1 पीढ़ी में सभी पौधों के फूल गुलाबी होते हैं। जब F1 पौधों में स्वनिषेचन होता है तो लक्षणप्ररूपी (Phenotype) तथा जीनप्ररूपी (Genotype) दोनों अनुपात RR लाल : Rr गुलाबी: Ir सफेद 1:2:1 पाया जाता है।
सह–प्रभाविता (Co-dominance)
– सह-प्रभाविता में एक युग्मविकल्पी जोड़ों में विद्यमान दोनों – प्रभावी एवं अप्रभावी कारक F1 पीढ़ी में लक्षण को प्रकट करने में समान रूप से योगदान करते हैं । इस प्रक्रिया को सह-प्रभाविता कहते हैं।
– मवेशियों में त्वचा का रंग (Skin colour in Cattles) लाल (RR) व सफेद (rr) होता है। इनमें परस्पर संकरण करवाने पर F1 पीढ़ी में उत्पन्न मवेशियों की त्वचा का रंग चितकबरा (Roan) Rr होता है। चितकबरा रंग लाल व सफेद दोनों कारकों के लक्षण प्रकट होने से प्राप्त होता है। यदि F1 पीढ़ी में प्राप्त मवेशियों में आपस में संकरण करवाया जाता है तो F2 पीढ़ी में लाल, चितकबरे व सफेद मवेशियों का अनुपात 1:2:1 (RR : Rr : Tr) प्राप्त होता है। अत: सह-प्रभाविता में भी मेण्डेलियन अनुपात का अनुसरण नहीं होता है।
बहुविकल्पी ऐलील (Multiple alleles)
– सामान्यतया एक जीन के दो प्ररूप होते हैं। जैसे लंबा या छोटा (बौना), लाल या सफेद, भूरी आँखें या नीली आँखें आदि। ये जीन युग्मविकल्पी (ऐलील) के मात्र दो प्रकार हैं परन्तु अधिकांश जीन के दो से अधिक प्रकार के एलील होते हैं, इन्हें बहुयुग्मविकल्पी (Multiple alleles) कहते हैं। इसका एक उदाहरण मानव में रक्त समूह की वंशागति होता है।
जीन विनिमय (Crossing) –
– जीन विनिमय (Crossing over) ऐसी परिघटना है जिसमें समजात गुणसूत्र के अपुत्री क्रोमेटिड (Non-sister chromatid) के मध्य जीन का आदान-प्रदान होता है तथा नए पुनर्योजन (Recombination) का निर्माण होता है।
– गुणसूत्र के वे क्रोमेटिड जो जीन विनिमय में भाग लेते हैं क्रॉस ऑवर (Cross-Over) कहलाते हैं तथा जो भाग नहीं लेते हैं वे नोन क्रॉस ऑवर (Non cross Over) कहलाते हैं।
जीन विनिमय के लक्षण तथा क्रियाविधि
– जीन रेखीय क्रम में व्यवस्थित होते हैं। एक विषम युग्मज में एक जीन के दोनों युग्मविकल्पी एक ही स्थल पर उपस्थित होते हैं अर्थात् एक समजात का ऐलील-A व दूसरे समजात के ऐलील-a की स्थिति एक समान ही होती है।
– जीन विनिमय के दौरान इनके क्रोमेटिड्स खण्डों का विखण्डन व आदान-प्रदान होता है तथा जीन विनिमय की क्रिया पेकीटीन अवस्था में होती है जो समजात गुणसूत्रों में युग्मन के पश्चात् सम्पन्न होती है।
– गुणसूत्र में द्विगुणन की क्रिया इंटरफेज प्रावस्था में हो जाती है जबकि जीन विनिमय की क्रिया पश्च टेट्राड अवस्था में होती है व पुत्री क्रोमेटिड्स में ही जीन विनिमय होता है। जीन विनिमय की घटना दो जीन्स के मध्य दूरी बढ़ने के साथ-साथ बढ़ती जाती है।
– जीन विनिमय की क्रियाविधि (Mechanism of Crossing Over) – जीन विनिमय की क्रिया चार पदों में पूरी होती है।
1. युग्मन (Synapsis) – अर्द्धसूत्री विभाजन की प्रोफेज-I में समजात गुणसूत्र युग्म बनाते हैं। यह क्रिया युग्मन (Synapsis) कहलाती है। यह घटना वंशागति विभिन्नताओं का मुख्य आधार है इस अवस्था में गुणसूत्र बाइवेलेन्ट प्रकार के होते हैं।
– युग्मन की क्रिया पैकीटीन तक चरम अवस्था में पहुंच जाती है। गुणसूत्र एक ही क्रोमेटिड के बने होते हैं । यह एकल क्रोमेटिड, स्थिरविद्युती (Electrostatical) आधार पर अंसतृप्त होते हैं।
2. क्रोमोसोम का द्विगुणन – फेज़-I की पेकीटीन प्रावस्था में गुणसूत्र सेन्ट्रोमीयर को छोड़कर सम्पूर्ण लम्बाई में विपाटित हो जाता है व बाईवेलेन्ट गुणसूत्र, चतुष्क (Tetravalent) में रूपांतरित हो जाता है। एक गुणसूत्र के क्रोमेटिड, पुत्री क्रोमेटिड (Sister chromatid) तथा अलग-अलग गुणसूत्रों के क्रोमेटिड अपुत्री (Non sister) प्रकार के होते हैं।
3. क्रॉसिंग ऑवर – समजात गुणसूत्रों के द्विगुणन के पश्चात् जीन विनिमय की घटना होती है। जीन विनिमय के समय अपुत्री क्रोमेटिड एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम के प्रभाव के कारण एक-दूसरे से लिपट जाते हैं। क्रोमेटिड के संयोजन स्थल पर क्रोमेटिड पाश बनते हैं ये स्थल काइएज्मेटा (Chiasmata) कहलाते हैं। एण्डोन्यूक्लिएज एंजाइम के कारण अपुत्री क्रोमेटिड क्रोमेटिड में टूट जाते हैं। इन खण्डों का आपस में विनिमय होता है व लाइगेस एंजाइम के द्वारा जुड़ जाते हैं।
4. टर्मीनेलाइजेशन (Terminalization) – जीन विनिमय के पूर्ण होने के पश्चात् अपुत्री क्रोमेटिड क्रोमेटिड आकर्षण के अभाव में एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।
– प्रतिकर्षण की क्रिया सेन्ट्रोमीयर (Centromere) से टिलोमीयर (Telomere) की तरफ चेन (Zipper) के समान प्रारम्भ होती है। यह घटना टर्मिनेलाइजेशन कहलाती है।
जीन विनिमय के प्रकार – गुणसूत्र पर काइएज्मा एक या इससे अधिक भी बन सकते हैं। काइएज्मा की संख्या गुणसूत्र की लम्बाई पर निर्भर होती है। काइएज्मेटा की संख्या के आधार पर क्रॉसिंग ऑवर निम्नलिखित प्रकार की होती है।
(a) एकल क्रॉसिंग ऑवर (Single Crossing Over) – गुणसूत्र की पूर्ण लम्बाई पर केवल एक काइएज्मा बनता है अर्थात् समजात गुणसूत्र के क्रोमेटिड्स केवल एक स्थान पर टूटते हैं व पुनः जुड़ते हैं।
(b) द्विक्रॉसिंग ऑवर (Double Crossing Over) – गुणसूत्र की लम्बाई पर केवल दो काइएज्मा बनते हैं।
(c) बहु–क्रॉसिंग ऑवर (Multiple Crossing Over)
– गुणसूत्र की सम्पूर्ण लम्बाई पर दो से अधिक काइएज्मा बनते हैं।
जीन विनिमय की सार्थकता –
– क्रॉसिंग ऑवर यह सत्यापित करती है कि गुणसूत्रों पर जींस रैखिक क्रम से व्यवस्थित होते हैं।
– इसकी सहायता से गुणसूत्रों के सहलग्न मानचित्र (Maps) बनाना सम्भव है।
– इसके कारण नये जीन संयोग बनते हैं। इससे जातियों का विकास होता है।
लिंग निर्धारण (Sex Determination)
– लैंगिक प्रजनन (Sexual Reproduction) के लिए जनन अंगों (Gonads) में युग्मकों (Gametes) का निर्माण होता है तथा नर में वृषण (Testis) में शुक्राणु (Sperms) एवं मादा में अण्डाशय (Ovary) में अण्डाणु (Ovum) बनते हैं।
– केंचुआ (Earthworm) में एक ही जीवधारी में नर तथा मादा दोनों प्रकार के युग्मक (Gametes) बनते हैं। अत: ये उभयलिंगाश्रयी (monoecious) होते हैं।
– नर तथा मादा युग्मक (Female gamet) के आपस में निषेचित होने पर नर तथा मादा युग्मकों के केन्द्रकों (Nucleus) का सम्मिश्रण (Fusion) हो जाता है तथा युग्मनज का निर्माण होता है। नर युग्मक (Male gamete) में X तथा Y लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosome) होते हैं, जबकि मादा युग्मक (Famale gamete) में XX प्रकार के लिंग गुणसूत्र होते हैं।
– मानव में X गुणसूत्र मादा लिंग (Famale Sex) का निर्धारण करता है, जबकि Y गुणसूत्र नर लिंग (Male sex) का निर्धारण करता है।
– लिंग निर्धारण के लिए बहुत से मत प्रस्तुत किए गए जो इस प्रकार हैं–
गुणसूत्रीय सिद्धान्त
– इस मत के अनुसार जीवों में लिंग निर्धारण लिंग गुणसूत्रों (Sex Chromosomes) के द्वारा होता है। आनुवंशिक लक्षणों (Hereditary Characters) के आधार पर एकलिंगी (Dioccious) जीवों में दो प्रकार के क्रोमोसोम (Chromosome) पाए जाते हैं–
– ऑटोसोम्स – इन गुणसूत्रों के दैहिक लक्षणों को निर्धारित करने वाले जीन्स पाए जाते हैं।
– लिंग गुणसूत्र – ये लिंग निर्धारण करते हैं।
– गुणसूत्रीय आधार पर लिंग निर्धारण के प्रकार –
(i) XX-XY प्रकार – नर में 44 + XY तथा मादा में 44 + XX प्रकार के गुणसूत्र पाए जाते हैं। नर तथा मादा दोनों में 44 गुणसूत्र आटोसोम्स (Autosomes) तथा XY (नर में) एवं XX (मादा में) लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosomes) होते हैं।
– नर का Y गुणसूत्र लिंग का नियंत्रण करता है तथा मादा में XX गुणसूत्रों में एक X गुणसूत्र अक्रिय (Innert) होता है जिसे बार बॉडी (Bar Body) कहते हैं। यह मादा में लिंग निर्धारण के लिए मुख्य कारक (Factor) होता है।
(ii) XX-XO प्रकार
– बहुत से कीटों (Insects) में मादा में दो लिंग गुणसूत्र (XX) तथा नर में केवल एक लिंग गुणसूत्र (XO) होता है। मादा में दोनों गुणसूत्र ‘X’ होते हैं इसलिए इनमें एक ही प्रकार के युग्मक बनते हैं, जबकि नर में दो प्रकार के युग्मक (Gemete) बनते हैं।
– ड्रोसोफिला (Drosiophila) पर अध्ययन करके किया था, जिसके अनुसार नर तथा मादा दोनों लिंगों से सम्बन्धित जीन्स शरीर की सभी कोशिकाओं में पाए जाते हैं। लिंग निर्धारण के समय इनका उत्प्रेरण (Stimulation) होता है एवं विभिन्न स्थितियाँ पाई जाती हैं–
– X गुणसूत्र एवं ऑटोसोम (Autosome) का अनुपात (Ratio) जीन्स को अपनी अभिव्यक्ति (gene Expression) व्यक्त करने के लिए उत्प्रेरित करता है।
– नर लक्षण उत्पन्न करने वाले जीन्स ऑटोसोम (Autosome) में पाए जाते हैं तथा मादा लक्षण उत्पन्न करने वाले जीन (Gene) X गुणसूत्रों पर पाए जाते हैं।
– लिंग निर्धारण X गुणसूत्रों एवं ऑटोसोम के अगुणित सेट (Haploid Set) के अनुपात (Ratio) पर निर्भर होता है।
– अत: जीन सन्तुलन सिद्धान्त के अनुसार Xगुणसूत्र एवं ऑटोसोम (Autosome) के पूरे सेट (Set) के मध्य मिलने वाला अनुपात ही लिंग निर्धारण (Sex Determination) का कार्य करता है।
– जीन्स (Genes) के दोनों सेट (Set) अपना कार्य प्रारम्भ करते हैं तब इनके मध्य एक प्रकार का सन्तुलन उपस्थित होता है। इस जीनीय सन्तुलन के आधार पर ही नर एवं मादा जीव बनते हैं; जैसे–गुणसूत्र के एक पूर्ण सेट (A + X) में मादा लक्षण उत्पन्न करने वाले जीन्स की संख्या अधिक होती है।
बारबॉडी (Barbody)
– मादा बिल्लियों (Female Cats) की तंत्रिका कोशिकाओं (Nerve cells) में तथा स्त्रियों की मुखगुहा की एपीथीलियम (Buccal epithelium), बालों की जड़ों (Hairs Root) एक अत्यधिक संघनित (Condenced) रचना होती है जिसे फ्यूलेज (Fuelgen) स्टेन (Stain) द्वारा आसानी से रंगा जा सकता है। इस संघनित रचना को बारबॉडी (Barbody) कहा जाता है, यह न्यूक्लियर मेम्ब्रेन (Nuclear Membrane) के अन्दर (Nucleolus) न्यूक्लिओलस से लगा हुआ पाया जाता है।
– यह निष्क्रिय (Inactive) X गुणसूत्र होता है। मादा में दो X गुणसूत्रों में से केवल एक सक्रिय होता है तथा दूसरा बारबॉडी के रूप में पाया जाता है।
– इन्हें लिंग क्रोमेटिन (Sex Chromatin) भी कहते हैं। नर में XY गुणसूत्र में केवल एक X गुणसूत्र होने से बारबॉडी नहीं पाई जाती है। X इस प्रकार बारबॉडी (Bar body) का महत्त्व लिंग निर्धारण (Sex determination) में होता है।
लिंग सहलग्न वंशागति (Sex-Linked Inheritance)
– लिंग गुणसूत्रों का मुख्य कार्य लिंग निर्धारण करना होता है, किन्तु इन पर लिंग जीन्स के अलावा कुछ ऐसे जीन्स भी होते हैं जो दैहिक लक्षणों का निर्धारण करते हैं।
– इस प्रकार ऐसे दैहिक लक्षणों को जिनके जीन लिंग गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं और जो उसी लिंग के साथ वंशागत होते हैं उन्हें लिंग सहलग्न लक्षण (Sex linked characters) कहते हैं तथा इनकी वंशागति लिंग सहलग्न वंशागति (Sex linked Inheritance) कहलाती है।
मनुष्य में लिंग सहलग्न वंशागति (Sex-Linked Inheritance in Man)
– मानव में लिंग सहलग्न लक्षणों की वंशागति X गुणसूत्रों द्वारा होती है; उदाहरण – वर्णान्धता (Colourblindness) तथा हीमोफीलिया (Haemophilia) नामक रोग।
– वर्णान्धता (Colourblindness) – इस रोग में होने पर मनुष्य लाल तथा हरे रंग में अन्तर स्पष्ट नहीं कर पाता है।
वर्णान्धता के प्रकार (Types of Colourblindness) –
– लाल वर्णान्धता या प्रोटानोपिया (Protanopia) – इसमें मनुष्य लाल रंग को पहचान नहीं सकता।
– हरी वर्णान्धता या ड्यूटेरानोपिया (Deuteranopia) – इसमें मनुष्य हरे रंग को नहीं पहचान सकता।
– वर्णान्धता की वंशागति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य –
– वर्णान्धता स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में अधिक सामान्य रूप से पाई जाती है, क्योंकि स्त्रियों में दो X गुणसूत्र होते हैं, जबकि पुरुषों में केवल एक X गुणसूत्र पाया जाता है। इस X गुणसूत्र में वर्णान्धता का अप्रभावी जीन होता है किन्तु Y गुणसूत्र पर इसका युग्मविकल्पी (Allele) नहीं पाया जाता, इसलिए केवल एक X गुणसूत्र होने से इसका जीन नर के X गुणसूत्र द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में सामान्यतः पहुँचता है तथा नर संतति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
– स्त्रियों में वर्णान्धता के लिए दो अप्रभावी जीनों (Recessive genes) का होना आवश्यक है तथा पुरुष इस रोग के वाहक नहीं होते।
हीमोफीलिया (Haemophilia)
– यह शाही परिवारों में अधिकतर पाया गया था इसलिए इसे रॉयल डिसीज (शाही रोग) कहा जाता है। इस रोग में रक्त का थक्का (Blood coagulation) नहीं जमता या अत्यधिक देर से जमता है जिससे कि अत्यधिक रक्त स्त्राव (Bleeding) हो जाता है, इसीलिए इस रोग को ब्लीडर्स रोग (Bleeders disease) भी कहते हैं।
– सामान्य अवस्था में रक्त का थक्का बनने में 2 से 8 मिनट लगते हैं, हीमोफीलिया की स्थिति में इसे 1/2 से 22 घण्टे या इससे अधिक समय लग सकता है जिससे रक्त की अत्यधिक हानि हो जाती है।
– इसका कारण यह है कि सामान्य मनुष्य के रक्त के प्लाज्मा (Plasma) में एक पदार्थ एण्टीहीमोफीलिक ग्लोब्यूलिन (Anti-haemophilicglobulin) पाया जाता है जिसके कारण रक्त का थक्का (Clot) बनता है, किन्तु हीमोफीलिक व्यक्ति में यह अनुपस्थित होता है, क्योंकि इस पदार्थ के निर्माण के लिए आवश्यक जीन्स म्यूटेशन के कारण X अगुणसूत्र पर उपस्थित नहीं पाए जाते तथा केवल अप्रभावी जीन्स ही पाए जाते हैं।
रक्त समूह (Blood Group)
– रक्त समूह A, B, O की खोज कार्ल लैण्डस्टीनर ने की।
– कार्ल लैण्डस्टीनर को वर्ष 1930 में इस खोज के लिए चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार मिला।
– डी-कॉस्टेलो एवं स्टर्ली ने रक्त समूह AB की खोज की।
– रक्त समूह (Blood group) का विभाजन प्रतिजन (एंटीजन) के आधार पर होता है।
– एंटीजन (प्रतिजन) RBC की सतह पर पाए जाने वाले विशेष प्रकार के प्रोटीन होते हैं।
रक्त समूह | एंटीजन (RBC) | एंटीबॉडी (प्लाज्मा) |
A | A | b |
B | B | a |
सर्वग्राही AB+ | AB | अनुपस्थित |
सर्वदाता O– | अनुपस्थित | ab |
रक्त का आदान–प्रदान/रक्ताधान (Blood Transfusion)
– विश्व में सर्वप्रथम रक्त का आदान-प्रदान 15 जून, 1667 को डॉ. जीन डेविस द्वारा फ्रांस में किया गया।
– 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस (World Blood Donor Day) मनाया जाता है।

Rh कारक (Factor)/एंटीजन-D–
– Rh कारक (Factor)/एंटीजन-D की खोज वर्ष 1940 में कार्ल लैण्डस्टीनर एवं वीनर ने की।
– उन्होंने ‘रीसस (Rhesus) मकाका बंदर’ (लाल मुँह के बंदर) में Rh कारक की खोज की।
– जिस व्यक्ति के रक्त में Rh कारक पाया जाता है, उसे Rh+ कहते हैं, जबकि जिसमें Rh कारक अनुपस्थित होता है, उसे Rh– कहते हैं।
– पुरुष (Rh+), महिला (Rh–) की आपस में शादी करने पर पहली संतान सामान्य जन्म लेगी एवं बाकी सभी संतानें मृत पैदा होंगी।
– इस रोग को ‘इरिथ्रो ब्लास्टोसिस फीटेलिस’ कहते हैं।
– इस रोग के उपचार हेतु प्रथम प्रसव के 24 घंटों के भीतर Anti Rh.D (Ig. G) का इंजेक्शन लगाया जाता है। (Ig-इम्यूनोग्लोबिन-G)
– भारत में लगभग 96 प्रतिशत Rh+ हैं, जबकि विश्व में लगभग 85 प्रतिशत लोग Rh+ हैं।
उत्परिवर्तन (Mutation)
– ह्यूगो डी व्रीज इवनिंग प्रिमरोज (Oenothera lamarkina) नामक वनस्पति का अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुँचा कि इनमें विभिन्नताएँ अचानक उत्पन्न हो जाती हैं। ये विभिन्नताएँ अपनी मातृक वनस्पतियों से भिन्न होती हैं। जीवों में उत्पन्न होने वाली इन आकस्मिक विभिन्नताओं को उत्परिवर्तन (Mutation) कहा गया।
– इसी आधार पर इन्होंने नई जाति की उत्पत्ति के बारे में डार्विन की धीमी विभिन्नताओं (Slow Variation) के आधार को नकारते हुए स्पष्ट किया कि जीवों में उत्पन्न आकस्मिक विभिन्नताओं के कारण नई जाति का निर्माण होता है। ये विभिन्नताएँ तेज गति से उत्पन्न होती हैं।
– ह्यूगो-डी-व्रीज ने आकस्मिक विभिन्नताओं की खोज के बाद जैव विकास क्रिया विधि के लिए उत्परिवर्तनवाद (Theory of mutation) का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धान्त की निम्न विशेषताएँ हैं–
– उत्परिवर्तन का सम्बन्ध आनुवंशिकी पदार्थों से होने के कारण ये वंशानुगत होते हैं।
– उत्परिवर्तन का परिणाम जीवों की संततियों में दृष्टिगोचर होता है।
– उत्परिवर्तन उत्पन्न होने की अवधि निर्धारित नहीं होती है।
– जीवधारी के जीवन के किसी भी समय अथवा अवस्था में उत्परिवर्तन उत्पन्न हो सकते हैं।
– उत्परिवर्तन प्रत्येक जीवधारी में उत्पन्न होते हैं।
– उत्परिवर्तन लाभकारी अथवा हानिकारक दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
– उत्परिवर्तन के कारण नई जाति का निर्माण होता है।
उत्परिवर्तन के प्रकार (Kinds of Mutation)
(i) जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) – इनकी संरचना में परिवर्तन हो जाने पर जीवों में उनके लक्षण में अचानक परिवर्तन आ जाता है। जीन संरचना में परिवर्तन से जीवों में उत्पन्न आकस्मिक परिवर्तनों को जीन उत्परिवर्तन (Gene mutation) कहते हैं।
– जीन उत्परिवर्तन गुणसूत्र के किसी एक बिन्दु (जीन) पर होने के कारण इन्हें बिन्दु उत्परिवर्तन (Point mutation) भी कहते हैं।
– संक्रान्ति (Transition) नामक प्रक्रिया में जीन की संरचना में एक प्यूरिन नाइट्रोजन क्षारक (एडिनीन एवं गुएनीन) का स्थान दूसरी प्यूरिन क्षारक ले लेती है अथवा एक पिरामिडीन (सायटोसीन एवं थायमीन) का स्थान दूसरी पिरिमिडीन क्षारक ले लेती है।
– अनुप्रस्थ (Transversion) नामक प्रक्रिया में जीन की संरचना में उपस्थित प्यूरिन एवं पिरिमिडीन की स्थिति आपस में बदल जाती है।
(ii) गुणसूत्र उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) –गुणसूत्र पर असंख्य जीन पाए जाते हैं । अतः एक गुणसूत्र शरीर में अनेक लक्षणों का नियंत्रण करता है । गुणसूत्र की संख्या अथवा संरचना में परिवर्तन से उत्पन्न आकस्मिक परिवर्तनों को गुणसूत्र उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) कहते हैं। यह कई प्रकार के होते हैं; जैसे –
– विलोपन (Deletion) के अंतर्गत कोशिकाओं में अर्धसूत्री विभाजन के समय इनके गुणसूत्रों के भागों का आदान-प्रदान होता है। इस समय प्रत्येक गुणसूत्र के छोटे-छोटे भागों में टूटकर पुनः जुड़ने की क्रिया सम्पन्न होती है। जुड़ने के समय कोई भाग अपने गुणसूत्र से पुनः जुड़ने से वंचित रह जाता है, जिसके कारण गुणसूत्र में इस भाग की कमी हो जाती है, इसे विलोपन (Deletion) कहते हैं। गुणसूत्र का यह वंचित भाग जीवद्रव्य में घुलकर नष्ट हो जाता है अथवा अन्य गुणसूत्र से जुड़ जाता है। उत्पन्न होने वाली संतति में इस विलोपित भाग द्वारा नियंत्रित लक्षणों का अभाव रहता है। अत: जीवों के लक्षणों में बदलाव आ जाता है।
– प्रतिपन (Inversion) के अतंर्गत गुणसूत्र टूटकर जब पुनः जुड़ता है उस समय इसके क्रम में नहीं जुड़कर आगे-पीछे जुड़ जाते हैं अर्थात् उनके निश्चित स्थान या क्रम में परिवर्तन आ जाता है, इसे प्रतिपन या उत्क्रमण (Inversion) कहते हैं।
– द्विगुणन (Duplication) के अंतर्गत जब गुणसूत्र की सामान्य रचना के साथ अन्य समजात गुणसूत्र का कोई भाग जुड़ जाता है, तब इस गुणसूत्र पर जीन की संख्या उस भाग विशेष की दुगुनी हो जाती है; इसे द्विगुणन (Duplication) कहते हैं। इस तरह के गुणसूत्र पर एक लक्षण के एक के बजाय दो जीन होते हैं। अतः लक्षण प्रकट करने के लिए दोनों में अन्तःक्रिया होती है, जिससे संतति के लक्षणों में परिवर्तन आ जाता है।
(iii) गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन से उत्परिवर्तन (Genomatic Mutation) – सभी जीवधारियों में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है जो जीव के स्वरूप एवं क्रियाओं का निर्धारण करती हैं। जैसे मानव में गुणसूत्रों की संख्या 46 होती है। जीवधारियों में उनकी निश्चित गुणसूत्र संख्या में परिवर्तन अर्थात् कमी अथवा अधिकता से उत्पन्न परिवर्तन, गुणसूत्र संख्या में परिवर्तन से उत्परिवर्तन (Genomatic Mutation) कहलाते हैं।
– उत्परिवर्तन का कारण (Causes of Mutation) – जीवों में उत्परिवर्तन के निम्न कारण हो सकते हैं–
– जनन क्रिया के समय होने वाली अर्धसूत्री विभाजन में अनियमितताएँ।
– ज्ञात एवं अज्ञात विकिरण।
– जीवों के शरीर में होने वाली अनियमित क्रियाएँ।
– वातावरणीय परिस्थितियों का जीव की आनुवंशिकी पर प्रभाव।
– उत्परिवर्तन जनन।
उत्परिवर्तन की सार्थकता
– उत्परिवर्तन के फलस्वरूप जीवों में अचानक बड़े एवं स्पष्ट परिवर्तन आते हैं। इनके कारण नई जाति का विकास शीघ्रता से होता है। बहुत कम उत्परिवर्तन लाभकारी होते हैं। अतः अधिकांश उत्परिवर्तन जीवों पर घातक प्रहार भी करते हैं तथा उनमें विकृतियाँ उत्पन्न कर देते हैं, कभी-कभी उनकी मृत्यु का कारण भी बन जाते हैं।
– इस समय में प्रेरित उत्परिवर्तन प्रक्रिया का उपयोग अधिक किया जा रहा है। उत्परिवर्तन के नियन्त्रित एवं अधिक उपज देने वाली होती है। प्राणियों में भी इसका सीमित उपयोग कर अच्छे एवं अधिक उत्पाद देने वाले पशुओं की नस्लों को तैयार किया जा रहा है।
अनुलेखन (TRANSCRIPTION)
– डी.एन.ए. टेम्पलेट पर आर.एन.ए. का निर्माण होना अनुलेखन (Transcription) कहलाता है। डी.एन.ए. की दो शृंखलाओं में से केवल एक शृंखला ही ट्रान्सक्रिप्शन में भाग लेती है और इस शृंखला को ‘मास्टर स्ट्रैण्ड’ (Master strand) या ‘एन्टीसेन्स स्ट्रैण्ड’ (Antisense strand) कहते हैं।
– अनुलेखन के दौरान DNA के दोनों रज्जुक यदि टेम्पलेट के रूप में कार्य करे तो उनसे विभिन्न अनुक्रमों वाले RNA अणु बनते हैं और यदि ये प्रोटीन का निर्माण करे तो प्रोटीन में मिलने वाले अमीनो अम्ल का अनुक्रम भिन्न होगा। एक अन्य कारण यह है कि यदि दो RNA का निर्माण हो तो दोनों एक-दूसरे के पूरक होंगे और इनसे द्विरज्जुकी RNA का निर्माण हो जाएगा, जो RNA के अनुवादन को अवरुद्ध कर देगा। इसी कारण DNA की दोनों Strand का अनुलेखन नहीं होता।
– जीन वंशागति की क्रियात्मक इकाई है। जीन को DNA अनुक्रम के शब्दों में अक्षरतः परिभाषित करना कठिन है, क्योंकि tRNA व rRNA अणु को बनाने वाला DNA अनुक्रम भी जीन कहलाता है (परन्तु प्रोटीन की सूचना DNA के केवल उसी खण्ड पर होती है जो mRNA बनाता है, इसलिए जीन का उपयोग सामान्यतः इसी खण्ड के लिए किया जाता है)
– डी.एन.ए. का वह खण्ड जिसका ट्रान्सक्रिप्शन होता है उसे ‘सिस्ट्रोन (Cistron)’ कहा जाता है।
– ट्रान्सक्रिप्शन में ‘आर.एन.ए. पोलीमरेज’ एन्जाइम भाग लेता है। यूकैरियोट्स में RNA polymerase एन्जाइम तीन प्रकार का होता है जो अलग-अलग प्रकार के आर एन.ए. के संश्लेषण को उत्प्रेरित करता है।
– युकैरियोट्स में RNA polymerases एन्जाइम 10-15 पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओं का बना होता है।
– RNA Polymerase-I = 28’s’, 18’s’, 5.8’s’, प्रकार के r-RNA के निर्माण को उत्प्रेरित करता है।
– RNA Polymerase-II = m-RNA के निर्माण को उत्प्रेरित करता है।
– RNA Polymerase-III = t-RNA, 5’s rRNA, SnRNA के निर्माण को उत्प्रेरित करता है।
– प्रोकैरियोट्स में केवल एक ही प्रकार का RNA Polymerase एन्जाइम होता है जो सभी प्रकार के RNAs का संश्लेषण करवाता है।
– प्रोकैरियोट्स (E. Coli) में RNA Polymerase एन्जाइम पाँच पोलीपेप्टाइड शृंखलाओं का बना होता है 𝛽,𝛽 ′,𝛼,𝛼 एवं 𝜎। इसके दो भाग होते हैं –

अनुलेखन क्रियाविधि –
1. प्रारम्भन (Initiation) –

अनुलेखन की क्रियाविधि :
(a) RNA पॉलीमरेज का वर्धक से जुड़ना एवं RNA शृंखला का समारम्भ (b) RNA शृंखला का दीर्घीकरण
– DNA में ट्रान्सक्रिप्शन के लिए दो क्षेत्र होते हैं–
Promoter site – जहाँ से ट्रान्सक्रिप्शन प्रारम्भ होता है।
Terminator site – जहाँ पर ट्रान्सक्रिप्शन समाप्त होता है।
– सिग्मा (𝜎) कारक की सहायता से RNA Polymerase एन्जाइम DNA के Promoter Site की पहचान कर उससे जुड़ जाता है।
– प्रोकैरियोट्स में प्रारम्भन बिन्दु के 10 नाइट्रोजन क्षार पहले 6- नाइट्रोजन क्षारक (TATAAT) का एक विशिष्ट क्रम होता है जिसे Pribnow box कहते हैं।
– यूकैरियोट्स में प्रारम्भन बिन्दु के 20 N2 – क्षारक पहले 7 – नाइट्रोजन क्षारकों (TATAAAA or TATATAT) का एक विशिष्ट क्रम होता है जिसे TATA box या Hogness box कहा जाता है।
– Promoter site पर RNA Polymerase एन्जाइम DNA की दोनों शृंखलाओं के मध्य उपस्थित H-bonds को तोड़कर उन्हें पृथक् कर देता है।
– DNA की Antisense स्ट्रैण्ड पर 5′-3″ दिशा में ट्रान्सक्रिप्शन होता है।
– Antisense Strand के N2 – क्षारकों के सामने पूरक न्यूक्लियोटाइड आकर व्यवस्थित हो जाते हैं।
– ये न्यूक्लियोटाइड्स ट्राइफॉस्फेट ATP, GTC, CTP, UTP के रूप में होते हैं।
– जब ये ट्रान्सक्रिप्शन में उपयोग होते हैं तो पायरोफॉस्फेटेज एन्जाइम द्वारा इनके दो फॉस्फेट समूह पृथक् कर दिये जाते हैं इस प्रक्रिया में ऊर्जा उत्पन्न होती है जो ट्रान्सक्रिप्शन में काम आती है।
2. दीर्घीकरण (Elongation) –
– RNA polymerase एन्जाइम, पूरक न्यूक्लियोटाइड्स के मध्य फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध बना देता है।
– सिग्मा कारक पृथक् हो जाता है व core-enzyme DNA पर तब तक गति करता है जब तक वह Terminator site पर नहीं पहुँच जाता और इसी जगह पर RNA का बनना बन्द हो जाता है।
3. समापन (Termination) –
– Terminator site पर पहुँचने पर RNA – polymerase एन्जाइम DNA से पृथक् हो जाता है।
– Terminator site पर नाइट्रोजन क्षारक पेलिन्ड्रोमिक क्रम में होते हैं।
– यूकैरियोट्स में RNA polymerase एन्जाइम स्वयं ही Terminator site को पहचान कर DNA से पृथक् हो जाता है, परन्तु प्रोकैरियोट्स में Terminator site को Rho-factor (𝜌-factor) द्वारा पहचाना जाता है।
– Rho-factor विशिष्ट प्रोटीन है जो Terminator site को पहचानने में RNA-polymerare एन्जाइम की सहायता करता है।
SPLIT GENE
– Split gene: खोज Philip Sharp and Roberts – Nobel Prize (1993)
– ऐसे जीन जिसमें क्रियाशील भाग (Exon) के साथ-साथ निष्क्रिय भाग (Intron) भी उपस्थित होता है।
– Split gene के ट्रान्सक्रिप्शन के द्वारा ऐसा RNA बनता है जिसमें coding क्रम के साथ-साथ noncoding क्रम भी उपस्थित होता है। इसे hn – RNA (heterogenous nuclear RNA) कहते हैं।
– यह hn-RNA अस्थायी होता है। RNA splicing में कुछ विशिष्ट प्रोटीन भी सहायक है जिन्हें small nuclear ribonucleoprotein या ‘SnRNP’ या ‘Snurps’ कहते हैं। यह SnRNP protein कुछ दूसरे प्रोटीन एवं SnRNA के साथ मिलकर Spliceosome complex बनाते हैं।
– इसके 3′ end पर Adenylic acid के लगभग 200 nucleotide जोड़कर इसे स्थायी बनाया जाता है इस भाग को poly ‘A’ tail कहते हैं।
– hn-RNA के 5 end पर 7 methyl guanosine भी जोड़ा जाता है इस प्रक्रिया को capping कहा जाता है।
– RNA splicing द्वारा hn-RNA से क्रियाशील m-RNA का निर्माण होता है।
– Splicing प्रक्रिया में non coding part को Ribonuclease एन्जाइम की सहायता से हटा दिया जाता है तथा coding भाग को RNA ligase एन्जाइम की सहायता से जोड़ दिया जाता है।
– यह complex ATP की सहायता से non coding part को हटाने व coding part को जोड़ने में सहायक होता है।
– hn RNA का non coding part केन्द्रक में ही रह जाता है। केवल coding part ही केन्द्रक से निकलकर cytoplasm में आता है। जहाँ उसका अनुवादन प्रोटीन में होता है।
– अधिकांश यूकैरियोटिक जीन split gene होती है अपवाद – Histone व Interferon बनाने वाली जीन।
– अधिकांश प्राकैरियोटिक जीन non split प्रकार की होती है।
– यूकैरियोट में अनुलेखन के पश्चात् RNA की समबंधन (splicing) होती है।
– विभक्त जीन, जीनोम के प्राचीन रूप को निरूपित करती है।
– इन्ट्रोन की उपस्थिति एक प्राचीन लक्षण है।
– समबंधन (splicing) प्रक्रिया RNA संसार की प्रभुता को व्यक्त करती है।
आनुवंशिक कूट (GENETIC CODE)
– खोज नीरेनबर्ग, मथाई व खुराना ने की। पद – जॉर्ज गेमोव ने दिया।
– आनुवंशिक कूट, DNA या m-RNA के क्षारों के अनुक्रम तथा प्रोटीन में अमीनो अम्लों के क्रम के बीच का संबंध है।
– प्रोटीन संश्लेषण में 20 प्रकार के अमीनो अम्ल भाग लेते हैं। कोशिका में समस्त प्रकार के प्रोटीन संश्लेषण के लिए आनुवंशिक सूचना DNA में N, क्षारकों के क्रम के रूप में निहित होती है। ट्रान्सक्रिप्शन के दौरान DNA से आनुवंशिक सूचनाएँ पूरक क्रम के रूप में m-RNA में स्थानान्तरित हो जाती है।
– m-RNA के पास प्रत्येक अमीनो अम्ल के लिए संकेत होता है जिसे codon कहा जाता है। एक कोडोन m-RNA पर उपस्थित न्यूक्लियोटाइड्स का क्रम है जो एक अमीनो अम्ल की सूचना देता है।
ट्रिप्लेट कोड (Triplet Code) –
– आनुवंशिक संकेत की मुख्य समस्या यह है कि एक कोडोन में कितने N, क्षारक होते हैं। आनुवंशिक संकेत (singlet) होता है या Doublet या Triplet.
– m-RNA में 20 प्रकार के अमीनो अम्लों को सूचना देने के लिए चार प्रकार के N2 क्षारक (A, U, G, C) पाए जाते हैं।
– यदि आनुवंशिक कूट को Singlet माना जाए अर्थात् एक कोडोन केवल एक N2–क्षारक का बना हो तो इस स्थिति में केवल चार कोडोन A, C, G तथा U ही बन पाएँगे। ये चार कोडोन 20 प्रकार के अमीनो अम्लों के लिए अपर्याप्त हैं।
– Singlet code = 41 = 4 1 = 4 codons
– यदि आनुवंशिक कूट को doublet माना जाए अर्थात् कोडोन को दो N2–क्षारकों से मिलकर बना हुआ माना जाए तो इस स्थिति में 16 कोडोन्स बनते हैं।
– Doublet code = 42 = 4 4 = 16 codons.
– ये 16 codons भी 20 अमीनो अम्लों के लिए अपर्याप्त हैं।
A | Codons | AA | AC | AG | AU |
C | CC | CA | CG | CU | |
G | GG | GA | GC | GU | |
U | UU | UA | UG | UC |
Singlet Code: 4 1 = 4 Codons
Doublet Code: 4 4 = 16 Codons
– तीन क्षारकों के रूप में आनुवंशिक संकेत होने की बात गेमो (Gamow) ने बताई।
– यदि codon को Triplet माना जाए अर्थात् एक कोडोन को तीन क्षारकों का समूह माना जाए। तीन-तीन क्षारकों का समूह मिलकर एक अमीनो अम्ल को संकेत दें, तो इस स्थिति में 64 कोडोन्स बनते हैं जो 20 अमीनो अम्लों को संकेत देने के लिए पर्याप्त हैं।
Triplet code = 43
= 4 4 4 = 64 codons
– H.G. खुराना ने एक m-RNA का कृत्रिम संश्लेषण किया था।
– सेवेरो ओकोआ एन्जाइम (RNA पॉलीमरेज एन्जाइम) RNA को स्वतंत्र रूप से टेम्पलेट के निश्चित अनुक्रमों के बिना बहुलीकरण में सहायता प्रदान करता है।
आनुवंशिक कूट का लक्षण Characteristics of Genetic Code–
(i) Triplet in Nature (त्रिक कोडोन)– एक कोडोन तीन N2 क्षारकों से मिलकर बना होता है। एक कोडोन एक अमीनो अम्ल को संकेत देता है। उदाहरण के तौर पर –
यदि -RNA में कुल 90 N2 – क्षारक हों तो इस m RNA द्वारा पॉलीपेप्टाइड शृंखला में 30 अमीनो अम्ल निर्धारित किए जाएँगे।
N2–क्षारक = 90 तो codon = 30
इसलिए प्रोटीन की शृंखला में 30 अमीनो अम्ल सांकेतिक किए जाएँगे।
(ii) सार्वत्रिकता (Universality) – आनुवंशिक कूट सार्वत्रिक होता है अर्थात् सभी प्रकार के सजीवों में एक जैसा आनुवंशिक कूट पाया जाता है, एक त्रिक कोडोन समस्त जीवों में निश्चित अमीनो अम्ल का ही संकेत देते हैं।
(iii) अतिव्यापकता विहीन (Non-Overlapping) –
– आनुवंशिक कूट non-overlapping होता है। एक नाइट्रोजन क्षारक केवल एक कोडोन का ही घटक होता है।
– कोडोन में उपस्थित प्रत्येक क्षारक एक बार में मात्र एक ही संकेत का भाग होते हैं।
(iv) नॉन एम्बीगुअस (Non – Ambiguous) (असंदिग्ध) – आनुवंशिक कूट non ambiguous होता है एक कोडोन केवल एक ही अमीनो अम्ल के लिए होता है अर्थात् इस स्थिति में एक कोडोन कभी भी दो भिन्न अमीनो अम्लों को संकेत नहीं देता है।
(v) कोमा विहीन (Comma less) –
– निकटवर्ती कोडोन्स के मध्य कोई कोमा, कोई अवकाश नहीं होता है। आनुवंशिक संकेतों के संदेश न्यूक्लिक अम्ल शृंखला के एक सिरे से दूसरे सिरे तक बिना किसी व्यवधान के होते हैं।
– न्यूक्लिक अम्ल की शृंखला में यदि किसी न्यूक्लियोटाइड को हटा दिया जाए या जोड़ दिया जाए तो आनुवंशिक संदेश का संकेत पूरी तरह से बदल जाता है।
– एक पॉलीपेप्टाइड शृंखला जिसमें 50 amino acid हैं और यह 150 न्यूक्लियोटाइड्स के रेखीय क्रम द्वारा निर्धारित होती है।
– यदि न्यूक्लियोटाइड के रेखीय क्रम के मध्य में एक अतिरिक्त न्यूक्लियोटाइड जोड़ दिया जाए या हटा दिया जाए तो इस न्यूक्लियोटाइड्स क्रम द्वारा निर्धारित होने वाली पॉलीपेप्टाइड शृंखला में प्रथम 25 अमीनो अम्ल तो अपरिवर्तित रहेंगे लेकिन अगले 25 अमीनो अम्ल पूरी तरह से परिवर्तित हो जाएँगे।
(vi) आनुवंशिक कूट की अपह्मासिता (Degeneracy of Genetic code) –
– आनुवंशिक कूट त्रिक के रूप में होता है अतः आनुवंशिक कूट की शब्दावली में कुल 64 कोडोन्स सम्भव हैं।
– ये 64 codons, 20 प्रकार के अमीनो अम्लों को संकेत देते हैं।
– अतः 20 में से दो को छोड़कर बाकी के सभी अमीनो अम्ल, एक से ज्यादा कोडोन्स के द्वारा संकेत प्राप्त करते हैं। एक अमीनो अम्ल के लिए एक से ज्यादा कोडोन्स का होना ‘आनुवंशिक कूट की अपभ्रष्टता’ (Degeneracy of genetic code) कहलाता है।
– इस परिघटना की खोज Nirenberg तथा Baumfield ने की।
– दो अमीनो अम्ल ट्रिप्टोफेन तथा मिथियोनिन के लिए केवल एक-एक कोडोन होता है।

– उपर्युक्त दोनों अमीनो अम्लों को छोड़कर बाकी के अमीनो अम्लों के लिए 2 से 6 तक कोडोन्स होते हैं।
– ल्यूसीन (Leucine), सिरीन (Serine) तथा आर्जीनिन (Arginine) तीनों अमीनो अम्लों के लिए अधिकतम 6-कोडोन होते हैं।
Leucine =
CUU, CUC, CUA, CUG, DUA & UUG
Serien =
UCU, UCC, UCA, UCG, AGU, AGC
Arginine =
CGU, CGC, CGA, CGG, AGA, AGG
– आनुवंशिक कूट की अपभ्रष्टता कोडोन के तीसरे सदस्य से सम्बन्धित हैं अपभ्रष्ट कोडोन के पहले दो नाइट्रोजन क्षारक ही विशिष्ट होते हैं अर्थात् समान होते हैं जबकि तृतीय N2–क्षारक भिन्न होता है। इस तृतीय क्षार को Wobbly base कहा जाता है।
शृंखला प्रारम्भन तथा शृंखला समापन कोडोन
(Chain Initiation and Chain Termination Codon)–
– AUG या GUG प्रारम्भन कोडोन्स के द्वारा पॉलीपेप्टाइड शृंखला के संश्लेषण की शुरुआत की जाती है।
– AUG कोडोन methionine अमीनो अम्ल के लिए तथा GUG कोडोन सामान्यतया valine अमीनो अम्ल को संकेत देता है लेकिन जब यह शुरुआती स्थिति में होता है तो यह methionine को संकेत देता है।
– यूकैरियोट्स में AUG कोडोन मिथियोनिन को कोड करता है जबकि prokaryote में AUG कोडोन N-formly methionine के लिए होता है।
– 64 कोडोन्स में से 3 कोडोन ऐसे होते हैं जो किसी भी अमीनो अम्ल को संकेत नहीं देते हैं इनको समापन कोडोन (stop codon or termination codon/non-sense codon) कहा जाता है।
UAA (Ochre)UAG (Amber)UGA (Opal) | Non-Sense Codon |
– आनुवंशिक कूट की शब्दावली 61-codons को Sense codons कहा जाता है जो अमीनो अम्लों को सूचना देते हैं।
CENTRAL DOGMA
– ‘सेन्ट्रल डोग्मा’ नाम Crick ने प्रस्तुत किया। DNA से संदेशवाहक RNA का निर्माण एवं इससे फिर प्रोटीन के निर्माण को सेन्ट्रल डोग्मा कहा जाता है अर्थात् इसमें अनुलेखन (Transcription) तथा अनुवादकरण (Translation) शामिल किए जाते हैं।

– प्रोटीन संश्लेषण की सेन्ट्रल डोग्मा स्कीम Jacob and Monad ने प्रस्तुत की।
– सेन्ट्रल डोग्मा का विस्तारपूर्वक अध्ययन Nirenberg, Mathai and Khorana ने किया।
– Beedle and Tatum ने न्यूरोस्पोरा नामक कवक में Central Dogma का अध्ययन किया।

REVERSE TRANSCRIPTION –
– RNA से DNA का निर्माण प्रतीप – अनुलेखन या Reverse transcription कहलाता है। इसकी खोज Temin and Baltimore ने Rous – sarcoma वायरस में की। अतः इसे Terminism भी कहते हैं। इस प्रक्रिया में Reverse Transcriptase या RNA dependant DNA polymerase काम आता है। RNA Template पर बनने वाले DNA को c-DNA या Retroposon कहा जाता है। यह Retroposon, oncogene की तरह व्यवहार करता है।
प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis)
– m-RNA पर उपस्थित आनुवंशिक कूट के अनुसार प्रोटीन में अमीनो अम्लों का क्रम निर्धारित होता है। प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया में निम्नलिखित पद काम आते हैं –
1. अमीनो अम्लों का सक्रियण (Activation of amino acids) –
– प्रोटीन संश्लेषण में 20 प्रकार के अमीनो अम्ल भाग लेते हैं।
– अमीनो अम्ल ATP से क्रिया करके Amino acyl AMP enzyme complex बनाते हैं। इसको सक्रिय अमीनो अम्ल भी कहा जाता है। इस क्रिया को विशेष प्रकार का अमीनो एसाइल t-RNA सिन्थेटेज एन्जाइम उत्प्रेरित करता है। 20 प्रकार के अमीनो अम्लों को सक्रिय करने के लिए 20 प्रकार के Amino acyl t-RNA synthatase एन्जाइम पाए जाते हैं।
Amino acid + ATP ⟶𝐴𝑚𝑖𝑛𝑜 𝑎𝑐𝑦𝑙𝑡−𝑅𝑁𝐴 𝑆𝑦𝑛𝑡ℎ𝑎𝑡𝑎𝑠𝑒 Amino acyl AMP-enzyme complex + PP
2. t- RNA की charging या loading –
– विशेष प्रकार के सक्रिय अमीनो अम्ल को एक विशेष प्रकार के t-RNA द्वारा पहचाना जाता है। सक्रिय अमीनो अम्ल विशेष प्रकार के t-RNA की amino acid attachment site से जुड़ जाता है व AMP तथा एन्जाइम पृथक् हो जाते हैं।
Amino acyl AMP – enzyme complex + t-RNA → Amino acylt RNA complex + AMP + enzyme
– Amino acyl t-RNA complex को charged t – RNA या loaded t – RNA कहा जाता है। यह charged t-RNA राइबोसोम पर प्रोटीन संश्लेषण के लिए जाता है।
3. अनुवादन (Translation) तीन चरणों में सम्पूर्ण होता है –
(i) पोलीपेप्टाइड शृंखला का प्रारम्भन (Initiation of polypeptide chain)
– इस प्रक्रिया में राइबोसोम की दोनों उपइकाइयाँ (50s, 30s), GTP, mg+2, charged tRNA, m-RNA तथा कुछ प्रारम्भन कारक भाग लेते हैं।
– प्रोकैरियोट्स में तीन प्रारम्भन कारक IF1, IF2 तथा IF3 पाए जाते हैं।
– यूकैरियोट्स में प्रारम्भन कारकों की संख्या ‘दस’ होती है।
– ये प्रारम्भन कारक प्रोटीन प्रकृति के होते हैं।
– GTP तथा Initiation factor प्रारम्भन की प्रक्रिया को उत्प्रेरित करते हैं।
– राइबोसोम की दोनों उपइकाइयाँ IF3 कारक की सहायता से अलग-अलग होती है।
– प्रोकैरियोट्स में ‘SD-sequence’ (shine – Delgarno sequence) की सहायता से m-RNA राइबोसोम की 30s वाली छोटी उपइकाई को पहचानता है। m-RNA के प्रारम्भन कोडोन AUG के 4-12 N2–क्षारक पहले 8-N2 क्षारकों का बना हुआ विशेष क्रम होता है जिसको SD क्रम कहा जाता है।
– राइबोसोम की छोटी उपइकाई में 16s rRNA पर ‘SD क्रम’ का पूरक पाया जाता है, जिसको Anti Shine-Delgarmo (ASD) क्रम कहा जाता है।
– SD क्रम तथा ASD क्रम की सहायता से m RNA व 30s वाली उपइकाई आपस में जुड़ जाती हैं।
– जबकि यूकैरियोट्स में राइबोसोम की छोटी उपइकाई को m-RNA के 7 methyl guanosine (cap) वाले भाग की सहायता से पहचाना जाता है, यूकैरियोट्स में राइबोसोम की छोटी उपइकाई में स्थित 18s r – RNA पर ‘7mG cap’ का पूरक क्रम पाया जाता है।

– यह 30s – mRNA वाला complex शुरुआती t-RNA से जुड़ जाता है। जिसके फलस्वरूप 30s mRNA fomyl met. t-RNA complex बन जाता है। इस प्रक्रिया में GTP का अणु काम आता है।
30 ‘S’ m-RNA – complex + Formyl methionyl t-RNA – complex

30 ‘S’ m-RNA formyl methionyl t-RNA – complex
– राइबोसोम की बड़ी उपइकाई में t – RNA के जुड़ने के लिए तीन स्थल होते हैं–
‘P’ site = Peptidyl site
‘A’ site = Amino acyl site
‘E’ site = exit site
– E-site से t-RNA discharged होकर राइबोसोम से बाहर निकलता है।
– m-RNA का शुरुआती कोडोन AUG राइबोसोम की P-site के नजदीक स्थित होता है अतः शुरुआती E-RNA (formyl methionine amino acid वाला) सबसे पहले P-site पर जुड़ता है तथा m-RNA का अगला codon राइबोसोम की A-site के नजदीक स्थित होता है लेकिन प्रारम्भन वाले पद में A site खाली रहती है।
(ii) प्रोटीन की शृंखला का दीर्घीकरण (Elongation of polypeptide chain) –
– इस step में नए-नए charged t-RNA, GTP, Mg+2 तथा दीर्घीकरण कारक काम आते हैं।
– m-RNA का नया codon राइबोसोम की A-site के नजदीक स्थित होता है अतः नया Charged t-RNA राइबोसोम की A site पर आकर जुड़ता है। सबसे पहले P-site पर उपस्थित t-RNA की discharging होती है, जिसके कारण P-site पर उपस्थित A.A. का COOH स्वतंत्र हो जाता है। अब P-site पर उपस्थित अमीनो अम्ल के COOH समूह तथा A-site पर उपस्थित अमीनो अम्ल के NH2 समूह के मध्य Peptide bond बनता है।
– पेप्टाइड बन्ध बनाने की क्रिया को Peptidyl transferase एन्जाइम उत्प्रेरित करता है। पेप्टाइड बन्ध बनने की क्रिया में 23-s r–RNA भी सहायक होता है। यह r–RNA एन्जाइम की तरह कार्य करता है अतः इसको ribozyme भी कहा जाता है।
– पेप्टाइड बन्ध बनने के बाद P-site पर उपस्थित t-RNA unloaded होकर E-site पर मुक्त हो जाता है तथा dipeptide A site वाले t-RNA से जुड़ जाता है, अब A-site वाला tRNA, P-site पर स्थानान्तरित हो जाता है तथा A site फिर खाली हो जाती है।
– अब राइबोसोम m RNA की स्ट्रैण्ड के ऊपर 5′-3″ दिशा में गति करता है। इस गति के कारण mRNA के नए-नए codon राइबोसोम की A-site के नजदीक उपलब्ध होते जाते हैं तथा उपलब्ध कोडोन के अनुसार नए-नए अमीनो अम्लों को लेकर आने वाले tRNA राइबोसोम की A-site पर जुड़ते जाते हैं। जिसके फलस्वरूप पॉलीपेप्टाइड शृंखला में नए-नए अमीनो अम्ल जुड़ते जाते हैं और पॉलीपेप्टाइड शृंखला का दीर्घीकरण होता जाता है।
– राइबोसोम की गति के लिए ऊर्जा GTP देता है तथा इस प्रक्रिया को translocase एन्जाइम उत्प्रेरित करता है।
(iii) शृंखला समापन पद (Chain termination step) –
– m-RNA पर राइबोसोम की गति के कारण जब m-RNA का कोई-सा भी non sense कोडोन (UAA या UAG या UGA) A-site पर उपस्थित हो जाता है तो प्रोटीन संश्लेषण उसी बिन्दु पर समाप्त हो जाता है।
– अन्तिम t-RNA व पॉलीपेप्टाइड शृंखला के बीच उपस्थित बन्ध को विमुक्तिकारक RF1, RF2, तथा RF3, GTP की सहायता से तोड़ देते हैं प्रोटीन की शृंखला राइबोसोम से मुक्त हो जाती है।
– यूकैरियोट्स में केवल एक release factor eRF1 पाया जाता है।
– m-RNA की संरचना में कुछ विशिष्ट क्रम भी होते हैं, जिनका अनुवादन नहीं होता है, इन्हें अन अनुवादित क्षेत्र (Untranslated region) (UTR) कहते हैं। UTR mRNA के 5′ सिरे पर प्रारंभिक कोडोन से पहले व 3′ सिरे पर समापन कोडोन के बाद होता है।
– m-RNA पर उपस्थित UTR (अन अनुवादित क्षेत्र) दक्षता पूर्ण अनुवादन के लिए आवश्यक है। (mRNA द्वारा राइबोसोम की छोटी उपइकाई को पहचानना)
जीन अभिव्यक्ति का नियमन (Regulation of Gene Expression)–
– जीन्स के कार्यों का नियमन जीन अभिव्यक्ति का नियमन कहलाता है। इसे चार स्तरों पर काम में लाया जा सकता है।
(i) प्राइमरी ट्रांसक्रिप्ट के निर्माण के दौरान अनुलेखन स्तर
(ii) प्रोसेसिंग जैसे स्प्लाइसिंग टर्मिनल एडीशन या रूपान्तरण
(iii) केन्द्र से कोशिका द्रव्य में RNA का स्थानान्तरण
(iv) अनुवाद स्तर
– जीन अभिव्यक्ति के तीन प्रकार हैं–
(1) Inducible
(2) Constitutive
(3) Repressible
(1) Inducible – सब्स्ट्रेट (प्रेरक) की उपस्थिति में क्रियाशील हो जाता है।
(2) Constitutive – जीन तथा उनसे निर्मित एन्जाइम्स सदैव क्रियाशील रहते हैं।
(3) Repressible – इसके दो प्रकार हैं–
(i) धनात्मक नियंत्रण (Positive Control) – नियामक जीन का उत्पाद अपने नियंत्रण में जीन्स की अभिव्यक्ति को प्रेरित करता है।
(b) ऋणात्मक नियंत्रण (Negative control) – नियामक जीन का उत्पाद अपने नियंत्रण में जीन्स की अभिव्यक्ति को अवरोधित करता है।
ओपेरॉन मॉडल (Operon systems) –
– एक ओपेरॉन, DNA का खण्ड है जो एकल नियामक इकाई के रूप में कार्य करता है तथा इसमें एक रेगुलेटर (नियामक) जीन, एक प्रमोटर (उन्नायक), एक ओपरेटर (प्रचालक) जीन, एक या अधिक संरचनात्मक जीन, एक रिप्रेसर (दमनक) तथा एक इन्ड्यूसर (प्रेरक) या कोरिप्रेसर (सहदमनक) होते हैं। ये सामान्य रूप से प्रोकैरियोट्स में होते हैं।
प्रथम ओपेरॉन लेक ओपेरोन की खोज ई. कोलाई में जेकब तथा मोनाड (1961) ने की थी।
– ओपेरॉन में दो प्रकार शामिल हैं–
1. प्रेरकीय ओपेरॉन तन्त्र (Inducible operon system)
2. दमनकारी ओपेरॉन तन्त्र (RepressibleOperon System)
1. प्रेरकीय ओपेरॉन तन्त्र (Inducible operon system) – यह केटाबॉलिक (अपचयी) पाथ-वे में पाए जाते हैं। उदाहरण – लेक्टोज ओपेरॉन या लेक ओपेरॉन। लेक ओपेरॉन में निम्नलिखित घटक होते हैं–
(i) संरचनात्मक जीन्स (Structural genes) –
– ये वास्तव में अनुलेखन द्वारा m-RNA के संश्लेषण का नियंत्रण करते हैं। ये पॉलीपेप्टाइड शृंखला की प्राथमिक संरचना निर्धारित करते हैं। लेक ओपेरॉन में तीन संरचनात्मक जीन z, y, a पॉलीसिस्ट्रोनिक m-RNA के निर्माण में भाग लेते हैं। जो गेलेक्टोसिडेज, परमियेज तथा ट्रांसएसीटिलेज एन्जाइम के संश्लेषण का नियमन करता है।
– 𝛽-गेलेक्टोसिडेज लेक्टोज का ग्लूकोज व ग्लाइकोजन में जलअपघटन कर देता है। परमियेज लेक्टोज के कोशिका में प्रवेश को प्रेरित करता है ट्रांसएसीटिलेज विषैले थायोगलेक्टोसाइड्स के उपापचय को नियंत्रित करता है।
(ii) ओपरेटर जीन (Operator gene) –
– यह संरचनात्मक जीन की क्रियाओं का नियंत्रण करता है। जब रेगुलेटर जीन का रिप्रेसर ओपरेटर जीन से जुड़ता है तो ओपरेटर जीन निष्क्रिय हो जाता है।
(iii) प्रमोटर जीन (Promoter gene) –
– यह समारम्भ संकेत के रूप में कार्य करता है। इस पर RNA पॉलीमरेज़ एन्जाइम जुड़ा होता है। जब ओपरेटर जीन क्रियाशील होता है इसका RNA पॉलीमरेज़ संरचनात्मक जीन पर स्थानान्तरित होता है तथा अनुलेखन सम्पन्न करता है।

(iv) रेगुलेटर जीन (Regulator gene) –
– यह रिप्रेसर के संश्लेषण का नियमन करता है। इसे इनहींबीटर जीन या i gene भी कहते हैं।
(v) रिप्रेसर (Repressor) – यह रेगुलेटर जीन द्वारा निर्मित प्रोटीनीकृत पदार्थ है। इस पर दो एलोस्टेरिक स्थल होते हैं, एक ओपरेटर जीन के जुड़ने के लिए तथा दूसरा प्रेरक (Inducer) के जुड़ने के लिए।
(vi) प्रेरक (इन्ड्यूसर) – यह रासायनिक पदार्थ (हॉर्मोन, एन्जाइम) होता है जब माध्यम में प्रेरक उपस्थित होता है तो प्रेरक रिप्रेसर से जुड़ता है इसके परिणामस्वरूप रिप्रेसर में कुछ संरूपणात्मक परिवर्तन उस तरह से होते हैं कि यह ओपरेटर जीन से जुड़ने में असमर्थ होता है इस कारण ओपरेटर जीन सतत क्रियाशील रहता है जब प्रेरक का पूर्णतया उपभोग हो जाता है तो रिप्रेसर (पुनः) सक्रिय हो जाता है। लेक ओपेरॉन में लेक्टोज प्रेरक (Inducer) तथा सबस्ट्रेट दोनों के रूप में कार्य करता है। (वास्तव में एलोलेक्टोज प्रेरक के रूप में कार्य करता है)
(viii) CAP (केटाबॉलिक एक्टिवेटर प्रोटीन) –
– यह लेक ओपेरॉन के धनात्मक नियंत्रण के काम में लाया जाता है लेकिन इसकी अनुपस्थिति में RNA पॉलीमरेज़ प्रमोटर जीन से संलग्न नहीं हो पाता है।
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